Friday, March 9, 2018


रोबोट का गौरैया प्रेम
फिर आ गया 20 मार्च, यानी विश्व गौरैया दिवस। सूचना एवं संचार माध्यमों में फिर से गौरैया के संरक्षण और उसके संवर्द्धन के बारे में खुब चर्चा-परिचर्चा होगी; अखबार, पत्र-पत्रिकाओं में लेख छपेंगे। फेसबुक एवं व्हाट्सएप पर गौरैयों की सुंदर-मनमोहक तस्वीरों एवं चीं-चीं करती, करतब दिखाती उसके विडियो के संग लाखों-करोड़ों की संख्या में संदेश भेजे जाएंगे। परंतु इन सबसे अनभिज्ञ गौरैया महानगरों एवं शहरों से लगातार पलायन करते हुए कहीं सुदूर क्रमशः घटते प्राकृतिक वन-प्रांतर में मिटती, सिमटती, विलुप्ति के कागार पर पहुँचती जाएगी।
सिर्फ गौरैया की बात क्या करें, मार्च महीना है, फगुआया मन है, बसंत अपने शबाब पर है। परंतु अभी तक कानों में कोयल की एक भी कूक सुनाई नहीं पड़ी। जबकि मैं मोबाइल का इयर फोन भी नहीं लगाता और पेड़-पौधों एवं पार्कों से होकर ऑफिस आते-जाते ज्यादा से ज्यादा पैदल चलता हूँ। मेरा ऑफिस भी चारों तरफ से घने वृक्षों से भरे पार्कों के बीच है। इतनी चेतावस्था रहने के बावजूद कोयल की कूक सुनाई नहीं पड़ी है। इसका मतलब यह है कि इस बसंत में भी बहुत कुछ मिलावट हो गई है। उस बसंत का क्या मतलब, जिसमें कोयल की कूक न हो, चहुँदिशी पीले-पीले फूलों से लदे पेड़-पौधे न हांे, आमों में मंजरी न दिखाई पड़े, नवसृजन के लिए विसर्जन यानी पतझड़ और फिर फूटते कोंपल अगर दिखे नहीं तो फिर काहे का वसंत?
गौरैया, कोयल ही नहीं, देखते-देखते गिद्ध का अस्तित्व भी समाप्तप्राय है, जबकि यह पक्षी अत्यंत विपरीत परिस्थितियों में भी जीवित रह सकता है। गिद्ध एक मृतोपजीवी पक्षी है, जो भोजन के लिए केवल मृत पशुओं पर निर्भर रहता है। इस तरह वह वातावरण के लिए कुशल एवं प्राकृतिक सफाईकर्मी है। इसका पाचनतंत्र इतना मजबूत होता है कि यह रोगाणुओं से परिपूर्ण सड़ा-गला मांस भी पचा सकता है। वह हमारे पर्यावरण एवं मानव जीवन को अनेक प्रकार के संक्रामक रोगों को फैलने से रोककर हमें बचाता है। 90 के दशक से पहले लगभग 40 लाख गिद्ध भारत में थे, जो लगभग 12 लाख टन सड़े-गले मांस को वार्षिक दर से समाप्त किया करते थे। परंतु पिछले दशकों में 99 प्रतिशत गिद्धों की आबादी समाप्त हो गई। जाँच के दौरान पाया गया कि मवेशियों के दर्द निवारण के लिए दी जाने वाली दवा में प्रयोग होने वाली रसायन डाइक्लोफेनेकइसके लिए जिम्मेदार है। इस दवा की रसायन पशुओं के मरने के बाद भी उसके शव में उपस्थित रहती है। इस तरह उसे खाते ही गिद्ध डाइक्लोफेनेक की विषाक्तता से समाप्तप्राय होता गया।
मनुष्य की बढ़ती असीम लालसा, उसकी शिकारी प्रवृत्ति और गिद्धदृष्टि ने एक ऐसी डिजीटल रोबोट सभ्यता को जन्म दिया है, जिसको किसी पारिस्थितिक संतुलन, जैव विविधता या वासंती बहुरंगी उत्सवलीला की आवश्यकता नहीं है। वह सिर्फ हिज मास्टर वॉयसबनकर चलायमान है। यह कृत्रिम बुद्धि वाला जानवर बहुत चुपके से हमारे जीवन में प्रवेश कर चुका है। कहा जा रहा है कि जल्द ही कार्यालयों में अनुवादकों, सचिव और क्लर्कों की जगह रोबोट ले लेगा। रोबोट कई मामलों में हमारे डॉक्टरों, इंजीनियरों और वैज्ञानिकों से भी बेहतर साबित हो सकते हैं। क्या