Thursday, November 23, 2017

खिचड़ी के सर्वसमन्वयी भाव का हो विस्तार
किसी देश की संस्कृति को वहाँ का खान-पान, वस्त्राभूषण, रहन-सहन, साहित्य-संगीत-कला, पर्व-त्योहार एवं आवास-यातायात के साधनों को देखकर बखूबी समझा जा सकता है। भारत में सदियों से ही विश्व की अनेक दिशाओं से लोग आते रहे और यहाँ की संस्कृति में रच-बसकर समाते चले गए। आनेवाले जहाँ एक-तरफ यहाँ की संस्कृति को अपनाते रहे, वहीं अपने साथ लाई संस्कृति से इसे समृद्ध भी करते रहे। यही कारण है कि हमारे देश में अनेक धर्म, जातियां, भाषा, खान-पान, अनेक प्रकार के वस्त्राभूषण एवं यातायात के साधन अस्तित्व में हैं। हमारी यह विविधता बाहर के लिए आश्चर्य की और हमारे लिए गर्व का विषय है। इसे हम सर्वसमावेशी यानी खिचड़ी संस्कृतिभी कहते है।
खिचड़ी पिछले दिनों एक प्रमुख राष्ट्रीय मुद्दा तब बन गई, जब समाचारों में यह आया कि मोदी सरकार खिचड़ी को राष्ट्रीय भोजन घोषित करने वाली है। अनेक लोग समर्थन में आए तो कुछ विरोध में भी। वह तो समय रहते केंद्रीय खाद्य प्रसंस्करण मंत्री हरसिमरत कौर ने यह कहकर विवाद को समाप्त किया कि विश्व खाद्य मेला 2017’ के अवसर पर खिचड़ी को एक पौष्टिक आहार के रूप में पेश कर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय बनाने का प्रयास किया जाएगा, न कि इसे राष्ट्रीय भोजन घोषित किया जाएगा।
खिचड़ी एक ऐसा खाद्य पदार्थ है, जिसे अनेक तरह से, स्थानीय उपलब्धता के अनुरूप अनेक अनाजों, दालों एवं सब्जियों को मिलाकर बनाते हैं। यह विभिन्न तरह से अलग-अलग क्षेत्रों एवं पसंद के हिसाब से बनाया जाता है। ज्यादातर लोग चावल-दाल को स्वादानुसार मसालों के साथ उबालकर पकाते हैं। लेकिन अगर कोई इसमें कुछ और भी मिलाना चाहे तो उसकी पूरी गुंजाइश होती है। यह सभी को अपनी-अपनी पसंद, परंपरा और अपने स्वाद को अभिव्यक्त करने की पूरा अवसर उपलब्ध कराती है।
खिचड़ी जिस तरह सर्वसमावेशी, स्वास्थ्यवर्द्धक एवं सुस्वादु है, अगर उसी तरह संस्कृति एवं आम जनों के जीवन से जुड़े सभी सार्वजनिक सेवा माध्यम भी हो जाएं तो हमारा समाज और भी सुंदर, स्वस्थ एवं सुसंस्कृत हो सकता है। उदाहरणस्वरूप हम सार्वजनिक यातायात के साधनों को ही ले सकते हैं, खासकर भारतीय रेल, जो कि देश के हर हिस्से को सांस्कृतिक, सामाजिक एवं आर्थिक रूप से जोड़ती है। परंतु इसमें कमी यही है कि यह आर्थिक हैसियत के आधार पर लोगों में भेद-भाव करती है। एक तरफ जहाँ अमीर लोगों के आगे यह सुविधाओं का अंबार लगा देती है, वहीं गरीब साधनहीन लोगों को अत्यंत नारकीय स्थिति में यात्रा करने को मजबूर करती है। परंतु दिल्ली मेट्रो रेल ने बीच का ऐसा रास्ता निकाला, जिसमें गरीब और अमीर एकसाथ सफर करने को मजबूर हो गए। इसके कारण जहाँ एक तरफ पर्यावरण को संरक्षण मिल रहा है, वहीं आर्थिक एवं सामाजिक दूरियों को पाटने का भी काम रहा है। दिल्ली में बड़े अधिकारी एवं अमीर भी मेट्रो में सफर करते धक्के खा रहे थे। हाँ, आम लोगों की तरह देखते हुए हिकारत की भावना अभी भी थी, उन्हें कई बार गरीब मजदूरों और साधारण लोगों के साथ चलने में अपनी सत्ता और अमीरी के दंभ के कारण परेशानी होती थी। कभी-कभी उबल भी पड़ते थे। उसी तरह गरीब मजदूर और साधारण लोग भी साथ-साथ चलते हुए कुछ सहमते, हिचकते साथ ही स्वच्छता और नफासत के साथ व्यवहार करना सीख रहे है। ऐसा करने के लिए उन्हें मेट्रो की कार्यप्रणाली ने सबको मजबूर किया है।
परंतु पहले मई में और फिर चार महीने बाद ही दिल्ली मेट्रो कॉरपोरेशन ने हर स्तर पर किराया सीधे दोगुना कर दिया। गरीब मजदूरों की तो बात ही क्या की जाए, विधार्थियों एवं निम्न-मध्यम दर्जे के वेतनभोगी आदमी के लिए भी अब मेट्रो में सफर करना मुश्किल हो गया। पहले जहाँ वैशाली से नेहरू प्लेस एक तरफ से 20 रुपया लगता था, अब बढ़कर सीधे पचास रुपया हो गया। ओखला जानेवाले को 60 रुपया इस तरह एक सामान्य मजदूर या कर्मचारी के लिए प्रतिदिन कम से कम सौ से लेकर दो सौ रुपये (रिक्शा, ऑटो या पार्किंग मिलाकर) खर्च बैठ रहा है। मजदूर या कर्मचारी, जो 10 से 20 हजार तक की वेतन पाता है, यह बोझ कहाँ से सहन कर पाता। नतीजा यह हुआ कि फिर से लोग बसों और अपने जंग लगते बाईक, स्कूटर आदि लेकर सड़कों को पहले से हथियाए रइसों की बड़ी-बड़ी कारों के पीछे रेंगने के लिए मजबूर हो गए।
किराया दुगुना बढ़ाने के लिए मेट्रो की यह दलील हजम करने लायक नहीं है कि उसे नुकसान हो रहा था, क्योंकि इसके सारे आंकड़े यही बताते रहे हैं कि लगातार यात्रियों के बढ़ने से मेट्रो फायदे में चल रही थी। परंतु किराया बढ़ाने के बाद यह साफ नजर आ रहा है कि उसके यात्रियों की संख्या में भारी गिरावट आई है। गरीब और निम्न मध्यम वर्ग के लोग इससे कटते जा रहे हैं। मेट्रो के लिए भी यह कदापि फायदे का सौदा नहीं है, भले ही आज वह इस बात को आंकड़ों के माध्यम से सार्वजनिक नहीं कर रही है।
दिल्ली मेट्रो के नीति-नियंता भले ही किराया बढ़ाकर खुश हो रहे हों, परंतु उन्हें नहीं भूलना चाहिए कि ऐसा कर वे मेट्रो को उसी खास वर्ग की सवारी बना रहे हैं जिसके पास सुविधाओं का अंबार है। जिनकी बड़ी-बड़ी गाड़ियों के आगे दिल्ली की सड़कें हर समय भरी रहती हैं। ऐसा न हो कि जाम में फंसा निम्न वर्ग दूर से जिस तरह सड़क पर बड़ी-बड़ी खाली कारों को देख-देख कर कुढ़ता रहता है, उसी तरह खाली मेट्रो को आते-जाते टकटकी लगाकर देखता रहे और दिल्ली भीड़ और प्रदूषण से कराहती रहे।
