Wednesday, May 2, 2018


विभाजन नहीं, विविधता चाहिए
जनतंत्र में चुनाव ही वह मौका होता है, जब मतदाता सत्ताधारी दल और विपक्षी दलों का हिसाब-किताब लेते हैं। वादों एवं विकास के मुद्दों पर उन्हें घेरते हैं और अपनी जरूरतों, उनकी घोषणाओं एवं संकल्पों पर संवाद करते हैं। कर्नाटक में विधानसभा चुनाव होने वाला है। पिछले पाँच सालों से मुख्यमंत्री सिद्धारमैया की कांग्रेस सरकार विकासात्मक कार्यों की डींगें हाँकती रही, मगर चुनाव के ठीक पहले ऐसी विभाजनकारी नीतियों को हवा दे दी है जो समाज, राज्य और देश के लिए घातक सिद्ध होने वाली हैं। उन्होंने सबसे पहले कर्नाटक राज्य के अलग झंडे की वकालत करते हुए केन्द्र सरकार को इसे मान्यता देने की माँग की, दूसरा लिंगायत समाज को हिन्दू धर्म से अलग धर्म की मान्यता देकर उसके लिए अल्पसंख्यक दर्जे की सिफारीश की।
लिंगायत शिव के उपासक हैं। इसकी स्थापना 12वीं सदी के समाज सुधारक और दर्शनशास्त्री संत बसवेश्वर के द्वारा हुई थी। संत बसवेश्वर का काल सभी तरह की संकीर्णताओं से आक्रांत था। बसवेश्वर बीच-बाजार और चौराहे के संत थे। वे आम जनता से अपनी बात पूरे आवेग और प्रखरता के साथ करते थे। जाति रहित समाज की स्थापना करने और भेदभाव तथा छुआछूत मिटाने के लिए उन्होंने ऊँची जाति ब्राम्हण कन्या रत्नाका विवाह नीची जाति के दलित, अस्पृश्य शीलवंतनामक युवक से करवाया। जिसका मूल्य उन्हें अपने सबसे प्रिय शिष्य के बलिदान से चुकाना पड़ा था। उन्होंने उसी काल में आदर्श संसद (अनुभव मंडप) का निर्माण किया था, जिसमें पुरुष और महिलाएँ तथा समाज के सभी वर्ग एवं जाति के लोगों की समान संख्या में भागीदारी थी। वे खुले वातावरण में बहस को प्रोत्साहित करते थे, जिसका रूप आज हमें संसदीय लोकतंत्र के रूप में देखने को मिलता है।
8वीं शताब्दी में दक्षिण भारत में जो अनेक भक्ति आंदोलन हुए, वहीं से लिंगायत समाज का उद्भव माना जाता है। लिंगायत यदा-कदा खुद को हिन्दू धर्म से अलग धर्म की मान्यता देने की माँग करते आये हैं। उनकी अपनी अलग पहचान को मुश्किल बनाता है उनमें और वीरशैव में समानता। हिन्दू धर्म में वीरशैव एक शैव समाज है। इसके अनुयायियों का मानना है कि संत बसवेश्वर लिंगायत समाज के संथापक नहीं, बल्कि एक समाज सुधारक थे, जो वीरशैव का हिस्सा है। वीरशैव जहाँ वेद और जाति व्यवस्था मानते थे, वहीं लिंगायतों ने शुरू से ही वेदों और जाति व्यवस्था को चुनौती दी।
हिन्दू धर्म को अनेक विद्वान अंग्रेजी के रिलीजन के अर्थ में धर्म न मानकर इसे हिन्दू संस्कृति की मान्यता देते हैं। सदियों से इसके अंदर से अनेक संप्रदाय बनते रहे, संग-संग पलते रहे, यहाँ तक कि एक दूसरे के विरुद्ध संघर्ष भी करते रहे, फिर भी एकमेव रहे। इस धर्म की खासियत ही सुधार के लिए संघर्ष, संवाद और सहअस्तित्व है। इस धर्म के लचीले स्वरूप में जब भी जड़ता की स्थिति निर्मित हुई, तब कोई न कोई महापुरुष ने आकर इसे गतिशीलता प्रदान कर इसकी सहिष्णुता को एक नई आभा से मंडित कर दिया। इस दृष्टि से प्राचीनकाल में बुद्ध और महावीर के द्वारा, मध्यकाल में शंकराचार्य, संत बसवेश्वर, गुरुनानक और चैतन्य महाप्रभु के माध्यम से तथा आधुनिक काल में राजा राम मोहन राय, स्वामी दयानन्द, स्वामी विवेकानन्द, महात्मा ज्योतिबा फुले, महात्मा गांधी तथा बाबा भीमराव अंबेडकर आदि अनेक सुधारकों के द्वारा किए गए प्रयास इस धर्म की धरोहर बन गए।
हिन्दू धर्मदर्शन में अनेक मत, संप्रदाय, धारा एवं वाद बनते रहे और इसकी उदारता से खुले आगोश में पुनः समाते चले गए। इसके अंदर वैष्णव, शैव तथा स्मृति हैं। वैष्णवों के अंदर अनेक उपसंप्रदाय हैं, जैसे वल्लभ, रामानंद आदि। उसी तरह शैव के अंदर दसनामी, नाथ, शाक्त आदि। सभी संप्रदाय एवं उपसंप्रदाय एक दूसरे से टकराते रहे हैं, फिर भी हिन्दू धर्म का हिस्सा बने रहे हैं। इसके अलावा चार्वाक का लोकायत दर्शन भी इसी धर्म का हिस्सा रहा है, जो न तो ईश्वर को मानता है और न ही किसी पूजा विधि को। दैहिक या भौतिक सुख ही इस दर्शन की सबसे बड़ी विशेषता है।
ऐसे में क्या चुनाव से ठीक पहले वोट की राजनीति के लिए कोई मुख्यमंत्री या सरकार हिन्दुओं को विभाजित कर नया धर्म बनाएगी? चुनावी फायदे के लिए कुछ सरकारी सुविधाओं का चारा डालकर उसे अल्पसंख्यक या पिछड़ा घोषित करेगी? क्या उनकी सरकार इसी तरह बौद्ध धर्म के संप्रदाय हीनयान, महायान, वज्रयान तथा नवयान को; जैन धर्म के दिगंबर और श्वेतांबर को; इस्लाम धर्म के शिया और सुन्नी को; ईसाइ धर्म के प्रोटेस्टैंट और रोमन कैथोलिक को पिछड़े का दर्जा देने के लिए अलग धर्म के तौर पर मान्यता देगी? उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश एन. संतोष हेगड़े ने सिद्धरमैया सरकार की आलोचना करते हुए कहा कि ‘‘किसी समुदाय को धर्म का दर्जा देने का काम सरकार का नहीं है। भारत के संविधान के तहत धर्मनिरपेक्ष सरकार है, वह किसी समुदाय के आंतरिक मामले में हस्तक्षेप करने का काम नहीं कर सकती।’’
इससे पहले सिद्धरमैया सरकार ने कन्नड़ लोगों की अस्मिता के नाम पर राज्य मंत्रिमंडल ने अलग झंडे को मंजूरी देकर गेंद केंद्र के पाले में डाल दी थी। लेकिन गृह मंत्रालय ने इसे खारिज करते हुए कहा कि झंडा कोड के तहत सिर्फ एक झंडे को मंजूरी दी गई है। इसलिए एक देश का एक झंडा ही होगा। जम्मू-कश्मीर का मामला अपवाद है, क्योंकि उसके लिए संविधान में अलग व्यवस्था है।
सवाल है कि चुनाव करीब आते ही उन्हें अलग लिंगायत समुदाय और कन्नड अस्मिता की चिंता क्यों सताने लगी? इसके पहले भी अनेक दल अनेक जाति एवं धर्म के लोगों को जो आरक्षण के दायरे में नहीं आते हैं, उनके सामने भी आरक्षण का चुग्गा डालकर वोट की फसल काटते रहे हैं। परंतु चुनाव के बाद यही वादे उनके गले की फाँस बनकर पूरे देश में जातिवादी हिंसा व नफरत का माहौल तैयार करते रहे हैं। हमारा समाज इतने सारे धर्मों, संप्रदायों, उपसंप्रदायों, जातियों, उपजातियों गोत्रों, कुलों और मूलों की अनन्त शृंखलाओं से बँधा है कि इसे जबरन छेड़ना हिंसा और अराजकता को ही न्योतना होगा। हर किसी को देश की विविधता में एकताका सम्मान करना चाहिए, न कि विभाजनकारी नीतियों को हवा देकर इसमें दरार पैदा करने का काम करना। बेहतर हो कि विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और नागरिक सुरक्षा जैसे सवाल हमारे चुनावों के मुख्य मुद्दे बनें। हमें विविधताओं से भरा भारत चाहिए, विभाजित भारत नहीं।



संसद में संवाद नहीं!
