Saturday, September 3, 2016


डिजिटल मीडिया का विद्रूप चेहरा
हम जैसे-जैसे डिजिटल होते जा रहे हैं, दुनिया की अनेक भयावह, भदेस और नग्न सच्चाइयाँ पूरी तेजी और तीव्रता से हमारे सामने खुलती और ओझल होती जा रही हैं। इन तस्वीरों के भीतर दबे पड़े इसके विविध आयामों को हमारा मन-मस्तिष्क ठीक से पकड़ ही नहीं पा रहा। हमें समझ में नहीं आ रहा है कि हम बुक्का फाड़कर रोएं, ठठाकर हँसें या तमाम इंसानी संवेदनाओं को ताख पर रखकर बाजार व्यवस्था की लुभावनी भूलभुलैयों में मशीन की तरह अपने में मगन रहें।
युद्ध की मार झेल रहे सीरिया के एलेप्पो शहर से टीवी और मोबाइल पर प्रसारित उस वीडियो को देखकर कोई ऐसा इंसान नहीं होगा, जो विचलित न हुआ हो। धूल और खून से सने तीन साल के मासूम ओमरान दाकनीश को एंबुलेंस में बैठे पहली नजर पड़ते ही उसका सपाट चेहरा, जिसमें रोने या हँसने का दूर-दूर तक कोई निशान नहीं, एक पलास्टिक या मोम के गुड्डे से ज्यादा कुछ नहीं दिख रहा था, परंतु दूसरे ही पल, जैसे ही वहां से उतरकर जाते हुए दिखा, दिमाग में कोंधा कि अरे! यह तो कोई इंसानी बच्चा है। पल भर में ही युद्ध की विभीषिका का एक बच्चे के चेहरे से फूटता ऐसा लोमहर्षक चित्रण विरला ही होगा। एक दूसरा चित्र दिल्ली की सड़क पर सुबह के समय एक व्यक्ति सड़क के किनारे-किनारे जा रहा है कि एक टैम्पो आता है और उसे जोर से धक्का मारता हुआ लड़खड़ाते हुए निकल जाता है। वह घायलावस्था में अचेत सड़क पर पर घंटो पड़ा रहता है। कुछ देर बाद एक आदमी आता है, उसे देखता है और उसके पास पड़े उसके मोबाइल को जेब में डालकर इत्मीनान से चलता बनता है। घंटो बाद पुलिस की गाड़ी आई तो उसे अस्पताल ले जाया गया, तबतक बहुत सारा रक्त बहने के कारण उसने दम तोड़ दिया। तीसरी तस्वीर जब पूरा भारत कृष्ण जन्माष्टमी के उत्सव में डूबा था, ओडिशा के कालाहांडी में सड़क पर एक व्यक्ति अपनी पत्नी की भारी-भरकम लाश को 10 किलोमीटर तक अपने कंधों पर हांफते-कांपते ढोता जा रहा है, साथ में उसकी 12 वर्षीय रोती-बिलखती और सामान उठाये साथ में चलती हुई उसकी बेटी। पता नहीं इस तस्वीर को जिसने भी देखा होगा, कैसे उत्सव के अनुकूल अपने आप को बनाए रखा होगा। क्या हमारे कल्याणकारी राज्य के सूरमाओं और कारिंदों को इस भ्रष्ट व्यवस्था को ढोते-ढोते दाना मांझी को अपनी पत्नी की लाश को इस कदर ले जाते हुए एक बार भी सिकन आई होगी? अगर आई तो क्या वे इस कदर इसके लिए दाना मांझी को ही दोषी ठहराते?
