Thursday, November 23, 2017

खिचड़ी के सर्वसमन्वयी भाव का हो विस्तार
किसी देश की संस्कृति को वहाँ का खान-पान, वस्त्राभूषण, रहन-सहन, साहित्य-संगीत-कला, पर्व-त्योहार एवं आवास-यातायात के साधनों को देखकर बखूबी समझा जा सकता है। भारत में सदियों से ही विश्व की अनेक दिशाओं से लोग आते रहे और यहाँ की संस्कृति में रच-बसकर समाते चले गए। आनेवाले जहाँ एक-तरफ यहाँ की संस्कृति को अपनाते रहे, वहीं अपने साथ लाई संस्कृति से इसे समृद्ध भी करते रहे। यही कारण है कि हमारे देश में अनेक धर्म, जातियां, भाषा, खान-पान, अनेक प्रकार के वस्त्राभूषण एवं यातायात के साधन अस्तित्व में हैं। हमारी यह विविधता बाहर के लिए आश्चर्य की और हमारे लिए गर्व का विषय है। इसे हम सर्वसमावेशी यानी खिचड़ी संस्कृतिभी कहते है।
खिचड़ी पिछले दिनों एक प्रमुख राष्ट्रीय मुद्दा तब बन गई, जब समाचारों में यह आया कि मोदी सरकार खिचड़ी को राष्ट्रीय भोजन घोषित करने वाली है। अनेक लोग समर्थन में आए तो कुछ विरोध में भी। वह तो समय रहते केंद्रीय खाद्य प्रसंस्करण मंत्री हरसिमरत कौर ने यह कहकर विवाद को समाप्त किया कि विश्व खाद्य मेला 2017’ के अवसर पर खिचड़ी को एक पौष्टिक आहार के रूप में पेश कर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय बनाने का प्रयास किया जाएगा, न कि इसे राष्ट्रीय भोजन घोषित किया जाएगा।
खिचड़ी एक ऐसा खाद्य पदार्थ है, जिसे अनेक तरह से, स्थानीय उपलब्धता के अनुरूप अनेक अनाजों, दालों एवं सब्जियों को मिलाकर बनाते हैं। यह विभिन्न तरह से अलग-अलग क्षेत्रों एवं पसंद के हिसाब से बनाया जाता है। ज्यादातर लोग चावल-दाल को स्वादानुसार मसालों के साथ उबालकर पकाते हैं। लेकिन अगर कोई इसमें कुछ और भी मिलाना चाहे तो उसकी पूरी गुंजाइश होती है। यह सभी को अपनी-अपनी पसंद, परंपरा और अपने स्वाद को अभिव्यक्त करने की पूरा अवसर उपलब्ध कराती है।
खिचड़ी जिस तरह सर्वसमावेशी, स्वास्थ्यवर्द्धक एवं सुस्वादु है, अगर उसी तरह संस्कृति एवं आम जनों के जीवन से जुड़े सभी सार्वजनिक सेवा माध्यम भी हो जाएं तो हमारा समाज और भी सुंदर, स्वस्थ एवं सुसंस्कृत हो सकता है। उदाहरणस्वरूप हम सार्वजनिक यातायात के साधनों को ही ले सकते हैं, खासकर भारतीय रेल, जो कि देश के हर हिस्से को सांस्कृतिक, सामाजिक एवं आर्थिक रूप से जोड़ती है। परंतु इसमें कमी यही है कि यह आर्थिक हैसियत के आधार पर लोगों में भेद-भाव करती है। एक तरफ जहाँ अमीर लोगों के आगे यह सुविधाओं का अंबार लगा देती है, वहीं गरीब साधनहीन लोगों को अत्यंत नारकीय स्थिति में यात्रा करने को मजबूर करती है। परंतु दिल्ली मेट्रो रेल ने बीच का ऐसा रास्ता निकाला, जिसमें गरीब और अमीर एकसाथ सफर करने को मजबूर हो गए। इसके कारण जहाँ एक तरफ पर्यावरण को संरक्षण मिल रहा है, वहीं आर्थिक एवं सामाजिक दूरियों को पाटने का भी काम रहा है। दिल्ली में बड़े अधिकारी एवं अमीर भी मेट्रो में सफर करते धक्के खा रहे थे। हाँ, आम लोगों की तरह देखते हुए हिकारत की भावना अभी भी थी, उन्हें कई बार गरीब मजदूरों और साधारण लोगों के साथ चलने में अपनी सत्ता और अमीरी के दंभ के कारण परेशानी होती थी। कभी-कभी उबल भी पड़ते थे। उसी तरह गरीब मजदूर और साधारण लोग भी साथ-साथ चलते हुए कुछ सहमते, हिचकते साथ ही स्वच्छता और नफासत के साथ व्यवहार करना सीख रहे है। ऐसा करने के लिए उन्हें मेट्रो की कार्यप्रणाली ने सबको मजबूर किया है।
