Wednesday, January 3, 2018

लोभ और लाभ की लाइलाज बीमारी
दुनिया में ऐसी कोई बीमारी नहीं, जिसका इलाज अगर हमारी मेडिकल साइंस, सरकार और समाज चाह ले तो नहीं हो सके, सिवाय लोभ और लाभ नामक बीमारी के। यह एक ऐसा वायरस है, जो बड़ी तीव्र गति से हमारी व्यवस्था को ग्रस रहा है। यह दबे पांव पहुँचकर जिम्मेदार व्यक्ति, संस्था, और सरकार की बीमारियों से मुकाबला करने वाली आंतरिक रोग प्रतिरोधक क्षमता को ही नष्ट-भ्रष्ट कर देता है। इसका शिकार निरीह सामान्य जन जब समाज और सरकारी संस्थाओं की तरफ आशा से टकटकी लगाकर देखता है, पता चलता है कि वह खुद भी इसी वायरस से ग्रसित हो, इस लोभ और लाभ का सहभागी बन सिर्फ घड़ियाली आसूँ बहा रहा है। इस तरह लोभ और लाभ का व्यापार निर्विघ्न चलता जा रहा है।
विगत दिनों गुड़गाँव के फोर्टिस अस्पताल ने डेंगू के असफल इलाज के बाद मृतक बच्ची के परिजनों से शव देने के पूर्व अनाप-शनाप सोलह लाख रुपये का बिल अदा करने की माँग की। दिल्ली के शालीमार बाग स्थित मैक्स अस्पताल ने पहले तो जुडवां नवजातों को, जिसमें एक उस समय जीवित था, मृत घोषित कर उनके शव को पैककर उनके परिजनों को सौंप दिया। पहले डॉक्टरों ने आइसीयू में रखने के लिए भारी-भरकम खर्च बताया, परिजनों द्वारा इतना खर्च उठाने पर असमर्थता जताने पर कुछ देर बाद ही जिंदा बच्चे को भी मृत घोषित कर उन्हें सौंप दिया। एक अन्य मामले में नोएडा मैक्स अस्पताल खोड़ा कॉलोनी में रहकर नोएडा में एक प्राइवेट नौकरी कर रहे मनोज की मृत्यु के उपरांत पाँच दिनों तक वेंटिलेटर पर रखकर बिल बढ़ाता रहा और बिल पाँच लाख तक पहुँचा दिया, पूरा पैसा परिजनों द्वारा नहीं चुका पाने के कारण उन्हें लाश तक नहीं सौंपी गयी। नोएडा के ही निओअस्पताल के बारे में इंडियन मेडिकल एसोसिएसन के डॉक्टरों की टीम ने जाँच में यह पाया कि अस्पताल ने मरीज पर अपने ही मेडिकल स्टोर से ब्रांडेड दवा खरीदने के लिए गैरकानूनी तरीके से दबाव डालकर लाखों रुपये का बिल बनाया और एडवांस पैसे कि लिए भर्ती मरीज के घर बाउंसर भेजता है।
ऐसे मामले उन अनेकों मामलों में से एक हैं, जो पूरे देश में रोज घटित हो रहे हैं। यह तो दिल्ली और उसके आस-पास का मामला है, जो मीडिया में कुछ देर के लिए ही सही जगह पा जाता है, नहीं तो यह गोरखधंधा तो राजधानियों से लेकर जिलों, कस्बों, गाँवों तक दिन दूनी रात चौगुनी गति से खूब फल-फूल रहा है। ये निजी अस्पताल न केवल अनेक तरह के अनावश्यक ऑपरेशन करने, अनावश्यक दवाइयों के दस गुने-बीस गुने दाम वसूलने, मरे हुए मरीजों को भी कई दिनों तक वेंटिलेटर पर रखकर बिल बढ़ाते जाने, यहाँ तक कि किडनी रैकेट और मानव अंगों की तस्करी तक में भी शामिल हैं।    
आंकड़े बताते हैं कि आज भी देश में इलाज पर लोग अपनी क्षमता से बाहर 70 फीसदी खर्च करने को मजबूर हैं। केन्द्र सरकार ने अब स्वास्थ्य पर 2.5 फीसदी खर्च का लक्ष्य रखा है, लेकिन 2002 में भी नीति बनाते वक्त 2010 तक इसे 2 फीसदी करने का लक्ष्य रखा था, लेकिन आज भी यह खर्च 1.2 फीसदी तक ही है। विश्व स्वास्थ्य सूचकांक में भारत का स्थान 188 देशों में 143वाँ है। भारत, स्वास्थ्य पर अपनी जीडीपी का सिर्फ 1.2 प्रतिशत व्यय करता है। जबकि अमेरिका का 8.3 प्रतिशत, चीन 3.1 प्रतिशत और दक्षिण अफ्रीका 4.2 प्रतिशत। दशकों से लगातार स्वास्थ्य सेवा को किनारा कर दिए जाने के कारण हमारी सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था इतनी भ्रष्ट और जर्जर होती गई कि इस क्षेत्र में निजी डॉक्टरों, व्यवसायियों, बिल्डरों, झोलाछाप नीम-हकीम डॉक्टरों और तथाकथित तांत्रिक बाबाओं तक को लोगों का खून पीने के लिए खुला मैदान मिल गया।   
भारतीय जनता पार्टी नें 2014 के आमचुनाव में अपने घोषणापत्र में यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज (यूएचसी) का वादा किया था। देश के हर नागरिक को प्राथमिक से हर स्तर की सभी जरूरी स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराना ही यूएचसी है, जिसमें सबको समय पर सहज, सुलभ और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सुविधा मिल सके। इसके लिए केन्द्र सरकार ने दर्जनों एम्स खोलने से लेकर दवाइयों एवं इलाज में काम आने वाले जरूरी सामानों का उचित मूल्य निर्धारण के लिए कई कदम उठाने की घोषणा कर उसके अनुपालन का प्रयास कर रही है। परंतु यह यूएचसी के लिए नाकाफी है। यूएचसी का लक्ष्य कब तक पूरा होगा, कोई समय सीमा तय नहीं है। तो सवाल है कि कब तक लोग निजी अस्पतालों के हाथों लूटते और मरते रहेंगे? लांसेट के एक अध्ययन के मुताबिक, स्वास्थ्य पर निवेश करने से 10 गुणा रिटर्न मिलता है। स्वास्थ्य सुविधा बेहतर होने से व्यक्ति की उम्र में एक साल का इजाफा होता है तो उत्पादकता बढ़ने से जीडीपी में 4 फीसदी की सालाना बढ़ोतरी होती है।
अनेक किंतु परंतु के बाद भी देश की जनता ने प्रधानमंत्री के नोटबंदी एवं जीएसटी जैसे कड़े फैसलों में अनेक तकलीफों को सहकर भी भारी जनसमर्थन दिया। गुजरात और हिमाचल में विजय इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। देश की आर्थिक स्थिति पर विरोधी दलों, मीडिया संस्थानों द्वारा लगातार प्रश्नचिह्न लगाने के बावजूद देश की अर्थव्यवस्था रफ्तार पकड़ रही है। आर्थिक रेटिंग एजेंसियां भी सकारात्मक संदेश दे रही हैं। सेंटर फॉर इकोनॉमिक्स एंड बिजनेस रिसर्च वर्ल्ड इकोनॉमिक लीगने यह अनुमान लगाया है कि भारत 2018 में फ्रांस और ब्रिटेन को पछाड़कर दुनिया की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगी। एक तरफ यह उजला पक्ष और दूसरी तरफ दुनिया के स्वास्थ्य सूचकांक में भारत का 188 देशों में 143 वाँ स्थान, क्या यह शर्मसार करने वाली बात नहीं होगी?
क्या कोई सरकार देश की आंतरिक और बाहरी सुरक्षा को प्राइवेट एजेंसी के हवाले कर सकती है? ऐसा करने के नतीजे कितने भयंकर हो सकते हैं, यह कल्पना के परे है। उसी तरह लोगों के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए भी किसी लाभ के उद्देश्य से चलने वाली निजी एजेंसियों के हवाले कैसे कर सकती है, जिसका प्राथमिक ध्येय ही येन-केन-प्रकारेण लाभ कमाना है? सरकार अगर देश का सुरक्षा बजट कुल बजट का 12-13 प्रतिशत कर सकती है जो जरूरी भी है, तो स्वास्थ्य जैसी बुनियादी जरूरत पर ईमानदारी से 5-6 प्रतिशत खर्च होना ही चाहिए। भारत सही मायने में विकसित देश तभी होगा, जब यहाँ के सामान्य जन पूरी तरह से स्वस्थ और सुरक्षित होंगे।


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