तार्किक एवं विवेकशील समाज के लिए
ऐसे समय में जब करीब-करीब पूरा उत्तर भारत एवं
हिंदी प्रदेश बाबा राम-रहीम के कुकर्मों की मिली सजा के बाद फैली हिंसा और ‘चोटीकटवा’ की
दहशत से गुजर रहा है, ऐसे समय पिछले महीने 24 जुलाई को आम आदमी के वैज्ञानिक माने जाने वाले प्रो. यशपाल का निधन हो
गया। अगर वे जिंदा एवं स्वस्थ होते तो मीडिया के सामने आते और जोरदार ढंग से सहज
तर्कशील वैज्ञानिक शिक्षा पर बल देते और अपने कंधों तक आती लंबी सफेद जुल्फों को
दिखाते हुए ललकार कर कहते कि ‘‘किसी चोटीकटवा में दम है तो
आकर मेरी चोटी काटकर दिखाए।’’ वे विविध कार्यक्रमों, अध्यापन एवं मीडिया के माध्यम से अनवरत पाखंडो, अंधविश्वासों
के विरुद्ध एक तर्कशील वैज्ञानिक समाज की स्थापना के लिए विविध स्तरों पर संघर्षरत
रहे।
हम एक ऐसे दौर से गुजर रहे हैं, जहाँ अनेक धार्मिक एवं
सांप्रदायिक समूहों के बीच वर्चस्व की लड़ाई चल रही है, जिसका
नतीजा है कि एक तरफ दुनिया सांप्रदायिक आतंकवाद एवं उन्माद की चपेट में है तो
दूसरी तरफ अंधविश्वासों की जकड़बंदी में अनेक तरह के ठग बाबा रोज पैदा हो रहे हैं
और गरीब-लाचार आम लोगों को फँसाकर नित नए तरीके अपनाकर अपना साम्राज्य खड़ा कर रहे
हैं। अनेक बाबा तो इस स्थिति में आ गए हैं कि खुलेआम हिंसा के माध्यम से सरकार एवं
शासन को चुनौती देने लगे हैं। इसी धंधे का बाइप्रोडक्ट कभी मुँहनोचवा, कभी मुड़कटवा, कभी खुनचुसवा तो कभी मंकीमेन और अब
चोटीकटवा नए अवतार में आता रहता है और अंधविश्वास का उर्वर धंधा हमेशा लहलहाता
रहता है।
आखिर क्या कारण है कि सारे मुँहनोचवा, चोटीकटवा या डायनप्रथा आदि
अशिक्षित-अनपढ़ गरीब-पिछड़े मुहल्लों एवं क्षेत्रों में ही देखने को मिलते हैं?
आखिर क्यों थक-हारकर लोग अपनी बीमारी के इलाज के लिए बाबाओं एवं
ओझाओं की शरण में जाते हैं? ऐसा इसलिए संभव होता है क्योंकि
ऐसे अधिकांश गरीब-निरीह लोगों को उनकी मामूली बीमारियों का भी सही समय पर समुचित
इलाज नहीं मिल पाता। प्राथमिक सरकारी अस्पताल और डॉक्टर पर्याप्त संख्या में हैं
नहीं। हाल ही में जो स्वास्थ्य मंत्रालय की एक रिपोर्ट आई है उसके अनुसार देश में 11528 लोगों के लिए एक सरकारी डॉक्टर उपलब्ध है। हिन्दी प्रदेशों की हालत तो और
भी बुरी है जहाँ 20,000 से ज्यादा लोगों के इलाज के लिए एक
डॉक्टर है, वह भी कितनी सेवा देता है वह राम ही जानें। जबकि
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार प्रत्येक 1000 लोगों पर एक
डॉक्टर का होना जरूरी है। प्राइवेट अस्पतालों की तरफ इलाज क्या, सर उठाकर उधर देखने तक की उनकी हिम्मत नहीं होती। नतीजा, पहले वे झोलाछाप डॉक्टरों से लुटते हैं। उनकी मामूली बीमारी बढ़कर खतरनाक
बनती रहती है और इसी दौरान अनेक मानसिक बीमारियों की चपेट में आते हैं। ऐसे हालत
में जो सर्वसुलभ सहज मार्ग उन्हें जहाँ खींच कर ले जाता है, वह
होता है कोई ओझा-तांत्रिक या पाखंडी बाबा की अंधीयारी गुफा जहाँ वे आजीवन
