Friday, August 5, 2016
Wednesday, July 6, 2016
विकलांग परिंदों के शिकारी
मेरा चार साल का बेटा
विवेकानंद रोज सुबह उठने के बाद बॉलकनी में खड़े होकर बिजली के तारों पर और पार्क
के पेड़ों पर चिडिया, कौवे, कबूतरों और बंदरों को देखता रहता है और मुझपर इनसे संबंधित अनगिनत
प्रश्नों के बौछार करता रहता है। उस दिन भी यही सिलसिला चल रहा था कि अकस्मात एक
कबूतर फड़फड़ाते हुए मेरी बॉलकनी में गिरा और डरा-सहमा कोने में स्थिर हो गया। हम
दोनों आश्चर्य से उसे देखने लगे। विवेकानंद तो कुछ ज्यादा ही विस्मित था। पापा, कबूतर यहाँ कैसे आया? क्या हम इसे अपने घर में रख सकते हैं? अब इसे जाने नहीं देंगे... मैंने कहा रुको तो सही, मैं उसके पास गया वह लंगड़ा रहा था और बीमार लग रहा था। मैंने उसे पकड़
लिया। उसके पैर में जख्म था, काफी कमजोर लग रहा था। विवेकानंद भी उसे
प्यार से सहलाने लगा। उसे पानी पीने को दिया परंतु कबूतर छूकर छोड़ दिया। फिर चावल
के दाने भी दिए परंतु उधर बिना देखे कोने में सिमट गया। इधर प्रश्न जारी था। पापा
यह पानी च्यूं नही पी रहा है? यह चावल च्यूं नहीं खा रहा है? मैं इसको अपने हाथ से खिलाऊं? मैंने कहा, उसके पैर में चोट लगी है, शायद बीमार है। चलो उसे आराम करने दो, थोड़ी देर में खूद ही पियेगा और खायेगा... वह उसके आगे से टस से मस
नहीं हो रहा था। मैंने फिर कहा, बाबू उसे छोड़ दो वह डरा हुआ है, इधर कमरे में आ जाओ... वह कमरे के दरवाजे पर आ तो गया परंतु उसकी
नजरंे उसी पर टिकी रहीं। इधर मैं अखबार पलटने लगा। तभी एक बिल्ली पता नहीं किधर से
आई और पलक झपकते ही झपट्टा मारकर सड़क पर, फिर सामने पार्क के कोने में उसकी गरदन दबोच कर रक्त के छीटे और पंख
बिखेर दिए। हम दोनों स्याह नजरों से इस हृदय विदारक दृश्य को देखते रह गए
विवेकानंद तो बहुत देर तक पलक झपकाना ही भूल गया...
ऑफिस जाते मेट्रो में
जब अखबार खोला तो जिस समाचार पर नजर गयी वह था ‘अपोलो किडनी रैकेट’। कानपुर के उमेश का छोटा-मोटा व्यापारी
था परंतु बेटे के पैर के ऑपरेशन में उसपर काफी कर्ज चढ़ चुका था। उमेश की मुलाकात
आशु नाम के किडनी दलाल से हुई। आशु ने उन्हें लाखों रुपये मिलने का लालच दिया, जिसके बाद उमेश किडनी बेचने को तैयार हो गया। आशु उमेश को लेकर
दिल्ली आ गया। उसकी मुलाकात असीम सिकदर और दिल्ली अपोलो अस्पताल में डॉक्टर अशोक
सरीन के पर्सनल कर्मचारियों आदित्य और शैलेष से कराई गई। इनके पास किडनी के कई
तलबगार थे। उमेश की किडनी गाजियाबाद के आशुतोष को ट्रांसप्लांट करने का फैसला किया
गया। उमेश के फर्जी पहचान पत्र आशुतोष के परिवार के सदस्य सुरेश चंद पुत्र रामपाल
गौतम के नाम से तैयार कर किडनी आशुतोष को ट्रांसप्लांट कर दी गई। किडनी बेचने के
एवज में उमेश को तीन लाख रुपये मिले जबकि मरीज से 25 लाख रुपये लिए गए थे।
इसके बावजूद उमेश का
कर्ज नहीं उतरा। दलाल ने उनकी पत्नी नीलू की किडनी बेचने के लिए दबाव बनाया। इसमें
उमेश को चार लाख रुपये मिले। कुछ इसी तरह का सच पश्चिम बंगाल, जलपाईगुड़ी की मौमिता मौली का है। मौमिता के पति देवाशीष मौली ने पहले
अपनी किडनी बेची फिर मौमिता की भी किडनी बेच दी। परंतु रकम मौमिता को नहीं दी थी, इसी कारण दोनों में झगड़ा हो गया था और पुलिस को इस किडनी रैकेट का
सुराग मिला।
अपोलो अस्पताल जहाँ
अक्सर जानी मानी हस्तियां अपना इलाज कराने के लिए पहुँचती हैं। जिसको तमाम
सुविधाओं से लैस माना जाता है। इस अस्पताल में एक ऐसा किडनी रैकेट चल रहा था जिसके
तार सिर्फ देश ही नहीं, बल्कि विदेशों तक भी फैले हुए थे। इसके
शिकार देश के हर हिस्से के अनेकों गरीब और मजबूर लोग हो चुके हैं।। पुलिस ने इस
रैकेट के पाँच धंधेबाजों का गिरफ्तार किया है। असीम सिकदर, सत्य प्रकाश उर्फ आशु, देवाशीष मलिक, आदित्य और शैलेष सक्सेना। इसके ऊपर है
इस रैकेट का मास्टरमाइंड राजकुमार राव जिसका नेटवर्क भारत के बाहर श्रीलंका और
इंडोनेशिया तक फैला है।
इस रैकेट में हर
धंधेबाज के हिस्से का काम बंटा हुआ था। कुछ लोग शिकार यानी डोनर की तलाश करते थे, जबकि कुछ रिसीवर की। फिर शिकार और डोनर को रिश्तेदार दिखाने के लिए
फर्जी कागजात बनाए जाते थे। अस्पताल के कर्मचारी इस काम में उनकी मदद करते थे। ये
रैकेट किड़नी के लिए जरूरतमंद से 20 से 25 लाख वसूलता था। इसमें बिचौलियों को 1-1
लाख रुपए मिलते थे। जबकि डोनर को सिर्फ 3 से 4 लाख। खास बात ये है कि विदेशी
जरूरतमंद को किडनी बेचने के लिए हिंदुस्तानी के मुकाबले कई गुना ज्यादा रकम मिलती
