Friday, August 5, 2016

इस आत्महंता प्रवृत्ति का अंत कहाँ?
एक तरफ जनसंचार माध्यमों में सफल लोगों का महिमामंडन और उनकी कहानियाँ लगातार लोक-लुभावन ढंग से परोसी जा रही हैं, वहीं इधर कुछ सालों से लगातार मासूम विद्यार्थियों खासकर इंजीनियरिंग मेडिकल एवं अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे किशोरों में बढ़ रही आत्महंता प्रवृत्ति की हर स्तर पर अनदेखी हो रही है। एक होनहार किशोर विद्यार्थी जब अपने घर, समाज और देश के माहौल में अपने आप को अयोग्य पाकर हताशा और निराशा में आत्महत्या का मार्ग अपनाता है तो वह सिर्फ अपना नहीं बल्कि अपने परिवार, समाज, देश और दुनिया की भी अपूरणीय क्षति होती है। 
हाल के वर्षों में कोचिंग हब बन चुका राजस्थान का कोटा शहर अब ऐसी आत्महत्याओं का गढ़ बनता जा रहा है। कोटा एक तरफ जहाँ मेडिकल और इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षाओं में बेहतर परिणाम देने के लिए जाना जाता है, वहीं इधर कुछ सालों से आत्महत्या के बढ़ते मामलों को लेकर सुर्खियों में है। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार, साल 2015 में यहां 19 छात्रों ने मौत को गले लगा लिया था। वर्ष 2014 में कोटा में 45 छात्रों ने आत्महत्या की। जबकि 2016 में अबतक यानी 23 जुलाई को बिहार के प्रिंस कुमार सिंह के आत्महत्या के साथ 12 छात्र अब तक खुदकुशी कर चुके हैं। कोटा में सन् 2000 से लेकर अब तक करीब 300 छात्रों ने आत्महत्या जैसे कदम उठाए हैं। पिछले जेईई के परीक्षा परिणाम में टॉप रैंक में 100 में 30 छात्र कोटा के इन कोचिंग सेन्टरों से ही निकले हैं। देश के तमाम नामी गिरामी संस्थानों से लेकर छोटे-मोटे 120 कोचिंग संस्थान यहां चल रहे हैं। इस समय यहां लगभग डेढ लाख छात्र इन संस्थानों से कोचिंग ले रहे हैं।
कुछ महीने पहले पांचवीं मंजिल से कूदकर सुसाइड करने वाली कोचिंग छात्रा कीर्ति त्रिपाठी के सुसाइड नोट से जो बातें सामने आई हैं, उससे आत्महत्या के पीछे के अनेक कारणों का खुलासा होता है। कीर्ति त्रिपाठी ने लिखा है कि मैं जेईई-मेंस में कम नम्बर होने के कारण जान नहीं दे रही हूं, मुझे तो इससे भी खराब रिजल्ट की आशंका थी। बल्कि मैं तो खुद से ही ऊब गई हूँ, इसलिए जान दे रही हूँ। कीर्ति के जेईई-मेंस में 144 अंक आए थे, जो जनरल के कट ऑफ से 44 अंक अधिक थे। कृति ने आगे लिखा है- ‘‘मैं भारत सरकार और मानव संसाधन मंत्रालय से कहना चाहती हूं कि अगर वे चाहते हैं कि कोई बच्चा न मरे तो जितनी जल्दी हो सके, इन कोचिंग संस्थानों को बंद करवा दें। ये कोचिंग छात्रों को खोखला कर देते हैं। पढ़ने का इतना दबाव होता है कि बच्चे बोझ तले दब जाते हैं।’’ कृति ने लिखा है कि ‘‘वो कोटा में कई छात्रों को डिप्रेशन और स्ट्रेस से बाहर निकालकर सुसाइड करने से रोकने में सफल हुई, लेकिन खुद को नहीं रोक सकी। बहुत लोगों को विश्वास नहीं होगा कि मेरे जैसी लड़की सुसाइड भी कर सकती है, लेकिन मैं आप लोगों को समझा नहीं सकती कि मेरे दिमाग और दिल में कितनी नफरत भरी है।’’
