दो ‘अतियों’
के बीच
यह कैसी विडंबना है कि इस बार के बारहवीं के
नतीजों में दो प्रमुख राज्यों में एक गुजरात, जो कि आधुनिक व्यवसाय, उद्योग
एवं प्रबंधन में अगुआ राज्य है। दूसरा बिहार, जिसका इतिहास
शिक्षा, ज्ञान, दर्शन एवं अध्यात्म में
पूरे विश्व का अगुआ रहा है तथा वर्तमान में पूरे भारत के लिए नौकरशाही तथा सरकारी
कर्मचारी पैदा करने में प्रथम पंक्ति में है। इस वर्ष के बारहवीं के नतीजों में
दोनों जगहों पर सर्वोच्च स्थान पाने वालों की दिशा बिल्कुल विपरीत रही। इतनी
विपरीत कि एक को आप आकाशीय या आध्यात्मिक कह सकते हैं तो दूसरे को निजी स्वार्थ
एवं कदाचार-भ्रष्टाचार में लिप्त बिल्कुल रसातल में जाता पातालीय। दोनों में अगर
समानता है तो सिर्फ यही कि दोनो में से किसी ने भी सर्वोच्चता की कामना नहीं की
थी। जाहिर है, जब कामना नहीं की तो दोनों इस व्यापक सामाजिक
जीवन से जुड़कर इसके पथप्रदर्शक भी न बन सकतेे। एक खुद ही इसे ठुकराकर, दुनियावी मोहमाया से मुक्त होकर संन्यासी बन गया तो दूसरा गोरखधंधे से
लादी गई सफलता के बोझ तले दबकर मुजरिम बन जेल पहुँच गया।
गुजरात माध्यमिक और उच्चतर शिक्षा बोर्ड की
परीक्षा में 99.99 प्रतिशत अंक हासिल करने वाले अहमदाबाद के 17 वर्षीय वर्शिल शाह
अब जैन संत बन गए हैं। वर्शिल ने संवाददाताओं को बताया, मैंने उच्च अंक हासिल किए,
लेकिन मैं उस आम रास्ते पर नहीं चलना चाहता, जहाँ
पैसे वाले पेशे के पीछे भागते हैं। मेरा लक्ष्य आंतरिक एवं आध्यात्मिक शांति और
प्रसन्नता हासिल करना है। यह तभी संभव है, जब मैं सबकुछ
छोड़कर जैन संत बन जाऊँ। वर्शिल की माता अमिबेन शाह और पिता जिगरभाई आयकर अधिकारी
हैं। वे खुश हैं कि उनके बेटे ने यह रास्ता चुना।
इस बार बिहार की 12वीं की परीक्षा में गणेश
कुमार ने 82.6 प्रतिशत अंक हासिल करके टॉप किया। परंतु फर्जीवाड़े के आरोप में
पुलिस ने गणेश कुमार को गिरफ्तार कर लिया। शक की वजह यह कि गणेश कुमार ने अपनी
उम्र 24 साल बताई, जबकि
17-18 की उम्र वाले बच्चे इस क्लास में होते हैं। वह झारखंड के गिरिडीह से परीक्षा
देने के लिए समस्तीपुर आया था। इसके साथ ही वह हार्मोनियम भी नहीं बजा पाया था,
जबकि उसको संगीत के प्रैक्टिकल में 70 में से 65 अंक मिले थे। इस
फर्जीवाडे का पता पुराने रिकॉर्ड्स से लगा। बिहार स्कूल एक्जामिनेशन बोर्ड (ठैम्ठ)
ने बताया कि, गणेश ने 1990 में गिरिडीह से मैट्रिक और 1992
में झुमरी तलैया से 12वीं की परीक्षा दी थी। दोनों ही बार उसकी सेकेंड डिवीजन आई।
दोनों बार के एडमिट कार्ड पर उसने अपनी जन्मतिथि सात नवंबर, 1975
बताई थी। इसके बाद उसने 2015 में फिर से दसवीं की परीक्षा दी। तब उसकी जन्मतिथि दो
जून, 1993 लिखी गई थी।
इन दो अतियों के बीच तीसरा मध्य मार्ग, जिसपर कि समाज और राष्ट्र का
पूरा दारोमदार है, जिसे हम रीढ़ की हड्डी कह सकते हैं,
उसकी सही मायने में प्रतिनिधित्व सीबीएसई के बारहवीं के नतीजों में
पूरे भारत में सर्वोच्च स्थान प्राप्त करने वाली 17 वर्षीय रक्षा गोपाल करती है।
नोएडा के एमिटी इंटरनेशनल स्कूल में पढ़ने वाली रक्षा गोपाल ने 99.6 फीसदी अंकों के
