जनतंत्र तो जीवन पद्धति है
आजादी मिलने के तुरंत बाद महात्मा गांधी ने यह
सद्इच्छा व्यक्त की कि कांग्रेस को एक सामाजिक आंदोलन का मंच रहने दिया जाए और
मौजूदा सरकार में शामिल नेता राजनीतिक दल के रूप में एक अलग पार्टी का गठन करें।
परंतु उस समय के प्रधानमंत्री जवाहर लाल तथा अन्य सत्ताधारी नेताओं ने इसे अनसुना
कर दिया। गांधीजी यह बात भलीभांति जानते थे कि देश में जो राजनीतिक लोकतंत्र का
शासन चल रहा है और संविधान लागू होने के बाद उसका जो स्वरूप उभर कर आएगा, उसको सन्मार्ग पर ले जाने के लिए एक
परिपक्व सामाजिक जनतंत्र की उर्वर भूमि की जरूरत है। अगर गांधीजी के पास कुछ साल
का समय होता तो वे कांग्रेस के समान एक दूसरा आंदोलनकारी सामाजिक संगठन खड़ा कर हर
स्तर पर सामाजिक जनतंत्र को मजबूत करने निकल पड़ते, ताकि जनतंत्र सचमुच की जीवन पद्धति,
आचार-व्यवहार
एवं जीवन व्यापार का तरीका बन जाए, न कि यह सिर्फ पाँच साल में सरकार चुनने का एक
उपक्रम मात्र। गांधीजी राजनीतिक और सामाजिक जीवन को देखने पर यही पता चलता है कि
वे एक तरफ जहाँ आजादी के लिए अनेक राजनीतिक आंदोलनों के जरिए संघर्ष करते रहे,
वहीं समाज सुधार
के आंदोलनों और संघर्षों में भी उसी तल्लीनता से लगे रहे।
गांधीजी की मंशा यह थी कि कांग्रेस एक सामाजिक
संगठन के रूप में एक तरफ जहाँ जनता में जागरूकता लाये कि वह जात-पांत, छुआछूत, सांप्रदायिक, क्षेत्रीय एवं भाषाई संकीर्णताओं,
अंधविश्वासों,
लैंगिक भेदभाव
आदि से दूर रहे। वहीं दूसरे तरफ समाज का हर व्यक्ति एवं संगठन समाज के कमजोर वर्गों, पर्यावरण, स्वच्छता, भाईचारे, एक स्वाबलंबी एवं सम्मानित समाज लिए
निरंतर आंदोलनरत रहे। परंतु सत्ताधारी नेताओं ने उनकी बातों को इस गुमान में
नजरंदाज कर दिया कि शासन अब हमारे हाथों में आ जाने के बाद सरकार ही सभी समस्याओं
का हल तलाश लेगी। नतीजा वही हुआ जिसका भान गांधी जी को बहुत पहले ही हो गया था।
जनतंत्र को सिर्फ चुनावों में जीतकर जश्न मनाने के रूप में ही तब्दील कर दिया गया।
चुनावी जीत के लिए राजनीतिक दल जनता एवं अनेक स्वार्थी समूहों या स्वनामधन्य वोट
के ठेकेदारों से कुछ भी असंभव वादे अपने घोषणापत्रों में करने लगे। आमजन लगातार
अपनी मुलभूत जरूरतों के लिए परमुखापेक्षी और केन्द्र या राज्य सरकारों पर निर्भर
होते गए। राजनीतिक वर्गों के एजेंडे में कभी सामाजिक जनतंत्र रहा ही नहीं।
हम यह कहते नहीं अघाते हैं कि हम विश्व के सबसे
बड़े लोकतंत्र हैं। जब हम यह बात कहते हैं तो हमारे दिलोदिमाग में यही बात होती है
कि हम जनता द्वारा चुनी हुई सरकारों द्वारा शासित हैं। परंतु जब हम सूक्ष्म तरीके
से मूल्यांकन करते हैं तो इसमें अनेकों तरह की खामियां मिलती हैं, जिनमें प्रमुख हैं- शिखर से लेकर धरातल
तक पैठा भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद,
जातिवाद,
सांप्रदायिक
उन्माद, लगातार
समाज में बढ़ती असमानता, नक्सलवाद,
आतंकवाद समेत