अंधविश्वासों और पाखंड के बीच पिसते हैं और ढोंगी बाबा लोग इनके बल पर रहनुमा बनकर
अय्यासी करते रहते हैं।
इससे बचने के लिए हर स्तर पर सरकार को सहज
सर्वसुलभ स्वास्थ्य सुविधाओं के साथ-साथ देश के हर गाँव से लेकर शहर तक सभी
प्राथमिक पाठशालाओं में प्रारंभ से ही वैज्ञानिक एवं विवेकवादी शिक्षा का आधार
तैयार करना होगा। यह सुनिश्चित करना होगा कि जब हर शिशु इस अद्भुत दुनिया की ओर
आश्चर्य से भावविभोर होकर देखता है और हर तरफ वह प्रश्नांकित नजरों से देखना
प्रारंभ करता है। इसके पहले कि कोई इस ब्रम्हांड की रचना में अनेक प्रकार के
सांप्रदायिक एवं जातिवादी करिश्माई सिद्धांतों को उनके कोमल दिमाग में ठूंसे, उन बच्चों को डार्विन के क्रमिक
विकासवाद के सिद्धांत को सहज एवं सरल तरीके से उसके दिमाग में तह-दर-तह बिठा दिया
जाना चाहिए। सरल शब्दों में, क्रमिक विकासवाद के अनुसार इस
पृथ्वी को इस रूप में आने में करोड़ों वर्ष लगे जो कि किसी गॉड, ईश्वर या पराशक्ति के हाथों रातो-रात बनाए का परिणाम नहीं बल्कि क्रमिक
विकास का परिणाम है। क्रम-विकास एक मन्द एवं गतिशील प्रक्रिया है, जिसके फलस्वरूप आदि युग के सरल रचना वाले जीवों से अधिक विकसित जटिल रचना
वाले नए जीवों की उत्पत्ति हुई है। जीव विज्ञान में क्रम-विकास किसी जीव की आबादी
की एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी के दौरान जीन में आया परिवर्तन है। यह प्रक्रिया नई
प्रजातियों के उद्भव में परिणत होती है।
जब हर बच्चा सारी उत्पत्ति को उपरोक्त ज्ञान की
कसौटी पर कसने लगेगा तो वह अपने धर्म को भी बेहतर तार्किक तरीके से समझने का
प्रयास करेगा। आखिरकार प्रारंभ में धर्म एवं विभिन्न संप्रदाय का उद्भव भी तो मानव
जीवन को सभ्य, सामाजिक
एवं सहज-सरल बनाने के लिए हुआ था। यह अलग बात है कि आगे चलकर हर धर्म के स्वार्थी
लोगों एवं समूहों ने अपने निजी हित के लिए इसका दुरुपयोग किया जिसके कारण आज सभी
संप्रदायों में अंधविश्वासी जड़तावादी लोगों का बोलबाला है, जो
प्रश्न एवं तर्क करने वालों से कोसों दूर भागते हैं। अगर प्रारंभ से ही तार्किक
आधार मजबूत हो जाए तो कोई कुरीति एवं अंधविश्वास उन्हें मार्ग से डिगा नही पाएगा
और अंधविश्वास, पाखंड एवं आतंकवादी हिंसा की दुकानें अपने-आप
बंद हो जाएंगी। वही धर्म एवं संप्रदाय टिकेंगे, जो विवेकवाद,
तर्क एवं नैतिकता की कसौटी पर खरे उतरेंगे।
अगर इन सबको रोकना है तो पूरे देश में एक समान
तार्किक एवं वैज्ञानिक सोच पर आधारित शिक्षा केन्द्र एवं प्राथमिक स्वास्थ्य
केन्द्र की मजबूत बुनियाद रखनी पड़ेगी, क्योंकि एक अशिक्षित एवं बीमार दिमाग में ही
अंधविश्वासों और पाखंडों को फलने-फूलने का निर्बाध अवसर मिलता है। एक विवेकशील
समाज बनाकर ही हम डॉ. यशपाल और धार्मिक पाखंड के विरुद्ध आजीवन लोहा लेने वाले
चार्ल्स डार्विन को सच्ची श्रद्धांजलि दे पाएंगे।
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