लोकतंत्र की संसदीय प्रणाली में संसद को देश की राजनीतिक, सामाजिक  आर्थिक व बहुविध आंतरिक व बाह्य स्थितियों का दर्पण माना जाता है, यानी संसद में पूरे देश के मुद्दों एवं हलचलों का प्रतिबिंब दिख जाता है कि देश किन परिस्थितियों से गुजर रहा है। परंतु लगातार कुछ वर्षों से संसद के बनावटी हुड़दंग और हंगामे को देखकर यही लगता है कि हमारे चुने गए प्रतिनिधियों को या तो जनता की अपेक्षाओं या आकांक्षाओं की समझ नहीं है या वे जानबूझकर किसी स्वार्थी हित के हाथों जनतंत्र व संसद की मर्यादा को मटियामेट कर रहे हैं। इसकी झाँकी इस महत्त्वपूर्ण बजट सेशन में देखने को मिल रही है, जिसमें विरोधी दलों द्वारा इस कदर हंगामा किया जा रहा है कि अनेक जरूरी विधेयकों एवं कार्यों की बात अगर छोड़ भी दें, यहाँ तक कि देश के भविष्य को तय करने वाला बजट तक लोकसभा में बिना कोई चर्चा-बहस के पारित हो गया। हद तो तब हो गई, जब इराक के मोसुल में आईएसआईएस के हाथों चार साल पहले बेरहमी से मारे गए 39 भारतीयों की पूरी जानकारी विदेश मंत्री सुषमा स्वराज लोकसभा में देना चाह रही थीं तो उन्हें बोलने तक नहीं दिया गया।
लोकसभा ने बिना चर्चा के ही वित्त विधेयक और विनियोग विधेयक 2018 को मंजूरी दे दी। इससे पहले विभिन्न मंत्रालयों और विभागों की 99 माँगों को गिलोटिन के जरिये मंजूरी दी गई। हाल के वर्षों में शायद यह पहला मौका है, जब पूरा बजट बिना चर्चा के लोकसभा में पारित हुआ हो। बजट को बिना बहस के पारित होना देश और लोकतंत्र के लिए उचित नहीं है। बजट सिर्फ आमदनी और खर्च का ब्योरा भर नहीं होता बल्कि पिछले वर्षों की शासकीय वित्तीय कार्यनीतियों और उसकी खामियों की समीक्षा, सुधार एवं सुझावों का दस्तावेज एवं देश के भविष्य का दिशा-निर्देश भी होता है। संसद सदस्यों, खासकर विपक्षी सदस्यों से यह अपेक्षा रहती है कि इसके हर पहलू का गहराई से अध्ययन एवं विश्लेषण कर इसके अंदर छुपे अनेक अव्यक्त प्रावधानों एवं तथ्यों को जोरदार बहस के माध्यम से उजागर करें, सरकार को घेरें एवं सुधार व जवाबदेही के लिए मजबूर कर दें। सरकार कई बार अपने दलीय हित या अनेक दवाब समूहों के फायदे के लिए बजट में दबे-छुपे कुछ ऐसा प्रावधान कर जाती है, जो देश के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है। परंतु यह कितना दुःखद है कि वित्तीय वर्ष की समयसीमा तथा विपक्षी सदस्यों की अनावश्यक अलोकतांत्रिक हुल्लड़बाजी में वित्त एवं विनियोग विधेयक यों ही बिना बहस के पारित हो गया।
एक दूसरा अत्यंत दुःखदायी विषय, विदेश मंत्री सुषमा स्वराज इराक के मोसुल से अगवा हुए 39 भारतीय नागरिकों की मौत की जानकारी लोकसभा में दे रही थीं, किंतु कांग्रेस के सांसदों द्वारा किए जा रहे अनावश्यक हंगामे के कारण वे पूरी जानकारी नहीं दे पायीं। असफल रहने पर उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा कि, ‘‘कांग्रेस ने मौत पर ओछी राजनीति की सारी हदें पार कर दीं, कांग्रेस पार्टी ने लोकसभा काररवाई को उस समय बाधित क्यों किया गया, जब मुझे इराक में मारे गए 39 भारतीयों की जानकारी देनी थी?’’ बयान के दौरान लोकसभा में कांग्रेस द्वारा हंगामे का नेतृत्व कांग्रेस के ज्योतिरादित्य सिंधिया ने राहुल गांधी के इशारे पर किया और लोकसभा अध्यक्ष द्वारा बार-बार आग्रह करने के बावजूद सिंधिया के नेतृत्व में कांग्रेस सदस्यों का शोर-शराबा जारी रहा। प्रेस कॉन्फ्रेंस में विदेश मंत्री ने बताया कि मृतकों में पंजाब के 27 लोग, हिमाचल के 4, बिहार के 6 और बंगाल के 2 लोग शामिल हैं।
इराक के मोसुल में 39 भारतीय कामगारों के जीवित होने की जिस झीनी-सी संभावना पर सैकड़ों विवश परिजनों की उम्मीद टिकी थी, वह एक झटके में टूट गई। यह त्रासदी चार साल पहले घटित हुई, पर उसकी पुष्टि अब हुई। काम की तलाश में दूसरे देश जाकर समूह में आतंकियों के हाथों मारे जाने से दुःखद कुछ नहीं हो सकता, लेकिन मौत के करीब चार साल तक उनके बारे में पता न चल पाना तो और भी दुर्भाग्यपूर्ण था। इस मामले में भारत सरकार चाहकर भी बहुत कुछ नहीं कर सकती थी। आईएस के कब्जे के दौरान मोसुल में जब इराक सरकार की ही पहुँच नहीं थी, तो बाहरी देशों की बात ही क्या? मोसुल के आईएस के कब्जे से मुक्त होते ही हमारी सरकार उनकी तलाश में सक्रिय हुई। रडार की मदद से एक गाँव के टीले पर सामूहिक कब्र का पता चला और निकाले गए शवों के डीएनए टेस्ट से मिलान कराने के बाद उनके भारतीय होने की पुष्टि हुई।
सबसे बड़े लोकतंत्र के प्रतिनिधि हे महानुभावो! अगर बजट और वित्त विधेयक जैसे महत्त्वपूर्ण दस्तावेज भी बिना आपकी बहसों के ही पारित हो जाते हैं। चार वर्षों से आशा और निराशा के भँवर में गोते खाते उन सैंकड़ों परिवारों तक 39 लोगों की निर्मम हत्या की पुष्ट खबर पहुँची, तब भी आपकी अंतरात्मा नहीं जगी। आपसे तो आशा थी कि सारी दलीय कटुता को परे रखकर तत्काल इस हत्या के पीछे के कारणों की चर्चा करते, सरकार की नीतियों में कोई खामी है तो उसे उजागर कर ऐसी घटनाओं के निवारण के लिए मजबूर करते। परंतु चर्चा-संवाद की तो बात ही दूर, आपने तो मंत्री महोदया को पूरी बात ही कहने नहीं दी। जिनके अवशेष के रूप में सिर्फ हड्डिया, उनके कड़े, केश, कंघे, जूते, कपड़े उनकी सुरक्षा के लिए माताओं, बहनों और पत्नी द्वारा बाँधे गऐ गंडे-ताबीज ही अवशेष बचे हैं, उनकी आत्मा की शांति के लिए तथा उनके आश्रित-पीड़ित परिवारों के गहरे घावों पर मरहम लगाने के लिए आपलोगों ने दो मिनट की मौन श्रद्धांजलि देना भी उचित नहीं समझा। वे बेचारे 25 से 30 हजार रुपये महीना कमाने के चक्कर में उस बियाबान में दरिंदों के हाथों निर्ममता से मारे गए और आपलोग जनता की गाढ़ी कमाई के करोड़ों रुपये हंगामे की भेंट प्रतिदिन चढ़ा रहे हैं। आप पर अगर इन दुखियारों की पीड़ा का भी असर नहीं हो रहा तो जनतंत्र के इस संप्रभू मंदिर में चुनकर आए महानुभावो, एक बार सोचिए, आप किसका प्रतिनिधित्व कर रहे हैं? हो सकता है, आप जिन मुद्दों पर बाधा उत्पन्न कर रहे हैं, वह भी महत्त्वपूर्ण हो, परंतु उसका भी समाधान तो वाद-प्रतिवाद-संवाद और नीति-निर्माण से ही निकलेगा न। फिर संसद में संवाद और संवेदनशीलता की जगह हंगामा क्यों?



