क़िस्त-दर-क़िस्त

‘सोनिया खाना’ और ‘अम्मा पानी’

यूपीए अध्यक्षा सोनिया गांधी अब जल्दी में हैं और किसी की एक नहीं सुननेवाली उन्होंने जल्दी से जल्दी खाद्य सुरक्षा बिल को अध्यादेश के जरिए लागू करने का मन बना लिया है। अब बहुत हो गया। अगले वर्ष 2014 में आम चुनाव है, उसके पहले आम लोगों के पेट भरने वाली योजना को जमीन पर उतारकर रहेंगी। उनका मानना है कि 2009 के आम चुनाव में मनरेगा कार्यक्रम के कारण जिस तरह देश की बेरोजगारी दूर हो गई! वोटों की बरसात से दूसरी बार भी यूपीए की सरकार बन गई, ठीक उसी तरह खाद्य सुरक्षा बिल से भी देश की भुखमरी की समस्या से निजात मिल जाएगी और नया जनादेश भी मिलेगी। मीडिया, न्यायपालिका, विपक्ष और विभिन्न संवैधानिक संस्थाओं की रिपोर्ट लाख भ्रष्टाचार, भुखमरी, महंगाई, कुशासन आदि का शोर करते रहें। इस कानून से सबकी बोलती बंद हो जाएगी, क्योंकि भूख से त्राहिमाम् करती जनता को यह सरकार भोजन का अधिकार देगी। यह गेमचेंजर साबित होने वाली है।

 दूसरी तरफ तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता ने भी क्रांतिकारी फैसला किया है कि अम्मा मिनरल वाटर के नाम से पानी की एक लीटर की बोतल सिर्फ और सिर्फ दस रुपये में जनता को बेचेंगी ताकि बाजार से कम दर पर जनता अपनी प्यास बुझा सके, जिसके लिए राज्य भर में नौ संयंत्र जल्द ही स्थापित किए जाएंगे।

 सुनने में यह कितना सुखद लगता है कि केन्द्र सरकार ने देश के अधिकांश लोगों को इस महंगाई में तीन रुपये किलो चावल और दो रुपये किलो गेहूं मुहैया कराने के लिए कमर कस ली है तो एक राज्य सरकार ने सस्ते दर पर पानी पिलाने की ठानी है। इसके अलावा अन्य राज्य सरकारें जनता के लिए भोजन, पानी के अतिरिक्त शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा यानी एक शिशु के मां के पेट में आने के पहले से लेकर एक वृद्ध के मृत्युपर्यंत तक के लिए अनेकानेक अभिनव योजनाएं चला रही हैं, यहां तक लेपटॉप और गैस चूल्हा एवं गैस सिलेंडर तक जनता को मुफ्त दे रही है। फिर भी यह कैसी विडंबना है कि हमारे देश के 48 प्रतिशत बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। आजादी के बाद तमाम आर्थिक विकास और गरीबी निवारण योजनाओं के बावजूद गरीबों की संख्या कम नहीं हुई, बल्कि बढ़कर सरकारी आंकडों के मुताबिक आज 40 करोड़ पहुंच गई है। संयुक्त राष्ट्र संघ की मानव विकास रिपोर्ट 2011 के अनुसार 187 देशों में भारत का 134वां स्थान है।

