Tuesday, June 6, 2017

लालबत्ती के स्याह पक्ष
आजादी के बाद देश के संविधान और कानून ने लोकतांत्रिक सरकार और शासन के हाथ में सत्ता का प्रकाश-स्तंभ इसलिए थमाया कि अब तक दरिद्रता, अशिक्षा, बीमारियों, अंधविश्वासों तथा अनेक प्रकार के जाति, धर्म, वर्ण और वर्गों के आधार पर विभेदकारी नीतियों के कारण हाशिए पर जीने को मजबूर लोगों के घरों और मनों में जड़ जमाए स्याह अँधेरे से मुक्ति और सुराज मिले। वह भी आलोकित होकर बिना अटके, बिना भटके देश की प्रगति और विकास की यात्रा में शामिल हो जाए। परंतु दुःखद स्थिति यह हो गई कि जिन्हें यह जिम्मेदारी दी गई, वही पहले अपने और अपने परिवार के लिए भरपूर रोशनी की व्यवस्था करने लगे; उसके बाद ऐसे लोगों को जो सदा से प्रकाशित थे, उन्हें ही गलत ढंग से हर क्षेत्र में निर्बाध रूप से आगे बढ़ने के भरपूर अवसर दिए जाने लगे। ऊपर से कोढ़ में खाज यह कि सत्ताधारी वर्ग सत्ता-सुविधा की भरपूर चमक-दमक के अतिरिक्त अपने सिरों पर लालबत्ती भी लाद ली।  परिणाम यह हुआ कि सदियों से अँधेरों में रोशनी की तलाश में बिलबिलाता समाज इस लाल रक्तिम रोशनी के भय से और दूर होता हुआ अंधकूप में समाता चला गया।
ऐसे समय में जनता का चौकीदार और जनता के प्रधानसेवक बनने के वादे से शासन में आनेवाले प्रधानमंत्री और केन्द्र सरकार का लालबत्ती हटाने समेत और अन्य कई फैसलों से एक आशाजनक  संकेत मिल रहा है। यह निश्चय ही जनतांत्रिक मूल्यों के पक्ष में केंद्र सरकार का एक ऐतिहासिक फैसला है कि एक मई से किसी भी गाड़ी के ऊपर लाल बत्ती नहीं होगी। यों कोई व्यवस्था कितनी भी जनतांत्रिक और समतावादी हो, शीर्ष पदों पर आसीन व्यक्तियों को कुछ विशिष्ट अधिकार हासिल होते हैं, इसी के अनुरूप उन्हें विशेष सुविधाएँ भी मिली होती हैं। इसका आमतौर पर बुरा नहीं माना जाता। परंतु सातवें दशक से मंत्रियों और नेताओं का सुरक्षा संबंधी तामझाम बढ़ने लगा और लालबत्ती लगी गाड़ियों का दायरा भी। यहाँ तक कि मंत्री और अधिकारियों के परिवार और रिश्तेदार तक बेधड़क इसका दुरुपयोग कर सब पर रोब गाँठते दिखाई पड़ने लगे।
यूरोप के कई देशों के प्रधानमंत्री आज भी साइकिल पर चलना पसंद करते हैं, जिनमें नॅार्वे नीदरलैंड्स, ब्रिटेन आदि के प्रधान मंत्री, मंत्रीगण, सांसद तथा अनेक विशिष्टजन शामिल हैं वे सार्वजनिक लोकल ट्रेनों एवं बसों में आम लोगों के साथ बड़े सहज ढंग से यात्रा करते हैं। इसके उलट हमारे देश में शिवसेना के सांसद रवींद्र गायकवाड़ जैसे अनेक महानुभाव हैं, जो साठ साल के बुजुर्ग विमानसेवा कर्मचारी की चप्पलों से धुनाई यह कहते हुए कर देते हैं कि एक कर्मचारी उन्हें यह याद दिलाने की गुस्ताखी कैसे कर सकता है कि उड़ान में बिजनेस क्लास नहीं है। वह भला साधारण लोगों की तरह कतार में लगने और आम दर्जे में यात्रा कैसे कर सकते हैं? बेशर्मी की हद तो तब हो जाती है कि इसके कारण संसद में भी इनके दल द्वारा कई दिनों तक अवरोध पैदा किया जाता है।