है। ऐसे में सवाल ये है कि आखिर बाकी की मोटी रकम कहाँ जाती थी। दिल्ली पुलिस के
मुताबिक दिल्ली के अपोलो अस्पताल में किडनी ट्रांसप्लांट रैकेट में जो गैंग काम कर
रहा था, उसकी पहुँच अपोलो के एमएस के दफ्तर तक
थी क्योंकि किडनी ट्रांसप्लांट की सारे कागजी प्रकिया एमएस ऑफिस के जरिए ही पूरी
होती थी।
मैं जानता हूँ घर
लौटते ही विवेकानंद उस बिल्ली द्वारा कबूतर का शिकार करने से संबंधित अनेकों
प्रश्न करेगा परंतु अब जवाब मेरे पास भी नहीं है क्योंकि इस बीच मेरे जेहन में
इंसानी भेड़िए और कमजोर इंसान का शिकार करने वाले (किडनी दलाल) बिल्ले भी इसमें
शामिल हो चुके हैं!ं बात सिर्फ किसी जानवर द्वारा कमजोर जीव का शिकार तक सीमित
होता तो आसानी से यह कहकर पिंड छुड़ाया जा सकता था कि बेटा, बिल्ली तो जानवर है न उसे अच्छे-बूरे कर्म का विवेक नहीं होता। परंतु
उस सभ्य इंसान के बारे में क्या कहा जाए? जिसे पूरा पता है कि मानव सभ्यता के संघर्ष का पूरा इतिहास जानवर से
एक मुकम्मल इंसान बनने की है। जब जीवनदायक डॉक्टर और अपोलो जैसे अस्पताल जिसे जीवन
से हार मान बैठे मरीजों के लिए आखिरी सहारा माना जाता है। वह जब करोड़ों रुपये
बनाने के लिए खूंखार बिल्ले (रैकेटियर) पाल ले जो गरीब, बीमार, विकलांग, लाचार लोगों को नित नए तरीके से शिकार करने लगे तो प्रश्न काफी जटिल
हो जाता है। वह बिल्ली तो शायद पेट भर जाने के बाद उस दिन दूसरे कमजोर जीव की
हत्या नहीं करेगी, परंतु इन इंसानी भूखे भेड़ियों के बारे
में दावे के साथ नहीं कहा जा सकता है कि इनके कुछ बिल्ले पकड़ में आ जाने के बाद भी
ये शिकार के दूसरे नये तरीके इजाद नहीं करेंगे!
Saturday, June 4, 2016
लाभ और लोभ का जानलेवा खेल
ब्रेड, पाव
या मैगी बनाने वाली देशी और मल्टीनेशनल कंपनियां खतरनाक रसायनों के मिलावट में
पकड़ी गईं। हंगामा मचने पर व्यापार चौपट होने के भय से भले ही अब यह कहने पर मजबूर
हुई हों कि अब वे उन हानिकारक तत्त्वों का प्रयोग नहीं करेंगी, परंतु अब तक जो कीमती जान का नुकसान हुआ होगा, उसकी भरपाई कौन करेगा? यही कंपनियां जब यूरोप या अमेरिका में
स्वास्थ्य के सारे मानदंडों के अनुरूप पारदर्शी तरीके से काम कर सकती हैं तो भारत
और अनेक विकासशील एवं पिछड़े देशों में सब नियमों और कानूनों को ताख पर रखकर किस
तरह इंसान की जान को जोखिम में डालती हैं, यह
मामला इसका भयावह उदाहरण है। अगर ये कंपनियां यहाँ ऐसा गोरखधंधा कर रही हैं तो
इन्हें भलीभांति पता है कि यहाँ के छोटे-बड़े व्यापारी से लेकर सरकारी जांच
एजेंसियां एवं नियम-कानूनों का पालन कराने वाला पूरा तंत्र भ्रष्टाचार में आकंठ
डूबा हुआ है। वे इनको अपने अवैध लाभ के चंद टुकड़े फेंककर आम लोगों की जान से खेल
सकते हैं।
सीएसई यानी (विज्ञान एवं पर्यावरण केंद्र) के
ताजा अध्ययन में ब्रेड में कैंसर जैसी घातक बीमारी के तत्त्व पाए जाने का खुलासा
हुआ है, जांच के मुताबिक ब्रेड बनाने के लिए
इस्तेमाल में लाए जाने वाले आटे के चौरासी फीसद नमूनों में पोटैशियम ब्रोमेट और
पोटैशियम आयोडेट मिले हैं, जिसके लगातार सेवन से कैंसर और थायराइड
जैसी बीमारियां हो सकती हैं। पिछले साल मैगी में अत्यधिक मात्रा में मोनोसोडियम
ग्लूटामेट और शीशा मिले होने पर तथा कई साल पहले सीएसई ने ही कोका कोला और पेप्सी
कोला जैसे ठंडे पेयों में कीटनाशकों की मात्रा और उसकी वजह से होने वाली अनेक
जानलेवा बीमारियों के बारे में एक अध्ययन जारी किया था जिसपर खूब हंगामा मचा था।
हमारे देश में मिलावट का यह धंधा प्रारंभ में
मामूली मिलावटों से शुरू हुआ। लोभ के इस खेल में मामूली शारीरिक एवं आर्थिक नुकसान
तो था परंतु जानलेवा नहीं था, जैसे चावल में थोड़ा कंकड मिला देना, दूध में पानी मिला देना या घी में थोड़ा वनस्पति
फेंट देना। ध्यान देने पर असली और मिलावटी का फर्क मालूम पड़ जाता था, सब अपने आप को बचाकर चलते थे। धंधा चोखा था, चलता रहा। परंतु अब यह सारी हदों को लांघ गया
है। व्यापारियों और कानून के रखवालों ने भी समानांतर सहकारी तंत्र विकसित कर लिया, जो दोनों के लिए फायदेमंद था। मिलावट के धंधे
दिन दूनी रात चौगुनी वृद्धि होने लगी। असली नकली का फर्क मिटने लगा और हाल के
वर्षों में ऐसा समय आया जब मिलावट के साथ-साथ सिर्फ और सिर्फ नकली का ही धंधा चल
निकला। आज बाजार में सभी खाद्य पदार्थों के नकली ब्रांड असली पैकेज के साथ उपलब्ध
हैं। पहले जहाँ कम से कम यह खयाल रखा जाता था कि मिलावट में कम से कम कोई ऐसा
