Tuesday, January 3, 2017

जनतंत्र में जलतरंग
जनतंत्र उस जलाशय के समान होता है, जिसमें अगर एक कंकड़ भी उछालें तो उसके अंदर से ऐसी जलतरंग उठती है कि वह अपनी अंतिम सीमा, जहाँ तक हमारी नजरें दृश्यमान होती हैं, अपने मनोहारी गोल घेरे में लेती चली जाती है। स्वस्थ जनतंत्र में भी ऐसा ही कुछ होता है, इसमें अगर कहीं से भी कोई मुद्दा उछाला जाता है तो पूरे तंत्र को प्रभावित करता है, इसमें आम नागरिक, कार्यपालिका, न्यायपालिका, विधायिका और मीडिया सभी शामिल हैं।
जब प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने आठ नवंबर की रात्रि को भ्रष्टाचार पर जोरदार निशाना साधते हुए नोटबंदी नामक पत्थर उछाला तो जनतंत्र के हर पाए से टकराते हुए इसने अनेक प्रतिक्रियाओं को जन्म दिया। नोटबंदी के बाद जिस तरह भ्रष्टाचार में लिप्त तत्वों ने बेशर्मी से सरकारी तंत्र से गठजोड़ करके काला धन जमा किया था, एक बार फिर उसी बेहयापने से नोटबंदी के कारण उसे कूड़ा बनने से रोकने के लिए प्रोफेशनल दलालों, बैंक के अधिकारियों एवं कर्मचारियों से गठजोड़ कर उसे सफेद करने में लग गए। दूसरी तरफ आम आदमी अपनी दैनिक जरूरतों के लिए दिन भर कतारों में दर-दर की ठोंकरे खाकर भी केन्द्र सरकार के इस सफाई अभियान को सफल बनाने के लिए जय-जयकार करता रहा।
जनतंत्र की रीढ़ आम आदमी को भड़काने के लिए ज्यादातर राजनीतिक दल से लेकर विविध बेईमान स्वार्थी तत्व अनेक प्रयासों में लगे हैं, परंतु आम जनता प्रधानमंत्री के इस कदम को हर हाल में समर्थन दे रही है। इसी का परिणाम है कि प्रधानमंत्री खम ठोककर देश के भ्रष्टाचारी तत्वों को चुनौती दे रहे हैं और दिन-रात छापे पर छापे पड़ रहे हैं तथा इसमें संलिप्त लोग पकड़े जा रहे हैं, चाहे वे नेता हों, बड़े सरकारी अधिकारी हों, बैंकिंग व्यवस्था के अधिकारी-कर्मचारी हांे, प्रोफेशनल दलाल हों या फिर अनेक क्षेत्रों के बडे़ या छोटे व्यवसायी। आतंकवादियों और नक्सलवादियों को तो सूझ ही नहीं रहा कि कैसे उबरें अकस्मात हुए इस प्राणघाती हमले से।
जब इस चोट से पूरा तंत्र प्रभावित हो रहा है तो जनतंत्र का एक प्रमुख अंग राजनीतिक दल कैसे बच सकता था। आज आम जनता, न्यायपालिका, मीडिया से लेकर चुनाव आयोग, सभी पूछ रहे हैं कि काले धन को बढ़ावा देने या उसे सफेद करने में राजनीतिक दलों का भी बहुत बड़ा हाथ है। जब आम जनता पारदर्शिता और भ्रष्टाचार मिटाने के लिए मोदी जी के हर कदम का स्वागत कर रही है तो फिर सरकार और सारे दलों की भी जिम्मेदारी बनती है कि वे भी पारदर्शिता दिखायें और अपने सारे चंदों के स्रोतों का हिसाब दें।
इसी बीच निर्वाचन आयोग ने राजनीतिक दलों द्वारा प्राप्त किए जाने वाले नकद चंदे की अधिकतम सीमा बीस हजार से घटा कर दो हजार करने की सिफारिश की है। आयोग ने इसके लिए जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 में संशोधन का सुझाव दिया है। राजनीतिक दलों को मिलने वाला चंदा आयकर अधिनियम 1961 की धारा 13 (ए) के अंतर्गत दलों को बीस हजार रुपये से कम के नकद चंदे का स्रोत बताना जरूरी नहीं है। इसी का फायदा उठाकार चंदे की अधिकांश राशि को बीस हजार से कम राशियों में झूठे नामों से अपने खातों में दर्ज कर कानून को ठेंगा दिखाते हैं और करोडों-करोड़ रुपये काले से सफेद करते हैं। यह अधिनियम देश में फैले भ्रष्टाचार की जननी बन गया है। 
केंद्रीय सूचना आयोग कई बार राजनीतिक दलों से आग्रह एवं आदेश भी दे चुका है कि अपनी पूरी कार्यप्रणाली को सूचना के अधिकार कानून के दायरे में लाया जाए। परंतु सारे राजनीतिक दल इसके दायरे में आने से अब तक आना-कानी करते रहे हैं। आज चुनाव सुधार के काम में जुटे अनेक पूर्व चुनाव आयुक्तों एवं स्वैच्छिक संस्थाओं की तरफ से एक मांग जोरदार ढंग से उठ रही है कि सीएजी या चुनाव आयोग की ओर से नियुक्त स्वतंत्र ऑडिटर द्वारा सभी राजनीतिक दलों के वित्तीय लेन-देन का सालाना ऑडिट होे और उसकी रिपोर्ट चुनाव आयोग की वेबसाइट पर डाली जाए।
कानपुर  में हुई रैली में जनता को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने चुनाव आयोग के सुझाव का समर्थन किया तथा चुनाव सुधार को अपनी प्राथमिकताओं में सबसे ऊपर रखने की घोषणा की है। प्रधानमंत्री के आह्वान पर आज पूरा सरकारी तंत्र ऑनलाइन भुगतान व्यवस्था पर जोर दे रहा है, ताकि भ्रष्टाचार और काली कमाई पर प्रभावी रोक लगे तथा भारतीय अर्थव्यवस्था अधिक पारदर्शी बने। देश की आम जनता भी अनेक परेशानियाँ उठाकर प्रधानमंत्री के साथ खड़ी है। परंतु आज चुनाव आयोग, मीडिया तथा आमजनों को भी संशय है कि राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे के स्वच्छ और पारदर्शी हुए बिना क्या हमारी व्यवस्था पूरी तरह से भ्रष्टाचार और कालेधन से मुक्त हो पाएगी?
प्रधानमंत्री ने जिस ताकत और हिम्मत से नोटबंदी नामक पत्थर से भ्रष्टाचार पर निशाना साधा है और बेनामी संपत्ति की आड़ में काला धन खपाने वालों पर हमला बोल रहे हैं, उसी मुस्तैदी से कालेधन को सफेद करने वाली एक प्रमुख ढाल राजनीतिक चंदे को भी पारदर्शी करने के लिए आगे बढ़ें। तत्काल कम से कम तीन कदम, जिसमें पहला, जनप्रतिनिधित्व कानून 1951 में संशोधन, जिसके तहत 20 हजार तक के चंदे के स्रोत बताने की छूट मिली हुई है का उन्मूलन। दूसरा, सभी राजनीतिक दलों को सूचना का अधिकार कानून के दायरे में लाना। तथा तीसरा, सभी दलों के लिए चुनाव आयोग द्वारा नियुक्त ऑडिटर के माध्यम से हर साल ऑडिट कराना अनिवार्य करने के लिए तत्काल कदम उठायें। और सभी राजनीतिक दल सर्वसम्मति से इसमें साथ दें।
हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि कंकड उछालने से उठा जलतरंग का घेरा उसी जलाशय की अंतिम सीमा तक पहुँचता है, जो पूरी तरह से स्वच्छ और निर्मल हो, कूड़ा-करकट से भरे जलाशय में तो बड़ा से बड़ा पत्थर फेंकने पर भी वही छपाक से, बिना कोई खास हलचल मचाये कुछ पलों में ही शांत होकर बैठ जाता है। आशा है, सरकार एवं समाज के समन्वित प्रयास से हमारा जनतंत्र इतना स्वच्छ-निर्मल बन जाए कि हर छोटे मुद्दे पर भी जनतंत्र रूपी जलाशय में ऐसी नयनाभिराम जलतरंग उठे कि सीमांत तक एक रचनात्मक सरगम पैदा करते हुए शुभाशुभ परिणति को प्राप्त करे। 



