लाभ और लोभ का जानलेवा खेल
ब्रेड, पाव
या मैगी बनाने वाली देशी और मल्टीनेशनल कंपनियां खतरनाक रसायनों के मिलावट में
पकड़ी गईं। हंगामा मचने पर व्यापार चौपट होने के भय से भले ही अब यह कहने पर मजबूर
हुई हों कि अब वे उन हानिकारक तत्त्वों का प्रयोग नहीं करेंगी, परंतु अब तक जो कीमती जान का नुकसान हुआ होगा, उसकी भरपाई कौन करेगा? यही कंपनियां जब यूरोप या अमेरिका में
स्वास्थ्य के सारे मानदंडों के अनुरूप पारदर्शी तरीके से काम कर सकती हैं तो भारत
और अनेक विकासशील एवं पिछड़े देशों में सब नियमों और कानूनों को ताख पर रखकर किस
तरह इंसान की जान को जोखिम में डालती हैं, यह
मामला इसका भयावह उदाहरण है। अगर ये कंपनियां यहाँ ऐसा गोरखधंधा कर रही हैं तो
इन्हें भलीभांति पता है कि यहाँ के छोटे-बड़े व्यापारी से लेकर सरकारी जांच
एजेंसियां एवं नियम-कानूनों का पालन कराने वाला पूरा तंत्र भ्रष्टाचार में आकंठ
डूबा हुआ है। वे इनको अपने अवैध लाभ के चंद टुकड़े फेंककर आम लोगों की जान से खेल
सकते हैं।
सीएसई यानी (विज्ञान एवं पर्यावरण केंद्र) के
ताजा अध्ययन में ब्रेड में कैंसर जैसी घातक बीमारी के तत्त्व पाए जाने का खुलासा
हुआ है, जांच के मुताबिक ब्रेड बनाने के लिए
इस्तेमाल में लाए जाने वाले आटे के चौरासी फीसद नमूनों में पोटैशियम ब्रोमेट और
पोटैशियम आयोडेट मिले हैं, जिसके लगातार सेवन से कैंसर और थायराइड
जैसी बीमारियां हो सकती हैं। पिछले साल मैगी में अत्यधिक मात्रा में मोनोसोडियम
ग्लूटामेट और शीशा मिले होने पर तथा कई साल पहले सीएसई ने ही कोका कोला और पेप्सी
कोला जैसे ठंडे पेयों में कीटनाशकों की मात्रा और उसकी वजह से होने वाली अनेक
जानलेवा बीमारियों के बारे में एक अध्ययन जारी किया था जिसपर खूब हंगामा मचा था।
हमारे देश में मिलावट का यह धंधा प्रारंभ में
मामूली मिलावटों से शुरू हुआ। लोभ के इस खेल में मामूली शारीरिक एवं आर्थिक नुकसान
तो था परंतु जानलेवा नहीं था, जैसे चावल में थोड़ा कंकड मिला देना, दूध में पानी मिला देना या घी में थोड़ा वनस्पति
फेंट देना। ध्यान देने पर असली और मिलावटी का फर्क मालूम पड़ जाता था, सब अपने आप को बचाकर चलते थे। धंधा चोखा था, चलता रहा। परंतु अब यह सारी हदों को लांघ गया
है। व्यापारियों और कानून के रखवालों ने भी समानांतर सहकारी तंत्र विकसित कर लिया, जो दोनों के लिए फायदेमंद था। मिलावट के धंधे
दिन दूनी रात चौगुनी वृद्धि होने लगी। असली नकली का फर्क मिटने लगा और हाल के
वर्षों में ऐसा समय आया जब मिलावट के साथ-साथ सिर्फ और सिर्फ नकली का ही धंधा चल
निकला। आज बाजार में सभी खाद्य पदार्थों के नकली ब्रांड असली पैकेज के साथ उपलब्ध
हैं। पहले जहाँ कम से कम यह खयाल रखा जाता था कि मिलावट में कम से कम कोई ऐसा
पदार्थ न मिला हो कि लोगों के लिए तुरंत जानलेवा साबित हो, अब वह भी समाप्त हो गया। अब तो खुलेआम दूध के
नाम पर रिफाइंड, खड़िया और डिटरजेंट तो घी मरे पशुओं की
चर्बी और हड्डियों का बुरादा मिलाकर बनाया जाता है। मसालों के नाम पर रंग मिला