पदार्थ न मिला हो कि लोगों के लिए तुरंत जानलेवा साबित हो, अब वह भी समाप्त हो गया। अब तो खुलेआम दूध के
नाम पर रिफाइंड, खड़िया और डिटरजेंट तो घी मरे पशुओं की
चर्बी और हड्डियों का बुरादा मिलाकर बनाया जाता है। मसालों के नाम पर रंग मिला
चूना और भूसी मिलाकर बेच रहे हैं। कोई भी खाद्य पदार्थ नहीं बचा है जिसका नकली
ब्रांड बाजार में उपलब्ध न हो।
बात खाद्य पदार्थों तक ही नहीं रुकी, इसने जीवनदायिनी दवाओं को भी अपने चंगुल में ले
लिया। आज स्थिति यह है कि बाजार में बिकने वाली दवाओं का बीस से पच्चीस प्रतिशत
हिस्सा नकली है। सरकारी सूत्रों के अनुसार है कुल दवाइयों में आठ से दस प्रतिशत
नकली दवाइयां बनती हैं। दूसरा आकलन है कि पूरी दुनिया में बनने वाली कुल नकली
दवाओं का पचास प्रतिशत हिस्सा भारत में तैयार होता है। इंडियन मेडिकल एसोसिएसन का
अनुमान है कि बाजार में बिकने वाली दवा के हर पाँच पŸाों में एक नकली होता है। कुछ साल पहले चीन
अपनी नकली दवाओं को अफ्रिकन देशों में ‘मेड
इन इंडिया’ की मुहर के साथ बेचता पाया गया था।
इससे हमारी साख का पता चलता है।
हद तो तब हो गई जब मानव अंगों की तस्करी की
जाने लगी। कई दशकों से कडनी और खून का अवैध धंधा चल ही रहा है, जिसमें गरीब मजदूरों, गरीब महिलाओं, नशाखोरों, भिखारियों और यहां तक कि बच्चों तक को बंधक
बनाकर, बहला-फुसलाकर खून से लेकर किडनी तक
निकाल लिया जाता है। यह धंधा देश के गरीब सुदूर प्रांतों से लेकर राजधानी दिल्ली
उसके आस-पास के आधुनिक उपनगरों में जोरों से चल रहा है। इसमें एक और आयाम तब जुड़ा
था, जब कुछ साल पहले लखनऊ के ठाकुरगंज
इलाके में पुलिस के छापे में एक सुव्यवस्थित प्रयोगशाला में बड़े पैमाने पर नकली खून
के पैकेट, सिरिंज, फर्जी
मुहर और स्टीकरों सहित छत्रपति शाहू जी महाराज चिकित्सा महाविद्यालय का प्राधिकार
पत्र भी बरामद हुए। जाँच से पता चला कि यहाँ से न केवल नकली खून बनाकर बेचते थे बल्कि इंसान का खून
बताकर जानवरों के भी खून को कई ब्लड बैंकों को बेच रहे थे। गिरफ्तार लोगों ने
स्वीकार किया था कि अब तक उन्होंने करीब सवा लाख लोगों को खून बेचा है। वास्तविक
आँकड़ा इससे कहीं ज्यादा हो सकता है। साफ जाहिर है कि यह धंधा संगठित रूप से चलाया
जा रहा है, जिसमें डॉक्टर तस्कर, प्रशासन के शामिल हुए बिना यह संभव नहीं है।
आज हमारे देश का आम उपभोक्ता हर समय एक डर के
साये में जी रहा है। लाभ और लोभ का ऐसा जानलेवा खेल खेला जा रहा है, जिसमें हवा, पानी, भोजन के तमाम उत्पादों से लेकर जान बचाने के
लिए प्रयुक्त होने वाली दवाइयां एवं रक्त तक में मिलावट एवं नकली का खुलेआम प्रयोग
हो रहा है। समय रहते सरकार के एफएसएसएआई यानी भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक
प्राधिकरण जैसे संस्थाओं को सिर्फ शिकायत मिलने पर ही नहीं बल्कि अपनी पहल पर औचक
निरीक्षण कर स्वास्थ्य के मानकों को हर स्तर पर लागू करना होगा। सीएसई जैसी
स्वैच्छिक संस्थाओं को और आगे बढ़कर काम करने के लिए प्रोत्साहित करना पड़ेगा। साथ
ही सरकार, मीडिया एवं समाज के प्रबुद्ध वर्गों को
जनजागरूकता के कार्य में लगना होगा,
तभी
हम इस लाभ और लोभ के चक्रव्यूह को तोड़ पायेंगे और भारत सही अर्थों में एक विकसित
देश बनेगा।
Wednesday, May 11, 2016
अंतरात्मा के दिशा-निर्देश
सर्द जनवरी, शनिवार
की शाम थी। आफिॅस से घर जाने के लिए तैयार ही था कि फोन आया। मैंने हलो...कहा।
अंकलजी, मैं कुणाल बोल रहा हूँ, मैंने कहा, कौन
कुणाल? ...अरे अंकलजी, गाँव का मिट्ठू। अरे हाँ, मिट्ठू बोलो...। बोला, मैं यहां सोलन हिमाचल प्रदेश में काम करता हूँ, कल जब फैक्ट्री से शाम को अपने कमरे पर आ रहा
था तो पहाड़ी के पास करीब दो साल का बच्चा मिला, वह
अकेला बहुत रो रहा था। उधर से गुजरनेवाले सारे लोग उसे अनदेखा करते हुए चले जा रहे
थे, परंतु मुझसे रहा नहीं गया और मैंने
जाकर उसे उठा लिया, वह मुझसे चिपककर जोर-जोर से रोने लगा।
काफी देर तक इधर-उधर देखा कि शायद उसके माता-पिता कहीं मिल जाएँ, परंतु कोई नहीं मिला। अंधेरा हो रहा था, ठंड से बुरा हाल था। अजीब स्थिति थी, अगर उसको छोड़ देता तो बर्फबारी और ठंड से वह
जिंदा नहीं बचता। उसे कमरे पर ले आया। मेरे साथ रहने वाला लड़का तथा आस-पास के सभी
कहने लगे, यह क्या मुसीबत तुम ले आए, खुद भी फंसोगे और दूसरों को भी फंसाओगे। उसने
आगे कहा, अंकल जी, मैं
इस बच्चे को खुद रखकर पालना चाहता हूँ...बहुत प्यारा बच्चा है। मैं क्या इसको गोद
ले सकता हूँ?...