Wednesday, November 30, 2016

जो जल बाढ़े नाव में...

इन दिनों जिस तरह नदियों-तालाबों में, गली-चौराहों पे, कूड़े के ढेर में, कारों एवं बसों में पाँच सौ और हजार-हजार रुपये के नोट लावारिस थोक के थोक मिल रहे हैं, उससे यही लग रहा है मानो कबीर की ये पंक्तियाँ, ‘‘जो जल बाढ़े नाव में घर में बाढ़े दाम, दोउ हाथ उलीचिए यही सयानो काम।’’ साकार हो गई हो। काश! ऐसा स्वतःस्फूर्त हो पाता तो आज हमारे समाज, देश और दुनिया का रूप ही कुछ और होता। हर जगह असमानता, गरीबी, भ्रष्टाचार, भुखमरी, गंदगी, बीमारी, अशिक्षा, अंधविश्वास, हिंसा, आतंकवाद, दंगे-फसाद और पर्यावरण विनाश का यह घृणित रूप देखने को नहीं मिलता। दुनिया का चेहरा इतना विद्रूप नहीं होता।   
आज लावारिस पैसे फैंके एवं बहाये जा रहे हैं तो इसके पीछे केन्द्र सरकार के एक साहसिक सधे कदम का नतीजा है। जिसका उद्देश्य देश में गंदे, काली कमाई से कमाये काले पैसे के आमद को रोकना है। देश की अधिकांश आर्थिक, राजनीतिक एवं सामाजिक समस्याओं की जड़ में यह काली कमाई का पैसा ही है, जिसकी आमद विदेशों से नकली नोट के रूप में आतंकवादियों एवं नक्सलियों के पास, अनेकों स्वैच्छिक संगठनों के पास, समाज-सेवा एवं अल्पसंख्यकों एवं दलितों के कल्याण के नाम पर चंदे के रूप में, नशे के कारोबारियों के पास अवैध आमद के रूप में तथा सोने की तस्करी के रूप में, तो देश के अंदर टैक्स चोरी, घूसखोरी, मानव अंगों की तस्करी, खाद्य पदार्थों में मिलावट आदि अनेक अवैध तरीकों से उत्पादित होता है। यह काला धन सिर्फ नोट के रूप में ही नहीं है, नोट के रूप में तो यह सिर्फ 6 से 8 प्रतिशत तक ही है बाकी तो अवैध बेनामी मकान, जमीन, सोना एवं विदेशी बैंको में जमा पैसों के रूप में है।
सरकार के सिर्फ पहले कदम यानी काले नकदी धन पर चोट से देश में इतना बड़ा तुफान खड़ा हो गया है। अन्य दूसरे कदमों, जिससे काले धन के अनेक अन्य रूपों पर जब सरकार का हमला होगा तो कितना भयंकर भूकंप, आँधी और ओले गिरेंगे, वह देखने वाला दृश्य होगा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सरकार के लिए यह परीक्षा की घड़ी है कि उनके कदम कितनी मजबूती से जमीन पर टिके रहेंगे, न केवल टिके रहेंगे बल्कि इसे अंजाम तक पहुँचाने में उतनी ही मजबूती से वह बढ़ पायेगी या नहीं? इसके शिकार बने शक्तिशाली लोग चैन से नहीं बैठेंगे और विरोध को लगातार हवा देते रहेंगे। हालाँकि प्रधानमंत्री ने अपने गोवा के भाषण में यह जता दिया है कि उनके कदम सख्ती से आगे बढ़ेंगे, चाहे उसकी कीमत जान देकर भी क्यों न चुकानी पड़े।    
          15 अगस्त, 2014 को स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री ने लालकिले से स्वच्छ भारत अभियानकी घोषणा करते हुए कहा था कि ‘‘केंद्र सरकार की योजना इस अभियान को जन-आंदोलन का रूप देकर आर्थिक गतिविधियों से जोड़ना है। सरकार का लक्ष्य गांधी की 150वीं जयंती 2019 तक पूरे देश को स्वच्छ भारत में तब्दील करना है।’’ इसी को अमली जामा पहनाने के लिए 2 अक्तूबर, 2014 को गाँधी जयंती पर जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सड़कों पर सफाई अभियान को निकले थे, उस समय उनके आलोचकों ने, अनेक पत्रकारों, यहाँ तक समाज के अनेक प्रबुद्ध वर्ग के लोगों तक ने इसे मात्र झाडू मारने एवं फोटोखिंचाऊ अभियान तक सीमित कर दिया; परंतु नरेन्द्र मोदी को नजदीक से जाननेवाले लोग अच्छी तरह से जानते हैं कि यह आदमी अगर कुछ कहता और संकल्प लेता है तो इसकी गूँज और इसका संदर्भ वहीं तक सीमित न होकर काफी दूर तक गुँजायमान होता है। उसकी टंकार काफी दूर तक झंकृत होती है।
स्वच्छता अभियान को झाडूमार अभियान तक सीमित करनेवाले उनके कथन में स्वच्छता अभियान को आर्थिक गतिविधियों से जोड़नेवाला कथन को या तो याद रखना भूल गए या जानबूझकार भुला दिया, जबकि इस अभियान का असली मर्म इसी आर्थिक गतिविधि में छुपा हुआ था। कहने का तात्पर्य यह है कि जबतक देश की आर्थिक गतिविधियाँ स्वच्छ नहीं होंगी, तबतक संपूर्ण स्वच्छता का सपना दिवास्वप्न ही बनी रहेगी। क्या गंदगी भरे कारोबार और आचार-विचार से ग्रस्त देश और समाज की सड़कें एवं पर्यावरण स्वच्छ बना रह सकता है?
आज मोदी सरकार की झाडू हर उस कोने और और काली कमाई की कंदराओं की सफाई कर रही है और अनेक अछूती जगहों पर घुसकर सफाई करने को मचल रही है। सरकार ने अपने तेवर से बता दिया है कि झाडू अब सिर्फ धूल और पत्ते ही नहीं बल्कि आजादी के बाद से ही आम लोगों तक आर्थिक और सामाजिक जनतंत्र यानी आर्थिक और सामाजिक समानता के राह में रोड़ा बनी अगाध काली कमाई की सफाई से ही देश में असली जनतंत्र का मार्ग प्रशस्त होगा। इसके लिए सर्वप्रथम राजनीतिक सुधार, यानी चुनावों में काले पैसे के प्रवाह को रोककर लक्ष्य ही हासिल किया जा सकता है।   
आम जन ने प्रधानमंत्री के इस संपूर्ण सफाई अभियान को जिस तरह हाथो-हाथ लिया है़ यह हमारे देश और समाज के भविष्य के लिए शुभ संकेत है। हमें सकारात्मक सोच रखनी चाहिए और स्वच्छ भारतनामक इस अँखुआते बीज को खाद-पानी देकर अनेक झंझावातों से बचाने में पूरा सक्रिय सहयोग देना चाहिए, ताकि 2019, गाँधीजी की 150वीं सालगिरह तक गांधी के, यानी भारत के आम लोगों के सपनों का स्वच्छ भारत बन जाए।
गांधीमार्ग अंत तक सबके लिए रास्ता खुला रखता है। काश! काले कारनामों में लिप्त वह वर्ग भी कबीर के बताए राह पर चलते हुए अपने घर में बढ़ते दाम को समाज के उन्नयन के लिए दोनों हाथों से उड़ेलना प्रारंभ कर दे, तभी वे इस गरीबी व असमानता के समुद्र के बीचोबीच काले धंधे के बल पर बने अपने अमीरी के चमकते द्वीप में सुरक्षित रह पाएगें। नहीं तो वह दिन दूर नहीं, जब स्वच्छता अभियान का यह जनसमुद्र रूपी तूफान उसे लील जाएगा। उन्हें यह कदापि नहीं भूलना चाहिए कि जो कबीर और गांधी के बताये स्वैच्छिक एवं स्वविवेक के रास्ते बंद कर लेते हैं, वे अपने लिए स्वतः सरकार और शासन के राजदंड का रास्ता भी खोल लेते हैं।


