Wednesday, May 2, 2018


संसद में संवाद नहीं!
लोकतंत्र की संसदीय प्रणाली में संसद को देश की राजनीतिक, सामाजिक  आर्थिक व बहुविध आंतरिक व बाह्य स्थितियों का दर्पण माना जाता है, यानी संसद में पूरे देश के मुद्दों एवं हलचलों का प्रतिबिंब दिख जाता है कि देश किन परिस्थितियों से गुजर रहा है। परंतु लगातार कुछ वर्षों से संसद के बनावटी हुड़दंग और हंगामे को देखकर यही लगता है कि हमारे चुने गए प्रतिनिधियों को या तो जनता की अपेक्षाओं या आकांक्षाओं की समझ नहीं है या वे जानबूझकर किसी स्वार्थी हित के हाथों जनतंत्र व संसद की मर्यादा को मटियामेट कर रहे हैं। इसकी झाँकी इस महत्त्वपूर्ण बजट सेशन में देखने को मिल रही है, जिसमें विरोधी दलों द्वारा इस कदर हंगामा किया जा रहा है कि अनेक जरूरी विधेयकों एवं कार्यों की बात अगर छोड़ भी दें, यहाँ तक कि देश के भविष्य को तय करने वाला बजट तक लोकसभा में बिना कोई चर्चा-बहस के पारित हो गया। हद तो तब हो गई, जब इराक के मोसुल में आईएसआईएस के हाथों चार साल पहले बेरहमी से मारे गए 39 भारतीयों की पूरी जानकारी विदेश मंत्री सुषमा स्वराज लोकसभा में देना चाह रही थीं तो उन्हें बोलने तक नहीं दिया गया।
लोकसभा ने बिना चर्चा के ही वित्त विधेयक और विनियोग विधेयक 2018 को मंजूरी दे दी। इससे पहले विभिन्न मंत्रालयों और विभागों की 99 माँगों को गिलोटिन के जरिये मंजूरी दी गई। हाल के वर्षों में शायद यह पहला मौका है, जब पूरा बजट बिना चर्चा के लोकसभा में पारित हुआ हो। बजट को बिना बहस के पारित होना देश और लोकतंत्र के लिए उचित नहीं है। बजट सिर्फ आमदनी और खर्च का ब्योरा भर नहीं होता बल्कि पिछले वर्षों की शासकीय वित्तीय कार्यनीतियों और उसकी खामियों की समीक्षा, सुधार एवं सुझावों का दस्तावेज एवं देश के भविष्य का दिशा-निर्देश भी होता है। संसद सदस्यों, खासकर विपक्षी सदस्यों से यह अपेक्षा रहती है कि इसके हर पहलू का गहराई से अध्ययन एवं विश्लेषण कर इसके अंदर छुपे अनेक अव्यक्त प्रावधानों एवं तथ्यों को जोरदार बहस के माध्यम से उजागर करें, सरकार को घेरें एवं सुधार व जवाबदेही के लिए मजबूर कर दें। सरकार कई बार अपने दलीय हित या अनेक दवाब समूहों के फायदे के लिए बजट में दबे-छुपे कुछ ऐसा प्रावधान कर जाती है, जो देश के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है। परंतु यह कितना दुःखद है कि वित्तीय वर्ष की समयसीमा तथा विपक्षी सदस्यों की अनावश्यक अलोकतांत्रिक हुल्लड़बाजी में वित्त एवं विनियोग विधेयक यों ही बिना बहस के पारित हो गया।
एक दूसरा अत्यंत दुःखदायी विषय, विदेश मंत्री सुषमा स्वराज इराक के मोसुल से अगवा हुए 39 भारतीय नागरिकों की मौत की जानकारी लोकसभा में दे रही थीं, किंतु कांग्रेस के सांसदों द्वारा किए जा रहे अनावश्यक हंगामे के कारण वे पूरी जानकारी नहीं दे पायीं। असफल रहने पर उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा कि, ‘‘कांग्रेस ने मौत पर ओछी राजनीति की सारी हदें पार कर दीं, कांग्रेस पार्टी ने लोकसभा काररवाई को उस समय बाधित क्यों किया गया, जब मुझे इराक में मारे गए 39 भारतीयों की जानकारी देनी थी?’’ बयान के दौरान लोकसभा में कांग्रेस द्वारा हंगामे का नेतृत्व कांग्रेस के ज्योतिरादित्य सिंधिया ने राहुल गांधी के इशारे पर किया और लोकसभा अध्यक्ष द्वारा बार-बार आग्रह करने के बावजूद सिंधिया के नेतृत्व में कांग्रेस सदस्यों का शोर-शराबा जारी रहा। प्रेस कॉन्फ्रेंस में विदेश मंत्री ने बताया कि मृतकों में पंजाब के 27 लोग, हिमाचल के 4, बिहार के 6 और बंगाल के 2 लोग शामिल हैं।