किसी भी सरकार का प्रयास यही होना चाहिए कि वह ऐसी नीति बनाये कि सार्वजनिक यातायात के माध्यम से जहां लोगों को प्रदूषण से छुटकारा मिले, वहीं सामाजिक एवं आर्थिक रूप से विभिन्न जातियों, धर्मों और वर्गों में बंटे हमारे समाज को कम से कम सफर के दौरान आपसी दूरियां कम हों, एक दूसरे को समझें-सीखें, ताकि सामाजिक लोकतंत्र को मजबूती मिले। सब जानते हैं कि नुकसान के साथ मेट्रो नहीं चल सकती परंतु किराया बढ़ाने का एक न्यायसंगत तरीका होना चाहिए ताकि सभी वर्ग के लोग इसे खुशी-खुशी वहन कर सकें। पुष्टिकारक, सुस्वादु खिचड़ी के सर्वसमन्वयी भाव को देश के यातायात के सभी साधनों में भी बढ़ावा देने की जरूरत है, इससे समाज और देश ज्यादा स्वस्थ, सुंदर और जनतांत्रिक बनेगा। 

Monday, September 4, 2017

तार्किक एवं विवेकशील समाज के लिए
ऐसे समय में जब करीब-करीब पूरा उत्तर भारत एवं हिंदी प्रदेश बाबा राम-रहीम के कुकर्मों की मिली सजा के बाद फैली हिंसा और चोटीकटवाकी दहशत से गुजर रहा है, ऐसे समय पिछले महीने 24 जुलाई को आम आदमी के वैज्ञानिक माने जाने वाले प्रो. यशपाल का निधन हो गया। अगर वे जिंदा एवं स्वस्थ होते तो मीडिया के सामने आते और जोरदार ढंग से सहज तर्कशील वैज्ञानिक शिक्षा पर बल देते और अपने कंधों तक आती लंबी सफेद जुल्फों को दिखाते हुए ललकार कर कहते कि ‘‘किसी चोटीकटवा में दम है तो आकर मेरी चोटी काटकर दिखाए।’’ वे विविध कार्यक्रमों, अध्यापन एवं मीडिया के माध्यम से अनवरत पाखंडो, अंधविश्वासों के विरुद्ध एक तर्कशील वैज्ञानिक समाज की स्थापना के लिए विविध स्तरों पर संघर्षरत रहे।
हम एक ऐसे दौर से गुजर रहे हैं, जहाँ अनेक धार्मिक एवं सांप्रदायिक समूहों के बीच वर्चस्व की लड़ाई चल रही है, जिसका नतीजा है कि एक तरफ दुनिया सांप्रदायिक आतंकवाद एवं उन्माद की चपेट में है तो दूसरी तरफ अंधविश्वासों की जकड़बंदी में अनेक तरह के ठग बाबा रोज पैदा हो रहे हैं और गरीब-लाचार आम लोगों को फँसाकर नित नए तरीके अपनाकर अपना साम्राज्य खड़ा कर रहे हैं। अनेक बाबा तो इस स्थिति में आ गए हैं कि खुलेआम हिंसा के माध्यम से सरकार एवं शासन को चुनौती देने लगे हैं। इसी धंधे का बाइप्रोडक्ट कभी मुँहनोचवा, कभी मुड़कटवा, कभी खुनचुसवा तो कभी मंकीमेन और अब चोटीकटवा नए अवतार में आता रहता है और अंधविश्वास का उर्वर धंधा हमेशा लहलहाता रहता है।
आखिर क्या कारण है कि सारे मुँहनोचवा, चोटीकटवा या डायनप्रथा आदि अशिक्षित-अनपढ़ गरीब-पिछड़े मुहल्लों एवं क्षेत्रों में ही देखने को मिलते हैं? आखिर क्यों थक-हारकर लोग अपनी बीमारी के इलाज के लिए बाबाओं एवं ओझाओं की शरण में जाते हैं? ऐसा इसलिए संभव होता है क्योंकि ऐसे अधिकांश गरीब-निरीह लोगों को उनकी मामूली बीमारियों का भी सही समय पर समुचित इलाज नहीं मिल पाता। प्राथमिक सरकारी अस्पताल और डॉक्टर पर्याप्त संख्या में हैं नहीं। हाल ही में जो स्वास्थ्य मंत्रालय की एक रिपोर्ट आई है उसके अनुसार देश में 11528 लोगों के लिए एक सरकारी डॉक्टर उपलब्ध है। हिन्दी प्रदेशों की हालत तो और भी बुरी है जहाँ 20,000 से ज्यादा लोगों के इलाज के लिए एक डॉक्टर है, वह भी कितनी सेवा देता है वह राम ही जानें। जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार प्रत्येक 1000 लोगों पर एक डॉक्टर का होना जरूरी है। प्राइवेट अस्पतालों की तरफ इलाज क्या, सर उठाकर उधर देखने तक की उनकी हिम्मत नहीं होती। नतीजा, पहले वे झोलाछाप डॉक्टरों से लुटते हैं। उनकी मामूली बीमारी बढ़कर खतरनाक बनती रहती है और इसी दौरान अनेक मानसिक बीमारियों की चपेट में आते हैं। ऐसे हालत में जो सर्वसुलभ सहज मार्ग उन्हें जहाँ खींच कर ले जाता है, वह होता है कोई ओझा-तांत्रिक या पाखंडी बाबा की अंधीयारी गुफा जहाँ वे आजीवन अंधविश्वासों और पाखंड के बीच पिसते हैं और ढोंगी बाबा लोग इनके बल पर रहनुमा बनकर अय्यासी करते रहते हैं।
इससे बचने के लिए हर स्तर पर सरकार को सहज सर्वसुलभ स्वास्थ्य सुविधाओं के साथ-साथ देश के हर गाँव से लेकर शहर तक सभी प्राथमिक पाठशालाओं में प्रारंभ से ही वैज्ञानिक एवं विवेकवादी शिक्षा का आधार तैयार करना होगा। यह सुनिश्चित करना होगा कि जब हर शिशु इस अद्भुत दुनिया की ओर आश्चर्य से भावविभोर होकर देखता है और हर तरफ वह प्रश्नांकित नजरों से देखना प्रारंभ करता है। इसके पहले कि कोई इस ब्रम्हांड की रचना में अनेक प्रकार के सांप्रदायिक एवं जातिवादी करिश्माई सिद्धांतों को उनके कोमल दिमाग में ठूंसे, उन बच्चों को डार्विन के क्रमिक विकासवाद के सिद्धांत को सहज एवं सरल तरीके से उसके दिमाग में तह-दर-तह बिठा दिया जाना चाहिए। सरल शब्दों में, क्रमिक विकासवाद के अनुसार इस पृथ्वी को इस रूप में आने में करोड़ों वर्ष लगे जो कि किसी गॉड, ईश्वर या पराशक्ति के हाथों रातो-रात बनाए का परिणाम नहीं बल्कि क्रमिक विकास का परिणाम है। क्रम-विकास एक मन्द एवं गतिशील प्रक्रिया है, जिसके फलस्वरूप आदि युग के सरल रचना वाले जीवों से अधिक विकसित जटिल रचना वाले नए जीवों की उत्पत्ति हुई है। जीव विज्ञान में क्रम-विकास किसी जीव की आबादी की एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी के दौरान जीन में आया परिवर्तन है। यह प्रक्रिया नई प्रजातियों के उद्भव में परिणत होती है।
