Saturday, April 4, 2015

चोरी की शिक्षा

जिस तरह बिहार एवं उत्तर प्रदेश की मैट्रिक परीक्षा में विधार्थियों द्वारा की और कराई जा रही चोरी को टीवी चैनलों एवं समाचार पत्रों द्वारा उपहास उड़ाते हुए दिखाया जा रहा है और लोग कहकहे लगा रहे हैं। वह हिन्दी पट्टी खासकर बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश जैसे राज्यों को नजदीक से जाननेवाले जानकारों के लिए उतनी आश्चर्यजनक, चौकानेवाली घटना नहीं हैं। इस वर्ष जिस तरह से चार-पाँच मंजिले स्कूलों एवं भवनों पर चोरी कराने के लिए लड़कों को हनुमान की तरह कुदते-फांदते, चढ़ते देख रहे हैं, वास्तव में यह सरकारी शिक्षा व्यवस्था की कई दशकों से होती उतनी मंजिल पतन की बानगी है जो अब चरमराकर पतन के पाताल तक पहुँच गई है।
जैसा कि पूर्व मुख्यमंत्री लालू यादव जी खिलखिलाते हुए कह रहे थे, मेरा राज पुनः आयेगा तो किसी को भी छत और खिड़कियों पर लटककर चोरी करने या करवाने की जरूरत नहीं रहेगी। सबको किताब-कॉपी दे दी जाएगी कि खुलेआम लिखो। यह लोग भूले नहीं हांेगे कि जब वे कुछ साल पहले मुख्यमंत्री थे तो धडल्ले से सभी स्तर पर हो रहे परीक्षाओं में कदाचार को बढ़ावा देने में कोई कोर-कसर उन्होंने नहीं छोड़ी थी। जिस क्षेत्र में जिस जाति का बाहुबल था पूरे स्कूल या कॉलेज में उसी जाति के नेताओं की मनमानी और धडल्ले से चोरी चलती थी। यहाँ तक कि कई स्कूल और कॉलेज में कार्यालय की खिड़की सुबह से शाम तक खास परीक्षार्थियों के लिए खुला छोड़ दिया जाता था ताकि परीक्षार्थी उत्तर की कॉपी शाम तक अपने घर से लिखकर इस खिड़की में डाल दें। हाँ जबसे नीतीश राज यानी सुशासन वाला राज आया तो इसमें कुछ रोक अवश्य लगी थी फिर भी उतना नहीं कि जितना कि सुशासन के गुणगान में हमारे पत्रकार बंधुओं को बिहार में सबकुछ सुशासित-सुभाषित लगने लगा था।
उत्तर प्रदेश में जब भारी मात्रा में हो रही नकल को रोकने के लिए कल्याण सिंह सरकार ने कानून बनाया और तत्कालीन शिक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कड़ाई से उसे अनुपालन करवाकर कदाचार को रोका तो राजनीतिक कोहराम मच गया था समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह ने इसे अगले विधानसभा चुनाव का मुख्य मुद्दा ही बना दिया और अपनी सरकार बनते ही मुख्यमंत्री की शपथ लेने के बाद तत्काल कैबिनेट बैठक करके पहला काम इस कानून को निरस्त करने का किया था। वह समाजवाद इतना फला-फुला कि अब राज्य लोक सेवा आयोग (यूपीपीएससी) के प्रश्नपत्र परीक्षा के पहले से ही धडल्ले से लाखों रुपये में बिक रही है। मध्य प्रदेश इस मामले में थोड़ा अलग है क्योंकि वहाँ जो भी होता है अभिनव एवं सभ्य अंदाज में होता है। यानी व्यापमं वाले अंदाज में। जिसमें परीक्षा वगैरह सब सलीके से हो चुकने के बाद अंतिम परिणाम के समय परीक्षार्थी के नाम फोटो बदलकर पूरा परिणाम खास लोगों के नाम कर दिया जाता है और सामान्य योग्य अभ्यर्थी जिंदगी भर अपने गरीब और सामान्य होने के भाग्य पर लहू के आंसु बहाने को विवश होकर रह जाते हैं।
इधर के अनेक वर्षों के अनेक स्वतंत्र शिक्षा संस्थाओं के रिपोर्ट को उठा कर देख लें सब इन क्षेत्रों में शिक्षा व्यवस्था खासकर प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा की चरमराने की बानगी से भरी पड़ी हैं। अनेक सर्वे इस बात की तस्दीक करती रही है कि सातवीं और आठवीं के बच्चे किताब ठीक से नहीं पढ पाते, चार लाइन शुद्ध लिख नहीं पाते और मामूली गुणा-भाग के प्रश्न हल नहीं कर पाते। परंतु साक्षरता के आंकडे सालों-साल बढ़ते जाते हैं। शिक्षा का मतलब सिर्फ साक्षरता भर बनकर रह गया है। यानी सिर्फ अपना नाम भर लिख लेना। इसके लिए अनेक कारण जिम्मेदार रहें जिसमें प्रमुख हैं- राज्य सरकारों का शिक्षा के प्रति बिल्कुल ध्यान नहीं देना और जानबूझकर स्थिति को आंख मुंदकर बिगड़ते देखते रहना। योग्य शिक्षकों की नियुक्ति कई दशकों से नहीं करना, स्कूल एवं शिक्षा के आवश्यक संसाधनों का विस्तार नहीं करना। स्कूलों पर जबर्दस्ती अधिक से अधिक नामांकन के आंकड़े पेश करके दिखाने के लिए प्रोत्साहित करना जैसे अनेक कारणों को गिनाया जा सकता है। इन सबके पीछे जो आपराधीक सोच यह रहा कि शिक्षा मुहैया कराने के मौलिक कर्त्तव्य से सरकारों का किनारा कर लेना और प्राइवेट शिक्षा की दुकानों को हर स्तर पर बढ़ावा देना। 
मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने अपने शासन काल में अनेक क्षेत्रों में अनेकों अभिनव योगदान दिए परंतु एक योगदान जिसे सभी हिन्दी राज्यों ने हाथोंहाथ लिया था वह था शिक्षा मित्रों या ठेकेदारी पर शिक्षकों की नियुक्ति। इन शिक्षकों को न तो कई सालों से पढ़ाई-लिखाई से कुछ खास लेना-देना था और न ही इनकी प्रशिक्षण की कोई व्यवस्था। सरकारों ने अपने नौनिहालों को भाग्य-भरोसे इन ठेके के चार-पाँच हजार वेतन पर नियुक्त बेचारे बेरोजगारों के हाथों सोंप दिया और शिक्षकों के वेतन पर होने वाले खर्च से निजात पा ली। नतीजा यह हुआ कि हर कस्बे शहर से लेकर महानगरों तक प्राइवेट स्कूल खुल गये और जो भी माता-पिता अपने बच्चों को इनमें भेजने लायक थे वे इन दुकानों की शरण में आ गये। जो गरीब कुपोषित बचे वे खिचड़ी या दलिया से भूख मिटाने व साक्षरता के आँकड़े बढ़ाने भर के लिए सरकारी स्कूल जा रहे हैं। बिहार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के शासन में आते ही सभी वर्गो के लिए समान स्कूलिंग व्यवस्था के लिए मुचकुंद दुबे की अध्यक्षता में समिति बनाई थी पर वर्षों पहले वह रिपोर्ट आ जाने के बावजूद उसे किस कूड़ेदान में डाल दिया गया पता नहीं। उनके एक दशक से ज्यादा के शासनकाल में कितने शिक्षकों की नियुक्ति हुई कोई बता सकता है?
आजादी के बाद कम से कम बहुसंख्यक सामान्य जनों के लिए प्रगति की अगली मंजिल पर जाने के लिए शिक्षा की जो सार्वजनिक सामान्य सीढ़ियां हुआ करती थी उसे जब कुछ दसकों से लगातार नष्ट कर उसके जगह पर खंदक खोदा जा रहा हो। इतना ही नहीं सफलता के ऊँचे सोपानों पर चढने के लिए कुछ खास वर्गों के लिए कहीं एस्केलेटर तो कहीं व्यापमं जैसी लिफ्ट की व्यवस्था कर दी गई हो। तो फिर सफलता की मृग मरिचिका पाले सामान्य वर्ग बोर्ड परीक्षा पास करने के लिए तीन मंजिले-चार मंजिले हनुमान कूद का रास्ता अपना कर चोरी कर या करवा रहा है तो इसमें आश्चर्य या विस्मय की कौन सी बात है? अब ये लोग उन गरीब बेचारों पर हँस रहे हैं जिन्हें पूरी जिंदगी जीने की न्यूनतम आवश्यकताओं के लिए इसी तरह गाँव से शहरों, महानगरों और जहाँ भी आशा की रोशनी दिखाई दे हर उस मंजिल तक कूदते-फांदते रहना है!