मैंने कहा, मिट्ठू
देखो यह तो तुमने बहुत अच्छा किया कि उसको बचा लिया...मगर उसे घर क्यों ले आए, उसे थाने क्यों नहीं पहुंचाया। अरे बेवकूफ, उसके मां-बाप उसे ढूँढ़ रहे होंगे, उसे जल्दी थाने ले जाकर सौंप दो, नहीं तो कल कोई तुम्हें उल्टे ही किडनेपिंग के
मामले में फँसा देगा। जहाँ तक गोद लेने का मामला है तो अभी तुम्हारी उम्र नहीं है
और गोद लेने के लिए बहुत लंबी कानूनी प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। मैंने पुनः
जोर देकर कहा जल्दी से उसे थाने ले जाओ। उसने धीरे से कहा, ठीक है अंकल जी...। मैंने कहा, थाने में सबकुछ सच-सच बता देना। उसने कहा, जी...। फोन कट गया रास्ते भर उसके बारे में
चिंतामग्न रहा।
घर जाकर फोन लगाया, नहीं लगा...दूसरे दिन कई बार फोन लगाया, नहीं लगा। रात को उसका फोन आया। उसने कहा, अंकल जी, आपने
जैसा कहा था, कल वैसे ही तुरंत एक साथी को लेकर थाने
चला गया था। पुलिस वाले अनेकों प्रश्न पूछते रहे और कल से ही भूखे-प्यासे बिठाये
रखा। यह कहने पर कि हमें छोड़ दीजिए काम पर भी जाना है, खाना-पीना है, परंतु
वे नहीं माने कहते रहे जबतक पूरी कानूनी प्रक्रिया पूरी नहीं होगी, यहीं बैठे रहो। तुम्हें यहाँ कोई मार-पीट थोड़े
ही रहा है। अंत में, कई कागजों पर साइन करवाने, मेरा घर, गाँव
मोबाइल नं., फैक्ट्री का पता आदि लेने के बाद यह
कहकर कि जबतक हम नहीं कहें, सोलन छोड़कर कहीं नहीं जाना...और जब हम
बुलायें तुरंत हाजिर होना। अभी रात में छोड़ा है।
यह वाकया मेरे जेहन में हाल ही में सर्वोच्च
न्यायालय के इस फैसले के संदर्भ में याद आ गया। जिसमें सड़क हादसों के पीड़ितों की
घटना स्थल पर मदद करने वाले नेक लोगों की हिफाजत के लिए केंद्र सरकार के
दिशा-निर्देशों को सुप्रीम कोर्ट ने मंजूरी दी है। सड़क पर दुर्घटना के शिकार को
तुरंत मदद मुहैया कराने वाले लोगों को कानूनी तौर पर सुरक्षा का मार्ग प्रशस्त कर
सुप्रीम कोर्ट ने सराहनीय कदम उठाया है। केंद्र की गाइडलाइन्स को सर्वोच्च अदालत
के वैधानिक समर्थन के बाद अब लोग निडर होकर लोगों की मदद करने को आगे आएंगे। अभी
सड़क पर दुर्घटना के पीड़ितों को अस्पताल पहुंचाने से लोग हिचकते हैं। वे मदद करना
चाहकर भी इस आशंका से कि पुलिस बार-बार थाने बुलाकर मानसिक उत्पीड़न करेगी। इस वजह
से लोग दुर्घटना स्थल से कन्नी काट लेते हैं। सड़क परिवहन मंत्रालय की रिपोर्ट के
मुताबिक दुर्घटना के शिकार लोगों को अगर तुरंत इलाज मिल जाए तो हर साल हजारों
लोगों की जान बचाई जा सकती है।
मैंने हाल में मिट्ठू से उस वाकये के बारे में
पूछा, उसने चिहुंककर जवाब दिया, हाँ अंकल, चार
दिनों बाद पुलिस वालों ने मुझे फिर फोन कर बुलाया, उस
बच्चे के माता-पिता मिल गए थे। वे लोग टूरिस्ट थे। वह बच्चा किसी तरह उनसे बिछुड़
गया था, उसे पाकर बहुत खुश और एहसानमंद थे। वे
मुझे जबर्दस्ती रुपये पकड़ाने लगे परंतु मैंने लेने से मना कर दिया। मैंने कहा, तुमने लिया क्यों नहीं, अपना चार-पांच दिन बर्बाद किया, परेशान हुआ सो अलग। उसने कहा, अंकल, पैसे
लेकर क्या करता...पैसा तो काम करके कमाने में मजा आता है। मैं उस सुख को कभी नहीं
भूल सकता, जब उस बच्चे पर मेरी नजर पड़ी थी, वह मेरे सीने से चिपक गया था और तबतक चिपका रहा
जबतक कि जर्बदस्ती पुलिस वाले ने उसे मुझसे अलग नहीं कर दिया।... मैं थाने में उसे
छोड़कर आने के बाद उन चार दिनों तक सो नहीं पाया था, जबतक
कि उसके माता-पिता और परिवार उसको मिल नहीं गया।
सुदूर झारखंड से अपने घर की गरीबी और बेरोजगारी
से पार पाने के लिए हिमाचल की ठंड में वनवास भोगनेवाले मिट्ठू को बिना बताये उसके
अंदर के उस जिंदा इंसान को नमस्कार किये बिना मैं नहीं रह सका। सोचने लगा कि क्या
मिट्ठू ने उस बच्चे को गोद में उठाने से पहले किसी दिशा-निर्देश के बारे में एक पल
के लिए भी सोचा होगा?
इसमें कोई शक नहीं है कि ये दिशा-निर्देश
सहायता के लिए बढ़े उन हाथों को बहुत ताकत देगी, जो
लोगों की सहायता करना चाहते हैं। इस कानून का विस्तार और कई मामलों जैसे गुमशुदा
बच्चों की तालाशी में, सड़कों पर हो रहे हिंसक हमलों में, महिलाओं पर होनेवाले लैंगिक भेदभाव तथा
बुजुर्गों की सहायता करने वाली बाधाओं को दूर करने जैसे अनेक सामाजिक समस्याओं तक
इसका विस्तार किया जा सकता है।
कोई भी महान दिशा-निर्देश या सहायता का सवाल तो
तभी आता है न, जब इंसान किसी अन्य को दर्द में डूबा
देखकर उसकी ममता और करुणा उसके अंदर उथल-पुथल मचा दे, पीड़ा में पड़े के प्रति सहायता हेतु हाथ बढ़ाने
के लिए उसकी अंतरात्मा उसे व्यग्र और बैचेन कर दे। अगर अंदर से ऐसा नहीं हो पाता
है तो समझिए, हम इंसान के रूप में अपनी लाश ढो रहे
हैं और लाशों पर सरकार तथा किसी भी न्यायालय का दिशा-निर्देश लागू नहीं होता!
