जनतंत्र में जलतरंग
जनतंत्र उस जलाशय के
समान होता है, जिसमें अगर एक कंकड़ भी उछालें तो उसके
अंदर से ऐसी जलतरंग उठती है कि वह अपनी अंतिम सीमा, जहाँ तक हमारी नजरें दृश्यमान होती हैं, अपने मनोहारी गोल घेरे में लेती चली जाती है। स्वस्थ जनतंत्र में भी
ऐसा ही कुछ होता है, इसमें अगर कहीं से भी कोई मुद्दा उछाला
जाता है तो पूरे तंत्र को प्रभावित करता है, इसमें आम नागरिक, कार्यपालिका, न्यायपालिका, विधायिका और मीडिया सभी शामिल हैं।
जब प्रधानमंत्री श्री
नरेन्द्र मोदी ने आठ नवंबर की रात्रि को भ्रष्टाचार पर जोरदार निशाना साधते हुए
नोटबंदी नामक पत्थर उछाला तो जनतंत्र के हर पाए से टकराते हुए इसने अनेक
प्रतिक्रियाओं को जन्म दिया। नोटबंदी के बाद जिस तरह भ्रष्टाचार में लिप्त तत्वों
ने बेशर्मी से सरकारी तंत्र से गठजोड़ करके काला धन जमा किया था, एक बार फिर उसी बेहयापने से नोटबंदी के कारण उसे कूड़ा बनने से रोकने
के लिए प्रोफेशनल दलालों, बैंक के अधिकारियों एवं कर्मचारियों से
गठजोड़ कर उसे सफेद करने में लग गए। दूसरी तरफ आम आदमी अपनी दैनिक जरूरतों के लिए
दिन भर कतारों में दर-दर की ठोंकरे खाकर भी केन्द्र सरकार के इस सफाई अभियान को
सफल बनाने के लिए जय-जयकार करता रहा।
जनतंत्र की रीढ़ आम
आदमी को भड़काने के लिए ज्यादातर राजनीतिक दल से लेकर विविध बेईमान स्वार्थी तत्व
अनेक प्रयासों में लगे हैं, परंतु आम जनता प्रधानमंत्री के इस कदम
को हर हाल में समर्थन दे रही है। इसी का परिणाम है कि प्रधानमंत्री खम ठोककर देश
के भ्रष्टाचारी तत्वों को चुनौती दे रहे हैं और दिन-रात छापे पर छापे पड़ रहे हैं
तथा इसमें संलिप्त लोग पकड़े जा रहे हैं, चाहे वे नेता हों, बड़े सरकारी अधिकारी हों, बैंकिंग व्यवस्था के अधिकारी-कर्मचारी हांे, प्रोफेशनल दलाल हों या फिर अनेक क्षेत्रों के बडे़ या छोटे व्यवसायी।
आतंकवादियों और नक्सलवादियों को तो सूझ ही नहीं रहा कि कैसे उबरें अकस्मात हुए इस
प्राणघाती हमले से।
जब इस चोट से पूरा
तंत्र प्रभावित हो रहा है तो जनतंत्र का एक प्रमुख अंग राजनीतिक दल कैसे बच सकता
था। आज आम जनता, न्यायपालिका, मीडिया से लेकर चुनाव आयोग, सभी पूछ रहे हैं कि काले धन को बढ़ावा देने या उसे सफेद करने में
राजनीतिक दलों का भी बहुत बड़ा हाथ है। जब आम जनता पारदर्शिता और भ्रष्टाचार मिटाने
के लिए मोदी जी के हर कदम का स्वागत कर रही है तो फिर सरकार और सारे दलों की भी
जिम्मेदारी बनती है कि वे भी पारदर्शिता दिखायें और अपने सारे चंदों के स्रोतों का
हिसाब दें।
इसी बीच निर्वाचन
आयोग ने राजनीतिक दलों द्वारा प्राप्त किए जाने वाले नकद चंदे की अधिकतम सीमा बीस
हजार से घटा कर दो हजार करने की सिफारिश की है। आयोग ने इसके लिए जनप्रतिनिधित्व
अधिनियम 1951 में संशोधन का सुझाव दिया है। राजनीतिक
दलों को मिलने वाला चंदा आयकर अधिनियम 1961 की धारा 13 (ए) के अंतर्गत दलों को बीस हजार रुपये
से कम के नकद चंदे का स्रोत बताना जरूरी नहीं है। इसी का फायदा उठाकार चंदे की