 दरअसल, हमारी चुनी हुई सरकार आम लोगों को भूखा, कामचोर और मुफ्तखोर मानकर चलती है और चुनावों से पहले ऐसे-ऐसे वादे करती है, जिसे पूरा करना उसके बस कि बात होती ही नहीं। भोजन और पानी क्या कोई जनता को भीख में देगी, इसे तो उसे प्रकृति ने दिया है, जिसे वह अपनी मेहनत के बल पर हासिल करती है। सरकार सही वितरण और इसका संरक्षण करने के बजाय बीच में स्वयंभू मालिक बन गई और व्यापारियों के हित में जमकर प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करने लगी है। आज देश में अनाज गोदाम भरे पड़े हैं और सड़ रहे हैं। सर्वोच्च न्यायलय के आदेश के बावजूद भी जरूरतमंदो को खाने के लिए नहीं मिल रहा, क्योंकि अनाज सड़ेगा तो उसे शराब व्यापारियों को बेचा जाएगा, जिससे ज्यादा मुनाफा होगा। उसी तरह अब कई सरकारें या मंत्रालय यह दावा कर रही है कि वह लोगों को सस्ते दर पर पानी पिलायेगी। वाह री! लोककल्याणकारी सरकार! पहले तो जल संसाधनों को जमकर बोतल बंद पानी तथा पेय पदार्थों को बेचने वाली कंपनियों को दोहन की छूट दो और आम लोगों के मौलिक आवश्यकता से भी वंचित करते जाओ। ऐसी स्थिति पैदा कर दो कि वह त्राहि-त्राहि करने लगे। फिर बीच में उस उत्पाद का बाजार बनाने के लिए हस्तक्षेप कर ऐसे पेश करो कि देखो सारी कंपनियों का उत्पाद महंगा है और सरकार इतने कम रेट पर इतनी सब्सिडी पर लोककल्याण के लिए खुद मुहैया करा रही है। ऐसा ही ‘रेल नीर’ बेचने वाले रेल मंत्रालय ने किया था। आज रेल में ढूंढ़ने से भी ‘रेल नीर’ नहीं मिलेगा अलबत्ता सभी स्टेशनों के नलकों में पानी सप्लाई अवश्य बंद हो गयी और बहुराष्ट्रीय कंपनियां पानी के व्यापार में मनमाने ढंग से पैसा कमाने लगी। यही सब कुछ शिक्षा के क्षेत्र में, स्वास्थ्य के क्षेत्र में, हर जगह सरकार अपनी संस्थाओं को नकारा बनाती जा रही है और बड़े-बड़े व्यापारियों को लोगों की जान की कीमत पर व्यापार की छूट देती जा रही है। 

 दरअसल, होना यह चाहिए कि केन्द्र सरकार को खुद ऐसी योजनाएं चलाने के बजाय देश-हित में शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा तथा अन्य जरूरी क्षेत्रों के लिए सिर्फ नीतियां बनाने तथा इसे अंजाम देने वाली संस्थाओं को मजबूत करना चाहिए। भोजन, पानी, पर्यावरण जैसी जरूरतों के लिए केन्द्र सरकार को ग्राम पंचायत, जिला पंचायत और राज्य सरकारों को अपनी आवश्यकतानुसार योजनायें बनाने एवं चलाने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। अपने आप को मॅानीटरिंग, आवश्यक वित्तीय सहायता, प्रोत्साहन एवं मूल्यांकन तक सीमित रखना चाहिए, ताकि आम लोग खुद अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप स्थानीय स्तर पर ही योजना बनाकर उन्हें चलायें। सरकार को यह नहीं भूलना चाहिए कि देश का असली आधार आज भी ‘गांव और कृषि’ ही है, योजना आयोग का ‘आधार कार्ड’ नहीं, कब तक वह योजना भवन से यह तय करती रहेगी फलां गांव या जिले में इतने लोग गरीब हैं? 

 सोनिया जी द्वारा भोजन और ‘अम्मा पानी’ की व्यवस्था हो जाने के बाद अब अगला आम चुनाव शायद हवा के मुद्दे पर लड़ा जाएगा! यह बात कहकर मैं हवा में तीर नहीं चला रहा हूं, बल्कि वास्तविकता है कि आज जिस तरह से पर्यावरण से खिलवाड़ किया जा रहा है और लोगों को विशुद्ध हवा नहीं मिल पा रही है। ऐसे में कई जानी-मानी कंपनियां घरों में शुद्ध हवा मुहैया कराने के नाम पर ए.सी. तो बेच ही रही हैं, वही कंपनियां कल लोगों को यह कहेगी कि शुद्ध हवा के लिए मेरे नये उत्पाद इस सिलेंडर मॉस्क को नाक में लगाकर चलिए ताकि आपको हमेशा घर-बाहर विशुद्ध हवा मिलती रहे। प्रारंभ में कुछ रईस प्रबुद्ध लोग लगाकार चलेंगे, फिर सरकार आम लोगों तक रियायती दर पर यह उत्पाद पहुंचाने का वादा करेगी। कुछ दिनों में सरकारी कंपनी असफल हो जाएगी और बहुराष्ट्रीय कंपनी के उत्पाद का बाजार बन जाएगा। वह सदियों तक मालामाल होती रहेगी। इसको नामुमकिन मानने वाले क्या कुछ दशक पहले यह मानने को तैयार थे कि हर घर में बोतल के पानी से प्यास बुझेगी और लोग दूध से भी ज्यादा महंगा बोतलबंद पानी खरीदकर ढोते हुए चलेंगे। इसलिए अगला आम चुनाव जी भरकर शुद्ध हवा में श्वास लेने के वादे पर हवा-हवाई होनी है!