Monday, April 11, 2016
जनतंत्र तो जीवन पद्धति है
आजादी मिलने के तुरंत बाद महात्मा गांधी ने यह
सद्इच्छा व्यक्त की कि कांग्रेस को एक सामाजिक आंदोलन का मंच रहने दिया जाए और
मौजूदा सरकार में शामिल नेता राजनीतिक दल के रूप में एक अलग पार्टी का गठन करें।
परंतु उस समय के प्रधानमंत्री जवाहर लाल तथा अन्य सत्ताधारी नेताओं ने इसे अनसुना
कर दिया। गांधीजी यह बात भलीभांति जानते थे कि देश में जो राजनीतिक लोकतंत्र का
शासन चल रहा है और संविधान लागू होने के बाद उसका जो स्वरूप उभर कर आएगा, उसको सन्मार्ग पर ले जाने के लिए एक
परिपक्व सामाजिक जनतंत्र की उर्वर भूमि की जरूरत है। अगर गांधीजी के पास कुछ साल
का समय होता तो वे कांग्रेस के समान एक दूसरा आंदोलनकारी सामाजिक संगठन खड़ा कर हर
स्तर पर सामाजिक जनतंत्र को मजबूत करने निकल पड़ते, ताकि जनतंत्र सचमुच की जीवन पद्धति,
आचार-व्यवहार
एवं जीवन व्यापार का तरीका बन जाए, न कि यह सिर्फ पाँच साल में सरकार चुनने का एक
उपक्रम मात्र। गांधीजी राजनीतिक और सामाजिक जीवन को देखने पर यही पता चलता है कि
वे एक तरफ जहाँ आजादी के लिए अनेक राजनीतिक आंदोलनों के जरिए संघर्ष करते रहे,
वहीं समाज सुधार
के आंदोलनों और संघर्षों में भी उसी तल्लीनता से लगे रहे।
गांधीजी की मंशा यह थी कि कांग्रेस एक सामाजिक
संगठन के रूप में एक तरफ जहाँ जनता में जागरूकता लाये कि वह जात-पांत, छुआछूत, सांप्रदायिक, क्षेत्रीय एवं भाषाई संकीर्णताओं,
अंधविश्वासों,
लैंगिक भेदभाव
आदि से दूर रहे। वहीं दूसरे तरफ समाज का हर व्यक्ति एवं संगठन समाज के कमजोर वर्गों, पर्यावरण, स्वच्छता, भाईचारे, एक स्वाबलंबी एवं सम्मानित समाज लिए
निरंतर आंदोलनरत रहे। परंतु सत्ताधारी नेताओं ने उनकी बातों को इस गुमान में
नजरंदाज कर दिया कि शासन अब हमारे हाथों में आ जाने के बाद सरकार ही सभी समस्याओं
का हल तलाश लेगी। नतीजा वही हुआ जिसका भान गांधी जी को बहुत पहले ही हो गया था।
जनतंत्र को सिर्फ चुनावों में जीतकर जश्न मनाने के रूप में ही तब्दील कर दिया गया।
चुनावी जीत के लिए राजनीतिक दल जनता एवं अनेक स्वार्थी समूहों या स्वनामधन्य वोट
के ठेकेदारों से कुछ भी असंभव वादे अपने घोषणापत्रों में करने लगे। आमजन लगातार
अपनी मुलभूत जरूरतों के लिए परमुखापेक्षी और केन्द्र या राज्य सरकारों पर निर्भर
होते गए। राजनीतिक वर्गों के एजेंडे में कभी सामाजिक जनतंत्र रहा ही नहीं।
हम यह कहते नहीं अघाते हैं कि हम विश्व के सबसे
बड़े लोकतंत्र हैं। जब हम यह बात कहते हैं तो हमारे दिलोदिमाग में यही बात होती है
कि हम जनता द्वारा चुनी हुई सरकारों द्वारा शासित हैं। परंतु जब हम सूक्ष्म तरीके
से मूल्यांकन करते हैं तो इसमें अनेकों तरह की खामियां मिलती हैं, जिनमें प्रमुख हैं- शिखर से लेकर धरातल
तक पैठा भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद,
जातिवाद,
सांप्रदायिक
उन्माद, लगातार
समाज में बढ़ती असमानता, नक्सलवाद,
आतंकवाद समेत
अनेक बुराइयां। दुःखद स्थिति यह कि इन सभी खामियों एवं बुराइयों को भुनाकर सत्ता
का के लिए संघर्ष करता राजनीतिक वर्ग। ध्यातव्य है कि जब हम राजनीतिक वर्ग कहते
हैं तो सिर्फ सत्ताधारी राजनीतिक दल नहीं बल्कि इसमें सत्ता के सभी अंग
कार्यपालिका, विधायिका,
न्यायपालिका,
यहां तक प्रेस
भी समाहित होता है।
इसमें कोई शक नहीं है कि आज देश में एक तरफ
समृद्धि आ रही है। लागों की सार्वजनिक सुविधाएं भी बढ़ रही हैं। तो दूसरी तरफ
लगातार हमारा समाज हिंसक से हिंसक होता जा रहा है। क्या गुजरात के पटेल या हरियाणा
के जाट समुदाय को वाकई में आरक्षण की आवश्यकता है? क्या लोगों में इतनी भी समझ नहीं होनी
चाहिए कि वे अपनी हिंसक कार्रवाइयों में जिसको शिकार बना रहे हैं, वह उन्हीं के सुख-दुःख का साझीदार
पड़ोसी है। जिन सार्वजनिक संपत्तियों स्कूल, अस्पताल, बस, रेलवे, वे सब उन्हीं के उपयोग के लिए हैं,
जिसपर देश या
समाज की प्रगति काफी हद तक निर्भर है और जिसको हासिल करने के लिए देश का बहुत बड़ा
वर्ग और क्षेत्र आज भी तरस रहा है? या फिर किसी राज्य द्वारा दूसरे राज्य को पानी
जैसी प्राकृतिक या मौलिक जरूरत को रोक देने के औचित्य को उचित ठहराया जा सकता है?
क्या विरोध करने
या बोलने की आजादी में देश के टुकड़े करने की माँग या आतंकवाद का खुलेआम समर्थन भी
शामिल होने चाहिए, वह
भी देश के भविष्य को दिशा देने वाले किसी विश्वविद्यालय में? क्या हम अपने पहाड़ों एवं नदियों को
नंगा एवं नाले में तब्दील कर स्वस्थ पर्यावरण एवं जीवन की कल्पना कर सकते हैं?
