Wednesday, July 6, 2016

  विकलांग परिंदों के शिकारी
मेरा चार साल का बेटा विवेकानंद रोज सुबह उठने के बाद बॉलकनी में खड़े होकर बिजली के तारों पर और पार्क के पेड़ों पर चिडिया, कौवे, कबूतरों और बंदरों को देखता रहता है और मुझपर इनसे संबंधित अनगिनत प्रश्नों के बौछार करता रहता है। उस दिन भी यही सिलसिला चल रहा था कि अकस्मात एक कबूतर फड़फड़ाते हुए मेरी बॉलकनी में गिरा और डरा-सहमा कोने में स्थिर हो गया। हम दोनों आश्चर्य से उसे देखने लगे। विवेकानंद तो कुछ ज्यादा ही विस्मित था। पापा, कबूतर यहाँ कैसे आया? क्या हम इसे अपने घर में रख सकते हैं? अब इसे जाने नहीं देंगे... मैंने कहा रुको तो सही, मैं उसके पास गया वह लंगड़ा रहा था और बीमार लग रहा था। मैंने उसे पकड़ लिया। उसके पैर में जख्म था, काफी कमजोर लग रहा था। विवेकानंद भी उसे प्यार से सहलाने लगा। उसे पानी पीने को दिया परंतु कबूतर छूकर छोड़ दिया। फिर चावल के दाने भी दिए परंतु उधर बिना देखे कोने में सिमट गया। इधर प्रश्न जारी था। पापा यह पानी च्यूं नही पी रहा है? यह चावल च्यूं नहीं खा रहा है? मैं इसको अपने हाथ से खिलाऊं? मैंने कहा, उसके पैर में चोट लगी है, शायद बीमार है। चलो उसे आराम करने दो, थोड़ी देर में खूद ही पियेगा और खायेगा... वह उसके आगे से टस से मस नहीं हो रहा था। मैंने फिर कहा, बाबू उसे छोड़ दो वह डरा हुआ है, इधर कमरे में आ जाओ... वह कमरे के दरवाजे पर आ तो गया परंतु उसकी नजरंे उसी पर टिकी रहीं। इधर मैं अखबार पलटने लगा। तभी एक बिल्ली पता नहीं किधर से आई और पलक झपकते ही झपट्टा मारकर सड़क पर, फिर सामने पार्क के कोने में उसकी गरदन दबोच कर रक्त के छीटे और पंख बिखेर दिए। हम दोनों स्याह नजरों से इस हृदय विदारक दृश्य को देखते रह गए विवेकानंद तो बहुत देर तक पलक झपकाना ही भूल गया...
ऑफिस जाते मेट्रो में जब अखबार खोला तो जिस समाचार पर नजर गयी वह था अपोलो किडनी रैकेट। कानपुर के उमेश का छोटा-मोटा व्यापारी था परंतु बेटे के पैर के ऑपरेशन में उसपर काफी कर्ज चढ़ चुका था। उमेश की मुलाकात आशु नाम के किडनी दलाल से हुई। आशु ने उन्हें लाखों रुपये मिलने का लालच दिया, जिसके बाद उमेश किडनी बेचने को तैयार हो गया। आशु उमेश को लेकर दिल्ली आ गया। उसकी मुलाकात असीम सिकदर और दिल्ली अपोलो अस्पताल में डॉक्टर अशोक सरीन के पर्सनल कर्मचारियों आदित्य और शैलेष से कराई गई। इनके पास किडनी के कई तलबगार थे। उमेश की किडनी गाजियाबाद के आशुतोष को ट्रांसप्लांट करने का फैसला किया गया। उमेश के फर्जी पहचान पत्र आशुतोष के परिवार के सदस्य सुरेश चंद पुत्र रामपाल गौतम के नाम से तैयार कर किडनी आशुतोष को ट्रांसप्लांट कर दी गई। किडनी बेचने के एवज में उमेश को तीन लाख रुपये मिले जबकि मरीज से 25 लाख रुपये लिए गए थे।
इसके बावजूद उमेश का कर्ज नहीं उतरा। दलाल ने उनकी पत्नी नीलू की किडनी बेचने के लिए दबाव बनाया। इसमें उमेश को चार लाख रुपये मिले। कुछ इसी तरह का सच पश्चिम बंगाल, जलपाईगुड़ी की मौमिता मौली का है। मौमिता के पति देवाशीष मौली ने पहले अपनी किडनी बेची फिर मौमिता की भी किडनी बेच दी। परंतु रकम मौमिता को नहीं दी थी, इसी कारण दोनों में झगड़ा हो गया था और पुलिस को इस किडनी रैकेट का सुराग मिला। 
अपोलो अस्पताल जहाँ अक्सर जानी मानी हस्तियां अपना इलाज कराने के लिए पहुँचती हैं। जिसको तमाम सुविधाओं से लैस माना जाता है। इस अस्पताल में एक ऐसा किडनी रैकेट चल रहा था जिसके तार सिर्फ देश ही नहीं, बल्कि विदेशों तक भी फैले हुए थे। इसके शिकार देश के हर हिस्से के अनेकों गरीब और मजबूर लोग हो चुके हैं।। पुलिस ने इस रैकेट के पाँच धंधेबाजों का गिरफ्तार किया है। असीम सिकदर, सत्य प्रकाश उर्फ आशु, देवाशीष मलिक, आदित्य और शैलेष सक्सेना। इसके ऊपर है इस रैकेट का मास्टरमाइंड राजकुमार राव जिसका नेटवर्क भारत के बाहर श्रीलंका और इंडोनेशिया तक फैला है। 
इस रैकेट में हर धंधेबाज के हिस्से का काम बंटा हुआ था। कुछ लोग शिकार यानी डोनर की तलाश करते थे, जबकि कुछ रिसीवर की। फिर शिकार और डोनर को रिश्तेदार दिखाने के लिए फर्जी कागजात बनाए जाते थे। अस्पताल के कर्मचारी इस काम में उनकी मदद करते थे। ये रैकेट किड़नी के लिए जरूरतमंद से 20 से 25 लाख वसूलता था। इसमें बिचौलियों को 1-1 लाख रुपए मिलते थे। जबकि डोनर को सिर्फ 3 से 4 लाख। खास बात ये है कि विदेशी जरूरतमंद को किडनी बेचने के लिए हिंदुस्तानी के मुकाबले कई गुना ज्यादा रकम मिलती है। ऐसे में सवाल ये है कि आखिर बाकी की मोटी रकम कहाँ जाती थी। दिल्ली पुलिस के मुताबिक दिल्ली के अपोलो अस्पताल में किडनी ट्रांसप्लांट रैकेट में जो गैंग काम कर रहा था, उसकी पहुँच अपोलो के एमएस के दफ्तर तक थी क्योंकि किडनी ट्रांसप्लांट की सारे कागजी प्रकिया एमएस ऑफिस के जरिए ही पूरी होती थी।

