Monday, March 7, 2016

घृणा के रक्तबीज
हम लाख मानव की प्रकृति के अहिंसक होने का दम्भ भरते रहें, परंतु वास्तविकता यह है कि जिस तरह मानव के अंदर अहिंसा का बीज सुरक्षित पड़ा रहता है और अनुकूल वातावरण मिलते ही अंकुरित होकर सर्वकल्याणकारी, रचनात्मकता का रूप ले लेता है, उसी तरह इसके विपरीत अनेक तरह के घृणा से पोषित-पल्लवित हिंसा का रक्तबीज भी कुंडली मार कर बैठा रहता है। जो जरा सी आहट पाते ही फुँफकार उठता है और इंसान सारी हदों को पार करते अपने विरोधियों को मिटा देने को आतुर-व्याकुल हो जाता है। इस आग में कभी व्यक्ति, कभी पूरा समाज तो कभी पूरा का पूरा देश और अब तो पूरी दुनिया इससे दहक और दहल रही है।
आज हिंसा की सबसे बड़े उत्प्रेरक धर्म, संप्रदाय, जाति, नस्ल, लिंग, वंश आदि हैं। अब तक यही माना जाता रहा है कि जर्मनी में हिटलर की नाजीवादी सत्ता ने नस्ली हिंसा की सबसे भयानक तरीके का इस्तेमाल अपने विरोधियों एवं यहूदियों को मिटाने के लिए किया था। परंतु आज जिस तरह से इस्लामिक स्टेट जैसे आतंकवादी संगठनों द्वारा दूसरे समुदाय के लोगों एवं इस्लाम के ही सिया संप्रदाय एवं उनके सोच से अलग विचार रखने वाले लोगों एवं समुदायों का बीभत्स कत्लेआम, महिलाओं का उत्पीड़न, मासूम बच्चों तक को जिंदा बम के रूप में इस्तेमाल इतनी निर्दयता से कर रहा है और उसे संचार माध्यमों द्वारा लाइव घरों तक पहुँचाया जा रहा है, वह इतना यंत्रणादायी है कि लगता है हम इंसानी सभ्यता की सबसे त्रासद समय से गुजर रहे हैं।
यह सब हो रहा है उसी धर्म एवं संप्रदाय के नाम पर जिसने मानव सभ्यता के विकास-पथ पर इंसान को अधिक सभ्य, सामाजिक, स्वतंत्र और शालीन, बनाने के मार्ग प्रशस्त किए थे। इसको प्रारंभ करने वाले महान लोग थे, जो मानव का कल्याण चाहते थे, वे किसी निजी स्वार्थ से परे थे। परंतु आज विभिन्न धर्मों के इतने कट्टरपंथी स्वार्थी ठेकेदार पैदा हो गए हैं जो निजी स्वार्थ की पूर्ति के लिए धर्म की ऐसी-ऐसी व्याख्यायें करने लगे हैं कि लोगों की स्वतंत्रता और समानता के सपने, उनकी आकांक्षाएँ सब निर्मम हिंसाओं के आगे भेंट चढ़ती जा रही है। इसका विद्रूप रूप भारतीय समाज में भी इतने संवैधानिक, धार्मिक एवं सामजिक सुधारों के बावजूद भी रोज देखने को मिल रहे हैं। कहीं सांप्रदायिक तो कहीं जातिवादी दंगे तो कहीं स्त्रियों को उसके लैंगिक आधार पर भेदभाव। यह पाखंड अब इतनी खतरनाक स्थिति तक पहुँच गया है कि अब जिंदे इंसान की तो बात ही छोड़िए गड़े मुर्दो तक को उसके नस्ल, कौम एवं कुनबे के आधार पर कब्र से उखाड़ कर फेंकने लग गए हैं।
