Tuesday, June 6, 2017

लोकतांत्रिक प्रक्रिया से ही निकलेगा शाश्वत समाधान
जनतांत्रिक प्रक्रिया भले ही कभी-कभी बड़ी ही विलंबित और उलझाऊ महसूस होती हो, परंतु इस पर विश्वास करने वाले समाज को पता होता है कि इस प्रक्रिया से जो समाधान सामने आता है, वह टिकाऊ और शाश्वत होता है। इसको समझने के लिए भारत का स्वतंत्रता आंदोलन तथा आजादी के बाद संसदीय जनतंत्र से निकलकर आए अनेक सुधारों को सूक्ष्म विवेचना की जरूरत पड़ेगी। इसे आसान तरीके से समझने के लिए वर्तमान में देश की दो अति विवादास्पद तथा जटिल आर्थिक, राजनीतिक तथा सामाजिक समस्याओं को सुलझते देखकर समझा जा सकता है, पहला, टैक्स संबंधी जीएसटी कानून का कार्यरूप में आना तथा दूसरा, मुस्लिम महिलाओं से जुड़ी तीन तलाक की समस्या।
श्रीनगर में जीएसटी यानी वस्तु व सेवा कर परिषद् ने जिस तरह इसकी दरों को तय किया है, उससे काफी उम्मीद जगती है। परिषद् ने कोशिश की है कि जीएसटी दरें लागू हांे तो आम लोगों की तकलीफ न बढ़े बल्कि उनकी दैनिक जिंदगी पहले से और सहज ढंग से चलती रहे। वस्तुओं एवं सेवाओं के बीच का अंतर समाप्त करने का विचार एवं कर प्रणाली सरल एवं पारदर्शी बने, यही जीएसटी के मूल में है। यह विचार सन् 1994 में अमरेश बागची की रिपोर्ट रिफॉर्म ऑफ डोमेस्टिक ट्रेड टैक्सेस इन इंडिया: इश्यूज ऐंड ऑप्शंसकेन्द्र सरकार के सामने पेश की गई थी। वर्ष 2000 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने इसे लागू करने के लिए राज्यों के वित्त मंत्रियों की एक अधिकार प्राप्त समिति बनाई थी।
यद्यपि उस समय की अटल सरकार अल्पमत व राजनीतिक दा वपेंच के चलते इस बिल को पास नहीं करा पाई थी। उसके बाद यूपीए सरकार के वित्तमंत्री पी. चिदम्बरम द्वारा 2007 में जीएसटी के लिए राज्यों के वित्तमंत्रियों की संयुक्त समिति का गठन कर वर्ष 2010 से इसके लागू करने की घोषणा की। तत्कालीन कांग्रेस सरकार द्वारा मार्च, 2011 में 115वाँ संविधान संशोधन विधेयक पेश किया गया, जो अनेक अवरोधों एवं मतभेदों के कारण पारित नहीं हो सका। भाजपा की नरेंद्र मोदी सरकार ने जीएसटी को अपने आर्थिक सुधारों का केंद्रबिंदु बताया तथा 122वाँ संविधान संशोधन विधेयक दिसंबर, 2014 में संसद में पेश किया, जिसे लोकसभा द्वारा मई, 2015 में पारित कर दिया गया था। किन्तु राज्यसभा में एनडीए के अल्पमत में होने के चलते व विपक्ष का रचनात्मक सहयोग नहीं होने के कारण राज्यसभा में इस बिल का भविष्य उज्ज्वल नहीं दिख रहा था। यह सरकार व वित्तमंत्री अरुण जेटली की संसदीय कुशलता का परिणाम ही है कि लोकसभा के बाद, वह बिल 3 अगस्त, 2016 को राज्यसभा में भी सम्पूर्ण उपस्थित सदस्यों के इकतरफा समर्थन से पारित हुआ। इस चुनौती को पार करते हुए जिस तरह सरकार अब आम सहमति से अनेक विपक्षी दलों वाली राज्यों की विधान सभाओं से भी पास करा पाई और करा रही है, यही जनतंत्र की जीत है।
दूसरी तीन तलाक की समस्या, जो कि मुस्लिम महिलाओं के जीवण-मरण से जुड़ा सवाल है। करीब तीस साल पहले तीन तलाक पर सर्वोच्च न्यायालय ने शाह बानो के पक्ष में फैसला दिया था। परंतु इस फैसले का मुस्लिम कट्टरपंथियों ने भारी विरोध किया। तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने कट्टरपंथी मुस्लिम धर्मगुरुओं के दबाव में आकर मुस्लिम महिला अधिनियम, 1986 पारित कर शाह बानो के पक्ष में आया न्यायालय का फैसला पलट दिया। लगभग तीस साल बाद, उत्तराखंड के काशीपुर की रहने वाली शायरा बानो का साल 2002 में इलाहाबाद के रिजवान अहमद से निकाह हुआ, ससुराल में उसको अनेक तरह की शारीरिक और मानसिक प्रताड़नाएँ दी गईं और अंततः 2015 में तीन तलाकदेते हुए उससे रिश्ता ही समाप्त कर लिया। इसी तलाक की वैधता को चुनौती देते हुए शायरा सर्वोच्च न्यायालय पहुँची। याचिका के माध्यम से मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरियत) एप्लीकेशन एक्ट, 1937की धारा 2 की संवैधानिकता को चुनौती दी गई। यही वह धारा है, जिसके जरिये मुस्लिम समुदाय में बहुविवाह, ‘तीन तलाक’ (तलाक-ए-बिद्दत) और निकाह-हलालाजैसी प्रथाओं को वैध्यता मिलती है।
इस मामले का संज्ञान लेते हुए सर्वोच्च अदालत को पूरा अहसास था कि उसे एक बहुत नाजुक और विवादित विषय पर सुनवाई करनी है। इसलिए उसने मामले को पाँच जजों की संवैधानिक पीठ को सौंपा, जिसमें अलग-अलग धार्मिक पृष्ठभूमि के जज शामिल किए गए। पहली बार इस मसले पर केंद्र की भाजपा सरकार ने अपने हलफनामे में सरकार ने तीन तलाक को मजहब के नजरिए से नहीं बल्कि स्त्री-पुरुष के समान अधिकार के नजरिए से देखने की वकालत की। इसके अलावा, मुसलिम समाज के भीतर से भी तीन तलाक की आलोचना के स्वर उठने लगे हैं।
सर्वोच्च न्यायालय में तीन तलाक के मसले पर चली सुनवाई की सार्थकता दिखने लगी है। न्यायालय का फैसला क्या होगा, यह तो फैसला आने के बाद पता चलेगा, पर ऑल इंडिया मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड के रुख में बदलाव साफ लक्षित किया जा सकता है। इस सुनवाई के दौरान न्यायालय की सख्त टिप्पणियों, केन्द्र सरकार के मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों के पक्ष में खड़े होने के कठोर रुख तथा जनमानस तथा मीडिया के मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों के प्रति संवेदनशीलता का ही असर है कि कल तक जो बोर्ड तीन तलाक के मुद््दे को अदालत के न्यायाधिकार क्षेत्र से बाहर बताता रहा, अब उसके सुर बदल गए हैं। उसने सर्वोच्च अदालत में दाखिल किए अपने नए हलफनामे में कहा है कि महिलाओं को तीन तलाक न मानने का अधिकार भी मिलेगा। दुलहन निकाहनामे में संबंधित शर्त जुड़वा सकेगी। यही नहीं, काजी दूल्हा-दुलहन को समझाएगा कि तीन तलाक न कहने की शर्त निकाहनामे में शामिल करेंगे तथा बोर्ड तीन तलाक का बेजा इस्तेमाल रोकने के लिए जागरूकता मुहिम चलाएगा।