Saturday, September 3, 2016


डिजिटल मीडिया का विद्रूप चेहरा
हम जैसे-जैसे डिजिटल होते जा रहे हैं, दुनिया की अनेक भयावह, भदेस और नग्न सच्चाइयाँ पूरी तेजी और तीव्रता से हमारे सामने खुलती और ओझल होती जा रही हैं। इन तस्वीरों के भीतर दबे पड़े इसके विविध आयामों को हमारा मन-मस्तिष्क ठीक से पकड़ ही नहीं पा रहा। हमें समझ में नहीं आ रहा है कि हम बुक्का फाड़कर रोएं, ठठाकर हँसें या तमाम इंसानी संवेदनाओं को ताख पर रखकर बाजार व्यवस्था की लुभावनी भूलभुलैयों में मशीन की तरह अपने में मगन रहें।
युद्ध की मार झेल रहे सीरिया के एलेप्पो शहर से टीवी और मोबाइल पर प्रसारित उस वीडियो को देखकर कोई ऐसा इंसान नहीं होगा, जो विचलित न हुआ हो। धूल और खून से सने तीन साल के मासूम ओमरान दाकनीश को एंबुलेंस में बैठे पहली नजर पड़ते ही उसका सपाट चेहरा, जिसमें रोने या हँसने का दूर-दूर तक कोई निशान नहीं, एक पलास्टिक या मोम के गुड्डे से ज्यादा कुछ नहीं दिख रहा था, परंतु दूसरे ही पल, जैसे ही वहां से उतरकर जाते हुए दिखा, दिमाग में कोंधा कि अरे! यह तो कोई इंसानी बच्चा है। पल भर में ही युद्ध की विभीषिका का एक बच्चे के चेहरे से फूटता ऐसा लोमहर्षक चित्रण विरला ही होगा। एक दूसरा चित्र दिल्ली की सड़क पर सुबह के समय एक व्यक्ति सड़क के किनारे-किनारे जा रहा है कि एक टैम्पो आता है और उसे जोर से धक्का मारता हुआ लड़खड़ाते हुए निकल जाता है। वह घायलावस्था में अचेत सड़क पर पर घंटो पड़ा रहता है। कुछ देर बाद एक आदमी आता है, उसे देखता है और उसके पास पड़े उसके मोबाइल को जेब में डालकर इत्मीनान से चलता बनता है। घंटो बाद पुलिस की गाड़ी आई तो उसे अस्पताल ले जाया गया, तबतक बहुत सारा रक्त बहने के कारण उसने दम तोड़ दिया। तीसरी तस्वीर जब पूरा भारत कृष्ण जन्माष्टमी के उत्सव में डूबा था, ओडिशा के कालाहांडी में सड़क पर एक व्यक्ति अपनी पत्नी की भारी-भरकम लाश को 10 किलोमीटर तक अपने कंधों पर हांफते-कांपते ढोता जा रहा है, साथ में उसकी 12 वर्षीय रोती-बिलखती और सामान उठाये साथ में चलती हुई उसकी बेटी। पता नहीं इस तस्वीर को जिसने भी देखा होगा, कैसे उत्सव के अनुकूल अपने आप को बनाए रखा होगा। क्या हमारे कल्याणकारी राज्य के सूरमाओं और कारिंदों को इस भ्रष्ट व्यवस्था को ढोते-ढोते दाना मांझी को अपनी पत्नी की लाश को इस कदर ले जाते हुए एक बार भी सिकन आई होगी? अगर आई तो क्या वे इस कदर इसके लिए दाना मांझी को ही दोषी ठहराते?
तस्वीर का दूसरे कुछ सुखद पहलू भी है। हनीमून के लिए विदेश जा रहे फैजान पटेल ने हवाई जहाज से विदेश मंत्री को अपना और अपने बगल के सीट पर अपनी नवब्याहता पत्नी की खाली सीट पर रखी उसके फोटो की तस्वीर के साथ ट्वीट किया कि यात्रा के समय पर उसकी पत्नी का पासपोर्ट खो जाने के कारण वह बिना पत्नी के ही हनीमून मनाने इटली जा रहा है। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने तत्काल ट्वीट किया, फैजान, तुम चिंता मत करो, मैं व्यवस्था करवा रही हूँ। तुम अपनी पत्नी के साथ ही अपने पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुरूप ही हनीमून मनाओगे। इससे सिर्फ फैजान ही नहीं बल्कि जिसने भी देखा-सुना, एक सुखद एहसास से भर गया। इसके अलावा रेलमंत्री सुरेश प्रभु से रेलयात्रियों की छोटी से छोटी समस्याओं का समाधान मिलता रहा है।  पौलेंड के ओलंपिक रजत विजेता डिस्कस थ्रोअर पियोट्र मलाचोवस्की ने अपने रजत पदक को आंख के कैंसर से जूझ रहे एक तीन साल के बच्चे के इलाज के लिए दान में दे दिया। वे चाहते हैं कि उनके पदक की नीलामी की जाए और उससे जो भी पैसा मिलें, उससे पीड़ित बच्चे का इलाज किया जाए।
यह तो हमारे डिजिटल दुनिया के घटनाक्रमों के मात्र कुछ उदाहरण हैं, इसके अलावा अनेकानेक मानव संवेदनाओं को कंपा देने वाली अनेक तस्वीरों से हम हर घंटे दो-चार होते हैं। स्वार्थी विश्व व्यवस्था, फफूँद पड़े सरकारी तंत्र और निर्दयी समाज की काली बदसूरत शक्ल का ऐसा घिनौना चेहरा नहीं लगता कि विश्व के इतने सारे लोगों ने एक साथ कभी इस डिजिटल क्रांति से पहले कभी देखा होगा। इनके बीच कुछ सुखद एहसास कराते सरकारी, सामाजिक एवं व्यक्तिगत मानवीय सरोकारी प्रयास के चित्र भी आते हैं, परंतु इतनी सारी अमानवीय विदू्रपताओं से भरपूर घनघोर अंधेरी रात के मध्य कुछ टिमटिमाते जुगनुओं के समान ही दिखते हैं।
क्या आज वह समय नहीं आ गया है, जब जरा ठहरकर डिजिटल दुनिया के विविध पहलुओं पर सामाजिक, मनोवैज्ञानिक, मानवीय तथा अन्य दृष्टिकोण से इसका गहन अध्ययन, विश्लेषण किया जाए? डिजिटल दुनिया में इतने सारे घटनाक्रम एक साथ इतनी तेजी से घटित होकर दृश्यमान होता लोगों के बीच आ रहा है कि किसी भी घटना पर थोड़ी देर रुककर उसपर चिंतन-मनन करना दुष्कर होता जा रहा है। सब कुछ चंद घंटों में पुराना होता जा रहा है। हर अमानवीय कृत्य लागों को सिर्फ कुछ देर के लिए चौंकाता है और दूसरा किसी उससे भी नृशंस दृश्य की आहट देकर चला जाता है। हर अमानवीय दृश्य का अनेक जातिवादी, कट्टर धार्मिक, आतंकवादी समूह और यहाँ तक कि राजनीतिक दल अपने पक्ष को मजबूत करने एवं विरोधियों को नीचा दिखाने में प्रयोग करने में लगे हैं। आमलोग एक नशेड़ी की भांति इसके आदी होते जा रहे हैं, उनकी संवेदनाएं मृत होती जा रही हैं। ओमरान का सपाट चेहरा या दाना मांझी की विवशता के दृश्य कुछ घंटो के लिए सिर्फ हलचल मचाकर घटनाक्रमों की शृंखला में रिकार्ड भर बनकर रह जाने को अभिशप्त हैं। आम लोगों को भोजन, शिक्षा, स्वास्थ्य एवं सुरक्षा जैसी मौलिक जरूरतों की जंग से निजात मिलती कहीं से नहीं दिख रही। इस डिजिटल क्रांति के फायदे चाहे जितने गिनाए जाएँ, इतना तो तय है कि आनेवाले समय में मनोचिकित्सकों का धंधा बहुत तेजी से बढ़ने वाला है!    