पिछले दिनों घृणा का यह नग्न रूप राजस्थान के उदयपुर में देखने को मिला। धर्म के ठेकेदारों ने उदयपुर के खांजीपीर निवासी 88 वर्षीय मुहम्मद यूसुफ की गड़ी हुई लाश को बड़ी बेरहमी से यह कहकर कब्रिस्तान से निकालकर उनके घर में फेंक दिया कि वे वहाबी या देवबंदी थे। मुहम्मद यूसुफ का देहांत देर रात एक बजे हो गया था। उन्हें दूसरे दिन सुबह 11 बजे अश्विनी बाजार स्थित कब्रिस्तान में दफनाया गया। परिजनों ने बताया कि कुछ देर बाद ही घर पर फोन आने लगे कि आप मैयत कब्रिस्तान से निकालो, क्योंकि मुहम्मद यूसुफ वहाबी थे और उन्हें सुन्नी कब्रिस्तान में नहीं दफनाया जा सकता।
उनके वकील बेटे हामिद हुसैन ने कहा, ‘‘मैंने तो अपने वालिद को अल्लाह के सुपुर्द कर दिया है। लेकिन वे नहीं माने और कुछ ही देर बाद वे मैयत हमारे घर फेंक गए। इसके बाद मैं और मेरा बेटा तफज्जुल मैयत लेकर अपने पैतृक गाँव मंदसौर रवाना हो गए, जहाँ देर रात उनको सुपुर्दे खाक किया गया।’’
परिजनों का कहना है कि मुहम्मद यूसुफ और उनका परिवार भी सुन्नी मुसलमान ही है, लेकिन लिखकर देने के बावजूद कोई मानने को तैयार नहीं होता। वजह यह कि दशकों  पहले एक बार कुछ लोगों के साथ उनकी बहस हो गई थी। इस बहस में तकरार हो जाने पर उन्हें कहा गया कि वे तो वहाबी हैं। यूसुफ कुछ जिद्दी और गुस्सैल थे। उन्होंने कह दिया, ‘‘हाँ हूँ, तो क्या कर लोगे।’’ इसके बाद ही झगड़ा और तनातनी बढ़ती गई। उनके कुछ रिश्तेदारों और दोस्तों ने उन्हें समझाया कि वे जुर्माना भरकर या अपनी गलती मानकर सबके साथ हो लें, लेकिन वे अपनी बात पर डटे रहे। इसी से लोग उनसे इतना नाराज थे। हामिद हुसैन का पूरा परिवार गमजदा है। उनको आशंका है कि जो लोग मैयत को कब्र से निकाल सकते हैं, वे जिंदा लोगों के साथ भी न जाने क्या कर गुजरें।
 इस घटना से अनुमान लगाया जा सकता है कि एक लाश के साथ जब उसी धर्म के लोग एक मामूली कहासुनी पर इस हद तक गिर सकते हैं कि उसे कब्र से निकालकर फेंक सकते हैं। दुनिया के हर समाज और धर्म की नीति यही है कि कम से कम मरे के साथ सम्मानजनक व्यवहार किया जाए यहाँ तक कि नृशंस हत्यारों एवं शत्रु सेना तक की लाश के साथ उसके धर्म एवं सामाजिक रीति-रिवाजों के अनुरूप अंतिम क्रिया-कर्म करने के वैश्विक मापदंड बने हुए हैं।
आज पूरी मानव जाति के सामने यही प्रश्न है कि जिस धर्म, संप्रदाय, जाति, वंश, कुनबों को मानव समाज का जीवन सुगम बनाने के लिए बनाया था, वही आज इसका सबसे बड़ा न केवल रोड़ा बनकर खड़ा हो गया है बल्कि पूरी मानव सभ्यता एवं संस्कृति को मटियामेट कर रहा है। घृणा का यह बर्बर चेहरा जीवित को तो लील ही रहा है लाशों तक को अपने आगोश में ले लिया है।
आज इंसानी सभ्यता के सामने यह गंभीर चुनौती है कि हर इंसान और समाज के अंदर कुंडली मारकर बैठे इस हिंसक रक्तबीज को मिटाकर अपने अंदर दबे उस अहिंसक रचनात्मक बीज को संवारने का संगठित प्रयास करे। ताकि मानव सभ्यता सदा फलती-फूलती रहे और दुनिया के के हर इंसान को इस प्रकृति के प्रंागण में पैदा होने, फलित होने से लेकर मृत्यु की मैयत तक सम्मानजनक निर्बाध वातावरण मिले। 

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