परंतु पहले मई में और फिर चार महीने बाद ही दिल्ली मेट्रो कॉरपोरेशन ने हर स्तर पर किराया सीधे दोगुना कर दिया। गरीब मजदूरों की तो बात ही क्या की जाए, विधार्थियों एवं निम्न-मध्यम दर्जे के वेतनभोगी आदमी के लिए भी अब मेट्रो में सफर करना मुश्किल हो गया। पहले जहाँ वैशाली से नेहरू प्लेस एक तरफ से 20 रुपया लगता था, अब बढ़कर सीधे पचास रुपया हो गया। ओखला जानेवाले को 60 रुपया इस तरह एक सामान्य मजदूर या कर्मचारी के लिए प्रतिदिन कम से कम सौ से लेकर दो सौ रुपये (रिक्शा, ऑटो या पार्किंग मिलाकर) खर्च बैठ रहा है। मजदूर या कर्मचारी, जो 10 से 20 हजार तक की वेतन पाता है, यह बोझ कहाँ से सहन कर पाता। नतीजा यह हुआ कि फिर से लोग बसों और अपने जंग लगते बाईक, स्कूटर आदि लेकर सड़कों को पहले से हथियाए रइसों की बड़ी-बड़ी कारों के पीछे रेंगने के लिए मजबूर हो गए।
किराया दुगुना बढ़ाने के लिए मेट्रो की यह दलील हजम करने लायक नहीं है कि उसे नुकसान हो रहा था, क्योंकि इसके सारे आंकड़े यही बताते रहे हैं कि लगातार यात्रियों के बढ़ने से मेट्रो फायदे में चल रही थी। परंतु किराया बढ़ाने के बाद यह साफ नजर आ रहा है कि उसके यात्रियों की संख्या में भारी गिरावट आई है। गरीब और निम्न मध्यम वर्ग के लोग इससे कटते जा रहे हैं। मेट्रो के लिए भी यह कदापि फायदे का सौदा नहीं है, भले ही आज वह इस बात को आंकड़ों के माध्यम से सार्वजनिक नहीं कर रही है।
दिल्ली मेट्रो के नीति-नियंता भले ही किराया बढ़ाकर खुश हो रहे हों, परंतु उन्हें नहीं भूलना चाहिए कि ऐसा कर वे मेट्रो को उसी खास वर्ग की सवारी बना रहे हैं जिसके पास सुविधाओं का अंबार है। जिनकी बड़ी-बड़ी गाड़ियों के आगे दिल्ली की सड़कें हर समय भरी रहती हैं। ऐसा न हो कि जाम में फंसा निम्न वर्ग दूर से जिस तरह सड़क पर बड़ी-बड़ी खाली कारों को देख-देख कर कुढ़ता रहता है, उसी तरह खाली मेट्रो को आते-जाते टकटकी लगाकर देखता रहे और दिल्ली भीड़ और प्रदूषण से कराहती रहे।
किसी भी सरकार का प्रयास यही होना चाहिए कि वह ऐसी नीति बनाये कि सार्वजनिक यातायात के माध्यम से जहां लोगों को प्रदूषण से छुटकारा मिले, वहीं सामाजिक एवं आर्थिक रूप से विभिन्न जातियों, धर्मों और वर्गों में बंटे हमारे समाज को कम से कम सफर के दौरान आपसी दूरियां कम हों, एक दूसरे को समझें-सीखें, ताकि सामाजिक लोकतंत्र को मजबूती मिले। सब जानते हैं कि नुकसान के साथ मेट्रो नहीं चल सकती परंतु किराया बढ़ाने का एक न्यायसंगत तरीका होना चाहिए ताकि सभी वर्ग के लोग इसे खुशी-खुशी वहन कर सकें। पुष्टिकारक, सुस्वादु खिचड़ी के सर्वसमन्वयी भाव को देश के यातायात के सभी साधनों में भी बढ़ावा देने की जरूरत है, इससे समाज और देश ज्यादा स्वस्थ, सुंदर और जनतांत्रिक बनेगा। 

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