Thursday, March 9, 2017

हर दिल में बसे बसंत
बसंत पंचमी को गुजरे महीना पूरा होने को है। पर बसंत का कोई नामोनिशान नहीं दिख रहा। पार्कों एवं सड़क के किनारे खड़े पेड़ बिजली के खंभे जैसे ही निर्जीव न सावन हरे न भादो भरेलग रहे हैं। अन्य पेड़ों को तो छोड़िए, आम्र वृक्षों तक का यह हाल है, जिन्हें मंजरियों से अभी लदा होना चाहिए, वे भी निर्लज्ज भाव से बेहया-बेसुध खड़े हैं। मॉल, बाजार यहाँ तक कि सब्जी और फलों के बाजारों तक को देखने पर दूर-दूर तक पता नहीं चलता कि यह बासंती मौसम है और शाक-सब्जियाँ और फल इसके अनुरूप होने चाहिए। अब तो हर मौसम हर तरह की सब्जियों और फलों से भरा रहता है सिर्फ पैसा और स्वाद न पूछो सब्जी कीशर्त पर। बसंत आने की सूचना देने वाले कवि और लेखकों का एक हिस्सा इन दिनों चुनावी नारे काम बोलता है...और कारनामे बोलते हैंजैसे जुमले गढ़ने में व्यस्त हैं। तो दूसरे सहिष्णुतावाद-असहिष्णुतावाद आंदोलन चला चुकने के बाद कुछ थक-हारकर बैठ गए हैं, तो कुछ शासन में पद और पुरस्कार पाने के लिए सामंजस्य बिठाने में रमे हुए हैं। शायद कुछ दुखिया, दिलजले होंगे, जो बसंत आगमन पर कुछ रचे होंगे या रच रहे होंगे, लेकिन उन बेचारों को कौन पूछता, पढ़ता है। दिन-रात इतने काँव-काँव के आगे कोयल कभी इधर झाँकेगी, यह सोचना भी बेकार है। खैर, बसंत का तो पता नहीं, पर वैलेंटाइन बाबा का तारीख के हिसाब से आगमन हुआ, सप्ताह भर पता नहीं कौन-कौन से डे होने के बाद वैलेंटाइन डे आया, जिसमें करोड़ों रुपयों के गुलाब का आदान-प्रदान हुआ और मॉल और बाजार खूब गुलजार हुए। औरों की बात छोड़िए, हमारी केन्द्र सरकार भी, जिसे विपक्षी दल दिल की बात नहीं करने वाली सरकार कहते हैं, उसने करोड़ों दिलों को खुश करने वाला तोहफा, दिल के मरीजों के ऐंजियोग्राफी में काम आने वाला स्टेंट की कीमत में भारी कमी करके दिया।
जीवन रक्षक कोरोनरी स्टेंट की कीमत 85 फीसद तक कम करके लाखों हृदय रोगियों को बड़ी राहत प्रदान की है। धातू के बने स्टेंट (बीएमएस) की कीमत 7,260 और ड्रग एल्यूटिंग स्टेंट (डीईएस) की कीमत 29,600 तय की गई है। इससे पहले बीएमएस का अधिकतम खुदरा मूल्य 45,000 रुपये और डीईएस का 1,29404 रुपये तक था। विचार-विमर्श और कई संबंधित पक्षों से मिली जानकारी के बाद राष्ट्रीय औषधि मूल्य अथारिटी (एनपीपीए) ने स्टेंट की कीमत तय करने का फैसला किया। एनपीपीए ने इस संबंध में अधिसूचना जारी की है। स्टेंट की कीमत तय होने से 80,000 से 90,000 प्रति पीस की बचत होगी और दिल के मरीजों को एक साल में 4,450 करोड़ रुपये की राहत होगी।
धातु के स्टेंट का इस्तेमाल अब बेहद कम होता है क्योंकि उसके कारण होने वाली पेचीदगियाँ ज्यादा हैं। डीईएस यानी जिन स्टेंट से दवा रिसती है और धमनियों को साफ करने में मदद मिलती है, उसकी खपत 80 प्रतिशत है। स्टेंट एक तरह छल्लानुमा छोटी स्प्रिंग जैसा होता है, जिसे दिल की धमनियों में उस जगह फिट किया जाता है जहाँ कोलेस्ट्रॉल जमने की वजह से खून का प्रवाह बंद या फिर बहुत मंद हो जाता है। इस प्रक्रिया को एंजियोप्लास्टी कहा जाता है। शरीर में एक पतली ट्यूब, जिसे कैथेटर कहते हैं, उसके जरिए इसे पैर और हाथों की बड़ी धमनियों के रास्ते दिल तक पहुँचाया जाता है।