80 के दशक में शाह बानो मामले को अलोकतांत्रिक तरीके से एक वर्ग की कट्टरवादी सनक को मान्यता देने के लिए कानून बनाकर मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक के वज्रपात के आगे बेसहारा और बेचारगी में तिल-तिल कर जिस तरह से मरने को विवश किया गया था, उसे तो फिर से उभरना ही था। यह तो हमारे जीवंत जनतंत्र का परिणाम है कि स्थाई समाधान तक प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से विविध संस्थाएँ सक्रिय रहती हैं और परस्पर विरोध, संवाद और समाधान की प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है। विपरीत परिस्थितियों में भी जटिलताओं और मतभेदों को पाटती रहती हैं। कभी कार्यपालिका, संसद, न्यायपालिका, मीडिया तो कभी-कभी सड़क से उठती आवाज से भी समाधान के रास्ते निकलते रहते हैं। चाहे जीएसटी हो या तीन तलाक या फिर लंबा इंतजार कराता विलंबित लोकपाल, शाश्वत समाधान का माध्यम तो जनतंत्र ही है।
लालबत्ती के स्याह पक्ष
आजादी के बाद देश के संविधान और कानून ने लोकतांत्रिक सरकार और शासन के हाथ में सत्ता का प्रकाश-स्तंभ इसलिए थमाया कि अब तक दरिद्रता, अशिक्षा, बीमारियों, अंधविश्वासों तथा अनेक प्रकार के जाति, धर्म, वर्ण और वर्गों के आधार पर विभेदकारी नीतियों के कारण हाशिए पर जीने को मजबूर लोगों के घरों और मनों में जड़ जमाए स्याह अँधेरे से मुक्ति और सुराज मिले। वह भी आलोकित होकर बिना अटके, बिना भटके देश की प्रगति और विकास की यात्रा में शामिल हो जाए। परंतु दुःखद स्थिति यह हो गई कि जिन्हें यह जिम्मेदारी दी गई, वही पहले अपने और अपने परिवार के लिए भरपूर रोशनी की व्यवस्था करने लगे; उसके बाद ऐसे लोगों को जो सदा से प्रकाशित थे, उन्हें ही गलत ढंग से हर क्षेत्र में निर्बाध रूप से आगे बढ़ने के भरपूर अवसर दिए जाने लगे। ऊपर से कोढ़ में खाज यह कि सत्ताधारी वर्ग सत्ता-सुविधा की भरपूर चमक-दमक के अतिरिक्त अपने सिरों पर लालबत्ती भी लाद ली।  परिणाम यह हुआ कि सदियों से अँधेरों में रोशनी की तलाश में बिलबिलाता समाज इस लाल रक्तिम रोशनी के भय से और दूर होता हुआ अंधकूप में समाता चला गया।
ऐसे समय में जनता का चौकीदार और जनता के प्रधानसेवक बनने के वादे से शासन में आनेवाले प्रधानमंत्री और केन्द्र सरकार का लालबत्ती हटाने समेत और अन्य कई फैसलों से एक आशाजनक  संकेत मिल रहा है। यह निश्चय ही जनतांत्रिक मूल्यों के पक्ष में केंद्र सरकार का एक ऐतिहासिक फैसला है कि एक मई से किसी भी गाड़ी के ऊपर लाल बत्ती नहीं होगी। यों कोई व्यवस्था कितनी भी जनतांत्रिक और समतावादी हो, शीर्ष पदों पर आसीन व्यक्तियों को कुछ विशिष्ट अधिकार हासिल होते हैं, इसी के अनुरूप उन्हें विशेष सुविधाएँ भी मिली होती हैं। इसका आमतौर पर बुरा नहीं माना जाता। परंतु सातवें दशक से मंत्रियों और नेताओं का सुरक्षा संबंधी तामझाम बढ़ने लगा और लालबत्ती लगी गाड़ियों का दायरा भी। यहाँ तक कि मंत्री और अधिकारियों के परिवार और रिश्तेदार तक बेधड़क इसका दुरुपयोग कर सब पर रोब गाँठते दिखाई पड़ने लगे।
यूरोप के कई देशों के प्रधानमंत्री आज भी साइकिल पर चलना पसंद करते हैं, जिनमें नॅार्वे नीदरलैंड्स, ब्रिटेन आदि के प्रधान मंत्री, मंत्रीगण, सांसद तथा अनेक विशिष्टजन शामिल हैं वे सार्वजनिक लोकल ट्रेनों एवं बसों में आम लोगों के साथ बड़े सहज ढंग से यात्रा करते हैं। इसके उलट हमारे देश में शिवसेना के सांसद रवींद्र गायकवाड़ जैसे अनेक महानुभाव हैं, जो साठ साल के बुजुर्ग विमानसेवा कर्मचारी की चप्पलों से धुनाई यह कहते हुए कर देते हैं कि एक कर्मचारी उन्हें यह याद दिलाने की गुस्ताखी कैसे कर सकता है कि उड़ान में बिजनेस क्लास नहीं है। वह भला साधारण लोगों की तरह कतार में लगने और आम दर्जे में यात्रा कैसे कर सकते हैं? बेशर्मी की हद तो तब हो जाती है कि इसके कारण संसद में भी इनके दल द्वारा कई दिनों तक अवरोध पैदा किया जाता है।
यह लालबत्ती वाली मानसिकता सिर्फ गाड़ी की बत्तियों तक सीमित नहीं है बल्कि शासन के हर स्तर और हर क्षेत्र में दिखती रही है। चाहे शिक्षा को लें, स्वास्थ्य सुविधाओं को लें, यातायात व्यवस्था को ले लें या फिर अन्य कोई सामान्य से सामान्य नागरिक सेवा। शिक्षा के क्षेत्र में आम नागरिकों के बच्चों के लिए सरकारी स्कूलों का हाल यह है कि न तो ढंग के शिक्षक उपलब्ध हैं न ही अन्य सुविधाएँ जबकि मंत्रियों, सरकारी अधिकारियों एवं अमीरों के बच्चों के लिए संस्कृति स्कूल, पांचसितारा सुविधाओं से युक्त अनेक पब्लिक स्कूलों से लेकर विदेशों तक की शिक्षा सहज उपलब्ध है। स्वास्थ्य के क्षेत्र में और भी बुरा हाल है। आम गरीब मामूली बीमारी होने पर समय पर सही इलाज नहीं मिलने के दर-दर की ठोकरें खाकर मरने को मजबूर होता है जबकि सरकार और शासन तथा अमीरों के लिए सरकारी अस्पताल से लेकर अनेक मंहगे अस्पताल उनकी सेवा में चौबिसों घंटे तत्पर रहते हैं। यातायात के साधनों में भी हर जगह वीआईपी लालबत्ती मानसिकता हावी है। जहाँ विशिष्ट लोगों के लिए पैसे एवं मुफ्त कोटे पर आराम की सारी सुविधा उपलब्ध हैं वहीं आमजनों को जानवरों से भी बदतर हालात में जान को जोखिम में डालकर यात्रा करनी पड़ती है।