जब हर बच्चा सारी उत्पत्ति को उपरोक्त ज्ञान की कसौटी पर कसने लगेगा तो वह अपने धर्म को भी बेहतर तार्किक तरीके से समझने का प्रयास करेगा। आखिरकार प्रारंभ में धर्म एवं विभिन्न संप्रदाय का उद्भव भी तो मानव जीवन को सभ्य, सामाजिक एवं सहज-सरल बनाने के लिए हुआ था। यह अलग बात है कि आगे चलकर हर धर्म के स्वार्थी लोगों एवं समूहों ने अपने निजी हित के लिए इसका दुरुपयोग किया जिसके कारण आज सभी संप्रदायों में अंधविश्वासी जड़तावादी लोगों का बोलबाला है, जो प्रश्न एवं तर्क करने वालों से कोसों दूर भागते हैं। अगर प्रारंभ से ही तार्किक आधार मजबूत हो जाए तो कोई कुरीति एवं अंधविश्वास उन्हें मार्ग से डिगा नही पाएगा और अंधविश्वास, पाखंड एवं आतंकवादी हिंसा की दुकानें अपने-आप बंद हो जाएंगी। वही धर्म एवं संप्रदाय टिकेंगे, जो विवेकवाद, तर्क एवं नैतिकता की कसौटी पर खरे उतरेंगे।
अगर इन सबको रोकना है तो पूरे देश में एक समान तार्किक एवं वैज्ञानिक सोच पर आधारित शिक्षा केन्द्र एवं प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र की मजबूत बुनियाद रखनी पड़ेगी, क्योंकि एक अशिक्षित एवं बीमार दिमाग में ही अंधविश्वासों और पाखंडों को फलने-फूलने का निर्बाध अवसर मिलता है। एक विवेकशील समाज बनाकर ही हम डॉ. यशपाल और धार्मिक पाखंड के विरुद्ध आजीवन लोहा लेने वाले चार्ल्स डार्विन को सच्ची श्रद्धांजलि दे पाएंगे।


Tuesday, August 1, 2017

इश्क के उजले और स्याह पक्ष
इश्क के अनेकों आयाम और अंजाम होते हैं। हर व्यक्ति का इसके बारे में अपनी-अपनी पृष्ठभूमि और अनुभवों के अनुरूप अपना फससफा है, जो कि एक दूसरे से बिल्कुल जुदा-जुदा है। इसके जुदा होने के कारणों पर जाएं तो मुख्य रूप से समाज, परिवार, जाति, नस्ल, धर्म, संस्कृति, शिक्षा, पर्यावरण, हर व्यक्ति का अपना अनूठा व्यक्तित्व एवं परिस्थितियों के अनुरूप बदलती मनःस्थिति को जिम्मेदार माना जा सकता है। प्यार को जितने रूमानी अंदाज में सिर्फ दो स्वतंत्र व्यक्तियों का अंदरूनी मामला माना जाता है, ज्यादातर मामले में ऐसा होता नहीं है। इश्क का अंजाम उसके स्वयं से लेकर घर-परिवार, यहाँ तक कि पूरे देश और समाज को प्रभावित करता है। हम अगर इसके अनेक आयामों पर न जाकर सिर्फ सकारात्मक और नकारात्मक पक्षों की ही बात करें तो यही कहा जा सकता है कि इश्क सफल रहा तो उसके सकारात्मक परिणामों से पूरे समाज को एक रचनात्मक उर्जा मिलती है, जिससे समाज में जड़ जमाए अनेक दकियानूसी विचारों एवं बुराइयों से मुक्ति का मार्ग खुलता है। और नकारात्मक हुए तो स्वयं उसके कर्त्ता के साथ-साथ उसके परिवार और समाज के लिए भी अत्यंत घातक होता है। पिछले दिनों दिल्ली में दो ऐसी घटनाएँ घटीं, जिससे इन दोनों पक्षों को बखूबी समझा जा सकता है।
दिल्ली के यमुनापार मानसरोवर पार्क का रहने वाले आदिल और रिया 2015 से एक दूसरे को जानते थे। आदिल स्कूल वैन चलाता था। वह रिया के घर के पास से एक छात्र को रोजाना स्कूल पहुंचाने के लिए आता था। दोनों में दोस्ती हुई। धीरे-धीरे दोस्ती परवान चढ़ी, बात करने के लिए आदिल ने महंगा मोबाइल खरीदकर रिया को दिया। एयर होस्टेस का कोर्स करने वाली रिया की स्कूल का वैन चालक आदिल की दोस्ती का पता जब रिया के घरवालों को चला तो उन्होंने इसका विरोध किया। वह आदिल से दूरी बनाने लगी। नाराज होकर आदिल ने उसे धमकाना शुरू कर दिया। परेशान आदिल ने अलीगढ़ जाकर अपने दोस्तों से रिया की नाराजगी के बारे में बताया। उसने दोस्तों के साथ प्लान बनाया कि रिया को खत्म कर दिया जाए। इसके बाद आदिल के साथियों ने रिया की रेकी शुरू कर दी। उसने चाकू खरीदा। वारदात के दिन जैसे ही रिया मानसरोवर पार्क इलाके में पहुंची तो आदिल ने उससे गिफ्ट में दिया गया मोबाइल फोन वापस देने के लिए कहा। दोनों के बीच झगड़ा होने लगा। तभी आदिल ने चाकू निकाला और रिया पर ताबड़तोड़ हमला कर दिया। इस हमले में रिया की मौत हो गई। वारदात को अंजाम देकर आदिल मुंबई भाग गया। पुलिस ने इनपुट के आधार पर आदिल और उसके साथियों को वहां से धर दबोचा। हत्या के बाद यह खुलासा भी हुआ है कि घटना से पहले रिया ने पुलिस को लिखित शिकायत की थी कि आदिल से उसकी जान को खतरा है।
दूसरी घटना में दोनों प्रेमी की एक कोठे पर मुलाकात हुई थी। इसके बाद दोनों अलग-अलग जगह मिलने लगे और एक-दूसरे को पसंद करने लगे। नेपाल की लड़की वर्ष 2015 में वहां आए भयानक भूकंप में सबकुछ खत्म हो जाने की वजह से परिवार के भरण-पोषण करने के इरादे से दिल्ली आ गई और रोजगार के लिए प्रयास करने लगी। काम ढूंढ़ने के दौरान उसे ढाई साल पहले किसी दलाल ने धोखे से बेच कर जीबी रोड पहुंचा दिया। पेशे से ड्राइवर 28 वर्षीय युवक से उसकी मुलाकात कोठे पर ही हुई। लगातार वह लड़की से मिलने जाता रहा, दोनों में प्यार इतना गहरा हो गया कि दोनों किसी तरह भागकर शादी करना चाहने लगे। कई बार लड़के ने उसे भगाने की कोशिश भी की, मगर कभी सफल नहीं हो पाए, उल्टे लड़की से मारपीट भी की गई। आखिर में युवक ने किसी की सलाह पर दिल्ली महिला आयोग से मदद मांगी। दोनों को परखकर आयोग ने एक स्वैच्छिक संगठन और पुलिस की मदद से युवती को वहां से निकाला। आयोग ने कहा कि युवती ने अपनी नई जिंदगी शुरू करने की इच्छा जताई है। यही नहीं युवक का परिवार भी उसे अपनाने को तैयार है। वे जल्द ही शादी करेंगे।