क्या देश के सभी
बच्चों एवं नागरिकों के लिए समान शिक्षा एवं स्वास्थ्य की समान व्यवस्था एवं अवसर
नहीं मिलने चाहिए? क्या
किसी भी सभ्य समाज में हर छोटे-मोटे वाद-विवादों पर घर-परिवार से लेकर सार्वजनिक
स्थानों तक में नृशंस हत्या एवं बलात्कार का इतना विद्रूप रूप रोज दिखते रहने के
बावजूद सरकार और समाज को इसके विरुद्ध सजग नहीं हो जाना चाहिए?
सिर्फ जनता के मतों से सरकार बन जाने या एक
आदर्श संविधान भर से हम बड़ा और महान लोकतंत्र नहीं हो सकते, जबतक कि हमारा पूरा समाज जनतांत्रिक
मूल्यों के अनुरूप अपने आप को पूर्णतः ढाल नहीं लेता और उसके अनुरूप जीवन प्रणाली
विकसित नहीं करता। गांधी जी की मंशानुरूप समाज को दिशा देने वाला कोई संगठन तो
अस्तित्व में नहीं आया। हाँ उस खाली जगह को भरने के लिए ढेर सारे स्वार्थी समूह या
एनजीओवादी संगठन जरूर अस्तित्व में आ गये, अधिकांश तो ऐसे पाये जाते हैं, जो जिस दर्शन या आदर्श को निमज्जित
अपने आप को बताते हैं, उसके
ठीक विपरीत काम करते हैं। आज यह समय की मांग है कि सरकार, समाज, सकारात्मक कार्य करने वाले अनेक
सामाजिक संगठन और मीडिया, हर स्तर पर प्रत्येक व्यक्ति, परिवार, समाज, देश और पूरी मानवता यहाँ तक कि पूरे
ब्रम्हांड के प्रति एक सकारात्मक जनतांत्रिक आचार-व्यवहार विकसित करे और जिसमें
हिंसा के किसी भी रूप के लिए कहीं कोई जगह न हो।
Monday, March 7, 2016
घृणा के रक्तबीज
हम लाख मानव की
प्रकृति के अहिंसक होने का दम्भ भरते रहें, परंतु वास्तविकता यह है कि जिस तरह मानव के अंदर अहिंसा का बीज
सुरक्षित पड़ा रहता है और अनुकूल वातावरण मिलते ही अंकुरित होकर सर्वकल्याणकारी, रचनात्मकता का रूप ले लेता है, उसी तरह इसके विपरीत अनेक तरह के घृणा से पोषित-पल्लवित हिंसा का
रक्तबीज भी कुंडली मार कर बैठा रहता है। जो जरा सी आहट पाते ही फुँफकार उठता है और
इंसान सारी हदों को पार करते अपने विरोधियों को मिटा देने को आतुर-व्याकुल हो जाता
है। इस आग में कभी व्यक्ति, कभी पूरा समाज तो कभी पूरा का पूरा देश
और अब तो पूरी दुनिया इससे दहक और दहल रही है।
आज हिंसा की सबसे बड़े
उत्प्रेरक धर्म, संप्रदाय, जाति, नस्ल, लिंग, वंश आदि हैं। अब तक यही माना जाता रहा
है कि जर्मनी में हिटलर की नाजीवादी सत्ता ने नस्ली हिंसा की सबसे भयानक तरीके का
इस्तेमाल अपने विरोधियों एवं यहूदियों को मिटाने के लिए किया था। परंतु आज जिस तरह
से इस्लामिक स्टेट जैसे आतंकवादी संगठनों द्वारा दूसरे समुदाय के लोगों एवं इस्लाम
के ही सिया संप्रदाय एवं उनके सोच से अलग विचार रखने वाले लोगों एवं समुदायों का
बीभत्स कत्लेआम, महिलाओं का उत्पीड़न, मासूम बच्चों तक को जिंदा बम के रूप में इस्तेमाल इतनी निर्दयता से
कर रहा है और उसे संचार माध्यमों द्वारा लाइव घरों तक पहुँचाया जा रहा है, वह इतना यंत्रणादायी है कि लगता है हम इंसानी सभ्यता की सबसे त्रासद
समय से गुजर रहे हैं।
यह सब हो रहा है उसी
धर्म एवं संप्रदाय के नाम पर जिसने मानव सभ्यता के विकास-पथ पर इंसान को अधिक सभ्य, सामाजिक, स्वतंत्र और शालीन, बनाने के मार्ग प्रशस्त किए थे। इसको प्रारंभ करने वाले महान लोग थे, जो मानव का कल्याण चाहते थे, वे किसी निजी स्वार्थ से परे थे। परंतु आज विभिन्न धर्मों के इतने
कट्टरपंथी स्वार्थी ठेकेदार पैदा हो गए हैं जो निजी स्वार्थ की पूर्ति के लिए धर्म
की ऐसी-ऐसी व्याख्यायें करने लगे हैं कि लोगों की स्वतंत्रता और समानता के सपने, उनकी आकांक्षाएँ सब निर्मम हिंसाओं के आगे भेंट चढ़ती जा रही है। इसका
विद्रूप रूप भारतीय समाज में भी इतने संवैधानिक, धार्मिक एवं सामजिक सुधारों के बावजूद भी रोज देखने को मिल रहे हैं।
कहीं सांप्रदायिक तो कहीं जातिवादी दंगे तो कहीं स्त्रियों को उसके लैंगिक आधार पर
भेदभाव। यह पाखंड अब इतनी खतरनाक स्थिति तक पहुँच गया है कि अब जिंदे इंसान की तो
बात ही छोड़िए गड़े मुर्दो तक को उसके नस्ल, कौम एवं कुनबे के आधार पर कब्र से उखाड़ कर फेंकने लग गए हैं।
पिछले दिनों घृणा का
यह नग्न रूप राजस्थान के उदयपुर में देखने को मिला। धर्म के ठेकेदारों ने उदयपुर
के खांजीपीर निवासी 88 वर्षीय मुहम्मद यूसुफ की गड़ी हुई लाश को बड़ी बेरहमी से यह
कहकर कब्रिस्तान से निकालकर उनके घर में फेंक दिया कि वे वहाबी या देवबंदी थे।
मुहम्मद यूसुफ का देहांत देर रात एक बजे हो गया था। उन्हें दूसरे दिन सुबह 11 बजे
अश्विनी बाजार स्थित कब्रिस्तान में दफनाया गया। परिजनों ने बताया कि कुछ देर बाद