अपनी मां के लिए उसने लिखा- ‘‘आपने मेरे बचपन और बच्चा होने का फायदा उठाया और मुझे विज्ञान पसंद करने के लिए मजबूर करती रहीं। मैं भी विज्ञान पढ़ती रही ताकि आपको खुश रख सकूँ। लेकिन मैं आपको बता दूं कि मुझे आज भी अंग्रेजी साहित्य और इतिहास बहुत अच्छा लगता है, क्योंकि ये मुझे मेरे अंधकार के वक्त में मुझे बाहर निकालते हैं।’’ कृति अपनी मां को चेतावनी देती है- ‘‘इस तरह की चालाकी और मजबूर करनेवाली हरकत 11वीं क्लास में पढ़नेवाली छोटी बहन से मत करना। वो जो बनना चाहती है और जो पढ़ना चाहती है, उसे वो करने देना क्योंकि वो उस काम में सबसे अच्छा कर सकती है, जिससे वो प्यार करती है।’’
प्रतिदिन 5 से ज्यादा घंटों का कोचिंग क्लास। कभी सुबह, कभी दोपहर तो कभी देर शाम तक, यानी कोई तय रुटीन नहीं। दैनिक दिनचर्या में कोई तारतम्य नहीं। मनोरंजन का कोई समय, न ही कोई व्यवस्था। न ही पुष्टीकारक भोजन। ऊपर से 500-600 बच्चों का एक बैच, जिसमें शिक्षक और छात्र का आपसी अंतर्व्यवहार असंभव। अगर छात्र को कुछ समझ न भी आए तो वह इतनी भीड़ में पूछने में भी संकोच। ऐसे में उसपर धीरे-धीरे सफलता का बढ़ता चौतरफा दबाव।
जो पैसे वाले हैं वे अकेले कमरा लेकर रहना चाहते हैं, जिसकी वजह से उनका जीवन और अकेला हो जाता है। अधिकांश ऐसे, जिनके माँ-बाप बेहद गरीब हैं और उन्होंने कर्ज लेकर कोचिंग के लिए भेजा है, जब अपेक्षा के अनुरूप अपने को नहीं पाता तो घबराकर महसूस करता है कि मां-बाप का क्या होगा? हाय! मैं उनका सपना नहीं पूरा कर पाया। अनेक बच्चे अपने स्कूल-कॉलेज या इलाके का टॉपर होता है, मगर यहाँ उसको अच्छी रैंक नहीं मिलती तो वह टूट जाता है। इस तरह वह घर-परिवार एवं समाज का दबाव, हताशा एवं निराशा के अतल गर्त में अवसाद के शिकंजे में जकड़े बच्चे को मुक्ति सिर्फ मृत्यु में ही नजर आती है। 
आज हर माँ-बाप शिक्षा संस्थानों एवं समाज को समझने की आवश्यकता है कि इंसान के जीवन से बड़ा कुछ भी नहीं है। इंसान तभी खुश रह सकता है जब वह स्वतंत्रतापूर्वक अपने जीवन की राह को खुद चुन सके, इसलिए कोई भी माँ-बाप, गुरु एवं शिक्षा संस्थान एवं शासन तंत्र पर सिर्फ यह जिम्मेदारी है कि वह एक लोकतांत्रिक माहौल में उसे पाल-पोसकर मजबूत कदमों और रचनात्मक-सकारात्मक सोच के साथ चलना सिखा दे, इंसान होने के नाते विविध रास्तों में अपने अनुरूप रास्ता और फिर मंजिल तो वह खुद चुन लेगा। तब यह दुनिया अभी से ज्यादा सुंदर होगी!
कीर्ति त्रिपाठी के पत्र का अंश तो एक उदाहरण मात्र है, ऐसे अनेकों मार्मिक मृत्युपत्र अपने अंतिम समय उन मासूमों ने लिखे होंगे और सबका मजमून करीब-करीब यही होगा। कुछ ने नहीं भी लिखे होंगे, किन्तु उसके दिल के अंदर दबा गुबार अंतिम क्रिया के समय धुआँ बनकर अवश्य दसों दिशाओं में यही संदेश लेकर फैला होगा! इस संदेश से क्या कोई सीख नई पीढ़ी के माता-पिता, परिवार, प्रशासन, सरकारों और कोचिंग संस्थानों ने ली, अगर ली है तो यह सिलसिला अभी तक रुक क्यों नहीं रहा?


 

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