इराक के मोसुल में 39 भारतीय कामगारों के जीवित होने की जिस झीनी-सी संभावना पर सैकड़ों विवश परिजनों की उम्मीद टिकी थी, वह एक झटके में टूट गई। यह त्रासदी चार साल पहले घटित हुई, पर उसकी पुष्टि अब हुई। काम की तलाश में दूसरे देश जाकर समूह में आतंकियों के हाथों मारे जाने से दुःखद कुछ नहीं हो सकता, लेकिन मौत के करीब चार साल तक उनके बारे में पता न चल पाना तो और भी दुर्भाग्यपूर्ण था। इस मामले में भारत सरकार चाहकर भी बहुत कुछ नहीं कर सकती थी। आईएस के कब्जे के दौरान मोसुल में जब इराक सरकार की ही पहुँच नहीं थी, तो बाहरी देशों की बात ही क्या? मोसुल के आईएस के कब्जे से मुक्त होते ही हमारी सरकार उनकी तलाश में सक्रिय हुई। रडार की मदद से एक गाँव के टीले पर सामूहिक कब्र का पता चला और निकाले गए शवों के डीएनए टेस्ट से मिलान कराने के बाद उनके भारतीय होने की पुष्टि हुई।
सबसे बड़े लोकतंत्र के प्रतिनिधि हे महानुभावो! अगर बजट और वित्त विधेयक जैसे महत्त्वपूर्ण दस्तावेज भी बिना आपकी बहसों के ही पारित हो जाते हैं। चार वर्षों से आशा और निराशा के भँवर में गोते खाते उन सैंकड़ों परिवारों तक 39 लोगों की निर्मम हत्या की पुष्ट खबर पहुँची, तब भी आपकी अंतरात्मा नहीं जगी। आपसे तो आशा थी कि सारी दलीय कटुता को परे रखकर तत्काल इस हत्या के पीछे के कारणों की चर्चा करते, सरकार की नीतियों में कोई खामी है तो उसे उजागर कर ऐसी घटनाओं के निवारण के लिए मजबूर करते। परंतु चर्चा-संवाद की तो बात ही दूर, आपने तो मंत्री महोदया को पूरी बात ही कहने नहीं दी। जिनके अवशेष के रूप में सिर्फ हड्डिया, उनके कड़े, केश, कंघे, जूते, कपड़े उनकी सुरक्षा के लिए माताओं, बहनों और पत्नी द्वारा बाँधे गऐ गंडे-ताबीज ही अवशेष बचे हैं, उनकी आत्मा की शांति के लिए तथा उनके आश्रित-पीड़ित परिवारों के गहरे घावों पर मरहम लगाने के लिए आपलोगों ने दो मिनट की मौन श्रद्धांजलि देना भी उचित नहीं समझा। वे बेचारे 25 से 30 हजार रुपये महीना कमाने के चक्कर में उस बियाबान में दरिंदों के हाथों निर्ममता से मारे गए और आपलोग जनता की गाढ़ी कमाई के करोड़ों रुपये हंगामे की भेंट प्रतिदिन चढ़ा रहे हैं। आप पर अगर इन दुखियारों की पीड़ा का भी असर नहीं हो रहा तो जनतंत्र के इस संप्रभू मंदिर में चुनकर आए महानुभावो, एक बार सोचिए, आप किसका प्रतिनिधित्व कर रहे हैं? हो सकता है, आप जिन मुद्दों पर बाधा उत्पन्न कर रहे हैं, वह भी महत्त्वपूर्ण हो, परंतु उसका भी समाधान तो वाद-प्रतिवाद-संवाद और नीति-निर्माण से ही निकलेगा न। फिर संसद में संवाद और संवेदनशीलता की जगह हंगामा क्यों?



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