आशा है, सरकार एवं शासन के कर्ता-धर्ता अब हर स्तर पर जनता से जुड़ी मौलिक जरूरतों के साधनों के द्वार सहज ढंग से खोलेंगे और अपने कर्तव्य, जिसे सत्ता के माध्यम से उन्हें संविधान और कानून नें सौंपा है उसका निर्वहन करेंगे। आगे जल्द से जल्द पूरे देश में ऐसी व्यवस्था होगी कि सबके लिए समान स्कूल की व्यवस्था होगी, जिसमें साधारण व्यक्ति के घरों के बच्चों के लेकर सत्ता के शिखर पर बैठे व्यक्ति के बच्चे एक साथ पढ़ें, सभी व्यक्तियों को सहज और समान जरूरत के अनुरूप स्वास्थ्य सेवाएँ मिलंे।
हमारे यातायात के साधनों का भी जनतांत्रिकीकरण हो। दिल्ली मेट्रो इसका बहुत बढ़िया उदाहरण है। यह सभी वर्ग के लोगों को संग-साथ चलना सिखा रही है। ऐसा करने के लिए उन्हें मेट्रो की कार्यप्रणाली ने उनको मजबूर किया है। जहाँ तक सुविधाओं की बात है तो गरमी, सर्दी से बचाव और सुरक्षित माहौल किस इंसान की जरूरत नहीं है? संग-साथ चलने का यही फार्मूला कुछ बडे स्तर पर भारतीय रेल एवं अन्य साधनों में भी क्यों नहीं अपनाया जा सकता है? जहां सामान्य और विशिष्ट सभी संग साथ होकर एक ही तरह की सामान्य सुविधाओं का प्रयोग करते हुए चलें। इसके लिए राजनीतिक एवं सामाजिक मानस में बदलाव की आवश्यकता है।
प्रधानमंत्री, उनकी केबिनेट, तथा कई मुख्यमंत्रियों ने कुलीन मानसिकता की प्रतीक लालबत्तियों को गाड़ियों से हटाने की जो मुहिम छेड़ी है, उसके प्रतीकात्मक, सकारात्मक महत्त्व से इंकार नहीं किया जा सकता। परंतु यह मुहिम तभी अपना मुकाम हासिल कर पाएगी जब सेवाओं एवं सामान्य आधारभूत मौलिक जरूरतों तक सबकी बिना भेद-भाव के सहज और समान, निर्बाध भागीदारी सुनिश्चत होगी। तभी देश को लालबत्ती के स्याह पक्ष से मुक्ति मिलेगी और सही मायने में सुराज स्थापित होगा।
x

Thursday, April 13, 2017

पुरखों के बगैर जीवन!
उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने गंगा-यमुना को इंसानी दर्जा यानी एक नागरिक होने का दर्जा दिया।  इन्हें सभी मैया और माँ तो कहते ही हैं और शुभ दिनों में इसके आगे शीश भी नवाते हैं, परंतु इनके साथ व्यवहार ठीक उसी तरह करते हैं, जैसे हमारे घरों के बेचारे बूढ़े-बुजुर्ग, जिनकी सारी संपत्ति, जीवन के सारे सृजन का उपयोग तो करते हैं, परंतु उनके साथ व्यवहार ऐसे करते हैं, मानो उनका कोई अस्तित्व ही नहीं बचा हो। भारत में हजारों ऐसे लोग हैं, जिन्हें सरकारी बाबुओं ने मृत घोषित कर दिया है और वे हर दफ्तर-दरवाजे अपने जिंदा होने का सबूत देते फिरते हैं, ताकि उन्हें भी एक सामान्य नागरिक होने की सारी सुविधाएँ मिलें। अच्छा हुआ, उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने गंगा और यमुना मैया को जीवित इंसान का कानूनी दर्जा दे दिया और एक लाचार व बेबस बुजुर्ग की भाँति उनका नोमनी भी यानी कानूनी अभिभावक नमामि गंगे मिशन के निदेशक, उत्तराखंड के मुख्यसचिव और उत्तराखंड के महाधिवक्ता को बना दिया। अब यही दोनों अधिकारी गंगा और यमुना के स्वास्थ्य और कुशलता का ध्यान रखने के लिए बाध्य होंगे।
इसके ठीक सप्ताह भर पहले न्यूजीलैंड की वांगानुई नदी को जिंदा इंसान होने का दर्जा वहाँ की संसद ने दिया। न्यूजीलैंड का माओरी आदिवासी समुदाय इस नदी को अपना पूर्वज मानता है। इसके लिए करीब डेढ़ सदी तक उन्होंने लगातार संघर्ष किया।
इसी माह संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने वैश्विक सांस्कृतिक धरोहर स्थलों पर सशस्त्र संघर्षों के खतरे के मद्देनजर इनकी सुरक्षा मजबूत करने का प्रस्ताव पारित करते हुए कहा कि अवैध तोड़-फोड़ करनेवाले अपराधियों को युद्ध अपराधों के मामले में अभियुक्त बनाया जा सकता है। इस प्रस्ताव में कहा गया है, ‘‘धर्म, शिक्षा, कला, विज्ञान एवं धमार्थ कार्यों के लिए बनी इमारतों एवं स्थलों या ऐतिहासिक स्मारकों पर अवैध हमले निश्चित परिस्थितियों में और अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार युद्ध अपराध के बराबर हो सकते हैं और इस प्रकार के हमले अपराधियों को न्याय के दायरे में लाया जाना चाहिए।’’ यूनेस्को विश्व की धरोहरों के संरक्षण के लिए लगातार प्रयासरत है।  
थोड़ा विस्तृत फलक पर देखें तो विश्व की सिर्फ एक-दो नदी नहीं बल्कि सारी नदियाँ, पहाड़, वृक्ष, स्थापत्य की इमारतें, जिसमें अनेक प्रकार के मूर्तिकारी, चित्रकारी, शिलालेख, गुफा, आवास एवं ऐतिहासिक सभ्यताओं वाले किले व स्थल। इसके अलावा प्राकृतिक और सांस्कृतिक धरोहर, सभी जिंदा धरोहर हैं। इंसान कभी अपने आप को किसी नदी से तो कोई किसी वृक्ष या पहाड़ को तो किसी पुरानी सभ्यता को अपना पूर्वज मानता है। हम किसी पुराने किले या खंडहर में जाते हैं तो उसे देखकर सिर्फ ईंट-गारे का मकान नहीं समझते बल्कि अपने पूर्वजों की जीवंत निशानियाँ ढूँढ़ते हैं और हमें मिलती भी हैं। परंतु कुछ कट्टरपंथी ताकतें और अनेकानेक स्वार्थी समूह सबको मटियामेट करने पर उतारू हैं।