Friday, March 9, 2018


रोबोट का गौरैया प्रेम
फिर आ गया 20 मार्च, यानी विश्व गौरैया दिवस। सूचना एवं संचार माध्यमों में फिर से गौरैया के संरक्षण और उसके संवर्द्धन के बारे में खुब चर्चा-परिचर्चा होगी; अखबार, पत्र-पत्रिकाओं में लेख छपेंगे। फेसबुक एवं व्हाट्सएप पर गौरैयों की सुंदर-मनमोहक तस्वीरों एवं चीं-चीं करती, करतब दिखाती उसके विडियो के संग लाखों-करोड़ों की संख्या में संदेश भेजे जाएंगे। परंतु इन सबसे अनभिज्ञ गौरैया महानगरों एवं शहरों से लगातार पलायन करते हुए कहीं सुदूर क्रमशः घटते प्राकृतिक वन-प्रांतर में मिटती, सिमटती, विलुप्ति के कागार पर पहुँचती जाएगी।
सिर्फ गौरैया की बात क्या करें, मार्च महीना है, फगुआया मन है, बसंत अपने शबाब पर है। परंतु अभी तक कानों में कोयल की एक भी कूक सुनाई नहीं पड़ी। जबकि मैं मोबाइल का इयर फोन भी नहीं लगाता और पेड़-पौधों एवं पार्कों से होकर ऑफिस आते-जाते ज्यादा से ज्यादा पैदल चलता हूँ। मेरा ऑफिस भी चारों तरफ से घने वृक्षों से भरे पार्कों के बीच है। इतनी चेतावस्था रहने के बावजूद कोयल की कूक सुनाई नहीं पड़ी है। इसका मतलब यह है कि इस बसंत में भी बहुत कुछ मिलावट हो गई है। उस बसंत का क्या मतलब, जिसमें कोयल की कूक न हो, चहुँदिशी पीले-पीले फूलों से लदे पेड़-पौधे न हांे, आमों में मंजरी न दिखाई पड़े, नवसृजन के लिए विसर्जन यानी पतझड़ और फिर फूटते कोंपल अगर दिखे नहीं तो फिर काहे का वसंत?
गौरैया, कोयल ही नहीं, देखते-देखते गिद्ध का अस्तित्व भी समाप्तप्राय है, जबकि यह पक्षी अत्यंत विपरीत परिस्थितियों में भी जीवित रह सकता है। गिद्ध एक मृतोपजीवी पक्षी है, जो भोजन के लिए केवल मृत पशुओं पर निर्भर रहता है। इस तरह वह वातावरण के लिए कुशल एवं प्राकृतिक सफाईकर्मी है। इसका पाचनतंत्र इतना मजबूत होता है कि यह रोगाणुओं से परिपूर्ण सड़ा-गला मांस भी पचा सकता है। वह हमारे पर्यावरण एवं मानव जीवन को अनेक प्रकार के संक्रामक रोगों को फैलने से रोककर हमें बचाता है। 90 के दशक से पहले लगभग 40 लाख गिद्ध भारत में थे, जो लगभग 12 लाख टन सड़े-गले मांस को वार्षिक दर से समाप्त किया करते थे। परंतु पिछले दशकों में 99 प्रतिशत गिद्धों की आबादी समाप्त हो गई। जाँच के दौरान पाया गया कि मवेशियों के दर्द निवारण के लिए दी जाने वाली दवा में प्रयोग होने वाली रसायन डाइक्लोफेनेकइसके लिए जिम्मेदार है। इस दवा की रसायन पशुओं के मरने के बाद भी उसके शव में उपस्थित रहती है। इस तरह उसे खाते ही गिद्ध डाइक्लोफेनेक की विषाक्तता से समाप्तप्राय होता गया।
मनुष्य की बढ़ती असीम लालसा, उसकी शिकारी प्रवृत्ति और गिद्धदृष्टि ने एक ऐसी डिजीटल रोबोट सभ्यता को जन्म दिया है, जिसको किसी पारिस्थितिक संतुलन, जैव विविधता या वासंती बहुरंगी उत्सवलीला की आवश्यकता नहीं है। वह सिर्फ हिज मास्टर वॉयसबनकर चलायमान है। यह कृत्रिम बुद्धि वाला जानवर बहुत चुपके से हमारे जीवन में प्रवेश कर चुका है। कहा जा रहा है कि जल्द ही कार्यालयों में अनुवादकों, सचिव और क्लर्कों की जगह रोबोट ले लेगा। रोबोट कई मामलों में हमारे डॉक्टरों, इंजीनियरों और वैज्ञानिकों से भी बेहतर साबित हो सकते हैं। क्या पता, कल वह एक अच्छा डायरेक्टर, प्रशासक, विचारक, समाजशास्त्री, दार्शनिक और लेखक-संपादक भी हो। लेकिन यह कृत्रिम दिमाग जब जीवन के हर क्षेत्र में तैनात हो जाएगा तब क्या होगा? हम यह अनुमान नहीं लगा सकते कि यह कृत्रिम बुद्धि (रोबोट) कहाँ तक पहुँचेगी। महान वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग को लगता है कि यह आगे चलकर मानव सभ्यता के लिए खतरा साबित होगी। दार्शनिक बासट्राम को भी कहा है कि इस कृत्रिम दिमाग में इतनी क्षमता होगी कि यह मानव सभ्यता का ही सफाया कर सकती है।
आज हर तरफ दिख रहा है कि हम एक पोस्ट ह्यूमन यानी उत्तर मानव युग की ओर जा रहे है। एक ऐसा युग जहाँ मानव तो होगा परंतु हम रोबोट के गुलाम भर होंगे, वह जैसे नचाएगा हम वैसा नाचेंगे। हम जिस तरह से अपने सारे कार्य कंप्यूटरों एवे डिजीटल माध्यमों के हवाले करते जा रहे हैं वह दिन दूर नहीं है जब यह भस्मासुर अपने निर्माता के ही सर पर हाथ रखकर उसे भस्मीभूत करेगा। उसकी बानगी आज हर तरफ दिख तो रही है। नहीं दिख रही तो जरा कानों से इयर फोन हटाकर और मॉनिटर एवं मोबाइल से नजरें परे कर देख लीजिए, क्या आपको गौरैया की चीं-चीं आस-पास सुनाई पड़ रही है? क्या कोयल इस बसंत में कूक रहा है? क्या हमारे आयातित वृक्षों के बनावटी पार्को एवं जंगल में बसंती हवा झकोंरे मार रही है?  