Tuesday, March 3, 2015

साधेंगे और सधेंगे भी

दिल्ली में द्वारका-वैशाली मेट्रो रूट से वैशाली जाते समय जैसे ही यमुना बैंक स्टेशन में पहुँचते हैं, लोगों का एक ऐसा रेला दरवाजा खुलते ही प्रवेश करता है, मानो यमुना नदी में अनायास कोई बाढ़ आई हो, जो सबकुछ बहाकर ले जायेगी। इसमें हर वर्ग के लोग शामिल होते हैं-ज्यादातर कर्मचारी एवं मजदूर। पहले से भरे मेट्रो में अच्छे मजबूत कद-काठी के लोगों तक को सँभलना मुश्किल हो जाता है। मजबूरी बस सभी एक-दूसरे से चिपककर सफर करते हैं। इसमें कइयों का बूरे हाल हो जाता हैं खासकर उन लोगों का, जो अब तक अकेले कारों में सफर के आदी रहे हैं, व सड़कों पर ट्रैफिक के बुरे हाल के चलते और समय पर कार्यस्थल पर पहुँचने की बाध्यता के कारण मेट्रो से सफर करने को बाध्य हैं। कुछ अर्सा पहले तक ये तथाकथित बड़े लोग इन निम्न वर्गों के साथ सीट में बैठते समय या साथ में खड़े यात्रा करते समय नाक-भों सिकोड़ते, ऊलजलूल गंदे, बिहारी आदि शब्द बकते हुए मारने-फाड़ने तक पर उतर जाते थे, परंतु अब बर्दाश्त करने लगे हैं। और इधर निम्न वर्गांे में भी साथ-साथ यात्रा करते हुए आचार-व्यवहार में पहले से अधिक नफासत एवं शालीनता आई है।
कुछ ऐसा ही नजारा अभी दिल्ली विधानसभा चुनाव में देखने को मिला। चुनाव प्रचार में भारतीय जनता पार्टीऔर आम आदमी पार्टीने एक-दूसरे के विरुद्ध ऐसे भाषण, नारे एवं प्रचार किया या जिसे लोकतांत्रिक मर्यादा के अंतर्गत नहीं रखा जा सकता खासकर केन्द्र में सत्तारूढ़ भाजपा एवं उसके प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जैसे बड़े कद के व्यक्ति के लिए दिल्ली विधानसभा जैसा चुनाव, जोकि पूर्ण राज्य भी नहीं है, को इतनी गंभीरता से लेना कई निरपेक्ष जनों को भी अखर रहा था। परंतु जिस तरह के परिणाम आये, जिसमें आपपार्टी को भारी सफलता मिली। अपनी पार्टी भाजपाके हार के बावजूद प्रधानमंत्री ने जिस सहजता और सद्भाव से अरविंद केजरीवाल को बधाई दी और उनसे मिलकर विकास के मोर्चे पर हरसंभव सहयोग का आश्वासन दिया, यह हमारे जनतंत्र की मजबूती की निशानी है।
आजादी के बाद कई दशकों तक सत्ता पर ऊँची जातियों का ही वर्चस्व था। इसका मूल कारण यह था कि कांग्रेस के अधिकांश पढ़े-लिखे इसी वर्ग ने स्वतंत्रता आंदोलन की अगुवाई की थी। परंतु जैसे-जैसे जनतंत्र मजबूत होता गया, लोगों की भागीदारी बढ़ती गई पिछड़े और दलितों की भी शासन और सत्ता में भागीदारी बढ़ती गई। अब तक तो समाज के सभी वर्ग सत्ता और शासन का नेतृत्व कर चुके हैं और कर रहे हैं। आज देश के अधिकांश राज्यों के मुख्यमंत्री पिछड़े एवं दलित वर्ग से आते हैं। मौजूदा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी पिछड़े वर्ग से हैं। अब सभी दल एवं वर्ग समझ चुके हैं कि एक जाति एवं वर्ग का शासन देश में अब नहीं चलने वाला। किसी भी दल को सत्ता प्राप्त करने के लिए हर समुदाय एवं वर्गों को प्रतिनिधित्व देना एवं उसका दिल जीतना आवश्यक हो गया है। यही कारण है कि 2014 के आमचुनाव से ही करीब-करीब सभी दलों का एजेंडा जाति एवं वर्ग से ऊपर उठकर विकास के मुद्दे पर केंद्रित गया है।
परिवर्तन सिर्फ सत्ता केन्द्रों में ही आया हो, ऐसा नहीं है। परिवर्तन लोकतंत्र के सभी स्तंभों में आया है, उसी का प्रतिबिंब सत्ता प्रतिष्ठानों में दिखाई पड़ रहा है। सरकार के तीनों स्तंभों में अब तक काफी बदलाव आ गया है। विधायिका में अब करीब-करीब देश की सभी जातियों एवं समुदायों को प्रतिनिधित्व मिल रहा है। उसी तरह न्यायपालिका में भी काफी परिवर्तन आया है। सभी समुदायों एवं वर्गों की हिस्सेदारी इसमें भी बढ़ी है। यह पहले से अधिक विकेन्द्रित हुआ है। इन्होंने समय-समय पर ऐसे फैसले दिए हैं, जिससे जनतंत्र को मजबूती मिली है। चाहे वह शीर्ष सत्ता द्वारा देश में आपातकाल को विफल करना हो या भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए अनेक संवैधानिक कदम उठाने हों, पी.आई.एल. के माध्यम से अनेक जनहितकारी फैसले देने हों या पर्यावरण को सुरक्षित रखने के लिए ग्रीन बैंच या सामाजिक न्याय पीठ बनाना हो, जिसके माध्यम से हाँसिए पर जीने वालों को जल्द से जल्द न्याय मुहैया कराना हो।
चौथा स्तंभ यानी मीडिया भी अब काफी मुखर हो चला है, खासकर इलेक्ट्रोनिक मीडिया, जिसमें आम लोगों के नजर में सत्ता से लेकर समाज की सभी अच्छी और बुरी खबरों तक जनता की पहुँच एवं भागीदारी बढ़ गई है। इसके बावजूद कोई मीडिया का मठाधीश अगर किसी पक्ष को खास तवज्जो देती है तो उसके प्रतिस्पर्धी चैनल उसको विरोध में तैयार बैठा होता है। और अगर मिलकर भी कुछ दबाना चाहें तो आम जन के हाथों में सबसे बड़ा हथियार अब सोशल मीडिया के रूप में आ गया है, जिसके इस्तेमाल से अब कुछ दबा-छुपा नहीं रह सकता। इसके अलावा स्वैच्छिक क्षेत्र, जिसे लोकतंत्र का पाँचवाँ स्तंभ भी कहा जाता है, जनांदोलनों एवं समाज-सेवा के माध्यम से हमेशा से जनतंत्र को मजबूत करता रहा है और कर रहा है।
जनतंत्र के सभी स्तंभ या इसके सभी तत्वों में समन्वय के साथ-साथ निरंतर एक प्रतिस्पर्धी भाव भी चलता रहता है। एक अंग जहाँ यह मानकर चलता है कि हम दूसरे दल या स्तंभ को साध रहे हैं, वहीं वह उसी समय अपने अंदर से सधता भी रहता है। दिल्ली विधानसभा चुनाव में जनता को शायद लगा कि देश के स्तर पर मोदी जी नीतियाँ ठीक हो सकती हैं, परंतु लोकल लेवल पर अगर एक अच्छा विकल्प मौजूद है तो हम उसे क्यों न आजमायें और यहाँ कि जनता ने यही किया। उसी तरह आम आदमी पार्टीएवं उसके नेतृत्व को सरकार के बाहर रहकर आंदोलन करने में और वादे करने में कोई रोक नहीं थी, जिसपर उनको जनसमर्थन तो मिल गया, परंतु अब सरकार में रहकर उन्हें केन्द्र सरकार से सामंजस्य बिठाते हुए सारे वादे पूरे करने पडेंगे।
इस तरह एक-दूसरे को साधने और साथ-साथ सधते जाने की यह प्रक्रिया ही जनतांत्रिक प्रणाली को जीवंत एवं मजबूत बनाये रखता है। अल्पकालिक समय के लिए भले ही यह लगे कि यह किसी की हार या जीत हुई है, परंतु यह तो लंबी लोकतांत्रिक प्रक्रिया का पड़ाव मात्र है। यह किसी कि हार जीत की नहीं बल्कि जीवंत जनतंत्र का प्रतीक है जो सबको लोकतांत्रिक ढांचे के अनुरूप साधती रहती है।

Monday, February 2, 2015

नीति आयोग: परिवर्तन की नई पौध!