दुनियावी प्यार, जिसमें एकसाथ घर-परिवार बसाने से है। उसके लिए जो प्राथमिक सोपान हैं- एक दूसरे के प्रति अदम्य चाहत, घर-परिवार और समाज की स्वीकृति और तीसरा कानून या सरकारी सुरक्षातंत्र का साथ। अगर पहला सोपान यानी प्यार की नींव मजबूत हो तो आज के समय में खासकर महानगरों में घर-परिवार और समाज की स्वीकृति ना-नुकर के बाद मिल ही जाती है। और न भी मिले तो कानूनी मापदंडों पर खरे उतरने पर उसके सहयोग से मंजिल मिल जाती है। रिया की नृशंस हत्या आदिल ने इसलिए कर दी कि वह इस बात को स्वीकार ही नहीं कर सका कि कुछ दिनों पहले तक जो रिया उससे प्यार कर रही थी, उसे अपने पारिवारिक और कैरियर के अनुरूप एक वैन ड्राइवर आदिल को न चाहने की आजादी भी हासिल है। आदिल की सामाजिक पृष्ठभूमि एवं हिंसक स्वभाव यह मानने को तैयार ही नहीं था कि कुछ दिनों पहले तक उससे गिफ्ट लेने व हमेशा बात करने वाली लड़की उससे मुंह चुराये। गुस्से में उसने अपने साथियों के साथ मिलकर उसकी हत्या कर दी।
दूसरी तरफ 28 वर्षीय युवक एवं कोठे पर धंधा करने को मजबूर लड़की का प्यार इसलिए सफलीभूत हो सका कि वे एक-दूसरे की पृष्ठभूमि को समझबूझकर, अपने परिवार को साथ लेकर अपने प्यार को अंजाम तक पहुंचाने के लिए अनवरत प्रयास करते रहे। और सबसे बड़ी बात यह कि उन्हें तीसरे पक्ष यानी दिल्ली महिला आयोग, पुलिस एवं स्वैच्छिक संगठन का साथ मिला। काश! रिया को भी आदिल से लगातार मिल रही धमकियों के समय की गई शिकायत पर पुलिस त्वरित कार्रवाई करती, तो रिया एयर होस्टेस बन स्वप्नों एवं उमंगों की उड़ान भरती होती और आदिल भी कम से कम हत्यारा होने से बच जाता।
प्यार को जितना आंतरिक समझा जाता है, वास्तविक सामाजिक जीवन में ऐसा होता नहीं है, वही प्यार स्वप्नों एवं उमंगों की इन्द्रधनुषी छटा बिखेर पाता है, जो दो स्वतंत्र व्यक्तियों के बीच अंकुरित होकर एक जनतांत्रिक परिवार, समाज और कानून यानी सरकार के संरक्षण में पलकर पल्लवित-पुष्पित हो चहुँओर खुशबू बिखेरे!        


Thursday, July 6, 2017

दो अतियोंके बीच
यह कैसी विडंबना है कि इस बार के बारहवीं के नतीजों में दो प्रमुख राज्यों में एक गुजरात, जो कि आधुनिक व्यवसाय, उद्योग एवं प्रबंधन में अगुआ राज्य है। दूसरा बिहार, जिसका इतिहास शिक्षा, ज्ञान, दर्शन एवं अध्यात्म में पूरे विश्व का अगुआ रहा है तथा वर्तमान में पूरे भारत के लिए नौकरशाही तथा सरकारी कर्मचारी पैदा करने में प्रथम पंक्ति में है। इस वर्ष के बारहवीं के नतीजों में दोनों जगहों पर सर्वोच्च स्थान पाने वालों की दिशा बिल्कुल विपरीत रही। इतनी विपरीत कि एक को आप आकाशीय या आध्यात्मिक कह सकते हैं तो दूसरे को निजी स्वार्थ एवं कदाचार-भ्रष्टाचार में लिप्त बिल्कुल रसातल में जाता पातालीय। दोनों में अगर समानता है तो सिर्फ यही कि दोनो में से किसी ने भी सर्वोच्चता की कामना नहीं की थी। जाहिर है, जब कामना नहीं की तो दोनों इस व्यापक सामाजिक जीवन से जुड़कर इसके पथप्रदर्शक भी न बन सकतेे। एक खुद ही इसे ठुकराकर, दुनियावी मोहमाया से मुक्त होकर संन्यासी बन गया तो दूसरा गोरखधंधे से लादी गई सफलता के बोझ तले दबकर मुजरिम बन जेल पहुँच गया।
गुजरात माध्यमिक और उच्चतर शिक्षा बोर्ड की परीक्षा में 99.99 प्रतिशत अंक हासिल करने वाले अहमदाबाद के 17 वर्षीय वर्शिल शाह अब जैन संत बन गए हैं। वर्शिल ने संवाददाताओं को बताया, मैंने उच्च अंक हासिल किए, लेकिन मैं उस आम रास्ते पर नहीं चलना चाहता, जहाँ पैसे वाले पेशे के पीछे भागते हैं। मेरा लक्ष्य आंतरिक एवं आध्यात्मिक शांति और प्रसन्नता हासिल करना है। यह तभी संभव है, जब मैं सबकुछ छोड़कर जैन संत बन जाऊँ। वर्शिल की माता अमिबेन शाह और पिता जिगरभाई आयकर अधिकारी हैं। वे खुश हैं कि उनके बेटे ने यह रास्ता चुना।
इस बार बिहार की 12वीं की परीक्षा में गणेश कुमार ने 82.6 प्रतिशत अंक हासिल करके टॉप किया। परंतु फर्जीवाड़े के आरोप में पुलिस ने गणेश कुमार को गिरफ्तार कर लिया। शक की वजह यह कि गणेश कुमार ने अपनी उम्र 24 साल बताई, जबकि 17-18 की उम्र वाले बच्चे इस क्लास में होते हैं। वह झारखंड के गिरिडीह से परीक्षा देने के लिए समस्तीपुर आया था। इसके साथ ही वह हार्मोनियम भी नहीं बजा पाया था, जबकि उसको संगीत के प्रैक्टिकल में 70 में से 65 अंक मिले थे। इस फर्जीवाडे का पता पुराने रिकॉर्ड्स से लगा। बिहार स्कूल एक्जामिनेशन बोर्ड (ठैम्ठ) ने बताया कि, गणेश ने 1990 में गिरिडीह से मैट्रिक और 1992 में झुमरी तलैया से 12वीं की परीक्षा दी थी। दोनों ही बार उसकी सेकेंड डिवीजन आई। दोनों बार के एडमिट कार्ड पर उसने अपनी जन्मतिथि सात नवंबर, 1975 बताई थी। इसके बाद उसने 2015 में फिर से दसवीं की परीक्षा दी। तब उसकी जन्मतिथि दो जून, 1993 लिखी गई थी।
इन दो अतियों के बीच तीसरा मध्य मार्ग, जिसपर कि समाज और राष्ट्र का पूरा दारोमदार है, जिसे हम रीढ़ की हड्डी कह सकते हैं, उसकी सही मायने में प्रतिनिधित्व सीबीएसई के बारहवीं के नतीजों में पूरे भारत में सर्वोच्च स्थान प्राप्त करने वाली 17 वर्षीय रक्षा गोपाल करती है। नोएडा के एमिटी इंटरनेशनल स्कूल में पढ़ने वाली रक्षा गोपाल ने 99.6 फीसदी अंकों के साथ पूरे देश में टॉप किया है। रक्षा को तीन विषयों अंग्रेजी, राजनीतिशास्त्र और अर्थशास्त्र में सौ-सौ नंबर मिले हैं। इतिहास और मनोविज्ञान में उसे 99-99 अंक मिले।