हाल के वर्षों में इस्लामी युद्धोन्मादी आतंकवादियों ने मानवों के नरसंहार के साथ सबसे अधिक विध्वंस पूर्वजों की विरासत का किया है। पिछले दिनों आईएसआईएस के आतंकियों ने इराक के दूसरे बड़े शहर मोसूल के एक विशाल म्यूजियम जो तीन हजार साल पुरानी कलाकृतियों और सांस्कृतिक धरोहरों तथा वहाँ की पब्लिक लाइब्रेरी में मौजूद 8000 से अधिक किताबों को आग लगाकर यह कहते हुए मटियामेट कर दिया कि उसके लिए उन्हें पैगंबर मोहम्मद ने हुक्म दिया है। 2013 में जब माली के शहर टिंबकटु पर अलकायदा के चरमपंथियों ने कब्जा किया था तो सबसे पहले उन्होंने वहाँ की धरोहरों को समेटने वाले पुस्तकालय में आग लगा दी। यह वही लाइब्रेरी थी, जहाँ अफ्रीका की सबसे पुरानी किताबें रखी थीं, जिनमें इस विशाल महाद्वीप का इतिहास दर्ज था। वहाँ दुनिया की सबसे पुरानी कुरान में से एक भी रखी हुई थी।
अफगानिस्तान के बामियान में 2001 में तालिबान के आतंकवादियों ने बुद्ध की दो विशाल प्रतिमाओं को डायनामाइट के विस्फोट से उड़ाया था। छठी शताब्दी की ये प्रतिमाएँ गांधार कला का नमूना थी, जिन्हें पहाड़ को काटकर बनाया गया था। 1990 के दशक में ईरान में खुमैनी के कट्टर इस्लामी शासन के दौरान पारसी संस्कृति की विरासतों को तहस-नहस किया जाने लगा, इस विनाश में ढाई हजार साल पुरानी पारसियों के पूर्वज राजा सायरस की मूर्ति भी शामिल थी।
भारत में विक्रमशिला एवं नालंदा विश्वविद्यालय से लेकर पिछली सदी में ही भारत से अलग हुए दो इस्लामिक देशों ने वहाँ मौजूद हिंदू, बौद्ध एवं भारतीय संस्कृति-सभ्यता की निशानियों का जिस निर्ममता से चुन-चुन कर विनाश किया और कर रहा है, वह जगजाहिर है।
सिर्फ कट्टरपंथियों ने ही नहीं बल्कि अनेक स्वार्थी समूहों ने भी तथा सामान्य नासमझ नागरिकों ने भी अपनी मौज-मस्ती के लिए जिस तरह से अपने पहाड़ों, तमाम नदियों, वनों एवं अनेक ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक धरोहरों का विनाश एवं प्रदूशित कर नुकसान पहुँचाया है, सरकारी एजेंसियों ने भी होने दिया, उसी से मजबूर होकर न्यायालय ने यह कदम उठाया है।
यह कितना दुःखद है कि जो इंसान इतने संघर्षों के बाद सभ्यता के इस सोपान तक पहुँचा और आधुनिक होने में अपने आप को गौरवान्वित महसूस करता है। वही आज पीछे के सारे सोपानों एवं भवन की नींव को बड़ी बेरहमी से ढहा रहा है। क्या कोई यह दावे से कह सकता है कि कोई प्राचीन विश्वविद्यालय, पुस्तकालय, म्यूजियम, धार्मिक स्थल या प्राकृतिक नदी, पहाड़, जंगल सिर्फ किसी एक ही पंथ, समुदाय या वर्ग के मानने वाले लोगों के हैं? हम किस हैसियत से इसका विनाश कर रहे हैं? हमारी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य इसके बगैर कितना अंधकारमय होगा, क्या इन्हें इसका कुछ भान है? क्या हम इन धरोहरों के बगैर निपट नंगे, नितांत अकेले एवं शारीरिक व मानसिक रूप से रुग्ण नहीं होते जा रहे हैं?

यह पता करना हो तो घड़ी भर के लिए किसी पुराने म्यूजियम, किला या खंडहर में जाएँ, या किसी पुराने वृक्ष, नदी या पहाड़ की तलहटी में बैठकर सोचें तो महसूस होगा कि इसके बिना हम एक जिंदा लाश के सिवा कुछ नहीं हैं। किसी अदालत, संसद, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् या यूनेस्को द्वारा हमें यह बार-बार बताया जाना कि ये तुम्हारे माता-पिता, पुरखे हैं या या इन्हें भी एक इंसान की तरह जिंदा रहने का अधिकार है, यह हमारे सभ्य एवं आधुनिक इंसान होने पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न है।  

Thursday, March 9, 2017

हर दिल में बसे बसंत
बसंत पंचमी को गुजरे महीना पूरा होने को है। पर बसंत का कोई नामोनिशान नहीं दिख रहा। पार्कों एवं सड़क के किनारे खड़े पेड़ बिजली के खंभे जैसे ही निर्जीव न सावन हरे न भादो भरेलग रहे हैं। अन्य पेड़ों को तो छोड़िए, आम्र वृक्षों तक का यह हाल है, जिन्हें मंजरियों से अभी लदा होना चाहिए, वे भी निर्लज्ज भाव से बेहया-बेसुध खड़े हैं। मॉल, बाजार यहाँ तक कि सब्जी और फलों के बाजारों तक को देखने पर दूर-दूर तक पता नहीं चलता कि यह बासंती मौसम है और शाक-सब्जियाँ और फल इसके अनुरूप होने चाहिए। अब तो हर मौसम हर तरह की सब्जियों और फलों से भरा रहता है सिर्फ पैसा और स्वाद न पूछो सब्जी कीशर्त पर। बसंत आने की सूचना देने वाले कवि और लेखकों का एक हिस्सा इन दिनों चुनावी नारे काम बोलता है...और कारनामे बोलते हैंजैसे जुमले गढ़ने में व्यस्त हैं। तो दूसरे सहिष्णुतावाद-असहिष्णुतावाद आंदोलन चला चुकने के बाद कुछ थक-हारकर बैठ गए हैं, तो कुछ शासन में पद और पुरस्कार पाने के लिए सामंजस्य बिठाने में रमे हुए हैं। शायद कुछ दुखिया, दिलजले होंगे, जो बसंत आगमन पर कुछ रचे होंगे या रच रहे होंगे, लेकिन उन बेचारों को कौन पूछता, पढ़ता है। दिन-रात इतने काँव-काँव के आगे कोयल कभी इधर झाँकेगी, यह सोचना भी बेकार है। खैर, बसंत का तो पता नहीं, पर वैलेंटाइन बाबा का तारीख के हिसाब से आगमन हुआ, सप्ताह भर पता नहीं कौन-कौन से डे होने के बाद वैलेंटाइन डे आया, जिसमें करोड़ों रुपयों के गुलाब का आदान-प्रदान हुआ और मॉल और बाजार खूब गुलजार हुए। औरों की बात छोड़िए, हमारी केन्द्र सरकार भी, जिसे विपक्षी दल दिल की बात नहीं करने वाली सरकार कहते हैं, उसने करोड़ों दिलों को खुश करने वाला तोहफा, दिल के मरीजों के ऐंजियोग्राफी में काम आने वाला स्टेंट की कीमत में भारी कमी करके दिया।
जीवन रक्षक कोरोनरी स्टेंट की कीमत 85 फीसद तक कम करके लाखों हृदय रोगियों को बड़ी राहत प्रदान की है। धातू के बने स्टेंट (बीएमएस) की कीमत 7,260 और ड्रग एल्यूटिंग स्टेंट (डीईएस) की कीमत 29,600 तय की गई है। इससे पहले बीएमएस का अधिकतम खुदरा मूल्य 45,000 रुपये और डीईएस का 1,29404 रुपये तक था। विचार-विमर्श और कई संबंधित पक्षों से मिली जानकारी के बाद राष्ट्रीय औषधि मूल्य अथारिटी (एनपीपीए) ने स्टेंट की कीमत तय करने का फैसला किया। एनपीपीए ने इस संबंध में अधिसूचना जारी की है। स्टेंट की कीमत तय होने से 80,000 से 90,000 प्रति पीस की बचत होगी और दिल के मरीजों को एक साल में 4,450 करोड़ रुपये की राहत होगी।
