Thursday, March 7, 2019

पुल बनाएँ और बनें भी
पुल सबको जोड़ता है। एक इनसान को दूसरे इनसान से, एक समाज को दूसरे समाज से, गाँव को दूसरे गाँवों और शहर से, प्रदेश को दूसरे प्रदेश से, दूसरे देश से भी। मानव सभ्यता के विकास में पुलों का अहम योगदान है। आधुनिक भौतिक एवं सामाजिक-सामुदायिक विकास का अगर गंभीर अध्ययन किया जाए तो आग के बाद पुलों का ही योगदान ठहरेगा। इसके लिए एकतरफ जहाँ मानव ने दूरदराज के लोगों को पुल बनाकर भौगोलिक दूरियों को मिटाया, वहीं दूसरी तरफ मानव खुद भी पुल बनकर संबंधों यानी रिश्ते-नातों के अंतर्जाल बुनकर जंगली, अराजकतावादी समाज से आधुनिक सामाजिक व्यवस्था तक पहुँचा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार 25 दिसंबर को असम के डिब्रुगढ़ में भारत के सबसे लंबे रेल-सड़क बोगीबील पुल का उद्घाटन किया। इस दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने खुली जीप में सवार होकर एवं पैदल चलकर भी पुल का अवलोकन किया। ब्रह्मपुत्र की तेज और अथाह लहरों के बीच पुल बनाना कोई आसान काम नहीं था। उसका महत्त्व इससे भी समझा जा सकता है कि यह देश का सबसे लंबा पुल है, लगभग पाँच किलोमीटर लंबा। यह तकरीबन वैसा ही पुल है, जैसा एक पुल यूरोप में स्वीडन और डेनमार्क के बीच बना है, नीचे रेल की दोतरफा पटरियाँ और ऊपर तीन लेन की सड़क। इसे इतना मजबूत बनाया गया है कि बिना किसी बाधा के यह 120 वर्षों तक साथ निभाता रहेगा।
यह पुल जितना लंबा है, उससे कहीं लंबी इसकी कहानी है। सर्वप्रथम बोगीबील पर पुल बनाने की माँग दरअसल 1962 में चीनी आक्रमणके बाद ही उठी थी। बोगीबील पुल परियोजना साल 1985 में हुए असम समझौते की शर्तों का एक हिस्सा था। इसका शिलान्यास 1997 में उस समय के प्रधानमंत्री एच डी देवेगौड़ा ने किया था। वैसे इसे बनाने का काम ठीक ढंग से 2002 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने शुरू करवाया। 2004 से 2014 तक प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए के कार्यकाल में इस काम में गतिरोध बना रहा, जबकि केन्द्र और असम दोनों जगह कांग्रेस की सरकार थी। 2014 के चुनाव में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का यह पुल बनाने का एक मुख्य वादा था, जो अब साकार हुआ है।
बोगीबील पुल असम और अरुणाचल प्रदेश के लोगों की जिंदगी को तो आसान बनाएगा ही, साथ ही भारतीय सेना के लिए भी आधारभूत सुविधाएं अब सहज उपलब्ध होंगी। सेना की जरूरतों को देखते हुए ही इसको इतना मजबूत बनाया गया है कि इस पर न सिर्फ भारी-भरकम टैंकों की आवाजाही हो सकती है, बल्कि जरूरत पड़ने पर वायुसेना के जेट विमान भी उतारे जा सकते हैं। बोगीबील पुल से कुछ ही आगे भारत और चीन की सीमा है, यानी वह जगह, जहाँ चीन का लपलपाता विस्तारवाद हमेशा से भारत के लिए सिरदर्द बना हुआ है। इस मायने में यह पुल इस क्षेत्र में सेना को मिली एक नई सुविधा ही नहीं, बल्कि उसे एक नया आत्मविश्वास भी देगा।