चूना और भूसी मिलाकर बेच रहे हैं। कोई भी खाद्य पदार्थ नहीं बचा है जिसका नकली
ब्रांड बाजार में उपलब्ध न हो।
बात खाद्य पदार्थों तक ही नहीं रुकी, इसने जीवनदायिनी दवाओं को भी अपने चंगुल में ले
लिया। आज स्थिति यह है कि बाजार में बिकने वाली दवाओं का बीस से पच्चीस प्रतिशत
हिस्सा नकली है। सरकारी सूत्रों के अनुसार है कुल दवाइयों में आठ से दस प्रतिशत
नकली दवाइयां बनती हैं। दूसरा आकलन है कि पूरी दुनिया में बनने वाली कुल नकली
दवाओं का पचास प्रतिशत हिस्सा भारत में तैयार होता है। इंडियन मेडिकल एसोसिएसन का
अनुमान है कि बाजार में बिकने वाली दवा के हर पाँच पŸाों में एक नकली होता है। कुछ साल पहले चीन
अपनी नकली दवाओं को अफ्रिकन देशों में ‘मेड
इन इंडिया’ की मुहर के साथ बेचता पाया गया था।
इससे हमारी साख का पता चलता है।
हद तो तब हो गई जब मानव अंगों की तस्करी की
जाने लगी। कई दशकों से कडनी और खून का अवैध धंधा चल ही रहा है, जिसमें गरीब मजदूरों, गरीब महिलाओं, नशाखोरों, भिखारियों और यहां तक कि बच्चों तक को बंधक
बनाकर, बहला-फुसलाकर खून से लेकर किडनी तक
निकाल लिया जाता है। यह धंधा देश के गरीब सुदूर प्रांतों से लेकर राजधानी दिल्ली
उसके आस-पास के आधुनिक उपनगरों में जोरों से चल रहा है। इसमें एक और आयाम तब जुड़ा
था, जब कुछ साल पहले लखनऊ के ठाकुरगंज
इलाके में पुलिस के छापे में एक सुव्यवस्थित प्रयोगशाला में बड़े पैमाने पर नकली खून
के पैकेट, सिरिंज, फर्जी
मुहर और स्टीकरों सहित छत्रपति शाहू जी महाराज चिकित्सा महाविद्यालय का प्राधिकार
पत्र भी बरामद हुए। जाँच से पता चला कि यहाँ से न केवल नकली खून बनाकर बेचते थे बल्कि इंसान का खून
बताकर जानवरों के भी खून को कई ब्लड बैंकों को बेच रहे थे। गिरफ्तार लोगों ने
स्वीकार किया था कि अब तक उन्होंने करीब सवा लाख लोगों को खून बेचा है। वास्तविक
आँकड़ा इससे कहीं ज्यादा हो सकता है। साफ जाहिर है कि यह धंधा संगठित रूप से चलाया
जा रहा है, जिसमें डॉक्टर तस्कर, प्रशासन के शामिल हुए बिना यह संभव नहीं है।
आज हमारे देश का आम उपभोक्ता हर समय एक डर के
साये में जी रहा है। लाभ और लोभ का ऐसा जानलेवा खेल खेला जा रहा है, जिसमें हवा, पानी, भोजन के तमाम उत्पादों से लेकर जान बचाने के
लिए प्रयुक्त होने वाली दवाइयां एवं रक्त तक में मिलावट एवं नकली का खुलेआम प्रयोग
हो रहा है। समय रहते सरकार के एफएसएसएआई यानी भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक
प्राधिकरण जैसे संस्थाओं को सिर्फ शिकायत मिलने पर ही नहीं बल्कि अपनी पहल पर औचक
निरीक्षण कर स्वास्थ्य के मानकों को हर स्तर पर लागू करना होगा। सीएसई जैसी
स्वैच्छिक संस्थाओं को और आगे बढ़कर काम करने के लिए प्रोत्साहित करना पड़ेगा। साथ
ही सरकार, मीडिया एवं समाज के प्रबुद्ध वर्गों को
जनजागरूकता के कार्य में लगना होगा,
तभी
हम इस लाभ और लोभ के चक्रव्यूह को तोड़ पायेंगे और भारत सही अर्थों में एक विकसित
देश बनेगा।
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