अनेक बुराइयां। दुःखद स्थिति यह कि इन सभी खामियों एवं बुराइयों को भुनाकर सत्ता
का के लिए संघर्ष करता राजनीतिक वर्ग। ध्यातव्य है कि जब हम राजनीतिक वर्ग कहते
हैं तो सिर्फ सत्ताधारी राजनीतिक दल नहीं बल्कि इसमें सत्ता के सभी अंग
कार्यपालिका, विधायिका,
न्यायपालिका,
यहां तक प्रेस
भी समाहित होता है।
इसमें कोई शक नहीं है कि आज देश में एक तरफ
समृद्धि आ रही है। लागों की सार्वजनिक सुविधाएं भी बढ़ रही हैं। तो दूसरी तरफ
लगातार हमारा समाज हिंसक से हिंसक होता जा रहा है। क्या गुजरात के पटेल या हरियाणा
के जाट समुदाय को वाकई में आरक्षण की आवश्यकता है? क्या लोगों में इतनी भी समझ नहीं होनी
चाहिए कि वे अपनी हिंसक कार्रवाइयों में जिसको शिकार बना रहे हैं, वह उन्हीं के सुख-दुःख का साझीदार
पड़ोसी है। जिन सार्वजनिक संपत्तियों स्कूल, अस्पताल, बस, रेलवे, वे सब उन्हीं के उपयोग के लिए हैं,
जिसपर देश या
समाज की प्रगति काफी हद तक निर्भर है और जिसको हासिल करने के लिए देश का बहुत बड़ा
वर्ग और क्षेत्र आज भी तरस रहा है? या फिर किसी राज्य द्वारा दूसरे राज्य को पानी
जैसी प्राकृतिक या मौलिक जरूरत को रोक देने के औचित्य को उचित ठहराया जा सकता है?
क्या विरोध करने
या बोलने की आजादी में देश के टुकड़े करने की माँग या आतंकवाद का खुलेआम समर्थन भी
शामिल होने चाहिए, वह
भी देश के भविष्य को दिशा देने वाले किसी विश्वविद्यालय में? क्या हम अपने पहाड़ों एवं नदियों को
नंगा एवं नाले में तब्दील कर स्वस्थ पर्यावरण एवं जीवन की कल्पना कर सकते हैं?
क्या देश के सभी
बच्चों एवं नागरिकों के लिए समान शिक्षा एवं स्वास्थ्य की समान व्यवस्था एवं अवसर
नहीं मिलने चाहिए? क्या
किसी भी सभ्य समाज में हर छोटे-मोटे वाद-विवादों पर घर-परिवार से लेकर सार्वजनिक
स्थानों तक में नृशंस हत्या एवं बलात्कार का इतना विद्रूप रूप रोज दिखते रहने के
बावजूद सरकार और समाज को इसके विरुद्ध सजग नहीं हो जाना चाहिए?
सिर्फ जनता के मतों से सरकार बन जाने या एक
आदर्श संविधान भर से हम बड़ा और महान लोकतंत्र नहीं हो सकते, जबतक कि हमारा पूरा समाज जनतांत्रिक
मूल्यों के अनुरूप अपने आप को पूर्णतः ढाल नहीं लेता और उसके अनुरूप जीवन प्रणाली
विकसित नहीं करता। गांधी जी की मंशानुरूप समाज को दिशा देने वाला कोई संगठन तो
अस्तित्व में नहीं आया। हाँ उस खाली जगह को भरने के लिए ढेर सारे स्वार्थी समूह या
एनजीओवादी संगठन जरूर अस्तित्व में आ गये, अधिकांश तो ऐसे पाये जाते हैं, जो जिस दर्शन या आदर्श को निमज्जित
अपने आप को बताते हैं, उसके
ठीक विपरीत काम करते हैं। आज यह समय की मांग है कि सरकार, समाज, सकारात्मक कार्य करने वाले अनेक
सामाजिक संगठन और मीडिया, हर स्तर पर प्रत्येक व्यक्ति, परिवार, समाज, देश और पूरी मानवता यहाँ तक कि पूरे
ब्रम्हांड के प्रति एक सकारात्मक जनतांत्रिक आचार-व्यवहार विकसित करे और जिसमें
हिंसा के किसी भी रूप के लिए कहीं कोई जगह न हो।
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