  


Friday, August 5, 2016

इस आत्महंता प्रवृत्ति का अंत कहाँ?
एक तरफ जनसंचार माध्यमों में सफल लोगों का महिमामंडन और उनकी कहानियाँ लगातार लोक-लुभावन ढंग से परोसी जा रही हैं, वहीं इधर कुछ सालों से लगातार मासूम विद्यार्थियों खासकर इंजीनियरिंग मेडिकल एवं अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे किशोरों में बढ़ रही आत्महंता प्रवृत्ति की हर स्तर पर अनदेखी हो रही है। एक होनहार किशोर विद्यार्थी जब अपने घर, समाज और देश के माहौल में अपने आप को अयोग्य पाकर हताशा और निराशा में आत्महत्या का मार्ग अपनाता है तो वह सिर्फ अपना नहीं बल्कि अपने परिवार, समाज, देश और दुनिया की भी अपूरणीय क्षति होती है। 
हाल के वर्षों में कोचिंग हब बन चुका राजस्थान का कोटा शहर अब ऐसी आत्महत्याओं का गढ़ बनता जा रहा है। कोटा एक तरफ जहाँ मेडिकल और इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षाओं में बेहतर परिणाम देने के लिए जाना जाता है, वहीं इधर कुछ सालों से आत्महत्या के बढ़ते मामलों को लेकर सुर्खियों में है। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार, साल 2015 में यहां 19 छात्रों ने मौत को गले लगा लिया था। वर्ष 2014 में कोटा में 45 छात्रों ने आत्महत्या की। जबकि 2016 में अबतक यानी 23 जुलाई को बिहार के प्रिंस कुमार सिंह के आत्महत्या के साथ 12 छात्र अब तक खुदकुशी कर चुके हैं। कोटा में सन् 2000 से लेकर अब तक करीब 300 छात्रों ने आत्महत्या जैसे कदम उठाए हैं। पिछले जेईई के परीक्षा परिणाम में टॉप रैंक में 100 में 30 छात्र कोटा के इन कोचिंग सेन्टरों से ही निकले हैं। देश के तमाम नामी गिरामी संस्थानों से लेकर छोटे-मोटे 120 कोचिंग संस्थान यहां चल रहे हैं। इस समय यहां लगभग डेढ लाख छात्र इन संस्थानों से कोचिंग ले रहे हैं।
कुछ महीने पहले पांचवीं मंजिल से कूदकर सुसाइड करने वाली कोचिंग छात्रा कीर्ति त्रिपाठी के सुसाइड नोट से जो बातें सामने आई हैं, उससे आत्महत्या के पीछे के अनेक कारणों का खुलासा होता है। कीर्ति त्रिपाठी ने लिखा है कि मैं जेईई-मेंस में कम नम्बर होने के कारण जान नहीं दे रही हूं, मुझे तो इससे भी खराब रिजल्ट की आशंका थी। बल्कि मैं तो खुद से ही ऊब गई हूँ, इसलिए जान दे रही हूँ। कीर्ति के जेईई-मेंस में 144 अंक आए थे, जो जनरल के कट ऑफ से 44 अंक अधिक थे। कृति ने आगे लिखा है- ‘‘मैं भारत सरकार और मानव संसाधन मंत्रालय से कहना चाहती हूं कि अगर वे चाहते हैं कि कोई बच्चा न मरे तो जितनी जल्दी हो सके, इन कोचिंग संस्थानों को बंद करवा दें। ये कोचिंग छात्रों को खोखला कर देते हैं। पढ़ने का इतना दबाव होता है कि बच्चे बोझ तले दब जाते हैं।’’ कृति ने लिखा है कि ‘‘वो कोटा में कई छात्रों को डिप्रेशन और स्ट्रेस से बाहर निकालकर सुसाइड करने से रोकने में सफल हुई, लेकिन खुद को नहीं रोक सकी। बहुत लोगों को विश्वास नहीं होगा कि मेरे जैसी लड़की सुसाइड भी कर सकती है, लेकिन मैं आप लोगों को समझा नहीं सकती कि मेरे दिमाग और दिल में कितनी नफरत भरी है।’’
अपनी मां के लिए उसने लिखा- ‘‘आपने मेरे बचपन और बच्चा होने का फायदा उठाया और मुझे विज्ञान पसंद करने के लिए मजबूर करती रहीं। मैं भी विज्ञान पढ़ती रही ताकि आपको खुश रख सकूँ। लेकिन मैं आपको बता दूं कि मुझे आज भी अंग्रेजी साहित्य और इतिहास बहुत अच्छा लगता है, क्योंकि ये मुझे मेरे अंधकार के वक्त में मुझे बाहर निकालते हैं।’’ कृति अपनी मां को चेतावनी देती है- ‘‘इस तरह की चालाकी और मजबूर करनेवाली हरकत 11वीं क्लास में पढ़नेवाली छोटी बहन से मत करना। वो जो बनना चाहती है और जो पढ़ना चाहती है, उसे वो करने देना क्योंकि वो उस काम में सबसे अच्छा कर सकती है, जिससे वो प्यार करती है।’’
प्रतिदिन 5 से ज्यादा घंटों का कोचिंग क्लास। कभी सुबह, कभी दोपहर तो कभी देर शाम तक, यानी कोई तय रुटीन नहीं। दैनिक दिनचर्या में कोई तारतम्य नहीं। मनोरंजन का कोई समय, न ही कोई व्यवस्था। न ही पुष्टीकारक भोजन। ऊपर से 500-600 बच्चों का एक बैच, जिसमें शिक्षक और छात्र का आपसी अंतर्व्यवहार असंभव। अगर छात्र को कुछ समझ न भी आए तो वह इतनी भीड़ में पूछने में भी संकोच। ऐसे में उसपर धीरे-धीरे सफलता का बढ़ता चौतरफा दबाव।
जो पैसे वाले हैं वे अकेले कमरा लेकर रहना चाहते हैं, जिसकी वजह से उनका जीवन और अकेला हो जाता है। अधिकांश ऐसे, जिनके माँ-बाप बेहद गरीब हैं और उन्होंने कर्ज लेकर कोचिंग के लिए भेजा है, जब अपेक्षा के अनुरूप अपने को नहीं पाता तो घबराकर महसूस करता है कि मां-बाप का क्या होगा? हाय! मैं उनका सपना नहीं पूरा कर पाया। अनेक बच्चे अपने स्कूल-कॉलेज या इलाके का टॉपर होता है, मगर यहाँ उसको अच्छी रैंक नहीं मिलती तो वह टूट जाता है। इस तरह वह घर-परिवार एवं समाज का दबाव, हताशा एवं निराशा के अतल गर्त में अवसाद के शिकंजे में जकड़े बच्चे को मुक्ति सिर्फ मृत्यु में ही नजर आती है। 
आज हर माँ-बाप शिक्षा संस्थानों एवं समाज को समझने की आवश्यकता है कि इंसान के जीवन से बड़ा कुछ भी नहीं है। इंसान तभी खुश रह सकता है जब वह स्वतंत्रतापूर्वक अपने जीवन की राह को खुद चुन सके, इसलिए कोई भी माँ-बाप, गुरु एवं शिक्षा संस्थान एवं शासन तंत्र पर सिर्फ यह जिम्मेदारी है कि वह एक लोकतांत्रिक माहौल में उसे पाल-पोसकर मजबूत कदमों और रचनात्मक-सकारात्मक सोच के साथ चलना सिखा दे, इंसान होने के नाते विविध रास्तों में अपने अनुरूप रास्ता और फिर मंजिल तो वह खुद चुन लेगा। तब यह दुनिया अभी से ज्यादा सुंदर होगी!
कीर्ति त्रिपाठी के पत्र का अंश तो एक उदाहरण मात्र है, ऐसे अनेकों मार्मिक मृत्युपत्र अपने अंतिम समय उन मासूमों ने लिखे होंगे और सबका मजमून करीब-करीब यही होगा। कुछ ने नहीं भी लिखे होंगे, किन्तु उसके दिल के अंदर दबा गुबार अंतिम क्रिया के समय धुआँ बनकर अवश्य दसों दिशाओं में यही संदेश लेकर फैला होगा! इस संदेश से क्या कोई सीख नई पीढ़ी के माता-पिता, परिवार, प्रशासन, सरकारों और कोचिंग संस्थानों ने ली, अगर ली है तो यह सिलसिला अभी तक रुक क्यों नहीं रहा?