धातु के स्टेंट का इस्तेमाल अब बेहद कम होता है क्योंकि उसके कारण होने वाली पेचीदगियाँ ज्यादा हैं। डीईएस यानी जिन स्टेंट से दवा रिसती है और धमनियों को साफ करने में मदद मिलती है, उसकी खपत 80 प्रतिशत है। स्टेंट एक तरह छल्लानुमा छोटी स्प्रिंग जैसा होता है, जिसे दिल की धमनियों में उस जगह फिट किया जाता है जहाँ कोलेस्ट्रॉल जमने की वजह से खून का प्रवाह बंद या फिर बहुत मंद हो जाता है। इस प्रक्रिया को एंजियोप्लास्टी कहा जाता है। शरीर में एक पतली ट्यूब, जिसे कैथेटर कहते हैं, उसके जरिए इसे पैर और हाथों की बड़ी धमनियों के रास्ते दिल तक पहुँचाया जाता है।
दुर्भाग्य यह है कि अभी से समाचारों में आने लगा है कि स्टेंट की कीमत तय करने के बाद से अस्पतालों ने एंजियोप्लास्टी का पैकेज महँगा करना शुरू कर दिया है। कम किए गए स्टेंट की कीमत की भरपाई करना तो बहुत आसान है। ये मरीजों के कमरे व बिस्तरों की कीमत बढ़ा देंगे, डॉक्टर के चार्ज में इजाफा कर देंगे, जैसा कि पहले से करते आए हैं। कुछ और मरीजों को, जिन्हें स्टेंट लगाने की जरूरत नहीं है उन्हें भी लगवा देंगे, तो कभी स्टेंट की कृत्रिम कमी दिखाकर भरपाई कर लेंगे। इसका एक उदाहरण, केन्द्र सरकार ने अभी तक आवश्यक दवाओं की राष्ट्रीय सूची (एनएलईएम) में 1415 दवाएँ शामिल कर कीमतों में भारी कमी की है, जिसमें कैंसर, एड्स, मलेरिया की दवाएँ शामिल हैं। परंतु अस्पतालों की ठगी के आगे मरीजों को न के बराबर फायदा मिल रहा है। बड़े-बड़े प्राइवेट अस्पतालों में देखा गया है कि अपने फायदे के लिए ये अमानवियता के किसी भी हद तक जा सकते हैं, हाल ही में इनकी सहमति से किडनी रैकेट चलाते इनके डॉक्टर और मैनेजमेंट तक पकड़े गए हैं।
अमेरीका जैसे देश में किस स्थिति में क्या करना है, इसकी पूरी प्रक्रिया तय है। इसलिए ऑपरेशन और स्टेंट लगाने की प्रक्रिया तय हो और फिर इस प्रक्रिया की निगरानी के लिए रेगुलेटर बने, जो निरंतर अस्पतालों का ऑडिट करे। यह एक अच्छा कदम है कि अब सरकार ने मेडिकल उपकरणों को भी दवाओं की राष्ट्रीय सूची (एनएलईएम) के दायरे में लाने की पहल शुरू कर दी है। परंतु सबसे बड़ी आवश्यकता इस बात की है कि सरकार को यह मानना पड़ेगा कि लोगों के जीवन से जुड़ी मौलिक जरूरत स्वास्थ्य को बाजार और निजी अस्पतालों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। सरकार को ज्यादा से ज्यादा हर स्तर पर सरकारी अस्पतालों को बढ़ाकर उसमें सारी सुविधाएँ देनी ही पड़ेंगी, तभी निजी अस्पताल भी मजबूरी बस पारदर्शिता से काम करेंगे।      
महायोगी शिव कामदेव के बाणों से आहत होकर उन्हें भस्मीभूत कर दिया परंतु काम की चिर संगिनी रति की अरण्य-रुदन के आगे झुकते हुए यह वरदान भी दे दिया कि कामदेव अब निराकार रूप में पूरी प्रकृति में समाकर सदैव अमर रहेंगे। आज बाजार नामक दैत्य पूरी प्रकृति को ही निगलता जा रहा है, उसने कामदेव के बाण बसंत के आगे अपने वैलेंटाइन को आगे कर दिया है। युवा पीढ़ी आज उसके आगे नतमस्तक है। सर्वसमावेशी भारतीय संस्कृति में उसका भी स्वागत है, बशर्ते कि वह भी हमारी बसंतोत्सव का एक हिस्सा बनकर आए। इसके लिए सरकार और समाज को बाजारवादी निजी फायदे को बढ़ावा देनेवाले सर्वग्रासी भाव को नियंत्रित कर शिवत्व यानी प्राकृतिक समदृष्टि भाव से कर्मशील होना होगा। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी  की प्रसिद्ध उक्ति है, ‘बसंत आता नहीं, ले आया जाता है।बसंत सदैव अपने संभावनाओं का द्वार सबके लिए खुला रखता है। जब सरकार और समाज प्रकृति का ध्यान रखेंगे, तभी बसंत विहँसता हुआ आएगा, फिर पूरी कायनात और हर दिल में बसंत बसेगा!


Monday, February 6, 2017

मानव तस्करी का मकड़जाल
कोई दस-बारह साल पहले की बात है। पहला मोबाइल खरीदा था। इंतजार में रहता कि कहीं से कोई फोन आए और बात करूँ। एक दिन सुबह-सुबह पाँच बजे ही एक फोन आया जसीडीह संथाली (देवघर, झारखंड) से। ‘‘...संजुआ बोल रहा है।’’ मैंने कहा संजय बोल रहा हूँ बोलिए। ...जुलिया कहाँ है? बात कराओ...यहाँ से नौकरी कराने, यह बोलकर ले गया कि हर सप्ताह बात कराएँगे। चार महीना हो गया, न तो एक बार बात ही कराये हो और न कोई पैसा-कोड़ी भेजे हो...कहाँ है वह, जल्दी बात कराओ। मैं हक्का-बक्का रह गया। मैंने कहा, आपको कोई गलतफहमी हो गई है, मैं किसी जुलिया या आपको नहीं जानता हूँ। उसने कहा, हाँ रे, हमीं को सिखा रहे हो, हमर बेटिया को ले गया यह नंबरवा देकर और वहाँ जाकर संजय बन गया और अंगरेजी बतियाने लगा है... बहुत ज्यादा बूथ में पैसा उठ रहा है...जल्दी बात कराओ।’’ मैं समझाने का प्रयास करता रहा। फिर फोन काट दिया, परंतु पुनः तुरंत फोन आ गया, अबकी कोई महिला थी, ...हम तुम्हारा क्या बिगाड़े हैं, तोहरो बहिन बेटी है। मैं परेशान हो गया कहा, देखिए आपने गलत जगह फोन किया है। उसके बाद उस महिला के मुँह से माँ-बहन की ऐसी धाराप्रवाह गालियाँ फूटीं कि यहाँ लिखना संभव नहीं है। मैंने फोन काटा। परंतु दूसरे दिन फिर उसी समय किसी दूसरे बूथ से पहले जुलिया से बात करने के लिए गिड़गिड़ाना, फिर अनेक धमकियाँ और गालियों की बौछार! यह सिलसिला करीब महीनों तक चला। किसी ने उसके यहाँ से लड़की को किसी बड़े घर में काम के लिए लाकर उन लोगों को कोई और नंबर थमा दिया था, जो दुर्योग से मेरा था। यह तो बाद में पता चला कि यह गरीब आदिवासियों को काम के नाम पर फँसाकर लड़कियों को लाने का बड़े गोरखधंधे का ही हिस्सा है।