15 अगस्त, 2014 को स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने योजना आयोग के बारे में कहा था कि ‘‘कभी-कभी पुराने घर की रिपेयरिंग में खर्चा ज्यादा होता है, लेकिन संतोष नहीं होता है। फिर मन करता है, अच्छा है एक नया ही घर बना लें...।’’ इसी संकल्प को पूरा करने के लिए केंद्र सरकार ने नये साल के प्रारंभ में ही योजना आयोग के स्थान पर नीति आयोगका गठन किया है। सरकार ने कैबिनेट के जिस प्रस्ताव के जरिए नीति आयोग बनाया है उसके प्रारंभ में ही महात्मा गांधी के उक्ति को उद्धृत किया गया है, इसके मुताबिक महात्मा गांधी ने कहा था कि सतत विकास जीवन का नियम है और जो व्यक्ति हमेशा हठधर्मिता बनाए रखने की कोशिश करता है, वह स्वयं को भटकाव की ओर ले जाता है।
प्रस्ताव में महात्मा गांधी, स्वामी विवेकानंद से लेकर बी.आर. अंबेडकर, पंडित दीनदयाल उपाध्याय, तमिल कवि तिरवल्लुवर और असमिया भाषी महान संत शंकरदेव के दार्शनिक चिंतन का उल्लेख किया गया है। इससे यही समझ बनती है कि नीति आयोग की भूमिका आने वाले समय में देश की राजव्यवस्था में एक नया अध्याय लिखेगी। यह जवाहर लाल नेहरू के योजना आयोग की पूँजीवाद, साम्यवाद या उदारवाद के वैश्विक प्रतीक की जगह ठेठ देशी राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक चिंतन एवं विचारों पर आधारित होगी।
यह सही है कि पिछले 65 वर्षों में देश और विश्व की आर्थिक परिस्थितियाँ काफी बदली हैं। योजना आयोग का गठन सोवियत रूस के साम्यवादी ढाँचे पर किया गया था, परंतु 90 के दशक में सोवियत रूस के बिखरने एवं साम्यवाद के सपनों पर तुषारापात होने के बाद वैश्वीकरण, उदारवाद और बाजारवाद ने पूरी दुनिया को जिस तरह अपने गिरफ्त में लिया, उसकी चपेट में भारत की नेहरूवादी मिश्रित अर्थव्यवस्था ने भी घुटने टेक दिए। योजना आयोग में भी इसकी साफ झलक मिलने लगी। योजनाएँ बनाने के नाम पर योजना आयोग ने अब तक संवैधानिक संस्था वित्त आयोग से लेकर कई केन्द्रीय मंत्रालयों के अधिकारों का अपहरण कर लिया। राज्य सरकारों के वित्तीय आवंटन के अधिकार तक अपने हाथ में ले लिए थे, यहाँ तक कि देश की गरीबी रेखा अपने मनमाने आँकडों के अनुरूप गढ़ने लगी, जिसका आम आदमी के वास्तविक जीवन-निवर्हण से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं रह गया था। यहाँ तक कि किस राज्य में कितना गरीब है, उसका भी फैसला वहाँ के वास्तविक स्थितियों, जिसका फैसला गँंव के पंचायत जिला या राज्य सरकार को किनारे रख कर योजना आयोग ही करने लगा था।
राज्य सरकारें लगातार यह माँग करती रही थी कि योजना आयोग, जो गरीबों की संख्या बता रहा है उससे कई गुणा अधिक गरीब उसके राज्य में हैं और उसके भौगोलिक एवं जमीनी हिसाब से वित्तीय एवं संसाधनों का आवंटन कर,े पर योजना आयोग मनमाने फैसले लेती रही और संघीय व्यवस्था को ठेंगा दिखाती रही। मुख्यमंत्री इसके दरवाजे पर दंडवत् होने को मजबूर होते रहे। गांधी के ग्राम स्वराज इसके द्वारा बनाये मनमानी कल्याणकारी योजनाएँ कागजी कार्रवाइयों और भ्रष्टाचार में दबकर दिल्ली की मेहरबानियों पर पलने की अभ्यस्त होती गई।