दुर्भाग्य यह है कि अभी से समाचारों में आने लगा है कि स्टेंट की कीमत तय करने के बाद से अस्पतालों ने एंजियोप्लास्टी का पैकेज महँगा करना शुरू कर दिया है। कम किए गए स्टेंट की कीमत की भरपाई करना तो बहुत आसान है। ये मरीजों के कमरे व बिस्तरों की कीमत बढ़ा देंगे, डॉक्टर के चार्ज में इजाफा कर देंगे, जैसा कि पहले से करते आए हैं। कुछ और मरीजों को, जिन्हें स्टेंट लगाने की जरूरत नहीं है उन्हें भी लगवा देंगे, तो कभी स्टेंट की कृत्रिम कमी दिखाकर भरपाई कर लेंगे। इसका एक उदाहरण, केन्द्र सरकार ने अभी तक आवश्यक दवाओं की राष्ट्रीय सूची (एनएलईएम) में 1415 दवाएँ शामिल कर कीमतों में भारी कमी की है, जिसमें कैंसर, एड्स, मलेरिया की दवाएँ शामिल हैं। परंतु अस्पतालों की ठगी के आगे मरीजों को न के बराबर फायदा मिल रहा है। बड़े-बड़े प्राइवेट अस्पतालों में देखा गया है कि अपने फायदे के लिए ये अमानवियता के किसी भी हद तक जा सकते हैं, हाल ही में इनकी सहमति से किडनी रैकेट चलाते इनके डॉक्टर और मैनेजमेंट तक पकड़े गए हैं।
अमेरीका जैसे देश में किस स्थिति में क्या करना है, इसकी पूरी प्रक्रिया तय है। इसलिए ऑपरेशन और स्टेंट लगाने की प्रक्रिया तय हो और फिर इस प्रक्रिया की निगरानी के लिए रेगुलेटर बने, जो निरंतर अस्पतालों का ऑडिट करे। यह एक अच्छा कदम है कि अब सरकार ने मेडिकल उपकरणों को भी दवाओं की राष्ट्रीय सूची (एनएलईएम) के दायरे में लाने की पहल शुरू कर दी है। परंतु सबसे बड़ी आवश्यकता इस बात की है कि सरकार को यह मानना पड़ेगा कि लोगों के जीवन से जुड़ी मौलिक जरूरत स्वास्थ्य को बाजार और निजी अस्पतालों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। सरकार को ज्यादा से ज्यादा हर स्तर पर सरकारी अस्पतालों को बढ़ाकर उसमें सारी सुविधाएँ देनी ही पड़ेंगी, तभी निजी अस्पताल भी मजबूरी बस पारदर्शिता से काम करेंगे।      
महायोगी शिव कामदेव के बाणों से आहत होकर उन्हें भस्मीभूत कर दिया परंतु काम की चिर संगिनी रति की अरण्य-रुदन के आगे झुकते हुए यह वरदान भी दे दिया कि कामदेव अब निराकार रूप में पूरी प्रकृति में समाकर सदैव अमर रहेंगे। आज बाजार नामक दैत्य पूरी प्रकृति को ही निगलता जा रहा है, उसने कामदेव के बाण बसंत के आगे अपने वैलेंटाइन को आगे कर दिया है। युवा पीढ़ी आज उसके आगे नतमस्तक है। सर्वसमावेशी भारतीय संस्कृति में उसका भी स्वागत है, बशर्ते कि वह भी हमारी बसंतोत्सव का एक हिस्सा बनकर आए। इसके लिए सरकार और समाज को बाजारवादी निजी फायदे को बढ़ावा देनेवाले सर्वग्रासी भाव को नियंत्रित कर शिवत्व यानी प्राकृतिक समदृष्टि भाव से कर्मशील होना होगा। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी  की प्रसिद्ध उक्ति है, ‘बसंत आता नहीं, ले आया जाता है।बसंत सदैव अपने संभावनाओं का द्वार सबके लिए खुला रखता है। जब सरकार और समाज प्रकृति का ध्यान रखेंगे, तभी बसंत विहँसता हुआ आएगा, फिर पूरी कायनात और हर दिल में बसंत बसेगा!


No comments: