Wednesday, May 11, 2016

अंतरात्मा के दिशा-निर्देश
सर्द जनवरी, शनिवार की शाम थी। आफिॅस से घर जाने के लिए तैयार ही था कि फोन आया। मैंने हलो...कहा। अंकलजी, मैं कुणाल बोल रहा हूँ, मैंने कहा, कौन कुणाल? ...अरे अंकलजी, गाँव का मिट्ठू। अरे हाँ, मिट्ठू बोलो...। बोला, मैं यहां सोलन हिमाचल प्रदेश में काम करता हूँ, कल जब फैक्ट्री से शाम को अपने कमरे पर आ रहा था तो पहाड़ी के पास करीब दो साल का बच्चा मिला, वह अकेला बहुत रो रहा था। उधर से गुजरनेवाले सारे लोग उसे अनदेखा करते हुए चले जा रहे थे, परंतु मुझसे रहा नहीं गया और मैंने जाकर उसे उठा लिया, वह मुझसे चिपककर जोर-जोर से रोने लगा। काफी देर तक इधर-उधर देखा कि शायद उसके माता-पिता कहीं मिल जाएँ, परंतु कोई नहीं मिला। अंधेरा हो रहा था, ठंड से बुरा हाल था। अजीब स्थिति थी, अगर उसको छोड़ देता तो बर्फबारी और ठंड से वह जिंदा नहीं बचता। उसे कमरे पर ले आया। मेरे साथ रहने वाला लड़का तथा आस-पास के सभी कहने लगे, यह क्या मुसीबत तुम ले आए, खुद भी फंसोगे और दूसरों को भी फंसाओगे। उसने आगे कहा, अंकल जी, मैं इस बच्चे को खुद रखकर पालना चाहता हूँ...बहुत प्यारा बच्चा है। मैं क्या इसको गोद ले सकता हूँ?...
मैंने कहा, मिट्ठू देखो यह तो तुमने बहुत अच्छा किया कि उसको बचा लिया...मगर उसे घर क्यों ले आए, उसे थाने क्यों नहीं पहुंचाया। अरे बेवकूफ, उसके मां-बाप उसे ढूँढ़ रहे होंगे, उसे जल्दी थाने ले जाकर सौंप दो, नहीं तो कल कोई तुम्हें उल्टे ही किडनेपिंग के मामले में फँसा देगा। जहाँ तक गोद लेने का मामला है तो अभी तुम्हारी उम्र नहीं है और गोद लेने के लिए बहुत लंबी कानूनी प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। मैंने पुनः जोर देकर कहा जल्दी से उसे थाने ले जाओ। उसने धीरे से कहा, ठीक है अंकल जी...। मैंने कहा, थाने में सबकुछ सच-सच बता देना। उसने कहा, जी...। फोन कट गया रास्ते भर उसके बारे में चिंतामग्न रहा।
घर जाकर फोन लगाया, नहीं लगा...दूसरे दिन कई बार फोन लगाया, नहीं लगा। रात को उसका फोन आया। उसने कहा, अंकल जी, आपने जैसा कहा था, कल वैसे ही तुरंत एक साथी को लेकर थाने चला गया था। पुलिस वाले अनेकों प्रश्न पूछते रहे और कल से ही भूखे-प्यासे बिठाये रखा। यह कहने पर कि हमें छोड़ दीजिए काम पर भी जाना है, खाना-पीना है, परंतु वे नहीं माने कहते रहे जबतक पूरी कानूनी प्रक्रिया पूरी नहीं होगी, यहीं बैठे रहो। तुम्हें यहाँ कोई मार-पीट थोड़े ही रहा है। अंत में, कई कागजों पर साइन करवाने, मेरा घर, गाँव मोबाइल नं., फैक्ट्री का पता आदि लेने के बाद यह कहकर कि जबतक हम नहीं कहें, सोलन छोड़कर कहीं नहीं जाना...और जब हम बुलायें तुरंत हाजिर होना। अभी रात में छोड़ा है।