मैं जानता हूँ घर लौटते ही विवेकानंद उस बिल्ली द्वारा कबूतर का शिकार करने से संबंधित अनेकों प्रश्न करेगा परंतु अब जवाब मेरे पास भी नहीं है क्योंकि इस बीच मेरे जेहन में इंसानी भेड़िए और कमजोर इंसान का शिकार करने वाले (किडनी दलाल) बिल्ले भी इसमें शामिल हो चुके हैं!ं बात सिर्फ किसी जानवर द्वारा कमजोर जीव का शिकार तक सीमित होता तो आसानी से यह कहकर पिंड छुड़ाया जा सकता था कि बेटा, बिल्ली तो जानवर है न उसे अच्छे-बूरे कर्म का विवेक नहीं होता। परंतु उस सभ्य इंसान के बारे में क्या कहा जाए? जिसे पूरा पता है कि मानव सभ्यता के संघर्ष का पूरा इतिहास जानवर से एक मुकम्मल इंसान बनने की है। जब जीवनदायक डॉक्टर और अपोलो जैसे अस्पताल जिसे जीवन से हार मान बैठे मरीजों के लिए आखिरी सहारा माना जाता है। वह जब करोड़ों रुपये बनाने के लिए खूंखार बिल्ले (रैकेटियर) पाल ले जो गरीब, बीमार, विकलांग, लाचार लोगों को नित नए तरीके से शिकार करने लगे तो प्रश्न काफी जटिल हो जाता है। वह बिल्ली तो शायद पेट भर जाने के बाद उस दिन दूसरे कमजोर जीव की हत्या नहीं करेगी, परंतु इन इंसानी भूखे भेड़ियों के बारे में दावे के साथ नहीं कहा जा सकता है कि इनके कुछ बिल्ले पकड़ में आ जाने के बाद भी ये शिकार के दूसरे नये तरीके इजाद नहीं करेंगे!

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