रक्षा पढ़ाई के अलावा पियानो बजाती है और वह साहित्य की शौकीन है। वह फ्रेंच सीख रही है। अब वह आगे पॉलिटिकल साइंस की पढ़ाई करना चाहती है और सिविल सेवा में जाना चाहती है। रक्षा अपनी कामयाबी का श्रेय अपने माता-पिता और स्कूल के शिक्षकों को देती है। रक्षा के पिता गुजरात स्टेट पेट्रोलियम कॉरपोरेशन में वित्त अधिकारी हैं, माँ गृहिणी हैं। रक्षा के पिता कहते हैं कि उन्हें अपनी बेटी पर भरोसा था कि वह अच्छे नंबर लाएगी, लेकिन पूरे भारत में टॉप करेगी, यह उन्होंने नहीं सोचा था। हमने अपनी बेटी से यही कहा कि मन लगाकर पढ़ो और नंबरों की परवाह छोड़ ज्ञान जुटाते रहो।
सिद्धार्थ बुद्ध बनने के लिए घर-गृहस्थी, राज-सिंहासन का मोह छोड़कर ज्ञान की खोज में उरुवेला पहुँचकर घोर तपस्या करने लगे। पहले तो सिर्फ तिल-चावल, फिर निराहार। छः साल बीत गए। शरीर सूखकर काँटा हो गया, फिर भी ज्ञान की प्राप्ति नहीं हुई। एक दिन कुछ ग्रामीण स्त्रियाँ लोकगीत गाती हुई जा रही थीं। उसका अर्थ था, ‘वीणा के तारों को ढीला मत छोड़ दो। उनका सुरीला स्वर नहीं निकलेगा। पर तारों को इतना कसो भी मत कि वे टूट जाएँ।बात उन्हें जँच गई। इसके पहले वे राजमहल के अति भोग-विलास में डूबा जीवन भी जी चुके थे। वे मान गए कि नियमित सामान्य आहार-विहार से ही योग सिद्ध होता है। मध्यम मार्ग पर चलकर उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई। वे भगवान बुद्ध बन भारतीय धर्म और समाज व्यवस्था में क्रांतिकारी बदलाव के अग्रदूत बने।
गुजरात और बिहार के दोनों टॉपर दो अतियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। वर्शिल आध्यात्मिक एवं आंतरिक शांति के लिए संन्यास का चोला पहन जैन मुनि बन गया। यानी मुख्यधारा के सामाजिक जीवन से पलायन कर गया। वह अब जो भी करेगा सिर्फ निजी आत्मिक आनंद के निमित्त ही करेगा। दूसरा बिहार के गणेश कुमार ने दो-दो बार उम्र घटाकर मैट्रिक एवं इंटर की परीक्षा सिर्फ इसलिए दी कि वह सिर्फ एक सरकारी बाबू बन सके। यह सिर्फ उसकी बात नहीं है, बिहार-झारखंड में बहुत से ऐसे लोग हैं, जो सालों से ऐसा करते आ रहे हैं। ऐसे लोग सिर्फ सरकारी बाबू ही नहीं बल्कि इंजीनियर, डॉक्टर और अधिकारी तक बनकर समाज पर बोझ बन बैठे हैं। गणेश कुमार जैसे लोगों को समाज-हित से कुछ मतलब नहीं है, येन-केन-प्रकारेण सिर्फ अपना जीवन सुखी हो जाए, यही ध्येय होता है।

लेकिन इन दो अतियों के मध्य रक्षा गोपालभी है, जो साहित्य, संगीतकला, भाषाशास्त्र, राजनीतिशास्त्र में पारंगत होकर भारतीय सिविल सेवा से जुड़ना चाहती है। अपने बहुमुखी ज्ञान और प्रतिभा का इस्तेमाल अपने देश-वासियों की दैनिक समस्याओं के समाधान में करना चाहती है। यह समझने की आवश्यकता है कि वृहत्तर समाज के सुख से होकर ही निजी भौतिक और आध्यात्मिक सुख का रास्ता जाता है। रक्षा गोपाल जैसी बहुविध प्रतिभाओं की हमारे देश और समाज को बहुत जरूरत है।   

Tuesday, June 6, 2017

लोकतांत्रिक प्रक्रिया से ही निकलेगा शाश्वत समाधान
जनतांत्रिक प्रक्रिया भले ही कभी-कभी बड़ी ही विलंबित और उलझाऊ महसूस होती हो, परंतु इस पर विश्वास करने वाले समाज को पता होता है कि इस प्रक्रिया से जो समाधान सामने आता है, वह टिकाऊ और शाश्वत होता है। इसको समझने के लिए भारत का स्वतंत्रता आंदोलन तथा आजादी के बाद संसदीय जनतंत्र से निकलकर आए अनेक सुधारों को सूक्ष्म विवेचना की जरूरत पड़ेगी। इसे आसान तरीके से समझने के लिए वर्तमान में देश की दो अति विवादास्पद तथा जटिल आर्थिक, राजनीतिक तथा सामाजिक समस्याओं को सुलझते देखकर समझा जा सकता है, पहला, टैक्स संबंधी जीएसटी कानून का कार्यरूप में आना तथा दूसरा, मुस्लिम महिलाओं से जुड़ी तीन तलाक की समस्या।
श्रीनगर में जीएसटी यानी वस्तु व सेवा कर परिषद् ने जिस तरह इसकी दरों को तय किया है, उससे काफी उम्मीद जगती है। परिषद् ने कोशिश की है कि जीएसटी दरें लागू हांे तो आम लोगों की तकलीफ न बढ़े बल्कि उनकी दैनिक जिंदगी पहले से और सहज ढंग से चलती रहे। वस्तुओं एवं सेवाओं के बीच का अंतर समाप्त करने का विचार एवं कर प्रणाली सरल एवं पारदर्शी बने, यही जीएसटी के मूल में है। यह विचार सन् 1994 में अमरेश बागची की रिपोर्ट रिफॉर्म ऑफ डोमेस्टिक ट्रेड टैक्सेस इन इंडिया: इश्यूज ऐंड ऑप्शंसकेन्द्र सरकार के सामने पेश की गई थी। वर्ष 2000 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने इसे लागू करने के लिए राज्यों के वित्त मंत्रियों की एक अधिकार प्राप्त समिति बनाई थी।
यद्यपि उस समय की अटल सरकार अल्पमत व राजनीतिक दा वपेंच के चलते इस बिल को पास नहीं करा पाई थी। उसके बाद यूपीए सरकार के वित्तमंत्री पी. चिदम्बरम द्वारा 2007 में जीएसटी के लिए राज्यों के वित्तमंत्रियों की संयुक्त समिति का गठन कर वर्ष 2010 से इसके लागू करने की घोषणा की। तत्कालीन कांग्रेस सरकार द्वारा मार्च, 2011 में 115वाँ संविधान संशोधन विधेयक पेश किया गया, जो अनेक अवरोधों एवं मतभेदों के कारण पारित नहीं हो सका। भाजपा की नरेंद्र मोदी सरकार ने जीएसटी को अपने आर्थिक सुधारों का केंद्रबिंदु बताया तथा 122वाँ संविधान संशोधन विधेयक दिसंबर, 2014 में संसद में पेश किया, जिसे लोकसभा द्वारा मई, 2015 में पारित कर दिया गया था। किन्तु राज्यसभा में एनडीए के अल्पमत में होने के चलते व विपक्ष का रचनात्मक सहयोग नहीं होने के कारण राज्यसभा में इस बिल का भविष्य उज्ज्वल नहीं दिख रहा था। यह सरकार व वित्तमंत्री अरुण जेटली की संसदीय कुशलता का परिणाम ही है कि लोकसभा के बाद, वह बिल 3 अगस्त, 2016 को राज्यसभा में भी सम्पूर्ण उपस्थित सदस्यों के इकतरफा समर्थन से पारित हुआ। इस चुनौती को पार करते हुए जिस तरह सरकार अब आम सहमति से अनेक विपक्षी दलों वाली राज्यों की विधान सभाओं से भी पास करा पाई और करा रही है, यही जनतंत्र की जीत है।