यह वाकया मेरे जेहन में हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले के संदर्भ में याद आ गया। जिसमें सड़क हादसों के पीड़ितों की घटना स्थल पर मदद करने वाले नेक लोगों की हिफाजत के लिए केंद्र सरकार के दिशा-निर्देशों को सुप्रीम कोर्ट ने मंजूरी दी है। सड़क पर दुर्घटना के शिकार को तुरंत मदद मुहैया कराने वाले लोगों को कानूनी तौर पर सुरक्षा का मार्ग प्रशस्त कर सुप्रीम कोर्ट ने सराहनीय कदम उठाया है। केंद्र की गाइडलाइन्स को सर्वोच्च अदालत के वैधानिक समर्थन के बाद अब लोग निडर होकर लोगों की मदद करने को आगे आएंगे। अभी सड़क पर दुर्घटना के पीड़ितों को अस्पताल पहुंचाने से लोग हिचकते हैं। वे मदद करना चाहकर भी इस आशंका से कि पुलिस बार-बार थाने बुलाकर मानसिक उत्पीड़न करेगी। इस वजह से लोग दुर्घटना स्थल से कन्नी काट लेते हैं। सड़क परिवहन मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक दुर्घटना के शिकार लोगों को अगर तुरंत इलाज मिल जाए तो हर साल हजारों लोगों की जान बचाई जा सकती है।
मैंने हाल में मिट्ठू से उस वाकये के बारे में पूछा, उसने चिहुंककर जवाब दिया, हाँ अंकल, चार दिनों बाद पुलिस वालों ने मुझे फिर फोन कर बुलाया, उस बच्चे के माता-पिता मिल गए थे। वे लोग टूरिस्ट थे। वह बच्चा किसी तरह उनसे बिछुड़ गया था, उसे पाकर बहुत खुश और एहसानमंद थे। वे मुझे जबर्दस्ती रुपये पकड़ाने लगे परंतु मैंने लेने से मना कर दिया। मैंने कहा, तुमने लिया क्यों नहीं, अपना चार-पांच दिन बर्बाद किया, परेशान हुआ सो अलग। उसने कहा, अंकल, पैसे लेकर क्या करता...पैसा तो काम करके कमाने में मजा आता है। मैं उस सुख को कभी नहीं भूल सकता, जब उस बच्चे पर मेरी नजर पड़ी थी, वह मेरे सीने से चिपक गया था और तबतक चिपका रहा जबतक कि जर्बदस्ती पुलिस वाले ने उसे मुझसे अलग नहीं कर दिया।... मैं थाने में उसे छोड़कर आने के बाद उन चार दिनों तक सो नहीं पाया था, जबतक कि उसके माता-पिता और परिवार उसको मिल नहीं गया।
सुदूर झारखंड से अपने घर की गरीबी और बेरोजगारी से पार पाने के लिए हिमाचल की ठंड में वनवास भोगनेवाले मिट्ठू को बिना बताये उसके अंदर के उस जिंदा इंसान को नमस्कार किये बिना मैं नहीं रह सका। सोचने लगा कि क्या मिट्ठू ने उस बच्चे को गोद में उठाने से पहले किसी दिशा-निर्देश के बारे में एक पल के लिए भी सोचा होगा?
इसमें कोई शक नहीं है कि ये दिशा-निर्देश सहायता के लिए बढ़े उन हाथों को बहुत ताकत देगी, जो लोगों की सहायता करना चाहते हैं। इस कानून का विस्तार और कई मामलों जैसे गुमशुदा बच्चों की तालाशी में, सड़कों पर हो रहे हिंसक हमलों में, महिलाओं पर होनेवाले लैंगिक भेदभाव तथा बुजुर्गों की सहायता करने वाली बाधाओं को दूर करने जैसे अनेक सामाजिक समस्याओं तक इसका विस्तार किया जा सकता है।    

कोई भी महान दिशा-निर्देश या सहायता का सवाल तो तभी आता है न, जब इंसान किसी अन्य को दर्द में डूबा देखकर उसकी ममता और करुणा उसके अंदर उथल-पुथल मचा दे, पीड़ा में पड़े के प्रति सहायता हेतु हाथ बढ़ाने के लिए उसकी अंतरात्मा उसे व्यग्र और बैचेन कर दे। अगर अंदर से ऐसा नहीं हो पाता है तो समझिए, हम इंसान के रूप में अपनी लाश ढो रहे हैं और लाशों पर सरकार तथा किसी भी न्यायालय का दिशा-निर्देश लागू नहीं होता!

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