ताजा घटना पश्चिम बंगाल निवासी 16 वर्षीय लूसी (बदला हुआ नाम) को पिछले माह उसके नियोक्ता ने वेतन माँगने पर बुरी तरह पीट-पीटकर मरणासन्न कर दिया। किसी तरह लूसी ने पुलिस से संपर्क साधा। लूसी ने 19 दिसंबर को अस्पताल में दम तोड़ दिया। पुलिस मरियम नाम की महिला को गिरफ्तार किया, जो प्लेसमेंट एजेंसी चलाती है। उसी ने लूसी को मुखर्जी नगर स्थित व्यवसायी अतुल लोहिया के घर भेजा था। जब पुलिस ने लूसी के कार्यालय में छापा मारा तो करीब 203 लड़कियों की तस्वीरें और फर्जी पतों वाला एक रजिस्टर तथा फार्म मिले। वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के अनुसार मरियम ने बताया है कि इन लड़कियों के बारे में उसे खुद भी नहीं पता कि वे आज किस हाल में हैं। पता नहीं वे लड़कियाँ एक हाथ से दूसरे हाथ और फिर इसके आगे कितने हाथों से बिकती हुई किस परिणति को प्राप्त हुई होंगी।
लूसी की माँ ने रोते हुए बताया कि दो लोग उसकी इकलौती बेटी को तीन साल पहले मालदा से यह कहकर ले आए थे कि हर महीने दस हजार रुपये उसे भेजा जाएगा, परंतु आज तक न एक पैसा भेजा, न ही लाख कोशिशों के बावजूद कोई जानकारी, सिवाय गाली की। उसने बताया कि घर में चार लोगों का परिवार है और खेती के लिए एक बीघा से भी कम भूमि है, हर साल बाढ़ आती है। ऐसे हालात में मरियम और एक स्थानीय आदमी उसके पास आए और घरेलू काम-काज कराने के नाम पर बहुत जोर-जबरदस्ती करके उनकी बेटी को ले गए।
लूसी के साथ जो हुआ, उससे भी बदतर हालात एक नहीं बल्कि हजारों आदिवासी लड़कियों के साथ लगातार दसकों से बंगाल, झारखंड़, उड़ीसा, बिहार, असम उत्तराखंड, यहाँ तक कि नेपाल और बांग्लादेश तक से घरेलू काम कराने के नाम पर लाया जाता रहा है। इन कार्यों में लगी दर्जनों प्लेसमेंट एजेंसियाँ तथा उसके दम पर पलने वाले स्थानीय दलाल अधिकांश को जिस्मफरोशी के धंधे में झोंक रहे हैं। अनेक समाचार चैनलों तथा पत्र-पत्रिकाओं ने अनेक बार दिल्ली के कई मुहल्लों में बने अनेक प्लेसमेंट एजेंसियों के संचालकों एवं दलालों के काले-कारणामों को उजागर किया है कि वे किस तरह भेड़-बकरियों की कीमत पर मानव तस्करी कर उन्हें पंजाब, हरियाणा से लेकर विदेशों तक में जिस्मफरोशी के लिए भेजते हैं।
कुछ महीने पहले राजधानी दिल्ली के नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से सटे पंत मार्ग पर जिस तरह अफाक हुसैन और उसकी पत्नी सायरा बेगम 40 कमरों में 250 से ज्यादा लड़कियों को मुक्त कराया। यहाँ इन्होंने दर्जनों कोठे बना रखे थे और उसमें 11 से 17 साल की बच्चियों शारीरिक धंधा इन दड़बों में जिन अमानवीय तरीकों से करवाते रहे, वह दिल को दहला देने वाली है। इस दंपती की घोषित संपत्ति 100 करोड़ से ज्यादा है। पुलिस की कर्तव्यनिष्ठता का यह आलम रहा है कि यहाँ तैनात साठ से ज्यादा पुलिसकर्मियों का दसियों सालों से कहीं दूसरे जगह तबादला तक नहीं हुआ। सोच सकते हैं कि शासन व्यवस्था का इस धंधे को बढ़ाने में कितना याराना रिश्ता रहा है।
मानव तस्करी पर एटसेक, झारखंड चैप्टर और भारतीय किसान संघ के आंकड़ों के मुताबिक हर साल 12 से 14 हजार लड़कियाँ अवैध तरीके से दिल्ली जैसे महानगरों में ले जाई जाती हैं। 2010 तक 42 हजार लड़कियाँ मानव तस्करी का शिकार हो चुकी है जबकि इस अवधि में नेशनल क्राइम रिकार्डस ब्यूरो का आँकड़ा 33,000 का है। ध्यान देने की बात है कि यह आँकड़ा सिर्फ झारखंड का है, वह भी 2010 तक का ही। उपर बताये अनेक राज्यों के आँकड़ों को अगर मिलाया जाए तो संख्या लाखों में पहुंचेगी। इससे पता चलता है कि यह परिदृश्य कितना भयावह है।
यह कैसी विडंबना है कि हमारे पास मानव तस्करी के लिए कड़े कानून हैं। राजधानी दिल्ली में अपने आपको सबसे चौकस एवं चाक-चौबंध मानने वाली पुलिस है। केन्द्र एवं राज्यों में गरीब एवं आदिवासियों को सबसे अधिक हितैषी मानने वाली राज्य सरकारें हैं। हजारों की संख्या में समाजसेवा के नाम पर चलने वाली स्वैच्छिक संस्थाएँ हैं। फिर भी इन गरीब मासुमों को जानते-बूझते दर्दनाक मौत के मुँह में धकेला जा रहा है। इसे अंधेरगर्दी नहीं तो और क्या है? आवश्यकता है कि सभी संबंधित राज्य सरकारें इनके लिए विशेष योजनाएँ चलाकर इन्हें गरीबी नामक महामारी से मुक्त कराएँ तथा शासन एवं पुलिस मानव तस्करी के इस मकड़जाल को तत्काल नष्ट करे। इस कोढ़ से मुक्त हुए बिना हम कभी सशक्त एवं विकसित भारत की कल्पना नहीं कर सकते।   

Tuesday, January 3, 2017

जनतंत्र में जलतरंग
जनतंत्र उस जलाशय के समान होता है, जिसमें अगर एक कंकड़ भी उछालें तो उसके अंदर से ऐसी जलतरंग उठती है कि वह अपनी अंतिम सीमा, जहाँ तक हमारी नजरें दृश्यमान होती हैं, अपने मनोहारी गोल घेरे में लेती चली जाती है। स्वस्थ जनतंत्र में भी ऐसा ही कुछ होता है, इसमें अगर कहीं से भी कोई मुद्दा उछाला जाता है तो पूरे तंत्र को प्रभावित करता है, इसमें आम नागरिक, कार्यपालिका, न्यायपालिका, विधायिका और मीडिया सभी शामिल हैं।
