Thursday, April 13, 2017

पुरखों के बगैर जीवन!
उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने गंगा-यमुना को इंसानी दर्जा यानी एक नागरिक होने का दर्जा दिया।  इन्हें सभी मैया और माँ तो कहते ही हैं और शुभ दिनों में इसके आगे शीश भी नवाते हैं, परंतु इनके साथ व्यवहार ठीक उसी तरह करते हैं, जैसे हमारे घरों के बेचारे बूढ़े-बुजुर्ग, जिनकी सारी संपत्ति, जीवन के सारे सृजन का उपयोग तो करते हैं, परंतु उनके साथ व्यवहार ऐसे करते हैं, मानो उनका कोई अस्तित्व ही नहीं बचा हो। भारत में हजारों ऐसे लोग हैं, जिन्हें सरकारी बाबुओं ने मृत घोषित कर दिया है और वे हर दफ्तर-दरवाजे अपने जिंदा होने का सबूत देते फिरते हैं, ताकि उन्हें भी एक सामान्य नागरिक होने की सारी सुविधाएँ मिलें। अच्छा हुआ, उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने गंगा और यमुना मैया को जीवित इंसान का कानूनी दर्जा दे दिया और एक लाचार व बेबस बुजुर्ग की भाँति उनका नोमनी भी यानी कानूनी अभिभावक नमामि गंगे मिशन के निदेशक, उत्तराखंड के मुख्यसचिव और उत्तराखंड के महाधिवक्ता को बना दिया। अब यही दोनों अधिकारी गंगा और यमुना के स्वास्थ्य और कुशलता का ध्यान रखने के लिए बाध्य होंगे।
इसके ठीक सप्ताह भर पहले न्यूजीलैंड की वांगानुई नदी को जिंदा इंसान होने का दर्जा वहाँ की संसद ने दिया। न्यूजीलैंड का माओरी आदिवासी समुदाय इस नदी को अपना पूर्वज मानता है। इसके लिए करीब डेढ़ सदी तक उन्होंने लगातार संघर्ष किया।
इसी माह संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने वैश्विक सांस्कृतिक धरोहर स्थलों पर सशस्त्र संघर्षों के खतरे के मद्देनजर इनकी सुरक्षा मजबूत करने का प्रस्ताव पारित करते हुए कहा कि अवैध तोड़-फोड़ करनेवाले अपराधियों को युद्ध अपराधों के मामले में अभियुक्त बनाया जा सकता है। इस प्रस्ताव में कहा गया है, ‘‘धर्म, शिक्षा, कला, विज्ञान एवं धमार्थ कार्यों के लिए बनी इमारतों एवं स्थलों या ऐतिहासिक स्मारकों पर अवैध हमले निश्चित परिस्थितियों में और अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार युद्ध अपराध के बराबर हो सकते हैं और इस प्रकार के हमले अपराधियों को न्याय के दायरे में लाया जाना चाहिए।’’ यूनेस्को विश्व की धरोहरों के संरक्षण के लिए लगातार प्रयासरत है।  
थोड़ा विस्तृत फलक पर देखें तो विश्व की सिर्फ एक-दो नदी नहीं बल्कि सारी नदियाँ, पहाड़, वृक्ष, स्थापत्य की इमारतें, जिसमें अनेक प्रकार के मूर्तिकारी, चित्रकारी, शिलालेख, गुफा, आवास एवं ऐतिहासिक सभ्यताओं वाले किले व स्थल। इसके अलावा प्राकृतिक और सांस्कृतिक धरोहर, सभी जिंदा धरोहर हैं। इंसान कभी अपने आप को किसी नदी से तो कोई किसी वृक्ष या पहाड़ को तो किसी पुरानी सभ्यता को अपना पूर्वज मानता है। हम किसी पुराने किले या खंडहर में जाते हैं तो उसे देखकर सिर्फ ईंट-गारे का मकान नहीं समझते बल्कि अपने पूर्वजों की जीवंत निशानियाँ ढूँढ़ते हैं और हमें मिलती भी हैं। परंतु कुछ कट्टरपंथी ताकतें और अनेकानेक स्वार्थी समूह सबको मटियामेट करने पर उतारू हैं।