नीति आयोग जिसका पूरा नाम नैशनल इंस्टीट्यूट फॉर ट्रांसफार्मिंग इंडिया और हिंदी में राष्ट्रीय भारत परिवर्तन संस्थान आयोग कहा जा रहा है। कैबिनेट प्रस्ताव, जिसके तहत इसका गठन हुआ के मुताबिक यह आयोग विकास प्रक्रिया में निर्देश और रणनीतिक परामर्श देगा। नए आयोग के उद्देश्यों को स्पष्ट करते हुए केंद्र सरकार ने जो बयान जारी किया है, उसके अनुसार नीति आयोग राज्यों के साथ सतत आधार पर संरचनात्मक सहयोग की पहल और तंत्र के माध्यम से सहयोगपूर्ण संघवाद को बढ़ावा देगा। नीति आयोग ग्राम स्तर पर विश्वसनीय योजना तैयार करने के लिए तंत्र विकसित करेगा और इसे उत्तरोत्तर उच्च स्तर तक पहुँचाएगा। आयोग राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों, प्रैक्टिशनरों तथा अन्य हितधारकों के सहयोगात्मक समुदाय के जरिए, ज्ञान, नवाचार और उद्यमशीलता के लिए सहायक प्रणाली बनाएगा। इसके अतिरिक्त आयोग कार्यक्रमों और नीतियों के क्रियान्वयन के लिए प्रौद्योगिकि उन्नयन और क्षमता निर्माण पर जोर देगा।
नीति आयोग का जो स्वरूप तय किया गया है, उसमें भारत के प्रधानमंत्री इसके अध्यक्ष होंगे। गवर्निंग काउंसिल में राज्यों के मुख्यमंत्री और केन्द्र शासित प्रदेशों के उपराज्यपाल या प्रशासक शामिल होंगे। विशिष्ट मुद्दों और ऐसे आकस्मिक मामले, जिनका संबंध एक से अधिक राज्य या क्षेत्र से हा,े को देखने के लिए क्षेत्रीय परिषद् गठित की जाएगी। ये परिषदें विशिष्ट कार्यकाल के लिए बनाई जाएँगी। योजना आयोग की तरह ही इसका एक उपाध्यक्ष होगा, जिसकी नियुक्ति प्रधानमंत्री करेंगे। इसके अलावा एक मुख्य कार्यकारी अधिकारी भी होगा। इसके सदस्य पूर्णकालिक होंगे और अंशकालिक भी। वहीं पदेन सदस्यों में केंद्रीय मंत्रिपरिषद से अधिकतम चार सदस्य प्रधानमंत्री द्वारा नामित होंगे।
सरकार ने नीति आयोगनामक जिस पौध को महान विभूतियों के महान विचारों की उर्वर जमीन पर एक पुराने दरख्त की जगह लगाया है, उससे यह आशा अवश्य जगती है कि यह सरकार जब भी कोई योजना बनायेगी तो वह गांधी के स्वावलंबी ग्राम स्वराज तथा हासिए पर पड़ा, अंतिम व्यक्ति का कल्याण तथा दीनदयाल उपाध्याय के अंत्योदय का ध्यान उसकी प्राथमिकता में होगा। स्वामी विवेकानंद तथा शंकरदेव के दर्शन को ध्यान रखते हुए दुःखी-दरिद्र, बीमार, कुपोषित, अशिक्षित भारतीयों को मुख्यधारा में लाने के लिए प्राण लगा देगी। अंबेडकर के सामाजिक एवं आर्थिक लोकतंत्र के सपनों को साकार करने के लिए किसी भी दबाव के आगे नहीं झुकेगी।
आशा है, इस वासंती मौसम में योजना आयोग की जगह लेने वाला यह पौधा परिवर्तन का वाहक बनेगा और नई कोंपल के साथ ऐसे फूल, मंजरी एवं फल लेकर आयेगी, जिससे ग्रामीण स्तर पर पंचायतीराज से लेकर राज्य सरकारें एवं केन्द्र सरकार समन्वय भाव के साथ सहभागिता से विकास कार्यो को अंजाम दंेगी। भारत का हरेक ग्राम स्वावलंबी बनेगा...लोग महानगरों में सिर्फ पेट पालने के लिए पलायन नहीं करेंगें...देश के हरेक बच्चों को घर के पास समान स्कूली व्यवस्था के तहत गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिलेगी...हरेक नागरिक को बिना भेदभाव के स्वास्थ्य सेवाएँ नसीब होंगी...किसी के साथ लिंग, जाति, धर्म या क्षेत्र के आधार पर अन्याय नहीं होगा...किसान कर्ज तले दबकर आत्महत्या नहीं करेंगे...देश के सारे आर्थिक संसाधन कुछ खास लोगों के पास न होकर सभी नागरिकों को मौलिक सुविधाएँ अवश्य मिलेगी। इन्हीं आशाओं के साथ इस पौधे का हम स्वागत करते हैं कि विकसित होकर यह खूब फूले, खुब फले और जिन महान विचारों की उर्वर भूमि पर इसे रोपा गया है, उसे कभी न भूले!
            