अधिकांश राशि को बीस हजार से कम राशियों में झूठे नामों से अपने खातों में दर्ज कर
कानून को ठेंगा दिखाते हैं और करोडों-करोड़ रुपये काले से सफेद करते हैं। यह
अधिनियम देश में फैले भ्रष्टाचार की जननी बन गया है।
केंद्रीय सूचना आयोग
कई बार राजनीतिक दलों से आग्रह एवं आदेश भी दे चुका है कि अपनी पूरी कार्यप्रणाली
को सूचना के अधिकार कानून के दायरे में लाया जाए। परंतु सारे राजनीतिक दल इसके
दायरे में आने से अब तक आना-कानी करते रहे हैं। आज चुनाव सुधार के काम में जुटे
अनेक पूर्व चुनाव आयुक्तों एवं स्वैच्छिक संस्थाओं की तरफ से एक मांग जोरदार ढंग
से उठ रही है कि सीएजी या चुनाव आयोग की ओर से नियुक्त स्वतंत्र ऑडिटर द्वारा सभी
राजनीतिक दलों के वित्तीय लेन-देन का सालाना ऑडिट होे और उसकी रिपोर्ट चुनाव आयोग
की वेबसाइट पर डाली जाए।
कानपुर में हुई रैली में जनता को संबोधित करते हुए
प्रधानमंत्री ने चुनाव आयोग के सुझाव का समर्थन किया तथा चुनाव सुधार को अपनी
प्राथमिकताओं में सबसे ऊपर रखने की घोषणा की है। प्रधानमंत्री के आह्वान पर आज
पूरा सरकारी तंत्र ऑनलाइन भुगतान व्यवस्था पर जोर दे रहा है, ताकि भ्रष्टाचार और काली कमाई पर प्रभावी रोक लगे तथा भारतीय
अर्थव्यवस्था अधिक पारदर्शी बने। देश की आम जनता भी अनेक परेशानियाँ उठाकर
प्रधानमंत्री के साथ खड़ी है। परंतु आज चुनाव आयोग, मीडिया तथा आमजनों को भी संशय है कि राजनीतिक दलों को मिलने वाले
चंदे के स्वच्छ और पारदर्शी हुए बिना क्या हमारी व्यवस्था पूरी तरह से भ्रष्टाचार
और कालेधन से मुक्त हो पाएगी?
प्रधानमंत्री ने जिस
ताकत और हिम्मत से नोटबंदी नामक पत्थर से भ्रष्टाचार पर निशाना साधा है और बेनामी
संपत्ति की आड़ में काला धन खपाने वालों पर हमला बोल रहे हैं, उसी मुस्तैदी से कालेधन को सफेद करने वाली एक प्रमुख ढाल राजनीतिक
चंदे को भी पारदर्शी करने के लिए आगे बढ़ें। तत्काल कम से कम तीन कदम, जिसमें पहला, जनप्रतिनिधित्व कानून 1951 में संशोधन, जिसके तहत 20 हजार तक के चंदे के स्रोत बताने की छूट मिली हुई है का उन्मूलन।
दूसरा, सभी राजनीतिक दलों को सूचना का अधिकार
कानून के दायरे में लाना। तथा तीसरा, सभी दलों के लिए चुनाव आयोग द्वारा नियुक्त ऑडिटर के माध्यम से हर
साल ऑडिट कराना अनिवार्य करने के लिए तत्काल कदम उठायें। और सभी राजनीतिक दल
सर्वसम्मति से इसमें साथ दें।
हमें यह नहीं भूलना
चाहिए कि कंकड उछालने से उठा जलतरंग का घेरा उसी जलाशय की अंतिम सीमा तक पहुँचता
है, जो पूरी तरह से स्वच्छ और निर्मल हो, कूड़ा-करकट से भरे जलाशय में तो बड़ा से बड़ा पत्थर फेंकने पर भी वही
छपाक से, बिना कोई खास हलचल मचाये कुछ पलों में
ही शांत होकर बैठ जाता है। आशा है, सरकार एवं समाज के समन्वित प्रयास से
हमारा जनतंत्र इतना स्वच्छ-निर्मल बन जाए कि हर छोटे मुद्दे पर भी जनतंत्र रूपी
जलाशय में ऐसी नयनाभिराम जलतरंग उठे कि सीमांत तक एक रचनात्मक सरगम पैदा करते हुए
शुभाशुभ परिणति को प्राप्त करे।
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