ही घर पर फोन आने लगे कि आप मैयत कब्रिस्तान से निकालो, क्योंकि मुहम्मद यूसुफ वहाबी थे और उन्हें सुन्नी कब्रिस्तान में
नहीं दफनाया जा सकता।
उनके वकील बेटे हामिद
हुसैन ने कहा, ‘‘मैंने तो अपने वालिद को अल्लाह के
सुपुर्द कर दिया है। लेकिन वे नहीं माने और कुछ ही देर बाद वे मैयत हमारे घर फेंक
गए। इसके बाद मैं और मेरा बेटा तफज्जुल मैयत लेकर अपने पैतृक गाँव मंदसौर रवाना हो
गए, जहाँ देर रात उनको सुपुर्दे खाक किया
गया।’’
परिजनों का कहना है
कि मुहम्मद यूसुफ और उनका परिवार भी सुन्नी मुसलमान ही है, लेकिन लिखकर देने के बावजूद कोई मानने को तैयार नहीं होता। वजह यह कि
दशकों पहले एक बार कुछ लोगों के साथ उनकी
बहस हो गई थी। इस बहस में तकरार हो जाने पर उन्हें कहा गया कि वे तो वहाबी हैं।
यूसुफ कुछ जिद्दी और गुस्सैल थे। उन्होंने कह दिया, ‘‘हाँ हूँ, तो क्या कर लोगे।’’ इसके बाद ही झगड़ा और तनातनी बढ़ती गई। उनके कुछ रिश्तेदारों और
दोस्तों ने उन्हें समझाया कि वे जुर्माना भरकर या अपनी गलती मानकर सबके साथ हो लें, लेकिन वे अपनी बात पर डटे रहे। इसी से लोग उनसे इतना नाराज थे। हामिद
हुसैन का पूरा परिवार गमजदा है। उनको आशंका है कि जो लोग मैयत को कब्र से निकाल
सकते हैं, वे जिंदा लोगों के साथ भी न जाने क्या
कर गुजरें।
इस घटना से अनुमान लगाया जा सकता है कि एक लाश
के साथ जब उसी धर्म के लोग एक मामूली कहासुनी पर इस हद तक गिर सकते हैं कि उसे
कब्र से निकालकर फेंक सकते हैं। दुनिया के हर समाज और धर्म की नीति यही है कि कम
से कम मरे के साथ सम्मानजनक व्यवहार किया जाए यहाँ तक कि नृशंस हत्यारों एवं शत्रु
सेना तक की लाश के साथ उसके धर्म एवं सामाजिक रीति-रिवाजों के अनुरूप अंतिम
क्रिया-कर्म करने के वैश्विक मापदंड बने हुए हैं।
आज पूरी मानव जाति के
सामने यही प्रश्न है कि जिस धर्म, संप्रदाय, जाति, वंश, कुनबों को मानव समाज का जीवन सुगम बनाने के लिए बनाया था, वही आज इसका सबसे बड़ा न केवल रोड़ा बनकर खड़ा हो गया है बल्कि पूरी
मानव सभ्यता एवं संस्कृति को मटियामेट कर रहा है। घृणा का यह बर्बर चेहरा जीवित को
तो लील ही रहा है लाशों तक को अपने आगोश में ले लिया है।
आज इंसानी सभ्यता के
सामने यह गंभीर चुनौती है कि हर इंसान और समाज के अंदर कुंडली मारकर बैठे इस हिंसक
रक्तबीज को मिटाकर अपने अंदर दबे उस अहिंसक रचनात्मक बीज को संवारने का संगठित
प्रयास करे। ताकि मानव सभ्यता सदा फलती-फूलती रहे और दुनिया के के हर इंसान को इस
प्रकृति के प्रंागण में पैदा होने, फलित होने से लेकर मृत्यु की मैयत तक
सम्मानजनक निर्बाध वातावरण मिले।
Friday, February 12, 2016
आग बुझाने वाले समाज का हो अभिनंदन
हर समाज में दो तरह के लोग होते हैं, एक आग लगाने वाले और दूसरे बुझाने
वाले। आग लगाने वाले लोग बड़े ही स्वार्थी, संकुचित, धर्मांध, जातिवाद और अनेक प्रकार के दकियानूसी
विचारों से ग्रसित होते हैं, जबकि आग बुझाने वाले लोग उदार, समाजहित को देखने वाले एवं जनतांत्रिक
मूल्यों से संचालित होते हैं। कोई भी समाज कितना लोकतांत्रिक, समानतावादी एवं उदारवादी है, यह इस बात से ही तय होता है कि उस समाज
में कैसे लोगों का बोलबाला है। अगर उदारवादी प्रबुद्ध लोग ताकतवर हैं तो वे आग
लगाने वाले लोगों के विध्वंसात्मक कार्यों पर घड़ों पानी डालकर पुनर्निमाण करते हुए
नकारात्मक लोगों को भी सोचने पर मजबूर कर देंगे कि उनका रास्ता सही नहीं है। इसके
उलट अगर समाज में दकियानूसी कट्टरपंथी लोगों का आधिपत्य होगा तो वे किसी न किसी
बहाने से समाज में विध्वंसात्मक कार्यों को ही अंजाम देते रहेंगे और उदारपंथियों
को किनारे कर पूरे समाज को गर्त में गिरा देंगे। हाल के दिनों में देश में दो ऐसी
घटनाएँ घटी हैं, जिनके
विश्लेषण से हम बखूबी इस बात को समझ सकते हैं।
पहली आग लगाने वाली घटना 3 जनवरी को मालदा के कलियाचक की है।
जिसमें मुस्लिम समूदाय के लाखों की संख्या में उत्तर प्रदेश के एक हिंदू संगठन के
कथित सदस्य के महज एक आपत्तिजनक बयान के विरोध में जमकर हिंसा और उत्पाद मचाया।
कलियाचक में इकट्ठा हुई उग्र भीड़ ने न केवल पुलिस थाने को आग के हवाले कर तहस-नहस
कर दिया, बल्कि
बीएसएफ के कई वाहनों समेत सरकारी संपत्ति को भी आग के हवाले कर दिया। यहाँ तक कि
उस क्षेत्र में हिन्दू अल्पसंख्यकों के घरों और दुकानों में जमकर लूटपाट की,
मंदिर एवं उसके
पुजारी पर भी हमला किया। उनके इस हिंसा के आगे वहाँ का प्रशासन, राजनीतिक प्रतिनिधि, यहाँ तक कि मीडिया के मुँह पर भी या तो
