सम्मानों का सम्मान
किसी भी पुरस्कार या सम्मान का गौरव तभी तक कायम
रहता है, जबतक
उसके लिए पारदर्शी व समुचित तरीके से उसके लिए योग्य, साहसी
व प्रतिभावान कर्मयोगी व्यक्तियों को सम्मानित करने के लिए चयन किया जाता है। अगर
योग्य व्यक्तियों को सम्मानित किया जाता है तो उसका तो मनोबल बढ़ता ही है, देश और समाज भी उससे लाभान्वित और प्रभावित होता है। इसके साथ खुद उस
सम्मान का भी सम्मान बढ़ जाता है। हम लंबे समय तक किसी बड़े सम्मान का आदर सिर्फ
इसलिए नहीं करते कि वह किसी महान व्यक्ति या बड़ी संस्था से जुड़ा हुआ है। महान
व्यक्ति या संस्था का अपना प्रभामंडल होता अवश्य है, परंतु
उस सम्मान या पुरस्कार का सम्मान तो लंबे समय तक तभी कायम रहेगा, जबतक उस सम्मान के उद्देश्यों एवं मानदंडो के अनुरूप जनतांत्रिक व
पारदर्शी तरीके से व्यक्तियों व संस्थाओं को सम्मानित किया जाएगा। इसलिए सम्मानित
करने वालों को कभी यह नहीं भूलना चाहिए कि किसी को सम्मानित कर वे सिर्फ उसे
सम्मान दे रहे हैं, बल्कि योग्य एवं उचित व्यक्ति को
सम्मानित कर खुद वह सम्मान भी सम्मानित होता है और अपनी प्रतिष्ठा व प्रभाव में
चार चाँद लगाता है।
इस मायने में हर वर्ष 26 जनवरी की पूर्व संध्या पर
घोषित किए जाने वाले पद्म पुरस्कारों को परखने का यह सही समय है। देश में यह
पुरस्कार 1954 से दिए जा रहे हैं। बीते 65 सालों में देश के 4 हजार 417
नामी व्यक्तियों को सम्मानित किया जा चुका है। इन पुरस्कारों के लिए नामों के चयन
की एक लंबी प्रक्रिया है। पात्र व्यक्तियों से उनके आवेदन अनुशंसाओं के साथ
कलेक्टर के माध्यम से केंद्र सरकार को भेजे जाते हैं। अनुशंसित नामांकन पद्म
पुरस्कार समिति के समक्ष रखे जाते हैं। समिति अपनी सिफारिशें प्रधानमंत्री को
भेजती है। वहाँ से अंतिम मुहर के लिए सूची राष्ट्रपति के पास भेजी जाती है।
पद्म पुरस्कारों के शुरुआती दौर में सम्मानित
ज्यादातर हस्तियाँ वे थीं, जिन्होंने
अपना जीवन किसी विशिष्ट क्षेत्र में बिना किसी लोभ या लाभ के राष्ट्र सेवा में खपा
दिया था। पहली सूची में जो 23 नाम थे, उनमें
प्रख्यात वैज्ञानिक होमी जहाँगीर भाभा, शांति स्वरूप भटनागर,
मूर्धन्य कवि मैथिलीशरण गुप्त, नामी शायर जोश
मलीहाबादी, जनरल केएस थिमैया, सुप्रसिद्ध
गायिका एमएस सुब्बालक्ष्मी आदि शामिल थे। लेकिन धीरे-धीरे पद्म पुरस्कार प्रतिभाओं
के सम्मान के साथ निजी पसंद और राजनीतिक प्रतिबद्धता ही मुख्य आधार बनते गए।
इसीलिए पद्म पुरस्कारों पर विवादों की घटा छाने लगी। कई ऐसे लोग भी राजनीतिक
जोड-तोड़ के बल पर पद्म पुरस्कार पाने लगे, जो किसी साधारण
पुरस्कार के भीे काबिल न थे। नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए सरकार आने के बाद
यह बात भी उठी कि लगातार अनेक ऐसे लोगों को यह सम्मान मिलता रहा है, जो कि इसके योग्य नहीं हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि हमें
देश में विविध क्षेत्रों में निष्काम भाव से काम कर रहे उन अलक्षित (अनसंग हीरो)
नामों को ढूँढ़कर पुरस्कृत करना चाहिए। इस सरकार ने पद्म पुरस्कारों के लिए व्यक्ति
चयन और आवेदन में एक महत्त्वपूर्ण बदलाव किया। दो साल पहले ऑनलाइन आवेदन शुरू हुए