भारत जैव विविधता से परिपूर्ण देश है। जहाँ पूरे विश्व का 8 प्रतिशत जैव विविधता वाला भाग मौजूद है। सभी प्राणी एक दूसरे से खाद्य शृंखला द्वारा जुड़े हैं। आज विश्व में कई पशु-पक्षी, जंगली प्रजातियाँ एवं विविध पेड़-पौधे या तो विलुप्त हो गए या उनका अस्तित्व संकट में है। पहले मानव नें अपनी असीम पिपाशाओं की पूर्ति के लिए पूरी पारिस्थितिकी का संतुलन बिगाड़ा। खुद अपने गाँव, घर-आँगन छोड़कर महानगरों में कबूतर के दड़बेनुमा अनेक मंजिली अट्टालिकाओं में कैद हुआ। उसी में बनावटी बोनसाई पौधे लगाए। वहीं पिंजरों में चिड़िया-तौते को पाला। वह यह भूल गया कि ऐसा करते हुए वह खुद भी स्वतंत्र व्यक्तित्व से गिरकर एक बोनसाई विचार का यानी बौना व्यक्तित्व बनता गया है। वह यहीं नहीं रुका और ज्यादा से ज्यादा सुख-सुविधा के लिए तिलस्मी डिजीटल दुनिया का गुलाम बनता गया। इसका ताजा उदाहरण सऊदी अरब है, जिसके हुक्मरानों ने महिलाओं को स्वतंत्र व्यक्तित्व नहीं माना और उन्हें अधिकांश स्वतंत्र नागरिक के मौलिक अधिकारों से मरहुम रखा, परंतु एक रोबोट रोबोट सोफियाको अपने देश की नागरिकता प्रदान कर यह सुनिश्चत किया है कि उसे वह सब अधिकार मिले जिसके लिए वहाँ की महिलाएं सदियों से तरसती रहीं।
मानव सिर्फ नन्हीं जीव गौैरैया ही नहीं खो रहा है बल्कि पूरी जैव विविधता, मानवीय प्रवृत्तियों- आचार-व्यवहार, नैतिकता एवं संवेदनाओं को खोते हुए खुद एक मशीनी पुतले यानी रोबोट में तब्दील होता जा रहा है। इस रोबोट मानव को असली गौरेया, कोयल, गिद्ध और बसंत से कोई मतलब नहीं है। यह विश्व गौरैया दिवस पर ट्वीटर, व्हाट्सएप, फेसबुक आदि के माध्यम से लाखों-करोड़ों गौरैया के फोटो, विडीयो युक्त बनावटी संवेदना-संदेश भेज देगा और बस...!   



Thursday, February 8, 2018


सिरफिरेपन से कैसे मिले निजात?
सत्य और तथ्य यही है कि सिरफिरापन एक घातक मानसिक बीमारी है। यह जब महज एक आदमी तक ही सीमित होता है, तब भी बड़ा विनाशकारी होता है और मुश्किल से काबू में आता है। वही जब संस्थागत, जातिगत, धर्मगत या समाजगत हो जाए तो पूरे समाज, देश और उससे भी आगे पूरी प्रकृति एवं मानवता के लिए घोर विध्वंसकारी होता है। सिरफिरेपन की यह बीमारी सदियों से चली आ रही है परंतु दुःख की बात यह है कि हम ज्यों-ज्यों अपने आप को ज्यादा सभ्य और आधुनिक बनने और बनाने का दंभ भरते हुए आगे बढ़ते रहे, तब से स्थिति ज्यादा खतरनाक और जटिल होती गई।
नये साल के प्रारंभ में हरियाणा के पलवल में आधी रात को लोहे का पाइप लेकर निकले पूर्व सैनिक नरेश धनकड़ ने छह मासूम लोगों की पीट-पीट कर हत्या कर दी। पुलिस टीम उसे पकड़ने पहुंची तो उसने पुलिस पर भी हमला कर दिया। दिल्ली के बुराड़ी इलाके में खुदकुशी का एक अजीबोगरीब मामला सामने आया। यहाँ मकान के दूसरे माले से छलांग लगाकर एक शख्स नवदीप ने अपनी जान दे दी। वह स्वीडन से पढ़कर दिल्ली आया हुआ था। जान देने से पहले नवदीप लाइफ आफ्टर डेथविषय से संबंधित सामग्री पढ़ रहा था। वह इंटरनेट पर यह खंगाल रहा था कि सेकेंड फ्लोर से कूदने से क्या वाकई जान जा सकती है? राजकोट (गुजरात) के एक युवक संदीप ने अपनी माँ जयश्रीबेन की छत से फेंककर हत्या कर दी। उसने ऐसा इसलिए किया, क्योंकि उसके मुताबिक उसकी माँ बूढ़ी हो गई थी और बीमार रहने लगी थी। दिल्ली में ही रहकर आई.ए.एस. की तैयारी कर रही एक पीसीएस अधिकारी लड़की ने 31 दिसंबर की रात को पंखे से लटककर इसलिए आत्महत्या कर ली कि उसे अपने कील- मुहांसों से जल्दी निजात नहीं मिल पा रही थी। पिछले दिनों केरल का एक युवक अब्दुल मनफ सीरिया में मारा गया, वह उस आइएसआइएस में शामिल था। जो पूरी दुनिया को एक कट्टर इस्लाम में तब्दील करने के लिए मौत और विध्वंस का तांडव कर रहा है। अब्दुल मनफ ने भी इसी में भर्ती होकर मृत्यु (आत्महत्या) को चुना। ऐसे आत्महंता प्रवृत्ति के उदाहरण इन दिनों बहुतेरे हैं।
संस्थागत सिरेफिरेपन की बात करें तो हाल के दिनों के ही ढेरों उदाहरण हैं, जिसमें अनेक बाबा, जिसमें संत गुरमीत राम-रहीम, बाबा वीरेंद्र देव दीक्षित, केरल के तिरुवनंतपुरम के एक चर्च के पादरी फादर देवराज, लखनऊ के खदीजतुल कुबरा लिलबनातमदरसे के संचालक कारी तय्यब जियाजैसा व्यक्ति धर्म, अध्यात्म, शिक्षा, समाजसेवा की आड़ लेकर भोले-भाले लोगों को वर्षों से ठगता रहा। स्त्रियों एवं मासूम बच्चियों को अपना हवस का शिकार बनाता रहा। विरोध करनेवालों की वह निर्ममता से हत्या करवाता रहा। सरकार और कानून को ठेंगा दिखाता रहा और न्यायालय के आदेश पर घिर जाने के बाद पूरे राज्य को दंगा और हिंसा में झोंकने का भरपूर प्रयास किया।
पूरी दुनिया को झुलसा रहा यह आतंकवाद किसी सिरफिरे के दिमाग की ही तो उपज है, जो यह मानता है कि मेरी कौम या संप्रदाय ही दुनिया का असली धर्म है और बाकी सभी का विश्वास बकवास है, उसे इस धरती पर रहने का कोई अधिकार नहीं है। इसी तरह नस्ल, रंग, लिंग और जातिवाद  अपनी तथाकथित काल्पनिक महानता के आगे किसी को भी जगह देने को तैयार नहीं है। पिछले एक साल के दौरान हमारे देश में ही जाति के नाम पर जिस तरह खुलेआम सड़कों पर हिंसा का तांडव किया गया और जानमाल एवं सार्वजनिक संपत्तियों का नुकसान किया गया, वह सिरफिरेपन की अति है।