तस्वीर का दूसरे कुछ सुखद पहलू भी है। हनीमून के लिए विदेश जा रहे फैजान पटेल ने हवाई जहाज से विदेश मंत्री को अपना और अपने बगल के सीट पर अपनी नवब्याहता पत्नी की खाली सीट पर रखी उसके फोटो की तस्वीर के साथ ट्वीट किया कि यात्रा के समय पर उसकी पत्नी का पासपोर्ट खो जाने के कारण वह बिना पत्नी के ही हनीमून मनाने इटली जा रहा है। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने तत्काल ट्वीट किया, फैजान, तुम चिंता मत करो, मैं व्यवस्था करवा रही हूँ। तुम अपनी पत्नी के साथ ही अपने पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुरूप ही हनीमून मनाओगे। इससे सिर्फ फैजान ही नहीं बल्कि जिसने भी देखा-सुना, एक सुखद एहसास से भर गया। इसके अलावा रेलमंत्री सुरेश प्रभु से रेलयात्रियों की छोटी से छोटी समस्याओं का समाधान मिलता रहा है।  पौलेंड के ओलंपिक रजत विजेता डिस्कस थ्रोअर पियोट्र मलाचोवस्की ने अपने रजत पदक को आंख के कैंसर से जूझ रहे एक तीन साल के बच्चे के इलाज के लिए दान में दे दिया। वे चाहते हैं कि उनके पदक की नीलामी की जाए और उससे जो भी पैसा मिलें, उससे पीड़ित बच्चे का इलाज किया जाए।
यह तो हमारे डिजिटल दुनिया के घटनाक्रमों के मात्र कुछ उदाहरण हैं, इसके अलावा अनेकानेक मानव संवेदनाओं को कंपा देने वाली अनेक तस्वीरों से हम हर घंटे दो-चार होते हैं। स्वार्थी विश्व व्यवस्था, फफूँद पड़े सरकारी तंत्र और निर्दयी समाज की काली बदसूरत शक्ल का ऐसा घिनौना चेहरा नहीं लगता कि विश्व के इतने सारे लोगों ने एक साथ कभी इस डिजिटल क्रांति से पहले कभी देखा होगा। इनके बीच कुछ सुखद एहसास कराते सरकारी, सामाजिक एवं व्यक्तिगत मानवीय सरोकारी प्रयास के चित्र भी आते हैं, परंतु इतनी सारी अमानवीय विदू्रपताओं से भरपूर घनघोर अंधेरी रात के मध्य कुछ टिमटिमाते जुगनुओं के समान ही दिखते हैं।
क्या आज वह समय नहीं आ गया है, जब जरा ठहरकर डिजिटल दुनिया के विविध पहलुओं पर सामाजिक, मनोवैज्ञानिक, मानवीय तथा अन्य दृष्टिकोण से इसका गहन अध्ययन, विश्लेषण किया जाए? डिजिटल दुनिया में इतने सारे घटनाक्रम एक साथ इतनी तेजी से घटित होकर दृश्यमान होता लोगों के बीच आ रहा है कि किसी भी घटना पर थोड़ी देर रुककर उसपर चिंतन-मनन करना दुष्कर होता जा रहा है। सब कुछ चंद घंटों में पुराना होता जा रहा है। हर अमानवीय कृत्य लागों को सिर्फ कुछ देर के लिए चौंकाता है और दूसरा किसी उससे भी नृशंस दृश्य की आहट देकर चला जाता है। हर अमानवीय दृश्य का अनेक जातिवादी, कट्टर धार्मिक, आतंकवादी समूह और यहाँ तक कि राजनीतिक दल अपने पक्ष को मजबूत करने एवं विरोधियों को नीचा दिखाने में प्रयोग करने में लगे हैं। आमलोग एक नशेड़ी की भांति इसके आदी होते जा रहे हैं, उनकी संवेदनाएं मृत होती जा रही हैं। ओमरान का सपाट चेहरा या दाना मांझी की विवशता के दृश्य कुछ घंटो के लिए सिर्फ हलचल मचाकर घटनाक्रमों की शृंखला में रिकार्ड भर बनकर रह जाने को अभिशप्त हैं। आम लोगों को भोजन, शिक्षा, स्वास्थ्य एवं सुरक्षा जैसी मौलिक जरूरतों की जंग से निजात मिलती कहीं से नहीं दिख रही। इस डिजिटल क्रांति के फायदे चाहे जितने गिनाए जाएँ, इतना तो तय है कि आनेवाले समय में मनोचिकित्सकों का धंधा बहुत तेजी से बढ़ने वाला है!    

  


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