Monday, January 12, 2015

सामाजिक न्याय का सपना

हमारा पूरा स्वतंत्रता संग्राम राजनैतिक, सामाजिक एवं आर्थिक समानता का संघर्ष था। वर्षों के अनथक संघर्ष के बाद हमें आजादी मिली। देश की सत्ता भारतीय प्रजातांत्रिक नेतृत्व के हाथ आई और समान मताधिकार के माध्यम से राजनीतिक समानता मिली। परंतु सामाजिक समानता एवं आर्थिक समानता अभी भी दूर की कौड़ी थी। इसलिए भारत के संविधान के प्रस्तावना में ही ‘‘सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक न्याय’’ को प्रमुखता देकर यहाँ के आम लोगों के सपनों को साकार करने कि प्रतिबद्धता को अभिव्यक्ति दी गई। स्वतंत्रता मिले और संविधान के लागू होने के बाद सालों-साल गुजरते गए परंतु आर्थिक एवं सामाजिक समानता का यह सपना मृग मरिचिका ही बनी रही क्योंकि जिस सामाजिक न्याय के माध्यम से इसे कार्यरूप दिया जाना था वह भाषणों, नारों, विधान पालिकाओं के शोर तथा संस्थाओं एवं आयोगों के भूल-भुलैये में सिमट कर रह गया।
सभी सभी एकमत रहे हैं कि देश का विकास एवं समृद्धि जरूरी है। अगर वह हो गया तो सामाजिक एवं आर्थिक समानता का सपना भी खुद-ब-खुद साकार हो जाएगी। विकास एवं प्रगति के लिए काम भी हुए जो कि हर तरफ दिखता भी है परंतु विषमता की दरार पहले से भी अधिक चौड़ी होती गई। उदारवादी एवं बाजारवादी व्यवस्था में तो अब यह सपना जटिल से जटिलतर होता गया है। इस विकास में अनेक ऐसे आयाम जुड़ते जा रहे हैं जो समाज के गरीब बहुसंख्यक वर्ग एवं पर्यावरण को हाशिए पर ढकेलने वाला साबित हो रहा है। जिसका परिणाम गरीबी, भूखमरी, कुपोषण, प्रदूषण, गाँवों से शहरों में पलायन, बालश्रम पर्यावरण का विनाश, लैंगिग असमानता, असमान शिक्षा एवं अनेक तरह की बीमारियों का महामारी का रूप धारण कर लेना जैसी समस्याओं से देश को सामना करना पड़ रहा है। यह अजीब विडंबना है कि एक तरफ महाशक्ति के रूप में भारत को उभरने की बात वहीं दूसरी तरफ अपनी मौलिक सामान्य आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए दर-दर की ठोकरें खाते बहुसंख्यक करोडों लोग।
इस महीने के प्रारंभ में प्रधान न्यायाधीश एचएल दत्तू ने सामाजिक न्याय पीठका गठन कर सामाजिक न्याय के सपनें को फिर से हवा दी। सर्वोच्च न्यायालय यह एक और आविष्कार है। यह इस उद्देश्य से गठित किया गया है कि सामाजिक समस्याओं और नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों से जुड़े मामलों की निगरानी हो और उनका तेजी से निपटारा हो सके। न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर और न्यायमूर्ति यूसी ललित की ये पीठ 12 दिसंबर से काम शुरू भी कर दिया है। हर शुक्रवार को दोपहर बाद 2 बजे यह बैठेगी और देखेगी कि संबंधित मामलों में कोर्ट के निर्देशों का किस तरह पालन हो रहा है। इस बेंच के दायरे में जन अधिकारों से जुड़े उन क्षेत्रों के मामले होंगे, जिनमें संवैधानिक तंत्र के ऊपर सक्रिय भूमिका निभाने का दायित्व है। मकसद है संवैधानिक लक्ष्यों को प्राप्त करना। इन उद्देश्यों से किसी को असहमति नहीं होगी। लेकिन यह प्रश्न अवश्य उठेगा कि न्यायपालिका कहाँ तक अपना दायरा बढ़ायेगी? सामान्य नागरिक कब तक अपनी मौलिक आवश्यकताओं को पाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय तक दस्तक देती रहेगी? अबतक हमारी कार्यपालिका ऐसी व्यवस्था या तंत्र क्यों नहीं विकसित कर पाई है कि जिससे सामान्य जन को सर्वसमावेशी और न्यायपूर्ण सार्वजनिक सेवा सर्वसुलभ हो सके?
भारतीय संविधान के मुताबिक न्यायपालिका का काम विवादों का निपटारा और कानूनों पर उनकी भावना के अनुरूप अमल सुनिश्चित कराना है। मगर बाद में उसे खुद अपने निर्णयों से सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के बुनियादी ढांचे और नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा की जिम्मेदारी अपने कंधों पर ले लेनी पड़ी। इस बीच उसने जन हित याचिका का आविष्कार किया, जिससे किसी मामले में तीसरे पक्ष द्वारा हस्तक्षेप संभव हो गया। फिर पर्यावरण कानूनों पर अमल के लिए बेंच बनाई गई। अब सामाजिक न्यायके लिए ऐसा किया गया है, जिसके दायरे में लगभग जीवन के हर क्षेत्रों को समेटा जा सकता है। जाहिर है, कोर्ट ने समाज की अंतर्चेतना के रक्षक अथवा वाहक की भूमिका अपनाने की दिशा में एक और बड़ा कदम बढ़ाया है। मगर इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि जिन मुद्दों का संबंध व्यापक सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था से है, उनका न्यायिक समाधान ढूँढना अक्सर अप्रभावी होता है। इन सवालों पर बहस और समाधान का क्षेत्र तो संसद और कार्यपालिका है। इस बात के अनेक उदाहरण हैं जिसमें समान नागरिक संहिता, लाखों बच्चियों के गायब होने से पुलिस सुधार तक के अनेक मामले है, जिस बारे में में कोर्ट ने व्यापक चेतावनी एवं दिशा-निर्देश दिए। लेकिन राजनीतिक अनिच्छा के कारण बात आगे नहीं बढ़ी। आँकडों के मुताबिक फिलहाल सामाजिक न्यायसे जुड़े लगभग 200 से ज्यादा मामले कोर्ट में लंबित हैं। ये विभिन्न पीठों के पास हैं, जो शायद अब नई बेंच को भेज दिए जाएंगे।
जस्टिस दत्तू के मुताबिक संविधान की प्रस्तावना की मूल भावना शायद अब साकार हो सकेगी। दरअसल संविधान की प्रस्तावना में सामाजिक कल्याण पर विशेष जोर देते हुए मूल अधिकारों के माध्यम से इसे सुनिश्चित करने की बात कही गई है। आजादी के सात दशक बाद भी अगर सरकारों को चुनाव के समय लोगों के पेट भरने के लिए मुफ्त में अनाज बाँटने जैसी घोषणाएं करनी पड़ती है तो कल्याणकारी राज्य की संकल्पना अभी अपने मुकाम से कितनी दूर है। इस लिहाज से सामाजिक न्याय पीठ का महत्व संदेह से परे है खास कर तब जबकि देश में हर छोटा बड़ा काम अदालती आदेशों की मार से ही आगे बढ़ता हो।
दिक्कत यह है कि समस्याओं एवं शिकायतों का अंबार है और सामाजिक न्याय पीठ सप्ताह में सिर्फ एक दिन शुक्रवार को वह भी दोपहर बाद सुनवाई करेगी इसमें वह कितने मामलों को सुनवाई इतने कम समय में कर पायेगी और लोगों को कितना राहत मिल पायेगा कहना मुश्किल है। कार्यपालिका के लिए भी यह एक सबक है कि वह कम से कम संविधान लागू होने के 65 साल बाद भी एक ऐसी सुशासन की प्रणाली अपनाये जिससे अपनी हर छोटी समस्या को लेकर लोगों को सरकार से निराश होकर अदालतों का चक्कर न काटना पड़े। न्यायालय दिशा-निर्देश ही दे सकती है उसे अमल में लाने की जिम्मेदारी तो सरकार पर ही है। जिम्मेदार एवं संवेदनशील सरकार के इस काम में जनता, अनेक स्वैच्छिक संगठन एवं जनसंचार माध्यम भी उसके सहयोगी हों तभी सामाजिक न्याय एवं समानता का सपना पूरा हो सकता है।