पता, कल वह एक अच्छा डायरेक्टर, प्रशासक, विचारक, समाजशास्त्री, दार्शनिक और लेखक-संपादक भी हो। लेकिन यह कृत्रिम दिमाग जब जीवन के हर क्षेत्र में तैनात हो जाएगा तब क्या होगा? हम यह अनुमान नहीं लगा सकते कि यह कृत्रिम बुद्धि (रोबोट) कहाँ तक पहुँचेगी। महान वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग को लगता है कि यह आगे चलकर मानव सभ्यता के लिए खतरा साबित होगी। दार्शनिक बासट्राम को भी कहा है कि इस कृत्रिम दिमाग में इतनी क्षमता होगी कि यह मानव सभ्यता का ही सफाया कर सकती है।
आज हर तरफ दिख रहा है कि हम एक पोस्ट ह्यूमन यानी उत्तर मानव युग की ओर जा रहे है। एक ऐसा युग जहाँ मानव तो होगा परंतु हम रोबोट के गुलाम भर होंगे, वह जैसे नचाएगा हम वैसा नाचेंगे। हम जिस तरह से अपने सारे कार्य कंप्यूटरों एवे डिजीटल माध्यमों के हवाले करते जा रहे हैं वह दिन दूर नहीं है जब यह भस्मासुर अपने निर्माता के ही सर पर हाथ रखकर उसे भस्मीभूत करेगा। उसकी बानगी आज हर तरफ दिख तो रही है। नहीं दिख रही तो जरा कानों से इयर फोन हटाकर और मॉनिटर एवं मोबाइल से नजरें परे कर देख लीजिए, क्या आपको गौरैया की चीं-चीं आस-पास सुनाई पड़ रही है? क्या कोयल इस बसंत में कूक रहा है? क्या हमारे आयातित वृक्षों के बनावटी पार्को एवं जंगल में बसंती हवा झकोंरे मार रही है?  
भारत जैव विविधता से परिपूर्ण देश है। जहाँ पूरे विश्व का 8 प्रतिशत जैव विविधता वाला भाग मौजूद है। सभी प्राणी एक दूसरे से खाद्य शृंखला द्वारा जुड़े हैं। आज विश्व में कई पशु-पक्षी, जंगली प्रजातियाँ एवं विविध पेड़-पौधे या तो विलुप्त हो गए या उनका अस्तित्व संकट में है। पहले मानव नें अपनी असीम पिपाशाओं की पूर्ति के लिए पूरी पारिस्थितिकी का संतुलन बिगाड़ा। खुद अपने गाँव, घर-आँगन छोड़कर महानगरों में कबूतर के दड़बेनुमा अनेक मंजिली अट्टालिकाओं में कैद हुआ। उसी में बनावटी बोनसाई पौधे लगाए। वहीं पिंजरों में चिड़िया-तौते को पाला। वह यह भूल गया कि ऐसा करते हुए वह खुद भी स्वतंत्र व्यक्तित्व से गिरकर एक बोनसाई विचार का यानी बौना व्यक्तित्व बनता गया है। वह यहीं नहीं रुका और ज्यादा से ज्यादा सुख-सुविधा के लिए तिलस्मी डिजीटल दुनिया का गुलाम बनता गया। इसका ताजा उदाहरण सऊदी अरब है, जिसके हुक्मरानों ने महिलाओं को स्वतंत्र व्यक्तित्व नहीं माना और उन्हें अधिकांश स्वतंत्र नागरिक के मौलिक अधिकारों से मरहुम रखा, परंतु एक रोबोट रोबोट सोफियाको अपने देश की नागरिकता प्रदान कर यह सुनिश्चत किया है कि उसे वह सब अधिकार मिले जिसके लिए वहाँ की महिलाएं सदियों से तरसती रहीं।
मानव सिर्फ नन्हीं जीव गौैरैया ही नहीं खो रहा है बल्कि पूरी जैव विविधता, मानवीय प्रवृत्तियों- आचार-व्यवहार, नैतिकता एवं संवेदनाओं को खोते हुए खुद एक मशीनी पुतले यानी रोबोट में तब्दील होता जा रहा है। इस रोबोट मानव को असली गौरेया, कोयल, गिद्ध और बसंत से कोई मतलब नहीं है। यह विश्व गौरैया दिवस पर ट्वीटर, व्हाट्सएप, फेसबुक आदि के माध्यम से लाखों-करोड़ों गौरैया के फोटो, विडीयो युक्त बनावटी संवेदना-संदेश भेज देगा और बस...!   



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