Wednesday, November 30, 2016

जो जल बाढ़े नाव में...

इन दिनों जिस तरह नदियों-तालाबों में, गली-चौराहों पे, कूड़े के ढेर में, कारों एवं बसों में पाँच सौ और हजार-हजार रुपये के नोट लावारिस थोक के थोक मिल रहे हैं, उससे यही लग रहा है मानो कबीर की ये पंक्तियाँ, ‘‘जो जल बाढ़े नाव में घर में बाढ़े दाम, दोउ हाथ उलीचिए यही सयानो काम।’’ साकार हो गई हो। काश! ऐसा स्वतःस्फूर्त हो पाता तो आज हमारे समाज, देश और दुनिया का रूप ही कुछ और होता। हर जगह असमानता, गरीबी, भ्रष्टाचार, भुखमरी, गंदगी, बीमारी, अशिक्षा, अंधविश्वास, हिंसा, आतंकवाद, दंगे-फसाद और पर्यावरण विनाश का यह घृणित रूप देखने को नहीं मिलता। दुनिया का चेहरा इतना विद्रूप नहीं होता।   
आज लावारिस पैसे फैंके एवं बहाये जा रहे हैं तो इसके पीछे केन्द्र सरकार के एक साहसिक सधे कदम का नतीजा है। जिसका उद्देश्य देश में गंदे, काली कमाई से कमाये काले पैसे के आमद को रोकना है। देश की अधिकांश आर्थिक, राजनीतिक एवं सामाजिक समस्याओं की जड़ में यह काली कमाई का पैसा ही है, जिसकी आमद विदेशों से नकली नोट के रूप में आतंकवादियों एवं नक्सलियों के पास, अनेकों स्वैच्छिक संगठनों के पास, समाज-सेवा एवं अल्पसंख्यकों एवं दलितों के कल्याण के नाम पर चंदे के रूप में, नशे के कारोबारियों के पास अवैध आमद के रूप में तथा सोने की तस्करी के रूप में, तो देश के अंदर टैक्स चोरी, घूसखोरी, मानव अंगों की तस्करी, खाद्य पदार्थों में मिलावट आदि अनेक अवैध तरीकों से उत्पादित होता है। यह काला धन सिर्फ नोट के रूप में ही नहीं है, नोट के रूप में तो यह सिर्फ 6 से 8 प्रतिशत तक ही है बाकी तो अवैध बेनामी मकान, जमीन, सोना एवं विदेशी बैंको में जमा पैसों के रूप में है।
सरकार के सिर्फ पहले कदम यानी काले नकदी धन पर चोट से देश में इतना बड़ा तुफान खड़ा हो गया है। अन्य दूसरे कदमों, जिससे काले धन के अनेक अन्य रूपों पर जब सरकार का हमला होगा तो कितना भयंकर भूकंप, आँधी और ओले गिरेंगे, वह देखने वाला दृश्य होगा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सरकार के लिए यह परीक्षा की घड़ी है कि उनके कदम कितनी मजबूती से जमीन पर टिके रहेंगे, न केवल टिके रहेंगे बल्कि इसे अंजाम तक पहुँचाने में उतनी ही मजबूती से वह बढ़ पायेगी या नहीं? इसके शिकार बने शक्तिशाली लोग चैन से नहीं बैठेंगे और विरोध को लगातार हवा देते रहेंगे। हालाँकि प्रधानमंत्री ने अपने गोवा के भाषण में यह जता दिया है कि उनके कदम सख्ती से आगे बढ़ेंगे, चाहे उसकी कीमत जान देकर भी क्यों न चुकानी पड़े।    