साथ पूरे देश में टॉप किया है। रक्षा को तीन विषयों अंग्रेजी, राजनीतिशास्त्र और अर्थशास्त्र में सौ-सौ नंबर मिले हैं। इतिहास और
मनोविज्ञान में उसे 99-99 अंक मिले।
रक्षा पढ़ाई के अलावा पियानो बजाती है और वह
साहित्य की शौकीन है। वह फ्रेंच सीख रही है। अब वह आगे पॉलिटिकल साइंस की पढ़ाई
करना चाहती है और सिविल सेवा में जाना चाहती है। रक्षा अपनी कामयाबी का श्रेय अपने
माता-पिता और स्कूल के शिक्षकों को देती है। रक्षा के पिता गुजरात स्टेट
पेट्रोलियम कॉरपोरेशन में वित्त अधिकारी हैं, माँ गृहिणी हैं। रक्षा के पिता कहते हैं कि उन्हें
अपनी बेटी पर भरोसा था कि वह अच्छे नंबर लाएगी, लेकिन पूरे
भारत में टॉप करेगी, यह उन्होंने नहीं सोचा था। हमने अपनी
बेटी से यही कहा कि मन लगाकर पढ़ो और नंबरों की परवाह छोड़ ज्ञान जुटाते रहो।
सिद्धार्थ बुद्ध बनने के लिए घर-गृहस्थी, राज-सिंहासन का मोह छोड़कर ज्ञान
की खोज में उरुवेला पहुँचकर घोर तपस्या करने लगे। पहले तो सिर्फ तिल-चावल, फिर निराहार। छः साल बीत गए। शरीर सूखकर काँटा हो गया, फिर भी ज्ञान की प्राप्ति नहीं हुई। एक दिन कुछ ग्रामीण स्त्रियाँ लोकगीत
गाती हुई जा रही थीं। उसका अर्थ था, ‘वीणा के तारों को ढीला
मत छोड़ दो। उनका सुरीला स्वर नहीं निकलेगा। पर तारों को इतना कसो भी मत कि वे टूट
जाएँ।’ बात उन्हें जँच गई। इसके पहले वे राजमहल के अति
भोग-विलास में डूबा जीवन भी जी चुके थे। वे मान गए कि नियमित सामान्य आहार-विहार
से ही योग सिद्ध होता है। मध्यम मार्ग पर चलकर उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई। वे
भगवान बुद्ध बन भारतीय धर्म और समाज व्यवस्था में क्रांतिकारी बदलाव के अग्रदूत
बने।
गुजरात और बिहार के दोनों टॉपर दो अतियों का
प्रतिनिधित्व करते हैं। वर्शिल आध्यात्मिक एवं आंतरिक शांति के लिए संन्यास का
चोला पहन जैन मुनि बन गया। यानी मुख्यधारा के सामाजिक जीवन से पलायन कर गया। वह अब
जो भी करेगा सिर्फ निजी आत्मिक आनंद के निमित्त ही करेगा। दूसरा बिहार के गणेश
कुमार ने दो-दो बार उम्र घटाकर मैट्रिक एवं इंटर की परीक्षा सिर्फ इसलिए दी कि वह
सिर्फ एक सरकारी बाबू बन सके। यह सिर्फ उसकी बात नहीं है, बिहार-झारखंड में बहुत से ऐसे
लोग हैं, जो सालों से ऐसा करते आ रहे हैं। ऐसे लोग सिर्फ
सरकारी बाबू ही नहीं बल्कि इंजीनियर, डॉक्टर और अधिकारी तक
बनकर समाज पर बोझ बन बैठे हैं। गणेश कुमार जैसे लोगों को समाज-हित से कुछ मतलब
नहीं है, येन-केन-प्रकारेण सिर्फ अपना जीवन सुखी हो जाए,
यही ध्येय होता है।
लेकिन इन दो अतियों के मध्य ‘रक्षा गोपाल’ भी है, जो साहित्य, संगीतकला,
भाषाशास्त्र, राजनीतिशास्त्र में पारंगत होकर
भारतीय सिविल सेवा से जुड़ना चाहती है। अपने बहुमुखी ज्ञान और प्रतिभा का इस्तेमाल
अपने देश-वासियों की दैनिक समस्याओं के समाधान में करना चाहती है। यह समझने की
आवश्यकता है कि वृहत्तर समाज के सुख से होकर ही निजी भौतिक और आध्यात्मिक सुख का
रास्ता जाता है। रक्षा गोपाल जैसी बहुविध प्रतिभाओं की हमारे देश और समाज को बहुत
जरूरत है।
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