माँ से मिला दो!
दस साल का मासूम जुबैल उ.प्र. के एटा से साइकिल
लेकर दिल्ली के लिए निकल पड़ा। साढ़े तीन घंटे में 35 किलोमीटर सिकंदराराऊ रेलवे क्रॉसिंग तक आते-आते
थककर चूर हो गया। उसके बाद उसकी हालत साइकिल चलाने लायक नहीं रही। उसे अब आगे जाने
की कोई तरकीब नहीं सूझ रही थी। भूख-प्यास से व्याकुल मासूम रुआंसा होकर एक
ई-रिक्शा चालक के पास गया और अपने पास के जमा पूंजी पाँच रुपये देकर बोला,
‘अंकल, आप मुझे मेरी माँ के पास दिल्ली तक छोड़
दोगे। मैं अपनी माँ से दो साल से नहीं मिला हूँ।’
ई-रिक्शा चालक उसकी बातें सुनकर परेशान हो गया।
वह बच्चे को लेकर कोतवाली पहुँचा और प्रभारी निरीक्षक मनोज कुमार शर्मा को सौंप
दिया। शर्मा ने बच्चे को उसके पिता मोहम्मद महफूज को सुपुर्द कर दिया। मोहम्मद
महफूज निवासी कांशीराम टाउनशिप, एटा का पहली पत्नी से पाँच वर्ष पूर्व तलाक हो चुका है। वह दिल्ली में
रहती है। मोहम्मद महफूज एवं उसकी पहली पत्नी ने दूसरी जगह शादी करके अपनी अलग
दुनिया बसा ली है। पहली पत्नी से हुए तीन बच्चे अपने पिता के पास ही रहते हैं।
महफूज की दूसरी पत्नी से भी एक पुत्र है। पहली पत्नी अपने बच्चों से मिलने करीब दो
वर्ष पूर्व आई थी। जुबैल एटा के रानी अवंतीबाई पब्लिक स्कूल में दूसरी कक्षा का
छात्र है। उस दिन वह सुबह सात बजे घर से अपनी साइकिल पर स्कूल के लिए निकला था,
लेकिन उसके मन में अपनी माँ से मिलने की धुन सवार थी। यह सहज अनुमान
लगाया जा सकता है कि जुबैल ने अपने माँ-बाप के तलाक के बाद अपने आप को कितना अकेला
महसूस किया होगा, बेचैनी में कितनी रातों तक वह सोया नहीं
होगा, वह अकसर अपने पिता से माँ से मिलाने को कहता रहा।
एक बच्चा जैविक, भौतिक एवं मानसिक अपनी हर आवश्यकताओं के लिए माँ
की ओर ही देखता है और माँ उसकी भाषा एवं मनोभावों को समझकर उसकी सारी आवश्कताओं को
पूरा करती है। कभी उसे भूख भी लगती है तो वह हमेशा बोलकर नहीं माँगता बल्कि दूसरे
बहाने कर-करके रोता है, माँ उसकी मानसिकता को पढ़कर कभी लाड़
से तो कभी डाँटकर खिलाती है। इस उम्र में दुनिया-जहान के बेशुमार प्रश्न उसके जेहन
में पैदा होते रहते हैं, वह अपने माता-पिता से ही सहज समाधान
पाता है। अनेक आवश्यकताओं के अलावा उसे नींद भी माँ की ही थपकी से आती है और
माँ-बाप के सुरक्षा कवच के अंदर सपनों की दुनिया में खो जाता है। एक बच्चे का पूरा
व्यक्तित्व उसके माता-पिता के सामूहिक पालन-पोषण पर ही फलित होता है।
जब से हम इस तथाकथित आधुनिकता के भ्रमजाल में
फँसे हैं, अपने
परिवार और समाज से कटते चले जा रहे हैं। एक समय वह भी था, जब
बच्चा अपने माता-पिता से ज्यादा दादा-दादी, नाना-नानी,
चाचा-चाची, मामा-मामी एवं बुआ-मौसियों से भरे
घर में पलता और बढ़ता था, परंतु धीरे-धीरे, खासकर शहरी समाज में सबसे कटता-सिकुड़ता बच्चा सिर्फ अपने माँ-पिता के बीच
का होकर रह गया; अब तो स्थिति यह हो गई कि बच्चे को अपने माँ