 

Wednesday, July 6, 2016

  विकलांग परिंदों के शिकारी
मेरा चार साल का बेटा विवेकानंद रोज सुबह उठने के बाद बॉलकनी में खड़े होकर बिजली के तारों पर और पार्क के पेड़ों पर चिडिया, कौवे, कबूतरों और बंदरों को देखता रहता है और मुझपर इनसे संबंधित अनगिनत प्रश्नों के बौछार करता रहता है। उस दिन भी यही सिलसिला चल रहा था कि अकस्मात एक कबूतर फड़फड़ाते हुए मेरी बॉलकनी में गिरा और डरा-सहमा कोने में स्थिर हो गया। हम दोनों आश्चर्य से उसे देखने लगे। विवेकानंद तो कुछ ज्यादा ही विस्मित था। पापा, कबूतर यहाँ कैसे आया? क्या हम इसे अपने घर में रख सकते हैं? अब इसे जाने नहीं देंगे... मैंने कहा रुको तो सही, मैं उसके पास गया वह लंगड़ा रहा था और बीमार लग रहा था। मैंने उसे पकड़ लिया। उसके पैर में जख्म था, काफी कमजोर लग रहा था। विवेकानंद भी उसे प्यार से सहलाने लगा। उसे पानी पीने को दिया परंतु कबूतर छूकर छोड़ दिया। फिर चावल के दाने भी दिए परंतु उधर बिना देखे कोने में सिमट गया। इधर प्रश्न जारी था। पापा यह पानी च्यूं नही पी रहा है? यह चावल च्यूं नहीं खा रहा है? मैं इसको अपने हाथ से खिलाऊं? मैंने कहा, उसके पैर में चोट लगी है, शायद बीमार है। चलो उसे आराम करने दो, थोड़ी देर में खूद ही पियेगा और खायेगा... वह उसके आगे से टस से मस नहीं हो रहा था। मैंने फिर कहा, बाबू उसे छोड़ दो वह डरा हुआ है, इधर कमरे में आ जाओ... वह कमरे के दरवाजे पर आ तो गया परंतु उसकी नजरंे उसी पर टिकी रहीं। इधर मैं अखबार पलटने लगा। तभी एक बिल्ली पता नहीं किधर से आई और पलक झपकते ही झपट्टा मारकर सड़क पर, फिर सामने पार्क के कोने में उसकी गरदन दबोच कर रक्त के छीटे और पंख बिखेर दिए। हम दोनों स्याह नजरों से इस हृदय विदारक दृश्य को देखते रह गए विवेकानंद तो बहुत देर तक पलक झपकाना ही भूल गया...
ऑफिस जाते मेट्रो में जब अखबार खोला तो जिस समाचार पर नजर गयी वह था अपोलो किडनी रैकेट। कानपुर के उमेश का छोटा-मोटा व्यापारी था परंतु बेटे के पैर के ऑपरेशन में उसपर काफी कर्ज चढ़ चुका था। उमेश की मुलाकात आशु नाम के किडनी दलाल से हुई। आशु ने उन्हें लाखों रुपये मिलने का लालच दिया, जिसके बाद उमेश किडनी बेचने को तैयार हो गया। आशु उमेश को लेकर दिल्ली आ गया। उसकी मुलाकात असीम सिकदर और दिल्ली अपोलो अस्पताल में डॉक्टर अशोक सरीन के पर्सनल कर्मचारियों आदित्य और शैलेष से कराई गई। इनके पास किडनी के कई तलबगार थे। उमेश की किडनी गाजियाबाद के आशुतोष को ट्रांसप्लांट करने का फैसला किया गया। उमेश के फर्जी पहचान पत्र आशुतोष के परिवार के सदस्य सुरेश चंद पुत्र रामपाल गौतम के नाम से तैयार कर किडनी आशुतोष को ट्रांसप्लांट कर दी गई। किडनी बेचने के एवज में उमेश को तीन लाख रुपये मिले जबकि मरीज से 25 लाख रुपये लिए गए थे।
इसके बावजूद उमेश का कर्ज नहीं उतरा। दलाल ने उनकी पत्नी नीलू की किडनी बेचने के लिए दबाव बनाया। इसमें उमेश को चार लाख रुपये मिले। कुछ इसी तरह का सच पश्चिम बंगाल, जलपाईगुड़ी की मौमिता मौली का है। मौमिता के पति देवाशीष मौली ने पहले अपनी किडनी बेची फिर मौमिता की भी किडनी बेच दी। परंतु रकम मौमिता को नहीं दी थी, इसी कारण दोनों में झगड़ा हो गया था और पुलिस को इस किडनी रैकेट का सुराग मिला। 
अपोलो अस्पताल जहाँ अक्सर जानी मानी हस्तियां अपना इलाज कराने के लिए पहुँचती हैं। जिसको तमाम सुविधाओं से लैस माना जाता है। इस अस्पताल में एक ऐसा किडनी रैकेट चल रहा था जिसके तार सिर्फ देश ही नहीं, बल्कि विदेशों तक भी फैले हुए थे। इसके शिकार देश के हर हिस्से के अनेकों गरीब और मजबूर लोग हो चुके हैं।। पुलिस ने इस रैकेट के पाँच धंधेबाजों का गिरफ्तार किया है। असीम सिकदर, सत्य प्रकाश उर्फ आशु, देवाशीष मलिक, आदित्य और शैलेष सक्सेना। इसके ऊपर है इस रैकेट का मास्टरमाइंड राजकुमार राव जिसका नेटवर्क भारत के बाहर श्रीलंका और इंडोनेशिया तक फैला है। 
इस रैकेट में हर धंधेबाज के हिस्से का काम बंटा हुआ था। कुछ लोग शिकार यानी डोनर की तलाश करते थे, जबकि कुछ रिसीवर की। फिर शिकार और डोनर को रिश्तेदार दिखाने के लिए फर्जी कागजात बनाए जाते थे। अस्पताल के कर्मचारी इस काम में उनकी मदद करते थे। ये रैकेट किड़नी के लिए जरूरतमंद से 20 से 25 लाख वसूलता था। इसमें बिचौलियों को 1-1 लाख रुपए मिलते थे। जबकि डोनर को सिर्फ 3 से 4 लाख। खास बात ये है कि विदेशी जरूरतमंद को किडनी बेचने के लिए हिंदुस्तानी के मुकाबले कई गुना ज्यादा रकम मिलती है। ऐसे में सवाल ये है कि आखिर बाकी की मोटी रकम कहाँ जाती थी। दिल्ली पुलिस के मुताबिक दिल्ली के अपोलो अस्पताल में किडनी ट्रांसप्लांट रैकेट में जो गैंग काम कर रहा था, उसकी पहुँच अपोलो के एमएस के दफ्तर तक थी क्योंकि किडनी ट्रांसप्लांट की सारे कागजी प्रकिया एमएस ऑफिस के जरिए ही पूरी होती थी।