हाल के वर्षों में इस्लामी युद्धोन्मादी आतंकवादियों ने मानवों के नरसंहार के साथ सबसे अधिक विध्वंस पूर्वजों की विरासत का किया है। पिछले दिनों आईएसआईएस के आतंकियों ने इराक के दूसरे बड़े शहर मोसूल के एक विशाल म्यूजियम जो तीन हजार साल पुरानी कलाकृतियों और सांस्कृतिक धरोहरों तथा वहाँ की पब्लिक लाइब्रेरी में मौजूद 8000 से अधिक किताबों को आग लगाकर यह कहते हुए मटियामेट कर दिया कि उसके लिए उन्हें पैगंबर मोहम्मद ने हुक्म दिया है। 2013 में जब माली के शहर टिंबकटु पर अलकायदा के चरमपंथियों ने कब्जा किया था तो सबसे पहले उन्होंने वहाँ की धरोहरों को समेटने वाले पुस्तकालय में आग लगा दी। यह वही लाइब्रेरी थी, जहाँ अफ्रीका की सबसे पुरानी किताबें रखी थीं, जिनमें इस विशाल महाद्वीप का इतिहास दर्ज था। वहाँ दुनिया की सबसे पुरानी कुरान में से एक भी रखी हुई थी।
अफगानिस्तान के बामियान में 2001 में तालिबान के आतंकवादियों ने बुद्ध की दो विशाल प्रतिमाओं को डायनामाइट के विस्फोट से उड़ाया था। छठी शताब्दी की ये प्रतिमाएँ गांधार कला का नमूना थी, जिन्हें पहाड़ को काटकर बनाया गया था। 1990 के दशक में ईरान में खुमैनी के कट्टर इस्लामी शासन के दौरान पारसी संस्कृति की विरासतों को तहस-नहस किया जाने लगा, इस विनाश में ढाई हजार साल पुरानी पारसियों के पूर्वज राजा सायरस की मूर्ति भी शामिल थी।
भारत में विक्रमशिला एवं नालंदा विश्वविद्यालय से लेकर पिछली सदी में ही भारत से अलग हुए दो इस्लामिक देशों ने वहाँ मौजूद हिंदू, बौद्ध एवं भारतीय संस्कृति-सभ्यता की निशानियों का जिस निर्ममता से चुन-चुन कर विनाश किया और कर रहा है, वह जगजाहिर है।
सिर्फ कट्टरपंथियों ने ही नहीं बल्कि अनेक स्वार्थी समूहों ने भी तथा सामान्य नासमझ नागरिकों ने भी अपनी मौज-मस्ती के लिए जिस तरह से अपने पहाड़ों, तमाम नदियों, वनों एवं अनेक ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक धरोहरों का विनाश एवं प्रदूशित कर नुकसान पहुँचाया है, सरकारी एजेंसियों ने भी होने दिया, उसी से मजबूर होकर न्यायालय ने यह कदम उठाया है।
यह कितना दुःखद है कि जो इंसान इतने संघर्षों के बाद सभ्यता के इस सोपान तक पहुँचा और आधुनिक होने में अपने आप को गौरवान्वित महसूस करता है। वही आज पीछे के सारे सोपानों एवं भवन की नींव को बड़ी बेरहमी से ढहा रहा है। क्या कोई यह दावे से कह सकता है कि कोई प्राचीन विश्वविद्यालय, पुस्तकालय, म्यूजियम, धार्मिक स्थल या प्राकृतिक नदी, पहाड़, जंगल सिर्फ किसी एक ही पंथ, समुदाय या वर्ग के मानने वाले लोगों के हैं? हम किस हैसियत से इसका विनाश कर रहे हैं? हमारी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य इसके बगैर कितना अंधकारमय होगा, क्या इन्हें इसका कुछ भान है? क्या हम इन धरोहरों के बगैर निपट नंगे, नितांत अकेले एवं शारीरिक व मानसिक रूप से रुग्ण नहीं होते जा रहे हैं?

यह पता करना हो तो घड़ी भर के लिए किसी पुराने म्यूजियम, किला या खंडहर में जाएँ, या किसी पुराने वृक्ष, नदी या पहाड़ की तलहटी में बैठकर सोचें तो महसूस होगा कि इसके बिना हम एक जिंदा लाश के सिवा कुछ नहीं हैं। किसी अदालत, संसद, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् या यूनेस्को द्वारा हमें यह बार-बार बताया जाना कि ये तुम्हारे माता-पिता, पुरखे हैं या या इन्हें भी एक इंसान की तरह जिंदा रहने का अधिकार है, यह हमारे सभ्य एवं आधुनिक इंसान होने पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न है।  

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