मनुष्य अपनी प्रकृति से एक मेहनती एवं सरल स्वभाव का प्राणी है। आदिकाल में जब इसे आग मिल गई तो इसने बेकार की हिंसा से मुक्ति पा ली और सामूहिक जीवन की ओर बढ़ा। जब अनाज  और फल मिल गए तो शिकारी जीवन को त्यागकर कृषक और गृहस्थ जीवन को अपना लिया। घर- परिवार, नाते-रिस्तेदारी और सामाजिक-सामुदायिक जीवन की ओर अग्रसर हुआ, जिससे उसे अपनी प्रकृति के अनुरूप सुकून और सहज जीवन मिला। हमारी सभ्यता की प्रगति का आख्यान सहयोग और सामाजिकता का है। परंतु निजी दंभ, लोभ और लोलुपता ने स्थिति को जटिल से जटिलतर बना दिया। विश्वास और सहयोग की जगह सौदा, समझौता और धोखेबाजी ने ले ली।
यह सिरफिरापन नहीं है तो क्या है जिसके कारण हमने विकास के लिए एक ऐसा मार्ग चुना, जिसमें सिर्फ अपना निजी सुख और उपभोग ही सर्वोपरि है। आज दुनिया की अधिकांश जनसंख्या शुद्ध हवा और पानी के लिए तरस रही है। हमारी सदानीरा नदियां नालों में, हर-भरे जंगल, पहाड़ वीरान और इसमें पलने वाले पक्षी एवं जीव-जंतु विलुप्ति के कागार पर पहुंच गए। इस उपभोगवादी जीवनपद्धति के शिकार धर्म, विज्ञान, अध्यात्म और नैतिक मूल्य हो गए और इसके प्रतिनिधि के रूप में ऐसे ठग और ठेकेदार पैदा कर दिए, जो बाजारवादी उपभोगवादी जीवन को बढ़ावा देने के लिए सबका दुरुपयोग करने लगे। इसी का परिणाम है कि मानव को मुक्ति का मार्ग दिखाने वाला धर्म आतंकवाद का, अध्यात्म पाखंड का और विज्ञान विनाश का पर्याय होता गया। आज एक सामान्य आदमी भय, आतंक और अविश्वास के साये में जी रहा है। सहारे और सहयोग की डोर में हर जगह गांठंे ही गांठंे पड़ गई हैं।
सिरफिरापन एक गंभीर मानसिक बीमारी है, जिसके लिए अनेक तत्व जिम्मेदार हैं, जिसमें आनुवंशिकी, पालन-पोषण, उसके घर-परिवार, रिस्तेदारी, समाज, धर्म, शासन-व्यवस्था, आर्थिक स्थिति, शिक्षा एवं देश-काल की परिस्थितियां एवं पर्यावरण मुख्य रूप से जिम्मेदार होते हैं। निजी सिराफन अब सामूहिक पागलपन में तब्दील हो चुका है। स्थिति इतनी भयावह हो गई है कि विधा के मंदिर में किशोर और मासूम बच्चे मामूली डांट पर अपनी प्रधानाध्यापिका तक कि हत्या, सिर्फ स्कूल में छूट्टी भर कराने के लिए सातवर्षीय नौनिहाल की बेरहमी से गला रेतकर हत्या, ककहरा सीखने के उम्र में कहीं यौन हिंसा के आरोप का दंश झेल रहा है तो कहीं उसका शिकार हो रहा है।
जब सारी परिस्थितियाँ अनुकूल हों तो कोई मनोचिकित्सक किसी सिरफिरे का इलाज आसानी से कर सकता है। परंतु सामूहिक पागलपन का इलाज भी सामूहिक करना पड़ेगा, ऐसी परिस्थितियाँ पैदा करनी पडेगी, जिसमें व्यक्ति सहज रूप से अपने घर-परिवार, रिस्तेदारी, समाज और पर्यावरण के संग विश्वास, सहयोग और सहअस्तित्व के साथ रह सके। परंतु वैश्विक बाजारवादी तंत्र के मोहजाल में फंसी दुनिया में क्या यह संभव होगा?

Wednesday, January 3, 2018

लोभ और लाभ की लाइलाज बीमारी
दुनिया में ऐसी कोई बीमारी नहीं, जिसका इलाज अगर हमारी मेडिकल साइंस, सरकार और समाज चाह ले तो नहीं हो सके, सिवाय लोभ और लाभ नामक बीमारी के। यह एक ऐसा वायरस है, जो बड़ी तीव्र गति से हमारी व्यवस्था को ग्रस रहा है। यह दबे पांव पहुँचकर जिम्मेदार व्यक्ति, संस्था, और सरकार की बीमारियों से मुकाबला करने वाली आंतरिक रोग प्रतिरोधक क्षमता को ही नष्ट-भ्रष्ट कर देता है। इसका शिकार निरीह सामान्य जन जब समाज और सरकारी संस्थाओं की तरफ आशा से टकटकी लगाकर देखता है, पता चलता है कि वह खुद भी इसी वायरस से ग्रसित हो, इस लोभ और लाभ का सहभागी बन सिर्फ घड़ियाली आसूँ बहा रहा है। इस तरह लोभ और लाभ का व्यापार निर्विघ्न चलता जा रहा है।
विगत दिनों गुड़गाँव के फोर्टिस अस्पताल ने डेंगू के असफल इलाज के बाद मृतक बच्ची के परिजनों से शव देने के पूर्व अनाप-शनाप सोलह लाख रुपये का बिल अदा करने की माँग की। दिल्ली के शालीमार बाग स्थित मैक्स अस्पताल ने पहले तो जुडवां नवजातों को, जिसमें एक उस समय जीवित था, मृत घोषित कर उनके शव को पैककर उनके परिजनों को सौंप दिया। पहले डॉक्टरों ने आइसीयू में रखने के लिए भारी-भरकम खर्च बताया, परिजनों द्वारा इतना खर्च उठाने पर असमर्थता जताने पर कुछ देर बाद ही जिंदा बच्चे को भी मृत घोषित कर उन्हें सौंप दिया। एक अन्य मामले में नोएडा मैक्स अस्पताल खोड़ा कॉलोनी में रहकर नोएडा में एक प्राइवेट नौकरी कर रहे मनोज की मृत्यु के उपरांत पाँच दिनों तक वेंटिलेटर पर रखकर बिल बढ़ाता रहा और बिल पाँच लाख तक पहुँचा दिया, पूरा पैसा परिजनों द्वारा नहीं चुका पाने के कारण उन्हें लाश तक नहीं सौंपी गयी। नोएडा के ही निओअस्पताल के बारे में इंडियन मेडिकल एसोसिएसन के डॉक्टरों की टीम ने जाँच में यह पाया कि अस्पताल ने मरीज पर अपने ही मेडिकल स्टोर से ब्रांडेड दवा खरीदने के लिए गैरकानूनी तरीके से दबाव डालकर लाखों रुपये का बिल बनाया और एडवांस पैसे कि लिए भर्ती मरीज के घर बाउंसर भेजता है।
ऐसे मामले उन अनेकों मामलों में से एक हैं, जो पूरे देश में रोज घटित हो रहे हैं। यह तो दिल्ली और उसके आस-पास का मामला है, जो मीडिया में कुछ देर के लिए ही सही जगह पा जाता है, नहीं तो यह गोरखधंधा तो राजधानियों से लेकर जिलों, कस्बों, गाँवों तक दिन दूनी रात चौगुनी गति से खूब फल-फूल रहा है। ये निजी अस्पताल न केवल अनेक तरह के अनावश्यक ऑपरेशन करने, अनावश्यक दवाइयों के दस गुने-बीस गुने दाम वसूलने, मरे हुए मरीजों को भी कई दिनों तक वेंटिलेटर पर रखकर बिल बढ़ाते जाने, यहाँ तक कि किडनी रैकेट और मानव अंगों की तस्करी तक में भी शामिल हैं।    