दूसरी तीन तलाक की समस्या, जो कि मुस्लिम महिलाओं के जीवण-मरण से जुड़ा सवाल है। करीब तीस साल पहले तीन तलाक पर सर्वोच्च न्यायालय ने शाह बानो के पक्ष में फैसला दिया था। परंतु इस फैसले का मुस्लिम कट्टरपंथियों ने भारी विरोध किया। तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने कट्टरपंथी मुस्लिम धर्मगुरुओं के दबाव में आकर मुस्लिम महिला अधिनियम, 1986 पारित कर शाह बानो के पक्ष में आया न्यायालय का फैसला पलट दिया। लगभग तीस साल बाद, उत्तराखंड के काशीपुर की रहने वाली शायरा बानो का साल 2002 में इलाहाबाद के रिजवान अहमद से निकाह हुआ, ससुराल में उसको अनेक तरह की शारीरिक और मानसिक प्रताड़नाएँ दी गईं और अंततः 2015 में तीन तलाकदेते हुए उससे रिश्ता ही समाप्त कर लिया। इसी तलाक की वैधता को चुनौती देते हुए शायरा सर्वोच्च न्यायालय पहुँची। याचिका के माध्यम से मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरियत) एप्लीकेशन एक्ट, 1937की धारा 2 की संवैधानिकता को चुनौती दी गई। यही वह धारा है, जिसके जरिये मुस्लिम समुदाय में बहुविवाह, ‘तीन तलाक’ (तलाक-ए-बिद्दत) और निकाह-हलालाजैसी प्रथाओं को वैध्यता मिलती है।
इस मामले का संज्ञान लेते हुए सर्वोच्च अदालत को पूरा अहसास था कि उसे एक बहुत नाजुक और विवादित विषय पर सुनवाई करनी है। इसलिए उसने मामले को पाँच जजों की संवैधानिक पीठ को सौंपा, जिसमें अलग-अलग धार्मिक पृष्ठभूमि के जज शामिल किए गए। पहली बार इस मसले पर केंद्र की भाजपा सरकार ने अपने हलफनामे में सरकार ने तीन तलाक को मजहब के नजरिए से नहीं बल्कि स्त्री-पुरुष के समान अधिकार के नजरिए से देखने की वकालत की। इसके अलावा, मुसलिम समाज के भीतर से भी तीन तलाक की आलोचना के स्वर उठने लगे हैं।
सर्वोच्च न्यायालय में तीन तलाक के मसले पर चली सुनवाई की सार्थकता दिखने लगी है। न्यायालय का फैसला क्या होगा, यह तो फैसला आने के बाद पता चलेगा, पर ऑल इंडिया मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड के रुख में बदलाव साफ लक्षित किया जा सकता है। इस सुनवाई के दौरान न्यायालय की सख्त टिप्पणियों, केन्द्र सरकार के मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों के पक्ष में खड़े होने के कठोर रुख तथा जनमानस तथा मीडिया के मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों के प्रति संवेदनशीलता का ही असर है कि कल तक जो बोर्ड तीन तलाक के मुद््दे को अदालत के न्यायाधिकार क्षेत्र से बाहर बताता रहा, अब उसके सुर बदल गए हैं। उसने सर्वोच्च अदालत में दाखिल किए अपने नए हलफनामे में कहा है कि महिलाओं को तीन तलाक न मानने का अधिकार भी मिलेगा। दुलहन निकाहनामे में संबंधित शर्त जुड़वा सकेगी। यही नहीं, काजी दूल्हा-दुलहन को समझाएगा कि तीन तलाक न कहने की शर्त निकाहनामे में शामिल करेंगे तथा बोर्ड तीन तलाक का बेजा इस्तेमाल रोकने के लिए जागरूकता मुहिम चलाएगा।

80 के दशक में शाह बानो मामले को अलोकतांत्रिक तरीके से एक वर्ग की कट्टरवादी सनक को मान्यता देने के लिए कानून बनाकर मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक के वज्रपात के आगे बेसहारा और बेचारगी में तिल-तिल कर जिस तरह से मरने को विवश किया गया था, उसे तो फिर से उभरना ही था। यह तो हमारे जीवंत जनतंत्र का परिणाम है कि स्थाई समाधान तक प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से विविध संस्थाएँ सक्रिय रहती हैं और परस्पर विरोध, संवाद और समाधान की प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है। विपरीत परिस्थितियों में भी जटिलताओं और मतभेदों को पाटती रहती हैं। कभी कार्यपालिका, संसद, न्यायपालिका, मीडिया तो कभी-कभी सड़क से उठती आवाज से भी समाधान के रास्ते निकलते रहते हैं। चाहे जीएसटी हो या तीन तलाक या फिर लंबा इंतजार कराता विलंबित लोकपाल, शाश्वत समाधान का माध्यम तो जनतंत्र ही है।
लालबत्ती के स्याह पक्ष
आजादी के बाद देश के संविधान और कानून ने लोकतांत्रिक सरकार और शासन के हाथ में सत्ता का प्रकाश-स्तंभ इसलिए थमाया कि अब तक दरिद्रता, अशिक्षा, बीमारियों, अंधविश्वासों तथा अनेक प्रकार के जाति, धर्म, वर्ण और वर्गों के आधार पर विभेदकारी नीतियों के कारण हाशिए पर जीने को मजबूर लोगों के घरों और मनों में जड़ जमाए स्याह अँधेरे से मुक्ति और सुराज मिले। वह भी आलोकित होकर बिना अटके, बिना भटके देश की प्रगति और विकास की यात्रा में शामिल हो जाए। परंतु दुःखद स्थिति यह हो गई कि जिन्हें यह जिम्मेदारी दी गई, वही पहले अपने और अपने परिवार के लिए भरपूर रोशनी की व्यवस्था करने लगे; उसके बाद ऐसे लोगों को जो सदा से प्रकाशित थे, उन्हें ही गलत ढंग से हर क्षेत्र में निर्बाध रूप से आगे बढ़ने के भरपूर अवसर दिए जाने लगे। ऊपर से कोढ़ में खाज यह कि सत्ताधारी वर्ग सत्ता-सुविधा की भरपूर चमक-दमक के अतिरिक्त अपने सिरों पर लालबत्ती भी लाद ली।  परिणाम यह हुआ कि सदियों से अँधेरों में रोशनी की तलाश में बिलबिलाता समाज इस लाल रक्तिम रोशनी के भय से और दूर होता हुआ अंधकूप में समाता चला गया।