Friday, December 5, 2014

सुरंग मार्ग

सुरंग का नाम आते ही दिलोदिमाग में काले अंधेरे में डूबा, डर, भय और जुगुप्सा का आभास लिए धरती के अंदर बना किसी चोर रास्ते का भाव जगता है। सामान्यतः सुरंग जमीन के नीचे  कुछ खास उद्ेदश्य से ही बनाए जाती है। जिसमें सामान्य सामाजिक आदमी का कुछ लेना-देना नहीं होता है, क्यों कि सामान्य जन तो जीवन भर सीधे सरल रास्ते को तलाशते और उसपर चलते-चलते ही मर-खप जाता है। ज्यादातर मामलों में सुरंग का रास्ता तो कोई असामाजिक, अपराधी या गैरकानूनी काम करने वाले ही बनाते हैं। हाँ कई बार सरकार भी अपने कई काम आसान करने के लिए या विषम, दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों में अपने कारोबार चलाने के लिए विकास के नाम पर सुरंग बनवाती है। फिर भी यह कभी भी आम रास्ता नहीं बन पाता, क्योंकि सुरंग तो किसी खास ध्येय से ही बनाई जाती है, जो नकारात्मक भाव ही पैदा करती है।
दिल्ली के मुखर्जी नगर स्थित बाल सुधार गृह से छः किशोरों ने सुरंग बनाकर भागने की कोशिश की मगर बाल सुधार गृह प्रशासन की नजर पड़ जाने से कामयाब नहीं हो सके। पिछले महीने 25-26 अक्तूबर के दरम्यान हरियाणा-सोनीपत के गोहाना कस्बे में पंजाब नेशनल बैंक में चोर सुरंग बनाकर सेंधमारी करते हुए बैंक के 86 लॉकरों को तोड़कर भारी मात्रा में सोने के गहने और नकदी लेकर चंपत हो गए। चोंरों के पास से 43 किलोग्राम सोना और ढाई लाख से ज्यादा रुपये पुलिस ने बरामद किए हैं। जम्मू-कश्मीर में भारत के नियंत्रण रेखा पर पाकिस्तान की तरफ से भारत की सीमा में सुरंग मिलती रहती है, इसके माध्यम से पाकिस्तान आतंकवादियों की घुसपैठ कराने का प्रयास करता है। जेलों से अकसर अपराधी कभी जेल की दीवार फांदकर, कभी तोड़कर तो कभी सुरंग बनाकर फरार होते रहे हैं। पता चला है कि ढोंगी संत रामपाल भी अपने भक्तों को चमत्कृत करने के लिए सुरंगों के माध्यम से ही अकस्मात उनके बीच प्रकट होता था। अंग्रेज शासन ने पहाड़ी राज्यों की दुर्गम जगहों पर खनिज पदार्थो से धनी क्षेत्रों में अपनी लूट के कार्य को अंजाम देने के लिए पहाड़ों को काटकर विकास के नाम पर सुरंग बनाई, जिनका विस्तार आज भी जारी है।
चोरी-छिपे अंधेरी रातों और भय की विषम परिस्थितियों में सैकड़ों मिटर तक सुरक्षित सुरंग खोदकर गलत कार्यों को अंजाम देना किसी अदम्य साहसी, शक्तिशाली और शातिर दिमाग का ही काम हो सकता है जिसे सिर्फ कानून व्यवस्था का मामला समझकर नहीं सुधारा जा सकता। दिल्ली के मुखर्जी नगर समेत अनेक बाल सुधार गृहों के बच्चे पहले भी तोड़-फोड़कर और दीवार फांदकर भागते रहे हैं और अनेक जांच कमेटियों एवं विशेषज्ञों की रिपोर्ट आई हैं कि ये कहने भर को सुधार गृह हैं यहाँ की परिस्थितियाँ ऐसी हैं कि इसमें जितने बच्चे को सुधार के लिए भेजा जाता है, उसमें से अधिकांश शातिर अपराधी बनकर निकलते हैं। इनमें ज्यादा बच्चों को जानवरों की तरह ठंूसा जाना। ज्यादा उम्र के किशोर अपराधी और छोटे बच्चे को एक साथ रखा जाना, भोजन, स्वास्थ्य एवं सुरक्षा की लचर व्यवस्था, कई जगह यहाँ तक देखा गया है कि इन गृहों के जिम्मेदार लोग और बड़े किशोर अपराधी बच्चों का यौन-शोषण तक करते हैं। यहाँ के बच्चे इसे सुधार गृह नहीं, बच्चों के जेल के नाम से जानते हैं।