या बाप से भी बिछुड़कर घुट-घुटकर जीना पड़ रहा है। जुबैल जैसे मुस्लिम बच्चों की
त्रासदी का तो क्या कहना, जिसने तलाक के बाद माँ को भी खोया
और बाप की नई शादी के बाद पिता को भी। नई शादी के बाद बाप भी वैसा कहाँ रह पाता है,
जिस लाड़-प्यार का वह आदी रहता आया है।
माँ-बाप सिर्फ अपने-अपने निजी स्वार्थ, जरूरतों या एक-दूसरे से बदले की
भावना के वसीभूत होकर तलाक ले लेते हैं और अपने मासूम बच्चों को उनके मूलभूत
अधिकारों से वंचित कर उसे अकेलेपन से जूझने के लिए छोड़ देते हैं। बच्चा अकेलेपन
में अंदर-अंदर टूटता-बिखरता रहता है और एक भग्न हृदय और भग्न मस्तिष्क वाला
व्यक्तित्व तैयार होकर समाज के बीच आता है, जिसके कारण हिंसा
के अनेक रूप नित नए रूप में सामने आते हैं।
कुछ वर्ष पहले ऑस्ट्रेलिया में वहाँ के लोगों के
ज्यादा हिंसक होने पर एक शोध कराया गया था, उसका निष्कर्ष था कि ऑस्ट्रेलिया के द्वीपों पर जब
ब्रिटेन ने 17वीं और 18वीं शताब्दी में
वहाँ के मूल निवासियों को खदेड़कर कब्जा किया तो वहाँ ब्रिटेन के लोगों को बसाना
प्रारंभ किया, जिसमें बहुत बड़ी संख्या में अपने माँ-पिता से
अलग कर बच्चों को भी जबरन बसने भेज दिया गया था। अपने माता-पिता एवं सगे-संबंधियों
से बिछुड़कर वे हिंसक होते चले गए, वहाँ के मूल आदिवासियों के
ऊपर अनेक अत्याचार किए। उनका हिंसक मनोभाव सदियों बाद अनेक पीढ़ियों के बाद उनके
अभी के वंशज भी इसी प्रवृत्ति से मुक्त नहीं हो पाए हैं।
हम एक ऐसे हत्यारे समय में जीने को अभिशप्त हैं, जहाँ हर घड़ी मीडिया में वीभत्स
तरीके से नृशंस हत्याएँ परोसी जा रही हैं। कहीं कोई किशोर अपने माता-पिता की हत्या
कर रहा है, तो कहीं बाप ही मासूम बच्चों समेत पूरे परिवार का
खात्मा कर रहा है, कोई पति अपनी पत्नी की हत्या कर रहा है तो
कहीं पत्नी ही अपने पति को सुपारी देकर मरवा रही है। व्यापार, राजनीति, आपसी रंजीश, रोडरेज,
और पार्किंग के लिए आए दिन होने वाली हत्याएँ तो आम हैं। हमारी
संवेदनाएँ इतनी कुंद होती जा रही हैं। हम मुश्किल से ठहरकर इन सब के पीछे के
कारणों पर गहराई से सोच पाते हैं कि हिंसा के अनेक कारणों में से एक बहुत बड़ा कारण
परिवार के हिंसक माहौल में बच्चों का पालन-पोषण है।
सदियों पहले ब्रिटेन ने अपने देश के बच्चों को
उनके माता-पिता और घर-समाज से अलग कर ऑस्ट्रेलिया के द्वीपों में वहाँ के
आदिवासियों को उजाड़ते हुए हिंसा का जो बीज-वपन उनमें किया, कई पीढ़ियों के बाद हिंसा की वह
विषबेल आज भी फल-फूल रही है। हमारे बच्चे पहले संयुक्त परिवार और अब माता-पिता से
भी विलगित होकर जिस उदास-उजाड़ टापू में पलने को अभिशप्त हो रहे हैं, वह हमारे समाज रूपी समुद्र में नित नए हिंसक ज्वार ला रहा है और परिवार का
पूरा ताना-बाना बिखर रहा है। मासूम जुबैल दिल्ली तक दस्तक देने का प्रयास करते हुए
मिन्नतें कर रहा है कि मुझे मेरी माँ से मिला दो, मेरा
हँसता-खेलता बचपन बचा लो!
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