ताला पड़ा रहा या मामले को झुठलाने या दबाने में लगे रहे।
अब दूसरी आग बुझाने वाली घटना ‘चक्रधरपुर’ (प.सिंहभूम) झारखंड की है। घटना यह है
कि ३ जनवरी की शाम कुछ नवयुवक पिकनिक से लौटते समय डीजे के तेज संगीत पर जय श्री
राम का नारा लगाते हुए आ रहे थे, कुछ उग्र मुस्लिम युवकों ने गाड़ी पर पथराव कर
दिया, मामला
हाथापाई से मारपीट तक बढ़ा और सांप्रदायिक रंग ले लिया। दोनों समुदाय के सैकड़ों लोग
नारेबाजी और पथराव करते हुए शहर के मुख्य चौराहे तक आ गए। इधर प्रशासन इस भीड़ को
काबू करने में व्यस्त रहा, उधर कुछ उपद्रवी तत्वों ने मुस्लिम बाहुल्य
गुदड़ी बाजार में आग लगा दी, मिनटों में दर्जनों दुकानें जल कर खाक हो गईं।
आग की लपटों ने शहर में व्याप्त साम्प्रदायिक तनाव को अपने चरम पर पहुँचा दिया।
प्रशासन ने तत्परता दिखाते हुए शहर को
अर्धसैनिक बालों के हवाले कर दिया। चाईबासा से दमकल को चक्रधरपुर पहुँचने में
घंटों लग गए। ठीक इसी समयावधि में आगे आया इस शहर के प्रबुद्ध नागरिक समाज का
चेहरा। मुसलमानों की दुकानों में लगी इस आग को बुझाने के लिए, इस कड़ी ठण्ड में भी सैंकड़ों हिन्दुओं
ने बिना किसी खतरे की परवाह किए जी-जान लगा कर दमकल के आने तक आग को फैलने से रोके
रखा।
घटना के दूसरे दिन लोग भय, आशंका और दुःख के कारण अपने अपने घरों
में दुबके रहे, शहर
में धारा 144
लगा दी गई, दुकानें
व अन्य प्रतिष्ठान बंद रहे, दोनों समुदाय के प्रभावित लोगों ने रात
सीआरपीएफ की निगरानी में किसी तरह काटी।
अगली सुबह हुई एक क्रांतिकारी विचार के साथ शहर
के कुछ सम्मानित प्रबुद्ध लोगों ने, जिन में विशेषकर मारवाड़ी, व्यापारी वर्ग और कुछ समाजसेवी शामिल
थे, ने
विचार रखा- ‘‘क्या
ही बेहतर हो कि इस आगजनी में हुए आर्थिक नुकसान को हम सब मिल कर साझा कर लें,
हम उनके नुकसान
की पूरी भरपाई तो नहीं कर सकेंगे किंतु इस घड़ी उनके जले पर मरहम जरूर रख सकते हैं।
अपने-अपने त्योहारों के अवसर पर जब हम लाखों जमा कर सकते हैं तो इस दुःख की बेला
में क्यों नहीं? ये
उन उपद्रवी लोगों के मुँह पर एक करारा तमाचा भी होगा, जो हमारे सभ्य समाज और देश की शांति,
सौहार्द और
भाईचारे को नुकसान पहुँचाना चाहते हैं।“
रेड क्रॉस सोसाएटी, मारवाड़ी युवा मंच, सीकेपी व्यापारी संघ, गुदड़ी बाजार समिति, मुस्लिम सेंटल अंजुमन कमिटी, नगरपालिका परिषद, प्राथमिक शिक्षक संघ, विभिन्न स्कूल और धार्मिक संस्थान
विशेषकर जामा मस्जिद और कांसेप्ट पब्लिक स्कूल के सदस्य इस नेक काम में हाथ बँटाने
आगे आ गए, लोगों
ने पाँच सौ से पचास हजार रुपये तक चंदा दिया। वही लोग जो बदले की भावना में उबल
रहे थे, अपनी
उर्जा को चंदा उगाही की इस मुहिम से जोड़ कर प्रभावित दुकानदारों को राहत पहुँचाने
में विसर्जित कर दिया।
मेरे मित्र इंतखाब आलम जिन्होंने सोशल मीडिया
पर बढ़-चढकर इस प्रयास को प्रसारित किया, ने बताया, ‘‘स्वयं वे दुकानदार जिनका माल जल कर खाक
हो गया था, और
जिनके बच्चे चीख-चीख कर कह रहे थे, हिन्दुओं ने हमारी दुकानें जला दीं...।
हिन्दुओं द्वारा शुरू की गई इस मुहिम की तारीफ करने लगे। अद्भुत था ये नजारा,
कल तक जहाँ आग,
बदला और विध्वंश
की बातें हो रहीं थीं, वहीं
आज निर्माण, प्रेम
और भाईचारे की चर्चा गली-गली होने लगी।’’
सामाजिक सद्भाव के इस कार्य में सभी धर्म,
समुदाय, वर्ग और दल के लोग शामिल थे, यहाँ तक कि भाजपा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, कांग्रेस, जनता दल, झामुमो जैसे धुर विरोधी राजनीतिक
विचारधारा के सदस्य और समर्थक भी कन्धा से कन्धा मिलाकर इस मुहिम में अपना सहयोग
देते नजर आए। कुछ दिनों में ही सात लाख रुपया जमा कर, प्रशासन के सहयोग से उन प्रभावित लोगों
के बीच वितरित कर दिया गया, जिनके सारे सपने इस आग में जल कर खाक हो गए थे।
कोई भी समाज ऐसा नहीं होता, जिसमें कुछ स्वार्थी, नकारात्मक सोच वाले न हों, परंतु अगर हमारा लोकतांत्रिक सभ्य समाज
मजबूत हो तो नकारात्मक विचारों की विषबेल फैलाने वाले लोगों की एक नहीं चलती है।
इसलिए आज आवश्यकता इस बात की है कि हम एक सभ्य लोकतांत्रिक समाज को बढ़ावा दें ताकि
पहले तो कोई आग लगा ही न पाये और लगा भी दे तो उसे मालदा जैसे आँख मूंदकर धू-धूकर
जलने के लिए न छोड़कर चक्रधरपुर जैसे फैलने से पहले रोककर पुनर्निर्माण कार्य
प्रारंभ कर दिया जाए। हमें चक्रधरपुर के नागरिक समाज का अभिनंदन करना चाहिए।
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