जब प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने आठ नवंबर की रात्रि को भ्रष्टाचार पर जोरदार निशाना साधते हुए नोटबंदी नामक पत्थर उछाला तो जनतंत्र के हर पाए से टकराते हुए इसने अनेक प्रतिक्रियाओं को जन्म दिया। नोटबंदी के बाद जिस तरह भ्रष्टाचार में लिप्त तत्वों ने बेशर्मी से सरकारी तंत्र से गठजोड़ करके काला धन जमा किया था, एक बार फिर उसी बेहयापने से नोटबंदी के कारण उसे कूड़ा बनने से रोकने के लिए प्रोफेशनल दलालों, बैंक के अधिकारियों एवं कर्मचारियों से गठजोड़ कर उसे सफेद करने में लग गए। दूसरी तरफ आम आदमी अपनी दैनिक जरूरतों के लिए दिन भर कतारों में दर-दर की ठोंकरे खाकर भी केन्द्र सरकार के इस सफाई अभियान को सफल बनाने के लिए जय-जयकार करता रहा।
जनतंत्र की रीढ़ आम आदमी को भड़काने के लिए ज्यादातर राजनीतिक दल से लेकर विविध बेईमान स्वार्थी तत्व अनेक प्रयासों में लगे हैं, परंतु आम जनता प्रधानमंत्री के इस कदम को हर हाल में समर्थन दे रही है। इसी का परिणाम है कि प्रधानमंत्री खम ठोककर देश के भ्रष्टाचारी तत्वों को चुनौती दे रहे हैं और दिन-रात छापे पर छापे पड़ रहे हैं तथा इसमें संलिप्त लोग पकड़े जा रहे हैं, चाहे वे नेता हों, बड़े सरकारी अधिकारी हों, बैंकिंग व्यवस्था के अधिकारी-कर्मचारी हांे, प्रोफेशनल दलाल हों या फिर अनेक क्षेत्रों के बडे़ या छोटे व्यवसायी। आतंकवादियों और नक्सलवादियों को तो सूझ ही नहीं रहा कि कैसे उबरें अकस्मात हुए इस प्राणघाती हमले से।
जब इस चोट से पूरा तंत्र प्रभावित हो रहा है तो जनतंत्र का एक प्रमुख अंग राजनीतिक दल कैसे बच सकता था। आज आम जनता, न्यायपालिका, मीडिया से लेकर चुनाव आयोग, सभी पूछ रहे हैं कि काले धन को बढ़ावा देने या उसे सफेद करने में राजनीतिक दलों का भी बहुत बड़ा हाथ है। जब आम जनता पारदर्शिता और भ्रष्टाचार मिटाने के लिए मोदी जी के हर कदम का स्वागत कर रही है तो फिर सरकार और सारे दलों की भी जिम्मेदारी बनती है कि वे भी पारदर्शिता दिखायें और अपने सारे चंदों के स्रोतों का हिसाब दें।
इसी बीच निर्वाचन आयोग ने राजनीतिक दलों द्वारा प्राप्त किए जाने वाले नकद चंदे की अधिकतम सीमा बीस हजार से घटा कर दो हजार करने की सिफारिश की है। आयोग ने इसके लिए जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 में संशोधन का सुझाव दिया है। राजनीतिक दलों को मिलने वाला चंदा आयकर अधिनियम 1961 की धारा 13 (ए) के अंतर्गत दलों को बीस हजार रुपये से कम के नकद चंदे का स्रोत बताना जरूरी नहीं है। इसी का फायदा उठाकार चंदे की अधिकांश राशि को बीस हजार से कम राशियों में झूठे नामों से अपने खातों में दर्ज कर कानून को ठेंगा दिखाते हैं और करोडों-करोड़ रुपये काले से सफेद करते हैं। यह अधिनियम देश में फैले भ्रष्टाचार की जननी बन गया है। 
केंद्रीय सूचना आयोग कई बार राजनीतिक दलों से आग्रह एवं आदेश भी दे चुका है कि अपनी पूरी कार्यप्रणाली को सूचना के अधिकार कानून के दायरे में लाया जाए। परंतु सारे राजनीतिक दल इसके दायरे में आने से अब तक आना-कानी करते रहे हैं। आज चुनाव सुधार के काम में जुटे अनेक पूर्व चुनाव आयुक्तों एवं स्वैच्छिक संस्थाओं की तरफ से एक मांग जोरदार ढंग से उठ रही है कि सीएजी या चुनाव आयोग की ओर से नियुक्त स्वतंत्र ऑडिटर द्वारा सभी राजनीतिक दलों के वित्तीय लेन-देन का सालाना ऑडिट होे और उसकी रिपोर्ट चुनाव आयोग की वेबसाइट पर डाली जाए।
कानपुर  में हुई रैली में जनता को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने चुनाव आयोग के सुझाव का समर्थन किया तथा चुनाव सुधार को अपनी प्राथमिकताओं में सबसे ऊपर रखने की घोषणा की है। प्रधानमंत्री के आह्वान पर आज पूरा सरकारी तंत्र ऑनलाइन भुगतान व्यवस्था पर जोर दे रहा है, ताकि भ्रष्टाचार और काली कमाई पर प्रभावी रोक लगे तथा भारतीय अर्थव्यवस्था अधिक पारदर्शी बने। देश की आम जनता भी अनेक परेशानियाँ उठाकर प्रधानमंत्री के साथ खड़ी है। परंतु आज चुनाव आयोग, मीडिया तथा आमजनों को भी संशय है कि राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे के स्वच्छ और पारदर्शी हुए बिना क्या हमारी व्यवस्था पूरी तरह से भ्रष्टाचार और कालेधन से मुक्त हो पाएगी?
प्रधानमंत्री ने जिस ताकत और हिम्मत से नोटबंदी नामक पत्थर से भ्रष्टाचार पर निशाना साधा है और बेनामी संपत्ति की आड़ में काला धन खपाने वालों पर हमला बोल रहे हैं, उसी मुस्तैदी से कालेधन को सफेद करने वाली एक प्रमुख ढाल राजनीतिक चंदे को भी पारदर्शी करने के लिए आगे बढ़ें। तत्काल कम से कम तीन कदम, जिसमें पहला, जनप्रतिनिधित्व कानून 1951 में संशोधन, जिसके तहत 20 हजार तक के चंदे के स्रोत बताने की छूट मिली हुई है का उन्मूलन। दूसरा, सभी राजनीतिक दलों को सूचना का अधिकार कानून के दायरे में लाना। तथा तीसरा, सभी दलों के लिए चुनाव आयोग द्वारा नियुक्त ऑडिटर के माध्यम से हर साल ऑडिट कराना अनिवार्य करने के लिए तत्काल कदम उठायें। और सभी राजनीतिक दल सर्वसम्मति से इसमें साथ दें।
हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि कंकड उछालने से उठा जलतरंग का घेरा उसी जलाशय की अंतिम सीमा तक पहुँचता है, जो पूरी तरह से स्वच्छ और निर्मल हो, कूड़ा-करकट से भरे जलाशय में तो बड़ा से बड़ा पत्थर फेंकने पर भी वही छपाक से, बिना कोई खास हलचल मचाये कुछ पलों में ही शांत होकर बैठ जाता है। आशा है, सरकार एवं समाज के समन्वित प्रयास से हमारा जनतंत्र इतना स्वच्छ-निर्मल बन जाए कि हर छोटे मुद्दे पर भी जनतंत्र रूपी जलाशय में ऐसी नयनाभिराम जलतरंग उठे कि सीमांत तक एक रचनात्मक सरगम पैदा करते हुए शुभाशुभ परिणति को प्राप्त करे। 



Wednesday, November 30, 2016

जो जल बाढ़े नाव में...

