सिरफिरेपन से कैसे मिले निजात?
सत्य और तथ्य यही है कि सिरफिरापन एक घातक
मानसिक बीमारी है। यह जब महज एक आदमी तक ही सीमित होता है, तब भी बड़ा विनाशकारी होता है और
मुश्किल से काबू में आता है। वही जब संस्थागत, जातिगत,
धर्मगत या समाजगत हो जाए तो पूरे समाज, देश और
उससे भी आगे पूरी प्रकृति एवं मानवता के लिए घोर विध्वंसकारी होता है। सिरफिरेपन
की यह बीमारी सदियों से चली आ रही है परंतु दुःख की बात यह है कि हम ज्यों-ज्यों
अपने आप को ज्यादा सभ्य और आधुनिक बनने और बनाने का दंभ भरते हुए आगे बढ़ते रहे,
तब से स्थिति ज्यादा खतरनाक और जटिल होती गई।
नये साल के प्रारंभ में हरियाणा के पलवल में आधी
रात को लोहे का पाइप लेकर निकले पूर्व सैनिक नरेश धनकड़ ने छह मासूम लोगों की
पीट-पीट कर हत्या कर दी। पुलिस टीम उसे पकड़ने पहुंची तो उसने पुलिस पर भी हमला कर
दिया। दिल्ली के बुराड़ी इलाके में खुदकुशी का एक अजीबोगरीब मामला सामने आया। यहाँ
मकान के दूसरे माले से छलांग लगाकर एक शख्स नवदीप ने अपनी जान दे दी। वह स्वीडन से
पढ़कर दिल्ली आया हुआ था। जान देने से पहले नवदीप ‘लाइफ आफ्टर डेथ’ विषय से
संबंधित सामग्री पढ़ रहा था। वह इंटरनेट पर यह खंगाल रहा था कि सेकेंड फ्लोर से
कूदने से क्या वाकई जान जा सकती है? राजकोट (गुजरात) के एक
युवक संदीप ने अपनी माँ जयश्रीबेन की छत से फेंककर हत्या कर दी। उसने ऐसा इसलिए
किया, क्योंकि उसके मुताबिक उसकी माँ बूढ़ी हो गई थी और बीमार
रहने लगी थी। दिल्ली में ही रहकर आई.ए.एस. की तैयारी कर रही एक पीसीएस अधिकारी
लड़की ने 31 दिसंबर की रात को पंखे से लटककर इसलिए आत्महत्या कर ली कि उसे अपने
कील- मुहांसों से जल्दी निजात नहीं मिल पा रही थी। पिछले दिनों केरल का एक युवक
अब्दुल मनफ सीरिया में मारा गया, वह उस आइएसआइएस में शामिल
था। जो पूरी दुनिया को एक कट्टर इस्लाम में तब्दील करने के लिए मौत और विध्वंस का
तांडव कर रहा है। अब्दुल मनफ ने भी इसी में भर्ती होकर मृत्यु (आत्महत्या) को
चुना। ऐसे आत्महंता प्रवृत्ति के उदाहरण इन दिनों बहुतेरे हैं।
संस्थागत सिरेफिरेपन की बात करें तो हाल के
दिनों के ही ढेरों उदाहरण हैं, जिसमें अनेक बाबा, जिसमें संत गुरमीत राम-रहीम,
बाबा वीरेंद्र देव दीक्षित, केरल के
तिरुवनंतपुरम के एक चर्च के पादरी फादर देवराज, लखनऊ के ‘खदीजतुल कुबरा लिलबनात’ मदरसे के संचालक ‘कारी तय्यब जिया’ जैसा व्यक्ति धर्म, अध्यात्म, शिक्षा, समाजसेवा की
आड़ लेकर भोले-भाले लोगों को वर्षों से ठगता रहा। स्त्रियों एवं मासूम बच्चियों को
अपना हवस का शिकार बनाता रहा। विरोध करनेवालों की वह निर्ममता से हत्या करवाता
रहा। सरकार और कानून को ठेंगा दिखाता रहा और न्यायालय के आदेश पर घिर जाने के बाद
पूरे राज्य को दंगा और हिंसा में झोंकने का भरपूर प्रयास किया।
पूरी दुनिया को झुलसा रहा यह आतंकवाद किसी
सिरफिरे के दिमाग की ही तो उपज है, जो यह मानता है कि मेरी कौम या संप्रदाय ही दुनिया
का असली धर्म है और बाकी सभी का विश्वास बकवास है, उसे इस
धरती पर रहने का कोई अधिकार नहीं है। इसी तरह नस्ल, रंग,
लिंग और जातिवाद अपनी