          15 अगस्त, 2014 को स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री ने लालकिले से स्वच्छ भारत अभियानकी घोषणा करते हुए कहा था कि ‘‘केंद्र सरकार की योजना इस अभियान को जन-आंदोलन का रूप देकर आर्थिक गतिविधियों से जोड़ना है। सरकार का लक्ष्य गांधी की 150वीं जयंती 2019 तक पूरे देश को स्वच्छ भारत में तब्दील करना है।’’ इसी को अमली जामा पहनाने के लिए 2 अक्तूबर, 2014 को गाँधी जयंती पर जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सड़कों पर सफाई अभियान को निकले थे, उस समय उनके आलोचकों ने, अनेक पत्रकारों, यहाँ तक समाज के अनेक प्रबुद्ध वर्ग के लोगों तक ने इसे मात्र झाडू मारने एवं फोटोखिंचाऊ अभियान तक सीमित कर दिया; परंतु नरेन्द्र मोदी को नजदीक से जाननेवाले लोग अच्छी तरह से जानते हैं कि यह आदमी अगर कुछ कहता और संकल्प लेता है तो इसकी गूँज और इसका संदर्भ वहीं तक सीमित न होकर काफी दूर तक गुँजायमान होता है। उसकी टंकार काफी दूर तक झंकृत होती है।
स्वच्छता अभियान को झाडूमार अभियान तक सीमित करनेवाले उनके कथन में स्वच्छता अभियान को आर्थिक गतिविधियों से जोड़नेवाला कथन को या तो याद रखना भूल गए या जानबूझकार भुला दिया, जबकि इस अभियान का असली मर्म इसी आर्थिक गतिविधि में छुपा हुआ था। कहने का तात्पर्य यह है कि जबतक देश की आर्थिक गतिविधियाँ स्वच्छ नहीं होंगी, तबतक संपूर्ण स्वच्छता का सपना दिवास्वप्न ही बनी रहेगी। क्या गंदगी भरे कारोबार और आचार-विचार से ग्रस्त देश और समाज की सड़कें एवं पर्यावरण स्वच्छ बना रह सकता है?
आज मोदी सरकार की झाडू हर उस कोने और और काली कमाई की कंदराओं की सफाई कर रही है और अनेक अछूती जगहों पर घुसकर सफाई करने को मचल रही है। सरकार ने अपने तेवर से बता दिया है कि झाडू अब सिर्फ धूल और पत्ते ही नहीं बल्कि आजादी के बाद से ही आम लोगों तक आर्थिक और सामाजिक जनतंत्र यानी आर्थिक और सामाजिक समानता के राह में रोड़ा बनी अगाध काली कमाई की सफाई से ही देश में असली जनतंत्र का मार्ग प्रशस्त होगा। इसके लिए सर्वप्रथम राजनीतिक सुधार, यानी चुनावों में काले पैसे के प्रवाह को रोककर लक्ष्य ही हासिल किया जा सकता है।   
आम जन ने प्रधानमंत्री के इस संपूर्ण सफाई अभियान को जिस तरह हाथो-हाथ लिया है़ यह हमारे देश और समाज के भविष्य के लिए शुभ संकेत है। हमें सकारात्मक सोच रखनी चाहिए और स्वच्छ भारतनामक इस अँखुआते बीज को खाद-पानी देकर अनेक झंझावातों से बचाने में पूरा सक्रिय सहयोग देना चाहिए, ताकि 2019, गाँधीजी की 150वीं सालगिरह तक गांधी के, यानी भारत के आम लोगों के सपनों का स्वच्छ भारत बन जाए।
गांधीमार्ग अंत तक सबके लिए रास्ता खुला रखता है। काश! काले कारनामों में लिप्त वह वर्ग भी कबीर के बताए राह पर चलते हुए अपने घर में बढ़ते दाम को समाज के उन्नयन के लिए दोनों हाथों से उड़ेलना प्रारंभ कर दे, तभी वे इस गरीबी व असमानता के समुद्र के बीचोबीच काले धंधे के बल पर बने अपने अमीरी के चमकते द्वीप में सुरक्षित रह पाएगें। नहीं तो वह दिन दूर नहीं, जब स्वच्छता अभियान का यह जनसमुद्र रूपी तूफान उसे लील जाएगा। उन्हें यह कदापि नहीं भूलना चाहिए कि जो कबीर और गांधी के बताये स्वैच्छिक एवं स्वविवेक के रास्ते बंद कर लेते हैं, वे अपने लिए स्वतः सरकार और शासन के राजदंड का रास्ता भी खोल लेते हैं।


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