मैं जानता हूँ घर लौटते ही विवेकानंद उस बिल्ली द्वारा कबूतर का शिकार करने से संबंधित अनेकों प्रश्न करेगा परंतु अब जवाब मेरे पास भी नहीं है क्योंकि इस बीच मेरे जेहन में इंसानी भेड़िए और कमजोर इंसान का शिकार करने वाले (किडनी दलाल) बिल्ले भी इसमें शामिल हो चुके हैं!ं बात सिर्फ किसी जानवर द्वारा कमजोर जीव का शिकार तक सीमित होता तो आसानी से यह कहकर पिंड छुड़ाया जा सकता था कि बेटा, बिल्ली तो जानवर है न उसे अच्छे-बूरे कर्म का विवेक नहीं होता। परंतु उस सभ्य इंसान के बारे में क्या कहा जाए? जिसे पूरा पता है कि मानव सभ्यता के संघर्ष का पूरा इतिहास जानवर से एक मुकम्मल इंसान बनने की है। जब जीवनदायक डॉक्टर और अपोलो जैसे अस्पताल जिसे जीवन से हार मान बैठे मरीजों के लिए आखिरी सहारा माना जाता है। वह जब करोड़ों रुपये बनाने के लिए खूंखार बिल्ले (रैकेटियर) पाल ले जो गरीब, बीमार, विकलांग, लाचार लोगों को नित नए तरीके से शिकार करने लगे तो प्रश्न काफी जटिल हो जाता है। वह बिल्ली तो शायद पेट भर जाने के बाद उस दिन दूसरे कमजोर जीव की हत्या नहीं करेगी, परंतु इन इंसानी भूखे भेड़ियों के बारे में दावे के साथ नहीं कहा जा सकता है कि इनके कुछ बिल्ले पकड़ में आ जाने के बाद भी ये शिकार के दूसरे नये तरीके इजाद नहीं करेंगे!