सोनीपत के गोहाना पंजाब नेशनल बैंक के लॉकर में सुरंगों के माध्यम से डाके पर हम चाहे जितना चोरों और पुलिस को कोसें पर ध्यान इस ओर भी देना जरूरी है कि कस्बे के एक बैंक के लॉकर में 350 लॉकरों में सिर्फ 86 लॉकरों को ही तोड़कर चोर करोंड़ों के गहने और नकदी ले गये। पुलिस ने 43 किलोग्राम सोना चोरों से हासिल किया है। बाकी के लॉकरों में कितने सोने और नकदी अभी होंगे इसका न तो बैंक को पता है और न ही इसका कोई बीमा होता है। यानी कि कोई चाहे कहीं से किसी माध्यम से गहने और नकदी लाइए और लॉकर का निर्धारित चार्ज चुकाते हुए इसमें रखिए। यानी सरकारी बैंक भी कानून के सुरंगों के माध्यम से काली कमाई करनेवालों को विदेश के स्विस बैंकों आदि जैसी सुरक्षा देश में हर जगह मुहैया कराते हैं। नहीं तो यूपी नोएडा प्राधिकरण का एक डिप्लोमाधारी इंजीनियर यादव सिंह जैसे अनेक अधिकारियों एवं कर्मचारियों के पास अवैध अरबों की संपत्ति, जिसका अधिकांश हिस्सा बैंक के लॉकरों में ही जमा होता है, अबतक कैसे सुरक्षित रहता।
दिल्ली में जब मेट्रो रेल सार्वजनिक परिवहन के रूप में चलाने की बात हुई तो इसे भी सिर्फ जमीन के भीतर से ही सुरंग बनाकर चलाने की बात हुई थी, परंतु मेट्रोमेन श्रीधरन एवं उनके सहयोगियों के दिमाग में यह बात आई कि यहाँ जो मेट्रो पर सवारी करेगा, वह बहुसंख्यक समाज तो आजीवन झुग्गी-झोंपड़ियों की सुरंगनुमा जिंदगी जीने के लिए अभिशप्त है, वह सिर्फ काम पर जाने के लिए ही सुरंगनुमा गलियों से निकलकर सड़कों पर आसमान का दीदार करता है और फिर रात तक सुरंगनुमा माहौल में बंद हो जाता है। दूसरी तरफ अमीर अभिजात वर्ग तो दिल्ली से बाहर के लिए आसमानी उड़ान और दिल्ली के अंदर तो रहस्य और रोमांच से भरपूर सुरंगों की सवारी ही गाँठना चाहते थे। मेट्रोमेन ने बीच का रास्ता निकालते हुए जमीनी भौगोलिक स्थितियों के अनुरूप कहीं सुरंगो में से, कहीं जमीन पर तो कहीं जमीन के उपर पुलों के माध्यम से सुगम रास्ता बनाया, ताकि कुछ समय के लिए ही सही, समाज के सभी वर्ग अपने-अपने सपनों के मनोनुकूल अपनी दूरियों को पाटकर हमसफर हो सकें। मजबूरीवश ही सही, एक-दूसरे के करीब रह सकें, एक-दूसरे को समझ सकें।
सरकार को भी दिल्ली मेट्रो के बनाये सामाजिक-आर्थिक-तार्किक रास्ते की तकनीक को समझकर समाज के सभी वर्गों के समान रूप से शिक्षा, स्वास्थ्य एवं सभी सार्वजनिक संसाधनों पर सभी की पहुंच को आसान करना चाहिए, ताकि पूरा समाज समान रूप से प्रगति कर सके। अब तक यही होता रहा है कि समाज के तथाकथित उच्च वर्ग कानून एवं नीतियों के बीच अवैध सुरंगों के माध्यम से देश के अधिकांश संसाधनों पर कब्जा करते रहे हैं, जबकि सामान्य गरीब व्यक्ति को अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भी जमीनी रास्ते पर धक्के खाता, घिसटता, टूटता-हारता रहा है। जब कोई सामान्य अपराधी सुरंग मार्ग बनाता है तो अपने कारनामे को अंजाम देकर जल्दी से जल्दी वहाँ से भागने के फिराक में रहता है जबकि तथाकथित सफेदपोश अपराधी, जिनमें राजनेता, सरकारी कर्मचारी, व्यापारी एवं तथाकथित संत, सभी सम्मिलित हैं, अवैध सुरंग मार्ग को ही स्थायी आम रास्ता समझ बैठे हैं और बड़ी बेशर्मी से उसे न्यायोचित भी ठहराने लगे हैं। सरकार और समाज को इस प्रवृत्ति पर तत्काल रोक लगानी होगी। लोकतांत्रिक सरकार एवं सभ्य समाज को हमेशा जमीनी, सरल-सुगम मार्ग को निष्कंटक बनाते रहना चाहिए, ताकि देश का हर नागरिक उसके माध्यम से अपनी-अपनी मंजिल को पा सके।