आंकड़े बताते हैं कि आज भी देश में इलाज पर लोग अपनी क्षमता से बाहर 70 फीसदी खर्च करने को मजबूर हैं। केन्द्र सरकार ने अब स्वास्थ्य पर 2.5 फीसदी खर्च का लक्ष्य रखा है, लेकिन 2002 में भी नीति बनाते वक्त 2010 तक इसे 2 फीसदी करने का लक्ष्य रखा था, लेकिन आज भी यह खर्च 1.2 फीसदी तक ही है। विश्व स्वास्थ्य सूचकांक में भारत का स्थान 188 देशों में 143वाँ है। भारत, स्वास्थ्य पर अपनी जीडीपी का सिर्फ 1.2 प्रतिशत व्यय करता है। जबकि अमेरिका का 8.3 प्रतिशत, चीन 3.1 प्रतिशत और दक्षिण अफ्रीका 4.2 प्रतिशत। दशकों से लगातार स्वास्थ्य सेवा को किनारा कर दिए जाने के कारण हमारी सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था इतनी भ्रष्ट और जर्जर होती गई कि इस क्षेत्र में निजी डॉक्टरों, व्यवसायियों, बिल्डरों, झोलाछाप नीम-हकीम डॉक्टरों और तथाकथित तांत्रिक बाबाओं तक को लोगों का खून पीने के लिए खुला मैदान मिल गया।   
भारतीय जनता पार्टी नें 2014 के आमचुनाव में अपने घोषणापत्र में यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज (यूएचसी) का वादा किया था। देश के हर नागरिक को प्राथमिक से हर स्तर की सभी जरूरी स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराना ही यूएचसी है, जिसमें सबको समय पर सहज, सुलभ और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सुविधा मिल सके। इसके लिए केन्द्र सरकार ने दर्जनों एम्स खोलने से लेकर दवाइयों एवं इलाज में काम आने वाले जरूरी सामानों का उचित मूल्य निर्धारण के लिए कई कदम उठाने की घोषणा कर उसके अनुपालन का प्रयास कर रही है। परंतु यह यूएचसी के लिए नाकाफी है। यूएचसी का लक्ष्य कब तक पूरा होगा, कोई समय सीमा तय नहीं है। तो सवाल है कि कब तक लोग निजी अस्पतालों के हाथों लूटते और मरते रहेंगे? लांसेट के एक अध्ययन के मुताबिक, स्वास्थ्य पर निवेश करने से 10 गुणा रिटर्न मिलता है। स्वास्थ्य सुविधा बेहतर होने से व्यक्ति की उम्र में एक साल का इजाफा होता है तो उत्पादकता बढ़ने से जीडीपी में 4 फीसदी की सालाना बढ़ोतरी होती है।
अनेक किंतु परंतु के बाद भी देश की जनता ने प्रधानमंत्री के नोटबंदी एवं जीएसटी जैसे कड़े फैसलों में अनेक तकलीफों को सहकर भी भारी जनसमर्थन दिया। गुजरात और हिमाचल में विजय इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। देश की आर्थिक स्थिति पर विरोधी दलों, मीडिया संस्थानों द्वारा लगातार प्रश्नचिह्न लगाने के बावजूद देश की अर्थव्यवस्था रफ्तार पकड़ रही है। आर्थिक रेटिंग एजेंसियां भी सकारात्मक संदेश दे रही हैं। सेंटर फॉर इकोनॉमिक्स एंड बिजनेस रिसर्च वर्ल्ड इकोनॉमिक लीगने यह अनुमान लगाया है कि भारत 2018 में फ्रांस और ब्रिटेन को पछाड़कर दुनिया की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगी। एक तरफ यह उजला पक्ष और दूसरी तरफ दुनिया के स्वास्थ्य सूचकांक में भारत का 188 देशों में 143 वाँ स्थान, क्या यह शर्मसार करने वाली बात नहीं होगी?
क्या कोई सरकार देश की आंतरिक और बाहरी सुरक्षा को प्राइवेट एजेंसी के हवाले कर सकती है? ऐसा करने के नतीजे कितने भयंकर हो सकते हैं, यह कल्पना के परे है। उसी तरह लोगों के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए भी किसी लाभ के उद्देश्य से चलने वाली निजी एजेंसियों के हवाले कैसे कर सकती है, जिसका प्राथमिक ध्येय ही येन-केन-प्रकारेण लाभ कमाना है? सरकार अगर देश का सुरक्षा बजट कुल बजट का 12-13 प्रतिशत कर सकती है जो जरूरी भी है, तो स्वास्थ्य जैसी बुनियादी जरूरत पर ईमानदारी से 5-6 प्रतिशत खर्च होना ही चाहिए। भारत सही मायने में विकसित देश तभी होगा, जब यहाँ के सामान्य जन पूरी तरह से स्वस्थ और सुरक्षित होंगे।


Thursday, November 23, 2017

खिचड़ी के सर्वसमन्वयी भाव का हो विस्तार
किसी देश की संस्कृति को वहाँ का खान-पान, वस्त्राभूषण, रहन-सहन, साहित्य-संगीत-कला, पर्व-त्योहार एवं आवास-यातायात के साधनों को देखकर बखूबी समझा जा सकता है। भारत में सदियों से ही विश्व की अनेक दिशाओं से लोग आते रहे और यहाँ की संस्कृति में रच-बसकर समाते चले गए। आनेवाले जहाँ एक-तरफ यहाँ की संस्कृति को अपनाते रहे, वहीं अपने साथ लाई संस्कृति से इसे समृद्ध भी करते रहे। यही कारण है कि हमारे देश में अनेक धर्म, जातियां, भाषा, खान-पान, अनेक प्रकार के वस्त्राभूषण एवं यातायात के साधन अस्तित्व में हैं। हमारी यह विविधता बाहर के लिए आश्चर्य की और हमारे लिए गर्व का विषय है। इसे हम सर्वसमावेशी यानी खिचड़ी संस्कृतिभी कहते है।
खिचड़ी पिछले दिनों एक प्रमुख राष्ट्रीय मुद्दा तब बन गई, जब समाचारों में यह आया कि मोदी सरकार खिचड़ी को राष्ट्रीय भोजन घोषित करने वाली है। अनेक लोग समर्थन में आए तो कुछ विरोध में भी। वह तो समय रहते केंद्रीय खाद्य प्रसंस्करण मंत्री हरसिमरत कौर ने यह कहकर विवाद को समाप्त किया कि विश्व खाद्य मेला 2017’ के अवसर पर खिचड़ी को एक पौष्टिक आहार के रूप में पेश कर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय बनाने का प्रयास किया जाएगा, न कि इसे राष्ट्रीय भोजन घोषित किया जाएगा।