Saturday, June 4, 2016

लाभ और लोभ का जानलेवा खेल

ब्रेड, पाव या मैगी बनाने वाली देशी और मल्टीनेशनल कंपनियां खतरनाक रसायनों के मिलावट में पकड़ी गईं। हंगामा मचने पर व्यापार चौपट होने के भय से भले ही अब यह कहने पर मजबूर हुई हों कि अब वे उन हानिकारक तत्त्वों का प्रयोग नहीं करेंगी, परंतु अब तक जो कीमती जान का नुकसान हुआ होगा, उसकी भरपाई कौन करेगा? यही कंपनियां जब यूरोप या अमेरिका में स्वास्थ्य के सारे मानदंडों के अनुरूप पारदर्शी तरीके से काम कर सकती हैं तो भारत और अनेक विकासशील एवं पिछड़े देशों में सब नियमों और कानूनों को ताख पर रखकर किस तरह इंसान की जान को जोखिम में डालती हैं, यह मामला इसका भयावह उदाहरण है। अगर ये कंपनियां यहाँ ऐसा गोरखधंधा कर रही हैं तो इन्हें भलीभांति पता है कि यहाँ के छोटे-बड़े व्यापारी से लेकर सरकारी जांच एजेंसियां एवं नियम-कानूनों का पालन कराने वाला पूरा तंत्र भ्रष्टाचार में आकंठ डूबा हुआ है। वे इनको अपने अवैध लाभ के चंद टुकड़े फेंककर आम लोगों की जान से खेल सकते हैं।
सीएसई यानी (विज्ञान एवं पर्यावरण केंद्र) के ताजा अध्ययन में ब्रेड में कैंसर जैसी घातक बीमारी के तत्त्व पाए जाने का खुलासा हुआ है, जांच के मुताबिक ब्रेड बनाने के लिए इस्तेमाल में लाए जाने वाले आटे के चौरासी फीसद नमूनों में पोटैशियम ब्रोमेट और पोटैशियम आयोडेट मिले हैं, जिसके लगातार सेवन से कैंसर और थायराइड जैसी बीमारियां हो सकती हैं। पिछले साल मैगी में अत्यधिक मात्रा में मोनोसोडियम ग्लूटामेट और शीशा मिले होने पर तथा कई साल पहले सीएसई ने ही कोका कोला और पेप्सी कोला जैसे ठंडे पेयों में कीटनाशकों की मात्रा और उसकी वजह से होने वाली अनेक जानलेवा बीमारियों के बारे में एक अध्ययन जारी किया था जिसपर खूब हंगामा मचा था।
हमारे देश में मिलावट का यह धंधा प्रारंभ में मामूली मिलावटों से शुरू हुआ। लोभ के इस खेल में मामूली शारीरिक एवं आर्थिक नुकसान तो था परंतु जानलेवा नहीं था, जैसे चावल में थोड़ा कंकड मिला देना, दूध में पानी मिला देना या घी में थोड़ा वनस्पति फेंट देना। ध्यान देने पर असली और मिलावटी का फर्क मालूम पड़ जाता था, सब अपने आप को बचाकर चलते थे। धंधा चोखा था, चलता रहा। परंतु अब यह सारी हदों को लांघ गया है। व्यापारियों और कानून के रखवालों ने भी समानांतर सहकारी तंत्र विकसित कर लिया, जो दोनों के लिए फायदेमंद था। मिलावट के धंधे दिन दूनी रात चौगुनी वृद्धि होने लगी। असली नकली का फर्क मिटने लगा और हाल के वर्षों में ऐसा समय आया जब मिलावट के साथ-साथ सिर्फ और सिर्फ नकली का ही धंधा चल निकला। आज बाजार में सभी खाद्य पदार्थों के नकली ब्रांड असली पैकेज के साथ उपलब्ध हैं। पहले जहाँ कम से कम यह खयाल रखा जाता था कि मिलावट में कम से कम कोई ऐसा पदार्थ न मिला हो कि लोगों के लिए तुरंत जानलेवा साबित हो, अब वह भी समाप्त हो गया। अब तो खुलेआम दूध के नाम पर रिफाइंड, खड़िया और डिटरजेंट तो घी मरे पशुओं की चर्बी और हड्डियों का बुरादा मिलाकर बनाया जाता है। मसालों के नाम पर रंग मिला चूना और भूसी मिलाकर बेच रहे हैं। कोई भी खाद्य पदार्थ नहीं बचा है जिसका नकली ब्रांड बाजार में उपलब्ध न हो।
बात खाद्य पदार्थों तक ही नहीं रुकी, इसने जीवनदायिनी दवाओं को भी अपने चंगुल में ले लिया। आज स्थिति यह है कि बाजार में बिकने वाली दवाओं का बीस से पच्चीस प्रतिशत हिस्सा नकली है। सरकारी सूत्रों के अनुसार है कुल दवाइयों में आठ से दस प्रतिशत नकली दवाइयां बनती हैं। दूसरा आकलन है कि पूरी दुनिया में बनने वाली कुल नकली दवाओं का पचास प्रतिशत हिस्सा भारत में तैयार होता है। इंडियन मेडिकल एसोसिएसन का अनुमान है कि बाजार में बिकने वाली दवा के हर पाँच पŸाों में एक नकली होता है। कुछ साल पहले चीन अपनी नकली दवाओं को अफ्रिकन देशों में मेड इन इंडियाकी मुहर के साथ बेचता पाया गया था। इससे हमारी साख का पता चलता है।
हद तो तब हो गई जब मानव अंगों की तस्करी की जाने लगी। कई दशकों से कडनी और खून का अवैध धंधा चल ही रहा है, जिसमें गरीब मजदूरों, गरीब महिलाओं, नशाखोरों, भिखारियों और यहां तक कि बच्चों तक को बंधक बनाकर, बहला-फुसलाकर खून से लेकर किडनी तक निकाल लिया जाता है। यह धंधा देश के गरीब सुदूर प्रांतों से लेकर राजधानी दिल्ली उसके आस-पास के आधुनिक उपनगरों में जोरों से चल रहा है। इसमें एक और आयाम तब जुड़ा था, जब कुछ साल पहले लखनऊ के ठाकुरगंज इलाके में पुलिस के छापे में एक सुव्यवस्थित प्रयोगशाला में बड़े पैमाने पर नकली खून के पैकेट, सिरिंज, फर्जी मुहर और स्टीकरों सहित छत्रपति शाहू जी महाराज चिकित्सा महाविद्यालय का प्राधिकार पत्र भी बरामद हुए। जाँच से पता चला कि यहाँ से न केवल  नकली खून बनाकर बेचते थे बल्कि इंसान का खून बताकर जानवरों के भी खून को कई ब्लड बैंकों को बेच रहे थे। गिरफ्तार लोगों ने स्वीकार किया था कि अब तक उन्होंने करीब सवा लाख लोगों को खून बेचा है। वास्तविक आँकड़ा इससे कहीं ज्यादा हो सकता है। साफ जाहिर है कि यह धंधा संगठित रूप से चलाया जा रहा है, जिसमें डॉक्टर तस्कर, प्रशासन के शामिल हुए बिना यह संभव नहीं है।

आज हमारे देश का आम उपभोक्ता हर समय एक डर के साये में जी रहा है। लाभ और लोभ का ऐसा जानलेवा खेल खेला जा रहा है, जिसमें हवा, पानी, भोजन के तमाम उत्पादों से लेकर जान बचाने के लिए प्रयुक्त होने वाली दवाइयां एवं रक्त तक में मिलावट एवं नकली का खुलेआम प्रयोग हो रहा है। समय रहते सरकार के एफएसएसएआई यानी भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण जैसे संस्थाओं को सिर्फ शिकायत मिलने पर ही नहीं बल्कि अपनी पहल पर औचक निरीक्षण कर स्वास्थ्य के मानकों को हर स्तर पर लागू करना होगा। सीएसई जैसी स्वैच्छिक संस्थाओं को और आगे बढ़कर काम करने के लिए प्रोत्साहित करना पड़ेगा। साथ ही सरकार, मीडिया एवं समाज के प्रबुद्ध वर्गों को जनजागरूकता के कार्य में लगना होगा, तभी हम इस लाभ और लोभ के चक्रव्यूह को तोड़ पायेंगे और भारत सही अर्थों में एक विकसित देश बनेगा।