यह पुल असम और अरुणाचल प्रदेश के पूर्वी क्षेत्र में ब्रह्मपुत्र नदी के उत्तर और दक्षिण तट के बीच संपर्क की सुविधा प्रदान करेगा। इससे अरुणाचल प्रदेश के अंजाव, चंगलांग, लोहित, निचली दिबांग घाटी, दिबांग घाटी और तिरप के दूरस्थ जिलों को ही लाभ नहीं होगा बल्कि उत्तर-पूर्व क्षेत्र के लिए एक जीवनरेखा के रूप में कार्य करेगा। यह न केवल डिब्रुगढ़ और अरुणाचल प्रदेश की राजधानी ईटानगर के बीच 150 किलोमीटर सड़क का फासला कम करेगा। पहले धेमाजी से डिब्रुगढ़ की 500 किलोमीटर की दूरी तय करने में 34 घंटे लगते थे, अब यह सफर महज 100 किलोमीटर का रह जाएगा और 3 घंटे लगेंगे। डिब्रुगढ़ से दिल्ली के बीच रेलयात्रा में कम से कम तीन घंटे का समय कम कर देगा यानी दिल्ली भी इसके दिल के ज्यादा करीब होगी।
सरकार यातायात, व्यापार, संचार के लिए पुल का निर्माण कर सकती है, यानी साधन मुहैया तो करा सकती है परंतु लोगों के दिलों को जोड़ने का पुल तो व्यक्ति और समाज को ही बनना और बनाना पड़ेगा। आधुनिक समय की सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि संचार के विविध पुल विकसित हो गए हैं और लगातार हो रहे हैं, परंतु समाज या रिश्तों को जोड़ने वाले सारे पुलों को हम खुद नेस्तनाबूद करते जा रहे हैं। कहीं जाति-संप्रदाय के नाम पर, तो कहीं क्षेत्र, भाषा एवं संस्कृति के नाम पर लोगों के बीच दूरियाँ बढ़ रही हैं। आज देश, प्रदेश, शहर, कस्बा, गाँव ही नहीं, हर घर में सारे रिश्तों के बीच भी दरारें बढ़ती जा रही हैं। कहने के लिए तो हर आदमी के पास ऐसा साधन है, जो बटन दबाते ही अपनों के सारे गिले-सिकवे दूर कर गले लग सकता है, मिनटों या कुछ ही देर में दूसरे के करीब पहुँच सकता है। परंतु अपनी झूठे अहं के कारण इतनी दूरियाँ बढ़ चुकी हैं कि वह सबकुछ होते हुए भी घुट-घुटकर मरने को अभिशप्त है। आज वह सोशल मीडिया के माध्यम से हजारों-लाखों लोगों से जुड़ा है, परंतु फिर भी नितांत अकेला है। हमने सामाजिक-मानवीय रिश्तों के हर व्यक्ति, हर संस्था को ध्वस्त कर दिया है और करते जा रहे हैं, जो मानवीय संबंधों के पुल का काम करते थे। जिसके कारण विविध भौतिक संसाधन होने के बावजूद अधिकांश व्यक्ति, परिवार, समाज अनेक सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक समस्याओं एवं संघर्षों में फँसकर हिंसा और विघटन से त्रस्त हैं।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बोगीबील पुल को राष्ट्र को सोंपकर क्षेत्रीय दूरियों को पाटने के लिए एक बहुत बड़ा कदम उठाया है। इस क्षेत्रीय दूरी के कारण ही उत्तर भारत एवं देश के अन्य भागों से पूर्वोत्तर भारत की दूरी बहुत ज्यादा लगती थी। ढोला-सादिया पुल के बाद बोगीबील पुल बन जाने से यह भौगोलिक दूरी काफी कम हो गई है। हमें इसी के साथ मानवीय संबंधों के पुल को भी इतना मजबूत करना पड़ेगा कि वो सांप्रदायिकता, जातीयता, क्षेत्रीयता और भाषाओं के नाम पर पैदा किए जाने वाली दरारों को पाटकर पूरे समाज और देश को एकता की डोर से जोड़ दे। सभ्यता की प्रगति के लिए पुल बनाना बहुत जरूरी है, साथ में पुल बनना भी, ताकि हम पूरे समाज और संसार को एक-दूसरे से जोड़ते रहें और जुड़े रहें।


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