खिचड़ी एक ऐसा खाद्य पदार्थ है, जिसे अनेक तरह से, स्थानीय उपलब्धता के अनुरूप अनेक अनाजों, दालों एवं सब्जियों को मिलाकर बनाते हैं। यह विभिन्न तरह से अलग-अलग क्षेत्रों एवं पसंद के हिसाब से बनाया जाता है। ज्यादातर लोग चावल-दाल को स्वादानुसार मसालों के साथ उबालकर पकाते हैं। लेकिन अगर कोई इसमें कुछ और भी मिलाना चाहे तो उसकी पूरी गुंजाइश होती है। यह सभी को अपनी-अपनी पसंद, परंपरा और अपने स्वाद को अभिव्यक्त करने की पूरा अवसर उपलब्ध कराती है।
खिचड़ी जिस तरह सर्वसमावेशी, स्वास्थ्यवर्द्धक एवं सुस्वादु है, अगर उसी तरह संस्कृति एवं आम जनों के जीवन से जुड़े सभी सार्वजनिक सेवा माध्यम भी हो जाएं तो हमारा समाज और भी सुंदर, स्वस्थ एवं सुसंस्कृत हो सकता है। उदाहरणस्वरूप हम सार्वजनिक यातायात के साधनों को ही ले सकते हैं, खासकर भारतीय रेल, जो कि देश के हर हिस्से को सांस्कृतिक, सामाजिक एवं आर्थिक रूप से जोड़ती है। परंतु इसमें कमी यही है कि यह आर्थिक हैसियत के आधार पर लोगों में भेद-भाव करती है। एक तरफ जहाँ अमीर लोगों के आगे यह सुविधाओं का अंबार लगा देती है, वहीं गरीब साधनहीन लोगों को अत्यंत नारकीय स्थिति में यात्रा करने को मजबूर करती है। परंतु दिल्ली मेट्रो रेल ने बीच का ऐसा रास्ता निकाला, जिसमें गरीब और अमीर एकसाथ सफर करने को मजबूर हो गए। इसके कारण जहाँ एक तरफ पर्यावरण को संरक्षण मिल रहा है, वहीं आर्थिक एवं सामाजिक दूरियों को पाटने का भी काम रहा है। दिल्ली में बड़े अधिकारी एवं अमीर भी मेट्रो में सफर करते धक्के खा रहे थे। हाँ, आम लोगों की तरह देखते हुए हिकारत की भावना अभी भी थी, उन्हें कई बार गरीब मजदूरों और साधारण लोगों के साथ चलने में अपनी सत्ता और अमीरी के दंभ के कारण परेशानी होती थी। कभी-कभी उबल भी पड़ते थे। उसी तरह गरीब मजदूर और साधारण लोग भी साथ-साथ चलते हुए कुछ सहमते, हिचकते साथ ही स्वच्छता और नफासत के साथ व्यवहार करना सीख रहे है। ऐसा करने के लिए उन्हें मेट्रो की कार्यप्रणाली ने सबको मजबूर किया है।
परंतु पहले मई में और फिर चार महीने बाद ही दिल्ली मेट्रो कॉरपोरेशन ने हर स्तर पर किराया सीधे दोगुना कर दिया। गरीब मजदूरों की तो बात ही क्या की जाए, विधार्थियों एवं निम्न-मध्यम दर्जे के वेतनभोगी आदमी के लिए भी अब मेट्रो में सफर करना मुश्किल हो गया। पहले जहाँ वैशाली से नेहरू प्लेस एक तरफ से 20 रुपया लगता था, अब बढ़कर सीधे पचास रुपया हो गया। ओखला जानेवाले को 60 रुपया इस तरह एक सामान्य मजदूर या कर्मचारी के लिए प्रतिदिन कम से कम सौ से लेकर दो सौ रुपये (रिक्शा, ऑटो या पार्किंग मिलाकर) खर्च बैठ रहा है। मजदूर या कर्मचारी, जो 10 से 20 हजार तक की वेतन पाता है, यह बोझ कहाँ से सहन कर पाता। नतीजा यह हुआ कि फिर से लोग बसों और अपने जंग लगते बाईक, स्कूटर आदि लेकर सड़कों को पहले से हथियाए रइसों की बड़ी-बड़ी कारों के पीछे रेंगने के लिए मजबूर हो गए।
किराया दुगुना बढ़ाने के लिए मेट्रो की यह दलील हजम करने लायक नहीं है कि उसे नुकसान हो रहा था, क्योंकि इसके सारे आंकड़े यही बताते रहे हैं कि लगातार यात्रियों के बढ़ने से मेट्रो फायदे में चल रही थी। परंतु किराया बढ़ाने के बाद यह साफ नजर आ रहा है कि उसके यात्रियों की संख्या में भारी गिरावट आई है। गरीब और निम्न मध्यम वर्ग के लोग इससे कटते जा रहे हैं। मेट्रो के लिए भी यह कदापि फायदे का सौदा नहीं है, भले ही आज वह इस बात को आंकड़ों के माध्यम से सार्वजनिक नहीं कर रही है।
दिल्ली मेट्रो के नीति-नियंता भले ही किराया बढ़ाकर खुश हो रहे हों, परंतु उन्हें नहीं भूलना चाहिए कि ऐसा कर वे मेट्रो को उसी खास वर्ग की सवारी बना रहे हैं जिसके पास सुविधाओं का अंबार है। जिनकी बड़ी-बड़ी गाड़ियों के आगे दिल्ली की सड़कें हर समय भरी रहती हैं। ऐसा न हो कि जाम में फंसा निम्न वर्ग दूर से जिस तरह सड़क पर बड़ी-बड़ी खाली कारों को देख-देख कर कुढ़ता रहता है, उसी तरह खाली मेट्रो को आते-जाते टकटकी लगाकर देखता रहे और दिल्ली भीड़ और प्रदूषण से कराहती रहे।
किसी भी सरकार का प्रयास यही होना चाहिए कि वह ऐसी नीति बनाये कि सार्वजनिक यातायात के माध्यम से जहां लोगों को प्रदूषण से छुटकारा मिले, वहीं सामाजिक एवं आर्थिक रूप से विभिन्न जातियों, धर्मों और वर्गों में बंटे हमारे समाज को कम से कम सफर के दौरान आपसी दूरियां कम हों, एक दूसरे को समझें-सीखें, ताकि सामाजिक लोकतंत्र को मजबूती मिले। सब जानते हैं कि नुकसान के साथ मेट्रो नहीं चल सकती परंतु किराया बढ़ाने का एक न्यायसंगत तरीका होना चाहिए ताकि सभी वर्ग के लोग इसे खुशी-खुशी वहन कर सकें। पुष्टिकारक, सुस्वादु खिचड़ी के सर्वसमन्वयी भाव को देश के यातायात के सभी साधनों में भी बढ़ावा देने की जरूरत है, इससे समाज और देश ज्यादा स्वस्थ, सुंदर और जनतांत्रिक बनेगा। 

Monday, September 4, 2017

तार्किक एवं विवेकशील समाज के लिए
ऐसे समय में जब करीब-करीब पूरा उत्तर भारत एवं हिंदी प्रदेश बाबा राम-रहीम के कुकर्मों की मिली सजा के बाद फैली हिंसा और चोटीकटवाकी दहशत से गुजर रहा है, ऐसे समय पिछले महीने 24 जुलाई को आम आदमी के वैज्ञानिक माने जाने वाले प्रो. यशपाल का निधन हो गया। अगर वे जिंदा एवं स्वस्थ होते तो मीडिया के सामने आते और जोरदार ढंग से सहज तर्कशील वैज्ञानिक शिक्षा पर बल देते और अपने कंधों तक आती लंबी सफेद जुल्फों को दिखाते हुए ललकार कर कहते कि ‘‘किसी चोटीकटवा में दम है तो आकर मेरी चोटी काटकर दिखाए।’’ वे विविध कार्यक्रमों, अध्यापन एवं मीडिया के माध्यम से अनवरत पाखंडो, अंधविश्वासों के विरुद्ध एक तर्कशील वैज्ञानिक समाज की स्थापना के लिए विविध स्तरों पर संघर्षरत रहे।