Wednesday, May 11, 2016

अंतरात्मा के दिशा-निर्देश
सर्द जनवरी, शनिवार की शाम थी। आफिॅस से घर जाने के लिए तैयार ही था कि फोन आया। मैंने हलो...कहा। अंकलजी, मैं कुणाल बोल रहा हूँ, मैंने कहा, कौन कुणाल? ...अरे अंकलजी, गाँव का मिट्ठू। अरे हाँ, मिट्ठू बोलो...। बोला, मैं यहां सोलन हिमाचल प्रदेश में काम करता हूँ, कल जब फैक्ट्री से शाम को अपने कमरे पर आ रहा था तो पहाड़ी के पास करीब दो साल का बच्चा मिला, वह अकेला बहुत रो रहा था। उधर से गुजरनेवाले सारे लोग उसे अनदेखा करते हुए चले जा रहे थे, परंतु मुझसे रहा नहीं गया और मैंने जाकर उसे उठा लिया, वह मुझसे चिपककर जोर-जोर से रोने लगा। काफी देर तक इधर-उधर देखा कि शायद उसके माता-पिता कहीं मिल जाएँ, परंतु कोई नहीं मिला। अंधेरा हो रहा था, ठंड से बुरा हाल था। अजीब स्थिति थी, अगर उसको छोड़ देता तो बर्फबारी और ठंड से वह जिंदा नहीं बचता। उसे कमरे पर ले आया। मेरे साथ रहने वाला लड़का तथा आस-पास के सभी कहने लगे, यह क्या मुसीबत तुम ले आए, खुद भी फंसोगे और दूसरों को भी फंसाओगे। उसने आगे कहा, अंकल जी, मैं इस बच्चे को खुद रखकर पालना चाहता हूँ...बहुत प्यारा बच्चा है। मैं क्या इसको गोद ले सकता हूँ?...
मैंने कहा, मिट्ठू देखो यह तो तुमने बहुत अच्छा किया कि उसको बचा लिया...मगर उसे घर क्यों ले आए, उसे थाने क्यों नहीं पहुंचाया। अरे बेवकूफ, उसके मां-बाप उसे ढूँढ़ रहे होंगे, उसे जल्दी थाने ले जाकर सौंप दो, नहीं तो कल कोई तुम्हें उल्टे ही किडनेपिंग के मामले में फँसा देगा। जहाँ तक गोद लेने का मामला है तो अभी तुम्हारी उम्र नहीं है और गोद लेने के लिए बहुत लंबी कानूनी प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। मैंने पुनः जोर देकर कहा जल्दी से उसे थाने ले जाओ। उसने धीरे से कहा, ठीक है अंकल जी...। मैंने कहा, थाने में सबकुछ सच-सच बता देना। उसने कहा, जी...। फोन कट गया रास्ते भर उसके बारे में चिंतामग्न रहा।
घर जाकर फोन लगाया, नहीं लगा...दूसरे दिन कई बार फोन लगाया, नहीं लगा। रात को उसका फोन आया। उसने कहा, अंकल जी, आपने जैसा कहा था, कल वैसे ही तुरंत एक साथी को लेकर थाने चला गया था। पुलिस वाले अनेकों प्रश्न पूछते रहे और कल से ही भूखे-प्यासे बिठाये रखा। यह कहने पर कि हमें छोड़ दीजिए काम पर भी जाना है, खाना-पीना है, परंतु वे नहीं माने कहते रहे जबतक पूरी कानूनी प्रक्रिया पूरी नहीं होगी, यहीं बैठे रहो। तुम्हें यहाँ कोई मार-पीट थोड़े ही रहा है। अंत में, कई कागजों पर साइन करवाने, मेरा घर, गाँव मोबाइल नं., फैक्ट्री का पता आदि लेने के बाद यह कहकर कि जबतक हम नहीं कहें, सोलन छोड़कर कहीं नहीं जाना...और जब हम बुलायें तुरंत हाजिर होना। अभी रात में छोड़ा है।
यह वाकया मेरे जेहन में हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले के संदर्भ में याद आ गया। जिसमें सड़क हादसों के पीड़ितों की घटना स्थल पर मदद करने वाले नेक लोगों की हिफाजत के लिए केंद्र सरकार के दिशा-निर्देशों को सुप्रीम कोर्ट ने मंजूरी दी है। सड़क पर दुर्घटना के शिकार को तुरंत मदद मुहैया कराने वाले लोगों को कानूनी तौर पर सुरक्षा का मार्ग प्रशस्त कर सुप्रीम कोर्ट ने सराहनीय कदम उठाया है। केंद्र की गाइडलाइन्स को सर्वोच्च अदालत के वैधानिक समर्थन के बाद अब लोग निडर होकर लोगों की मदद करने को आगे आएंगे। अभी सड़क पर दुर्घटना के पीड़ितों को अस्पताल पहुंचाने से लोग हिचकते हैं। वे मदद करना चाहकर भी इस आशंका से कि पुलिस बार-बार थाने बुलाकर मानसिक उत्पीड़न करेगी। इस वजह से लोग दुर्घटना स्थल से कन्नी काट लेते हैं। सड़क परिवहन मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक दुर्घटना के शिकार लोगों को अगर तुरंत इलाज मिल जाए तो हर साल हजारों लोगों की जान बचाई जा सकती है।
मैंने हाल में मिट्ठू से उस वाकये के बारे में पूछा, उसने चिहुंककर जवाब दिया, हाँ अंकल, चार दिनों बाद पुलिस वालों ने मुझे फिर फोन कर बुलाया, उस बच्चे के माता-पिता मिल गए थे। वे लोग टूरिस्ट थे। वह बच्चा किसी तरह उनसे बिछुड़ गया था, उसे पाकर बहुत खुश और एहसानमंद थे। वे मुझे जबर्दस्ती रुपये पकड़ाने लगे परंतु मैंने लेने से मना कर दिया। मैंने कहा, तुमने लिया क्यों नहीं, अपना चार-पांच दिन बर्बाद किया, परेशान हुआ सो अलग। उसने कहा, अंकल, पैसे लेकर क्या करता...पैसा तो काम करके कमाने में मजा आता है। मैं उस सुख को कभी नहीं भूल सकता, जब उस बच्चे पर मेरी नजर पड़ी थी, वह मेरे सीने से चिपक गया था और तबतक चिपका रहा जबतक कि जर्बदस्ती पुलिस वाले ने उसे मुझसे अलग नहीं कर दिया।... मैं थाने में उसे छोड़कर आने के बाद उन चार दिनों तक सो नहीं पाया था, जबतक कि उसके माता-पिता और परिवार उसको मिल नहीं गया।
सुदूर झारखंड से अपने घर की गरीबी और बेरोजगारी से पार पाने के लिए हिमाचल की ठंड में वनवास भोगनेवाले मिट्ठू को बिना बताये उसके अंदर के उस जिंदा इंसान को नमस्कार किये बिना मैं नहीं रह सका। सोचने लगा कि क्या मिट्ठू ने उस बच्चे को गोद में उठाने से पहले किसी दिशा-निर्देश के बारे में एक पल के लिए भी सोचा होगा?
इसमें कोई शक नहीं है कि ये दिशा-निर्देश सहायता के लिए बढ़े उन हाथों को बहुत ताकत देगी, जो लोगों की सहायता करना चाहते हैं। इस कानून का विस्तार और कई मामलों जैसे गुमशुदा बच्चों की तालाशी में, सड़कों पर हो रहे हिंसक हमलों में, महिलाओं पर होनेवाले लैंगिक भेदभाव तथा बुजुर्गों की सहायता करने वाली बाधाओं को दूर करने जैसे अनेक सामाजिक समस्याओं तक इसका विस्तार किया जा सकता है।    

कोई भी महान दिशा-निर्देश या सहायता का सवाल तो तभी आता है न, जब इंसान किसी अन्य को दर्द में डूबा देखकर उसकी ममता और करुणा उसके अंदर उथल-पुथल मचा दे, पीड़ा में पड़े के प्रति सहायता हेतु हाथ बढ़ाने के लिए उसकी अंतरात्मा उसे व्यग्र और बैचेन कर दे। अगर अंदर से ऐसा नहीं हो पाता है तो समझिए, हम इंसान के रूप में अपनी लाश ढो रहे हैं और लाशों पर सरकार तथा किसी भी न्यायालय का दिशा-निर्देश लागू नहीं होता!