तथाकथित काल्पनिक महानता के आगे किसी को भी जगह देने को तैयार नहीं है। पिछले एक
साल के दौरान हमारे देश में ही जाति के नाम पर जिस तरह खुलेआम सड़कों पर हिंसा का
तांडव किया गया और जानमाल एवं सार्वजनिक संपत्तियों का नुकसान किया गया, वह सिरफिरेपन की अति है।
मनुष्य अपनी प्रकृति से एक मेहनती एवं सरल
स्वभाव का प्राणी है। आदिकाल में जब इसे आग मिल गई तो इसने बेकार की हिंसा से
मुक्ति पा ली और सामूहिक जीवन की ओर बढ़ा। जब अनाज
और फल मिल गए तो शिकारी जीवन को त्यागकर कृषक और गृहस्थ जीवन को अपना लिया।
घर- परिवार, नाते-रिस्तेदारी
और सामाजिक-सामुदायिक जीवन की ओर अग्रसर हुआ, जिससे उसे अपनी
प्रकृति के अनुरूप सुकून और सहज जीवन मिला। हमारी सभ्यता की प्रगति का आख्यान
सहयोग और सामाजिकता का है। परंतु निजी दंभ, लोभ और लोलुपता
ने स्थिति को जटिल से जटिलतर बना दिया। विश्वास और सहयोग की जगह सौदा, समझौता और धोखेबाजी ने ले ली।
यह सिरफिरापन नहीं है तो क्या है जिसके कारण
हमने विकास के लिए एक ऐसा मार्ग चुना, जिसमें सिर्फ अपना निजी सुख और उपभोग ही सर्वोपरि
है। आज दुनिया की अधिकांश जनसंख्या शुद्ध हवा और पानी के लिए तरस रही है। हमारी
सदानीरा नदियां नालों में, हर-भरे जंगल, पहाड़ वीरान और इसमें पलने वाले पक्षी एवं जीव-जंतु विलुप्ति के कागार पर
पहुंच गए। इस उपभोगवादी जीवनपद्धति के शिकार धर्म, विज्ञान,
अध्यात्म और नैतिक मूल्य हो गए और इसके प्रतिनिधि के रूप में ऐसे ठग
और ठेकेदार पैदा कर दिए, जो बाजारवादी उपभोगवादी जीवन को
बढ़ावा देने के लिए सबका दुरुपयोग करने लगे। इसी का परिणाम है कि मानव को मुक्ति का
मार्ग दिखाने वाला धर्म आतंकवाद का, अध्यात्म पाखंड का और
विज्ञान विनाश का पर्याय होता गया। आज एक सामान्य आदमी भय, आतंक
और अविश्वास के साये में जी रहा है। सहारे और सहयोग की डोर में हर जगह गांठंे ही
गांठंे पड़ गई हैं।
सिरफिरापन एक गंभीर मानसिक बीमारी है, जिसके लिए अनेक तत्व जिम्मेदार
हैं, जिसमें आनुवंशिकी, पालन-पोषण,
उसके घर-परिवार, रिस्तेदारी, समाज, धर्म, शासन-व्यवस्था,
आर्थिक स्थिति, शिक्षा एवं देश-काल की
परिस्थितियां एवं पर्यावरण मुख्य रूप से जिम्मेदार होते हैं। निजी सिराफन अब
सामूहिक पागलपन में तब्दील हो चुका है। स्थिति इतनी भयावह हो गई है कि विधा के
मंदिर में किशोर और मासूम बच्चे मामूली डांट पर अपनी प्रधानाध्यापिका तक कि हत्या,
सिर्फ स्कूल में छूट्टी भर कराने के लिए सातवर्षीय नौनिहाल की
बेरहमी से गला रेतकर हत्या, ककहरा सीखने के उम्र में कहीं
यौन हिंसा के आरोप का दंश झेल रहा है तो कहीं उसका शिकार हो रहा है।
जब सारी परिस्थितियाँ अनुकूल हों तो कोई
मनोचिकित्सक किसी सिरफिरे का इलाज आसानी से कर सकता है। परंतु सामूहिक पागलपन का
इलाज भी सामूहिक करना पड़ेगा, ऐसी परिस्थितियाँ पैदा करनी पडेगी, जिसमें व्यक्ति
सहज रूप से अपने घर-परिवार, रिस्तेदारी, समाज और पर्यावरण के संग विश्वास, सहयोग और
सहअस्तित्व के साथ रह सके। परंतु वैश्विक बाजारवादी तंत्र के मोहजाल में फंसी
दुनिया में क्या यह संभव होगा?
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