हम एक ऐसे दौर से गुजर रहे हैं, जहाँ अनेक धार्मिक एवं सांप्रदायिक समूहों के बीच वर्चस्व की लड़ाई चल रही है, जिसका नतीजा है कि एक तरफ दुनिया सांप्रदायिक आतंकवाद एवं उन्माद की चपेट में है तो दूसरी तरफ अंधविश्वासों की जकड़बंदी में अनेक तरह के ठग बाबा रोज पैदा हो रहे हैं और गरीब-लाचार आम लोगों को फँसाकर नित नए तरीके अपनाकर अपना साम्राज्य खड़ा कर रहे हैं। अनेक बाबा तो इस स्थिति में आ गए हैं कि खुलेआम हिंसा के माध्यम से सरकार एवं शासन को चुनौती देने लगे हैं। इसी धंधे का बाइप्रोडक्ट कभी मुँहनोचवा, कभी मुड़कटवा, कभी खुनचुसवा तो कभी मंकीमेन और अब चोटीकटवा नए अवतार में आता रहता है और अंधविश्वास का उर्वर धंधा हमेशा लहलहाता रहता है।
आखिर क्या कारण है कि सारे मुँहनोचवा, चोटीकटवा या डायनप्रथा आदि अशिक्षित-अनपढ़ गरीब-पिछड़े मुहल्लों एवं क्षेत्रों में ही देखने को मिलते हैं? आखिर क्यों थक-हारकर लोग अपनी बीमारी के इलाज के लिए बाबाओं एवं ओझाओं की शरण में जाते हैं? ऐसा इसलिए संभव होता है क्योंकि ऐसे अधिकांश गरीब-निरीह लोगों को उनकी मामूली बीमारियों का भी सही समय पर समुचित इलाज नहीं मिल पाता। प्राथमिक सरकारी अस्पताल और डॉक्टर पर्याप्त संख्या में हैं नहीं। हाल ही में जो स्वास्थ्य मंत्रालय की एक रिपोर्ट आई है उसके अनुसार देश में 11528 लोगों के लिए एक सरकारी डॉक्टर उपलब्ध है। हिन्दी प्रदेशों की हालत तो और भी बुरी है जहाँ 20,000 से ज्यादा लोगों के इलाज के लिए एक डॉक्टर है, वह भी कितनी सेवा देता है वह राम ही जानें। जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार प्रत्येक 1000 लोगों पर एक डॉक्टर का होना जरूरी है। प्राइवेट अस्पतालों की तरफ इलाज क्या, सर उठाकर उधर देखने तक की उनकी हिम्मत नहीं होती। नतीजा, पहले वे झोलाछाप डॉक्टरों से लुटते हैं। उनकी मामूली बीमारी बढ़कर खतरनाक बनती रहती है और इसी दौरान अनेक मानसिक बीमारियों की चपेट में आते हैं। ऐसे हालत में जो सर्वसुलभ सहज मार्ग उन्हें जहाँ खींच कर ले जाता है, वह होता है कोई ओझा-तांत्रिक या पाखंडी बाबा की अंधीयारी गुफा जहाँ वे आजीवन अंधविश्वासों और पाखंड के बीच पिसते हैं और ढोंगी बाबा लोग इनके बल पर रहनुमा बनकर अय्यासी करते रहते हैं।
इससे बचने के लिए हर स्तर पर सरकार को सहज सर्वसुलभ स्वास्थ्य सुविधाओं के साथ-साथ देश के हर गाँव से लेकर शहर तक सभी प्राथमिक पाठशालाओं में प्रारंभ से ही वैज्ञानिक एवं विवेकवादी शिक्षा का आधार तैयार करना होगा। यह सुनिश्चित करना होगा कि जब हर शिशु इस अद्भुत दुनिया की ओर आश्चर्य से भावविभोर होकर देखता है और हर तरफ वह प्रश्नांकित नजरों से देखना प्रारंभ करता है। इसके पहले कि कोई इस ब्रम्हांड की रचना में अनेक प्रकार के सांप्रदायिक एवं जातिवादी करिश्माई सिद्धांतों को उनके कोमल दिमाग में ठूंसे, उन बच्चों को डार्विन के क्रमिक विकासवाद के सिद्धांत को सहज एवं सरल तरीके से उसके दिमाग में तह-दर-तह बिठा दिया जाना चाहिए। सरल शब्दों में, क्रमिक विकासवाद के अनुसार इस पृथ्वी को इस रूप में आने में करोड़ों वर्ष लगे जो कि किसी गॉड, ईश्वर या पराशक्ति के हाथों रातो-रात बनाए का परिणाम नहीं बल्कि क्रमिक विकास का परिणाम है। क्रम-विकास एक मन्द एवं गतिशील प्रक्रिया है, जिसके फलस्वरूप आदि युग के सरल रचना वाले जीवों से अधिक विकसित जटिल रचना वाले नए जीवों की उत्पत्ति हुई है। जीव विज्ञान में क्रम-विकास किसी जीव की आबादी की एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी के दौरान जीन में आया परिवर्तन है। यह प्रक्रिया नई प्रजातियों के उद्भव में परिणत होती है।
जब हर बच्चा सारी उत्पत्ति को उपरोक्त ज्ञान की कसौटी पर कसने लगेगा तो वह अपने धर्म को भी बेहतर तार्किक तरीके से समझने का प्रयास करेगा। आखिरकार प्रारंभ में धर्म एवं विभिन्न संप्रदाय का उद्भव भी तो मानव जीवन को सभ्य, सामाजिक एवं सहज-सरल बनाने के लिए हुआ था। यह अलग बात है कि आगे चलकर हर धर्म के स्वार्थी लोगों एवं समूहों ने अपने निजी हित के लिए इसका दुरुपयोग किया जिसके कारण आज सभी संप्रदायों में अंधविश्वासी जड़तावादी लोगों का बोलबाला है, जो प्रश्न एवं तर्क करने वालों से कोसों दूर भागते हैं। अगर प्रारंभ से ही तार्किक आधार मजबूत हो जाए तो कोई कुरीति एवं अंधविश्वास उन्हें मार्ग से डिगा नही पाएगा और अंधविश्वास, पाखंड एवं आतंकवादी हिंसा की दुकानें अपने-आप बंद हो जाएंगी। वही धर्म एवं संप्रदाय टिकेंगे, जो विवेकवाद, तर्क एवं नैतिकता की कसौटी पर खरे उतरेंगे।
अगर इन सबको रोकना है तो पूरे देश में एक समान तार्किक एवं वैज्ञानिक सोच पर आधारित शिक्षा केन्द्र एवं प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र की मजबूत बुनियाद रखनी पड़ेगी, क्योंकि एक अशिक्षित एवं बीमार दिमाग में ही अंधविश्वासों और पाखंडों को फलने-फूलने का निर्बाध अवसर मिलता है। एक विवेकशील समाज बनाकर ही हम डॉ. यशपाल और धार्मिक पाखंड के विरुद्ध आजीवन लोहा लेने वाले चार्ल्स डार्विन को सच्ची श्रद्धांजलि दे पाएंगे।