यह लालबत्ती वाली मानसिकता सिर्फ गाड़ी की बत्तियों तक सीमित नहीं है बल्कि शासन के हर स्तर और हर क्षेत्र में दिखती रही है। चाहे शिक्षा को लें, स्वास्थ्य सुविधाओं को लें, यातायात व्यवस्था को ले लें या फिर अन्य कोई सामान्य से सामान्य नागरिक सेवा। शिक्षा के क्षेत्र में आम नागरिकों के बच्चों के लिए सरकारी स्कूलों का हाल यह है कि न तो ढंग के शिक्षक उपलब्ध हैं न ही अन्य सुविधाएँ जबकि मंत्रियों, सरकारी अधिकारियों एवं अमीरों के बच्चों के लिए संस्कृति स्कूल, पांचसितारा सुविधाओं से युक्त अनेक पब्लिक स्कूलों से लेकर विदेशों तक की शिक्षा सहज उपलब्ध है। स्वास्थ्य के क्षेत्र में और भी बुरा हाल है। आम गरीब मामूली बीमारी होने पर समय पर सही इलाज नहीं मिलने के दर-दर की ठोकरें खाकर मरने को मजबूर होता है जबकि सरकार और शासन तथा अमीरों के लिए सरकारी अस्पताल से लेकर अनेक मंहगे अस्पताल उनकी सेवा में चौबिसों घंटे तत्पर रहते हैं। यातायात के साधनों में भी हर जगह वीआईपी लालबत्ती मानसिकता हावी है। जहाँ विशिष्ट लोगों के लिए पैसे एवं मुफ्त कोटे पर आराम की सारी सुविधा उपलब्ध हैं वहीं आमजनों को जानवरों से भी बदतर हालात में जान को जोखिम में डालकर यात्रा करनी पड़ती है।
आशा है, सरकार एवं शासन के कर्ता-धर्ता अब हर स्तर पर जनता से जुड़ी मौलिक जरूरतों के साधनों के द्वार सहज ढंग से खोलेंगे और अपने कर्तव्य, जिसे सत्ता के माध्यम से उन्हें संविधान और कानून नें सौंपा है उसका निर्वहन करेंगे। आगे जल्द से जल्द पूरे देश में ऐसी व्यवस्था होगी कि सबके लिए समान स्कूल की व्यवस्था होगी, जिसमें साधारण व्यक्ति के घरों के बच्चों के लेकर सत्ता के शिखर पर बैठे व्यक्ति के बच्चे एक साथ पढ़ें, सभी व्यक्तियों को सहज और समान जरूरत के अनुरूप स्वास्थ्य सेवाएँ मिलंे।
हमारे यातायात के साधनों का भी जनतांत्रिकीकरण हो। दिल्ली मेट्रो इसका बहुत बढ़िया उदाहरण है। यह सभी वर्ग के लोगों को संग-साथ चलना सिखा रही है। ऐसा करने के लिए उन्हें मेट्रो की कार्यप्रणाली ने उनको मजबूर किया है। जहाँ तक सुविधाओं की बात है तो गरमी, सर्दी से बचाव और सुरक्षित माहौल किस इंसान की जरूरत नहीं है? संग-साथ चलने का यही फार्मूला कुछ बडे स्तर पर भारतीय रेल एवं अन्य साधनों में भी क्यों नहीं अपनाया जा सकता है? जहां सामान्य और विशिष्ट सभी संग साथ होकर एक ही तरह की सामान्य सुविधाओं का प्रयोग करते हुए चलें। इसके लिए राजनीतिक एवं सामाजिक मानस में बदलाव की आवश्यकता है।
प्रधानमंत्री, उनकी केबिनेट, तथा कई मुख्यमंत्रियों ने कुलीन मानसिकता की प्रतीक लालबत्तियों को गाड़ियों से हटाने की जो मुहिम छेड़ी है, उसके प्रतीकात्मक, सकारात्मक महत्त्व से इंकार नहीं किया जा सकता। परंतु यह मुहिम तभी अपना मुकाम हासिल कर पाएगी जब सेवाओं एवं सामान्य आधारभूत मौलिक जरूरतों तक सबकी बिना भेद-भाव के सहज और समान, निर्बाध भागीदारी सुनिश्चत होगी। तभी देश को लालबत्ती के स्याह पक्ष से मुक्ति मिलेगी और सही मायने में सुराज स्थापित होगा।
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