और कुछ ऐसे चेहरों को पद्म पुरस्कार मिले, जिसके बारे में
उन्होंने खुद भी नहीं सोचा होगा। ऑनलाइन आवेदनों का रास्ता खुलने का नतीजा है कि
वर्ष 2019 के पद्म पुरस्कारों के लिए अंतिम तिथि 15 सितम्बर, 2018 तक कुल 49,992
आवेदन मिले हैं, जो वर्ष 2010 में
प्राप्त नामांकनों की अपेक्षा 32 गुना ज्यादा हैं। उस वर्ष 1313,
तो वर्ष 2016 में 18768
और वर्ष 2017 में 35595 नामांकन
प्राप्त हुए थे।
इस वर्ष पूर्व राष्ट्रपति व राजनेता प्रणब
मुखर्जी, उनके
साथ ही सामाजिक कार्यकर्ता और संघ विचारक नानाजी देशमुख तथा प्रख्यात संगीतकार
भूपेन हजारिका को मरणोपरांत भारतरत्न से सम्मानित किया गया है। इन महान विभूतियों
को सम्मानित कर सरकार ने पूरे देश को सकारात्मक शुभ संदेश दिया है। इसके अलावा
पद्म पुरस्कारों में अधिकांश अचर्चित कर्म योद्धा हैं जिन्होंने समाज सेवा को ही
अपनी जीवनचर्या बना लिया है, इनमें 96
वर्षीय वल्लभभाई वसराम हैं, जिन्होंने बिना किसी आधुनिक
प्रयोगशाला के ही ‘मधुवन गाजर’ का
विकास किया। वह 65 वर्षों से जैविक कृषि प्रचार में संलग्न
हैं। उन्हें पद्मश्री मिला है। ओडिशा की 69 वर्षीय कमला
पुजारी ने बीज प्रजाति संरक्षण का बड़ा काम किया है। सुधांशु बिस्वास, 99 वर्षीय स्वतंत्रता सेनानी, जिन्होंने अपना जीवन
गरीबों की सेवा के लिए समर्पित कर दिया। बिस्वास पश्चिम बंगाल में स्कूल, अनाथालय और डिस्पेंसरी चलाते हैं।
पद्म सम्मान के लिए इस बार कई ऐसे नायकों को
चुना गया है, जो अब
तक राष्ट्रीय मीडिया की चकाचौंध से दूर ही थे। इनमें मुजफ्फरपुर की राजकुमारी देवी
के घर में बनाए अचार-मुरब्बा के अनेक दिग्गज भी मुरीद हैं। ओडिशा के ‘चाय वाले गुरुजी’ के नाम से मशहूर डी प्रकाश राव भी
इस सम्नान के लिए चुने गए। चाय बेचकर अनाथ और गरीबों को शिक्षा दे रहे हैं। झारखंड
में जंगलों की रक्षा में जुटीं जमना टुडू उर्फ लेडी टार्जन भी ऐसा ही एक नाम हैं,
जो अनेक विरोधों और खतरों के बावजूद वन संरक्षण में जुटी हुई हैं।
डॉ. स्मिता एवं डॉ. रवींद्र महाराष्ट्र के
मेलघाट जिले के उपेक्षित क्षेत्र में 30 साल से कोरकू जनजातियों के बीच सक्रिय हैं। वे
गरीबों के बीच प्राथमिक चिकित्सा केंद्र चला रहे हैं। चिकित्सा सेवा की राशि सिर्फ
दो रुपये है। एम आर राजगोपाल को भारत में ‘पैलिएटिव केयर’
का जनक माना जाता है। ‘पैलिएटिव केयर’ का इस्तेमाल गंभीर रूप से बीमार मरीजों में दर्द कम करने के लिए किया जाता
है। इसी तरह 66 वर्षीय एम चिन्ना पिल्लई भी पद्मश्री सूची
में हैं। उन्होंने अपने दम पर हजारों महिलाओं के स्वयं सहायता समूह बनाए। बचत और
साख की संस्थाएँ बनीं। इसके अलावा भी जमीन से जुड़े और विपरीत परिस्थितियों में
समाजसेवा करने वाले अनेक अचर्चित नाम सूची में हैं।
इस वर्ष पद्म सम्मानों से सम्मानित लोगों की
सूची और उनके कार्यों को देखकर यही कहा जा सकता है कि इस सम्मान से सम्मानित होकर
विविध क्षेत्रों में सेवा कार्य करने वालों का ही मनोबल नहीं बढ़ा है बल्कि पद्म
पुरस्कारों का भी पूरे देश और समाज में सम्मान बढ़ा है।
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