इन दिनों जिस तरह नदियों-तालाबों में, गली-चौराहों पे, कूड़े के ढेर में, कारों एवं बसों में पाँच सौ और हजार-हजार रुपये के नोट लावारिस थोक के थोक मिल रहे हैं, उससे यही लग रहा है मानो कबीर की ये पंक्तियाँ, ‘‘जो जल बाढ़े नाव में घर में बाढ़े दाम, दोउ हाथ उलीचिए यही सयानो काम।’’ साकार हो गई हो। काश! ऐसा स्वतःस्फूर्त हो पाता तो आज हमारे समाज, देश और दुनिया का रूप ही कुछ और होता। हर जगह असमानता, गरीबी, भ्रष्टाचार, भुखमरी, गंदगी, बीमारी, अशिक्षा, अंधविश्वास, हिंसा, आतंकवाद, दंगे-फसाद और पर्यावरण विनाश का यह घृणित रूप देखने को नहीं मिलता। दुनिया का चेहरा इतना विद्रूप नहीं होता।   
आज लावारिस पैसे फैंके एवं बहाये जा रहे हैं तो इसके पीछे केन्द्र सरकार के एक साहसिक सधे कदम का नतीजा है। जिसका उद्देश्य देश में गंदे, काली कमाई से कमाये काले पैसे के आमद को रोकना है। देश की अधिकांश आर्थिक, राजनीतिक एवं सामाजिक समस्याओं की जड़ में यह काली कमाई का पैसा ही है, जिसकी आमद विदेशों से नकली नोट के रूप में आतंकवादियों एवं नक्सलियों के पास, अनेकों स्वैच्छिक संगठनों के पास, समाज-सेवा एवं अल्पसंख्यकों एवं दलितों के कल्याण के नाम पर चंदे के रूप में, नशे के कारोबारियों के पास अवैध आमद के रूप में तथा सोने की तस्करी के रूप में, तो देश के अंदर टैक्स चोरी, घूसखोरी, मानव अंगों की तस्करी, खाद्य पदार्थों में मिलावट आदि अनेक अवैध तरीकों से उत्पादित होता है। यह काला धन सिर्फ नोट के रूप में ही नहीं है, नोट के रूप में तो यह सिर्फ 6 से 8 प्रतिशत तक ही है बाकी तो अवैध बेनामी मकान, जमीन, सोना एवं विदेशी बैंको में जमा पैसों के रूप में है।
सरकार के सिर्फ पहले कदम यानी काले नकदी धन पर चोट से देश में इतना बड़ा तुफान खड़ा हो गया है। अन्य दूसरे कदमों, जिससे काले धन के अनेक अन्य रूपों पर जब सरकार का हमला होगा तो कितना भयंकर भूकंप, आँधी और ओले गिरेंगे, वह देखने वाला दृश्य होगा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सरकार के लिए यह परीक्षा की घड़ी है कि उनके कदम कितनी मजबूती से जमीन पर टिके रहेंगे, न केवल टिके रहेंगे बल्कि इसे अंजाम तक पहुँचाने में उतनी ही मजबूती से वह बढ़ पायेगी या नहीं? इसके शिकार बने शक्तिशाली लोग चैन से नहीं बैठेंगे और विरोध को लगातार हवा देते रहेंगे। हालाँकि प्रधानमंत्री ने अपने गोवा के भाषण में यह जता दिया है कि उनके कदम सख्ती से आगे बढ़ेंगे, चाहे उसकी कीमत जान देकर भी क्यों न चुकानी पड़े।    
          15 अगस्त, 2014 को स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री ने लालकिले से स्वच्छ भारत अभियानकी घोषणा करते हुए कहा था कि ‘‘केंद्र सरकार की योजना इस अभियान को जन-आंदोलन का रूप देकर आर्थिक गतिविधियों से जोड़ना है। सरकार का लक्ष्य गांधी की 150वीं जयंती 2019 तक पूरे देश को स्वच्छ भारत में तब्दील करना है।’’ इसी को अमली जामा पहनाने के लिए 2 अक्तूबर, 2014 को गाँधी जयंती पर जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सड़कों पर सफाई अभियान को निकले थे, उस समय उनके आलोचकों ने, अनेक पत्रकारों, यहाँ तक समाज के अनेक प्रबुद्ध वर्ग के लोगों तक ने इसे मात्र झाडू मारने एवं फोटोखिंचाऊ अभियान तक सीमित कर दिया; परंतु नरेन्द्र मोदी को नजदीक से जाननेवाले लोग अच्छी तरह से जानते हैं कि यह आदमी अगर कुछ कहता और संकल्प लेता है तो इसकी गूँज और इसका संदर्भ वहीं तक सीमित न होकर काफी दूर तक गुँजायमान होता है। उसकी टंकार काफी दूर तक झंकृत होती है।
स्वच्छता अभियान को झाडूमार अभियान तक सीमित करनेवाले उनके कथन में स्वच्छता अभियान को आर्थिक गतिविधियों से जोड़नेवाला कथन को या तो याद रखना भूल गए या जानबूझकार भुला दिया, जबकि इस अभियान का असली मर्म इसी आर्थिक गतिविधि में छुपा हुआ था। कहने का तात्पर्य यह है कि जबतक देश की आर्थिक गतिविधियाँ स्वच्छ नहीं होंगी, तबतक संपूर्ण स्वच्छता का सपना दिवास्वप्न ही बनी रहेगी। क्या गंदगी भरे कारोबार और आचार-विचार से ग्रस्त देश और समाज की सड़कें एवं पर्यावरण स्वच्छ बना रह सकता है?
आज मोदी सरकार की झाडू हर उस कोने और और काली कमाई की कंदराओं की सफाई कर रही है और अनेक अछूती जगहों पर घुसकर सफाई करने को मचल रही है। सरकार ने अपने तेवर से बता दिया है कि झाडू अब सिर्फ धूल और पत्ते ही नहीं बल्कि आजादी के बाद से ही आम लोगों तक आर्थिक और सामाजिक जनतंत्र यानी आर्थिक और सामाजिक समानता के राह में रोड़ा बनी अगाध काली कमाई की सफाई से ही देश में असली जनतंत्र का मार्ग प्रशस्त होगा। इसके लिए सर्वप्रथम राजनीतिक सुधार, यानी चुनावों में काले पैसे के प्रवाह को रोककर लक्ष्य ही हासिल किया जा सकता है।   
आम जन ने प्रधानमंत्री के इस संपूर्ण सफाई अभियान को जिस तरह हाथो-हाथ लिया है़ यह हमारे देश और समाज के भविष्य के लिए शुभ संकेत है। हमें सकारात्मक सोच रखनी चाहिए और स्वच्छ भारतनामक इस अँखुआते बीज को खाद-पानी देकर अनेक झंझावातों से बचाने में पूरा सक्रिय सहयोग देना चाहिए, ताकि 2019, गाँधीजी की 150वीं सालगिरह तक गांधी के, यानी भारत के आम लोगों के सपनों का स्वच्छ भारत बन जाए।
गांधीमार्ग अंत तक सबके लिए रास्ता खुला रखता है। काश! काले कारनामों में लिप्त वह वर्ग भी कबीर के बताए राह पर चलते हुए अपने घर में बढ़ते दाम को समाज के उन्नयन के लिए दोनों हाथों से उड़ेलना प्रारंभ कर दे, तभी वे इस गरीबी व असमानता के समुद्र के बीचोबीच काले धंधे के बल पर बने अपने अमीरी के चमकते द्वीप में सुरक्षित रह पाएगें। नहीं तो वह दिन दूर नहीं, जब स्वच्छता अभियान का यह जनसमुद्र रूपी तूफान उसे लील जाएगा। उन्हें यह कदापि नहीं भूलना चाहिए कि जो कबीर और गांधी के बताये स्वैच्छिक एवं स्वविवेक के रास्ते बंद कर लेते हैं, वे अपने लिए स्वतः सरकार और शासन के राजदंड का रास्ता भी खोल लेते हैं।