ऐसे समय में जनता का चौकीदार और जनता के प्रधानसेवक बनने के वादे से शासन में आनेवाले प्रधानमंत्री और केन्द्र सरकार का लालबत्ती हटाने समेत और अन्य कई फैसलों से एक आशाजनक  संकेत मिल रहा है। यह निश्चय ही जनतांत्रिक मूल्यों के पक्ष में केंद्र सरकार का एक ऐतिहासिक फैसला है कि एक मई से किसी भी गाड़ी के ऊपर लाल बत्ती नहीं होगी। यों कोई व्यवस्था कितनी भी जनतांत्रिक और समतावादी हो, शीर्ष पदों पर आसीन व्यक्तियों को कुछ विशिष्ट अधिकार हासिल होते हैं, इसी के अनुरूप उन्हें विशेष सुविधाएँ भी मिली होती हैं। इसका आमतौर पर बुरा नहीं माना जाता। परंतु सातवें दशक से मंत्रियों और नेताओं का सुरक्षा संबंधी तामझाम बढ़ने लगा और लालबत्ती लगी गाड़ियों का दायरा भी। यहाँ तक कि मंत्री और अधिकारियों के परिवार और रिश्तेदार तक बेधड़क इसका दुरुपयोग कर सब पर रोब गाँठते दिखाई पड़ने लगे।
यूरोप के कई देशों के प्रधानमंत्री आज भी साइकिल पर चलना पसंद करते हैं, जिनमें नॅार्वे नीदरलैंड्स, ब्रिटेन आदि के प्रधान मंत्री, मंत्रीगण, सांसद तथा अनेक विशिष्टजन शामिल हैं वे सार्वजनिक लोकल ट्रेनों एवं बसों में आम लोगों के साथ बड़े सहज ढंग से यात्रा करते हैं। इसके उलट हमारे देश में शिवसेना के सांसद रवींद्र गायकवाड़ जैसे अनेक महानुभाव हैं, जो साठ साल के बुजुर्ग विमानसेवा कर्मचारी की चप्पलों से धुनाई यह कहते हुए कर देते हैं कि एक कर्मचारी उन्हें यह याद दिलाने की गुस्ताखी कैसे कर सकता है कि उड़ान में बिजनेस क्लास नहीं है। वह भला साधारण लोगों की तरह कतार में लगने और आम दर्जे में यात्रा कैसे कर सकते हैं? बेशर्मी की हद तो तब हो जाती है कि इसके कारण संसद में भी इनके दल द्वारा कई दिनों तक अवरोध पैदा किया जाता है।
यह लालबत्ती वाली मानसिकता सिर्फ गाड़ी की बत्तियों तक सीमित नहीं है बल्कि शासन के हर स्तर और हर क्षेत्र में दिखती रही है। चाहे शिक्षा को लें, स्वास्थ्य सुविधाओं को लें, यातायात व्यवस्था को ले लें या फिर अन्य कोई सामान्य से सामान्य नागरिक सेवा। शिक्षा के क्षेत्र में आम नागरिकों के बच्चों के लिए सरकारी स्कूलों का हाल यह है कि न तो ढंग के शिक्षक उपलब्ध हैं न ही अन्य सुविधाएँ जबकि मंत्रियों, सरकारी अधिकारियों एवं अमीरों के बच्चों के लिए संस्कृति स्कूल, पांचसितारा सुविधाओं से युक्त अनेक पब्लिक स्कूलों से लेकर विदेशों तक की शिक्षा सहज उपलब्ध है। स्वास्थ्य के क्षेत्र में और भी बुरा हाल है। आम गरीब मामूली बीमारी होने पर समय पर सही इलाज नहीं मिलने के दर-दर की ठोकरें खाकर मरने को मजबूर होता है जबकि सरकार और शासन तथा अमीरों के लिए सरकारी अस्पताल से लेकर अनेक मंहगे अस्पताल उनकी सेवा में चौबिसों घंटे तत्पर रहते हैं। यातायात के साधनों में भी हर जगह वीआईपी लालबत्ती मानसिकता हावी है। जहाँ विशिष्ट लोगों के लिए पैसे एवं मुफ्त कोटे पर आराम की सारी सुविधा उपलब्ध हैं वहीं आमजनों को जानवरों से भी बदतर हालात में जान को जोखिम में डालकर यात्रा करनी पड़ती है।
आशा है, सरकार एवं शासन के कर्ता-धर्ता अब हर स्तर पर जनता से जुड़ी मौलिक जरूरतों के साधनों के द्वार सहज ढंग से खोलेंगे और अपने कर्तव्य, जिसे सत्ता के माध्यम से उन्हें संविधान और कानून नें सौंपा है उसका निर्वहन करेंगे। आगे जल्द से जल्द पूरे देश में ऐसी व्यवस्था होगी कि सबके लिए समान स्कूल की व्यवस्था होगी, जिसमें साधारण व्यक्ति के घरों के बच्चों के लेकर सत्ता के शिखर पर बैठे व्यक्ति के बच्चे एक साथ पढ़ें, सभी व्यक्तियों को सहज और समान जरूरत के अनुरूप स्वास्थ्य सेवाएँ मिलंे।
हमारे यातायात के साधनों का भी जनतांत्रिकीकरण हो। दिल्ली मेट्रो इसका बहुत बढ़िया उदाहरण है। यह सभी वर्ग के लोगों को संग-साथ चलना सिखा रही है। ऐसा करने के लिए उन्हें मेट्रो की कार्यप्रणाली ने उनको मजबूर किया है। जहाँ तक सुविधाओं की बात है तो गरमी, सर्दी से बचाव और सुरक्षित माहौल किस इंसान की जरूरत नहीं है? संग-साथ चलने का यही फार्मूला कुछ बडे स्तर पर भारतीय रेल एवं अन्य साधनों में भी क्यों नहीं अपनाया जा सकता है? जहां सामान्य और विशिष्ट सभी संग साथ होकर एक ही तरह की सामान्य सुविधाओं का प्रयोग करते हुए चलें। इसके लिए राजनीतिक एवं सामाजिक मानस में बदलाव की आवश्यकता है।
प्रधानमंत्री, उनकी केबिनेट, तथा कई मुख्यमंत्रियों ने कुलीन मानसिकता की प्रतीक लालबत्तियों को गाड़ियों से हटाने की जो मुहिम छेड़ी है, उसके प्रतीकात्मक, सकारात्मक महत्त्व से इंकार नहीं किया जा सकता। परंतु यह मुहिम तभी अपना मुकाम हासिल कर पाएगी जब सेवाओं एवं सामान्य आधारभूत मौलिक जरूरतों तक सबकी बिना भेद-भाव के सहज और समान, निर्बाध भागीदारी सुनिश्चत होगी। तभी देश को लालबत्ती के स्याह पक्ष से मुक्ति मिलेगी और सही मायने में सुराज स्थापित होगा।
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Thursday, April 13, 2017

पुरखों के बगैर जीवन!
उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने गंगा-यमुना को इंसानी दर्जा यानी एक नागरिक होने का दर्जा दिया।  इन्हें सभी मैया और माँ तो कहते ही हैं और शुभ दिनों में इसके आगे शीश भी नवाते हैं, परंतु इनके साथ व्यवहार ठीक उसी तरह करते हैं, जैसे हमारे घरों के बेचारे बूढ़े-बुजुर्ग, जिनकी सारी संपत्ति, जीवन के सारे सृजन का उपयोग तो करते हैं, परंतु उनके साथ व्यवहार ऐसे करते हैं, मानो उनका कोई अस्तित्व ही नहीं बचा हो। भारत में हजारों ऐसे लोग हैं, जिन्हें सरकारी बाबुओं ने मृत घोषित कर दिया है और वे हर दफ्तर-दरवाजे अपने जिंदा होने का सबूत देते फिरते हैं, ताकि उन्हें भी एक सामान्य नागरिक होने की सारी सुविधाएँ मिलें। अच्छा हुआ, उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने गंगा और यमुना मैया को जीवित इंसान का कानूनी दर्जा दे दिया और एक लाचार व बेबस बुजुर्ग की भाँति उनका नोमनी भी यानी कानूनी अभिभावक नमामि गंगे मिशन के निदेशक, उत्तराखंड के मुख्यसचिव और उत्तराखंड के महाधिवक्ता को बना दिया। अब यही दोनों अधिकारी गंगा और यमुना के स्वास्थ्य और कुशलता का ध्यान रखने के लिए बाध्य होंगे।
इसके ठीक सप्ताह भर पहले न्यूजीलैंड की वांगानुई नदी को जिंदा इंसान होने का दर्जा वहाँ की संसद ने दिया। न्यूजीलैंड का माओरी आदिवासी समुदाय इस नदी को अपना पूर्वज मानता है। इसके लिए करीब डेढ़ सदी तक उन्होंने लगातार संघर्ष किया।
इसी माह संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने वैश्विक सांस्कृतिक धरोहर स्थलों पर सशस्त्र संघर्षों के खतरे के मद्देनजर इनकी सुरक्षा मजबूत करने का प्रस्ताव पारित करते हुए कहा कि अवैध तोड़-फोड़ करनेवाले अपराधियों को युद्ध अपराधों के मामले में अभियुक्त बनाया जा सकता है। इस प्रस्ताव में कहा गया है, ‘‘धर्म, शिक्षा, कला, विज्ञान एवं धमार्थ कार्यों के लिए बनी इमारतों एवं स्थलों या ऐतिहासिक स्मारकों पर अवैध हमले निश्चित परिस्थितियों में और अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार युद्ध अपराध के बराबर हो सकते हैं और इस प्रकार के हमले अपराधियों को न्याय के दायरे में लाया जाना चाहिए।’’ यूनेस्को विश्व की धरोहरों के संरक्षण के लिए लगातार प्रयासरत है।  
थोड़ा विस्तृत फलक पर देखें तो विश्व की सिर्फ एक-दो नदी नहीं बल्कि सारी नदियाँ, पहाड़, वृक्ष, स्थापत्य की इमारतें, जिसमें अनेक प्रकार के मूर्तिकारी, चित्रकारी, शिलालेख, गुफा, आवास एवं ऐतिहासिक सभ्यताओं वाले किले व स्थल। इसके अलावा प्राकृतिक और सांस्कृतिक धरोहर, सभी जिंदा धरोहर हैं। इंसान कभी अपने आप को किसी नदी से तो कोई किसी वृक्ष या पहाड़ को तो किसी पुरानी सभ्यता को अपना पूर्वज मानता है। हम किसी पुराने किले या खंडहर में जाते हैं तो उसे देखकर सिर्फ ईंट-गारे का मकान नहीं समझते बल्कि अपने पूर्वजों की जीवंत निशानियाँ ढूँढ़ते हैं और हमें मिलती भी हैं। परंतु कुछ कट्टरपंथी ताकतें और अनेकानेक स्वार्थी समूह सबको मटियामेट करने पर उतारू हैं।
हाल के वर्षों में इस्लामी युद्धोन्मादी आतंकवादियों ने मानवों के नरसंहार के साथ सबसे अधिक विध्वंस पूर्वजों की विरासत का किया है। पिछले दिनों आईएसआईएस के आतंकियों ने इराक के दूसरे बड़े शहर मोसूल के एक विशाल म्यूजियम जो तीन हजार साल पुरानी कलाकृतियों और सांस्कृतिक धरोहरों तथा वहाँ की पब्लिक लाइब्रेरी में मौजूद 8000 से अधिक किताबों को आग लगाकर यह कहते हुए मटियामेट कर दिया कि उसके लिए उन्हें पैगंबर मोहम्मद ने हुक्म दिया है। 2013 में जब माली के शहर टिंबकटु पर अलकायदा के चरमपंथियों ने कब्जा किया था तो सबसे पहले उन्होंने वहाँ की धरोहरों को समेटने वाले पुस्तकालय में आग लगा दी। यह वही लाइब्रेरी थी, जहाँ अफ्रीका की सबसे पुरानी किताबें रखी थीं, जिनमें इस विशाल महाद्वीप का इतिहास दर्ज था। वहाँ दुनिया की सबसे पुरानी कुरान में से एक भी रखी हुई थी।
अफगानिस्तान के बामियान में 2001 में तालिबान के आतंकवादियों ने बुद्ध की दो विशाल प्रतिमाओं को डायनामाइट के विस्फोट से उड़ाया था। छठी शताब्दी की ये प्रतिमाएँ गांधार कला का नमूना थी, जिन्हें पहाड़ को काटकर बनाया गया था। 1990 के दशक में ईरान में खुमैनी के कट्टर इस्लामी शासन के दौरान पारसी संस्कृति की विरासतों को तहस-नहस किया जाने लगा, इस विनाश में ढाई हजार साल पुरानी पारसियों के पूर्वज राजा सायरस की मूर्ति भी शामिल थी।
भारत में विक्रमशिला एवं नालंदा विश्वविद्यालय से लेकर पिछली सदी में ही भारत से अलग हुए दो इस्लामिक देशों ने वहाँ मौजूद हिंदू, बौद्ध एवं भारतीय संस्कृति-सभ्यता की निशानियों का जिस निर्ममता से चुन-चुन कर विनाश किया और कर रहा है, वह जगजाहिर है।
सिर्फ कट्टरपंथियों ने ही नहीं बल्कि अनेक स्वार्थी समूहों ने भी तथा सामान्य नासमझ नागरिकों ने भी अपनी मौज-मस्ती के लिए जिस तरह से अपने पहाड़ों, तमाम नदियों, वनों एवं अनेक ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक धरोहरों का विनाश एवं प्रदूशित कर नुकसान पहुँचाया है, सरकारी एजेंसियों ने भी होने दिया, उसी से मजबूर होकर न्यायालय ने यह कदम उठाया है।
यह कितना दुःखद है कि जो इंसान इतने संघर्षों के बाद सभ्यता के इस सोपान तक पहुँचा और आधुनिक होने में अपने आप को गौरवान्वित महसूस करता है। वही आज पीछे के सारे सोपानों एवं भवन की नींव को बड़ी बेरहमी से ढहा रहा है। क्या कोई यह दावे से कह सकता है कि कोई प्राचीन विश्वविद्यालय, पुस्तकालय, म्यूजियम, धार्मिक स्थल या प्राकृतिक नदी, पहाड़, जंगल सिर्फ किसी एक ही पंथ, समुदाय या वर्ग के मानने वाले लोगों के हैं? हम किस हैसियत से इसका विनाश कर रहे हैं? हमारी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य इसके बगैर कितना अंधकारमय होगा, क्या इन्हें इसका कुछ भान है? क्या हम इन धरोहरों के बगैर निपट नंगे, नितांत अकेले एवं शारीरिक व मानसिक रूप से रुग्ण नहीं होते जा रहे हैं?

यह पता करना हो तो घड़ी भर के लिए किसी पुराने म्यूजियम, किला या खंडहर में जाएँ, या किसी पुराने वृक्ष, नदी या पहाड़ की तलहटी में बैठकर सोचें तो महसूस होगा कि इसके बिना हम एक जिंदा लाश के सिवा कुछ नहीं हैं। किसी अदालत, संसद, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् या यूनेस्को द्वारा हमें यह बार-बार बताया जाना कि ये तुम्हारे माता-पिता, पुरखे हैं या या इन्हें भी एक इंसान की तरह जिंदा रहने का अधिकार है, यह हमारे सभ्य एवं आधुनिक इंसान होने पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न है।