Saturday, November 15, 2014

डॉक्टरों पर नकेल!

यह तो बताना मुश्किल है कि भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के दीक्षांत समारोह में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी डॉक्टरों को सलाह दे रहे थे या मार्मिक अपील कर रहे थे कि वे छुट्टियों में समय निकालकर पिछड़े इलाकों व गाँवों में जाकर गरीबों का इलाज करें। उन्होंने कहा कि मैं 365 दिन की बात नहीं कर रहा। छुट्टियाँ सभी को मिलती हैं, उन दिनों में थोड़ा समय निकालें और पिछड़े इलाकों में जाकर इलाज करें। इसके पहले भी अनेक समारोहों में पूर्व राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री से लेकर स्वास्थ्य मंत्रियों तक डॉक्टरों से अपील से लेकर चिरौरी तक करते रहे हैं कि समाज की गरीब जनता के हितों को ध्यान में रखते हुए केवल अधिक धन के लिए संस्थान को छोड़ कर विदेश एवं निजी अस्पतालों में न जाएँ और गाँवों में भी अपनी सेवा दें। परंतु इसका कोई सकारात्मक नतीजा नहीं निकला, जिसका जिक्र खुद केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ हर्षवर्धन ने अपने भाषण में किया और कहा कि पहले यहाँ से पढ़ाई करने वाले अधिकांश डॉक्टर विदेश चले जाते थे। अब भी 40 प्रतिशत विदेश पलायन कर जाते हैं। हाल ही में भुवनेश्वर एम्स के उद्घाटन में स्वास्थ्य मंत्री ने बताया था कि एक एमबीबीएस तैयार करने में संस्थान को लगभग आठ से दस करोड़ रुपये खर्च करने पड़ते हैं।
कुछ वर्ष पहले दिल्ली स्थित मीडिया स्टडी ग्रुप के एक अध्ययन में यह तथ्य उजागर हुआ था कि सिर्फ एम्स से पढ़ाई करके निकलने वाले डॉक्टरों में 53 फीसद विदेश चले जाते हैं। अब भी 40 प्रतिशत से मतलब डॉ. हर्षवर्धन का यह नहीं है कि पलायन में कमी आई है, बल्कि पलायन तो पहले से भी ज्यादा बढ़ा ही है। अब हो यह रहा है कि देश के महानगरों में ही यूरोपीय एवं अमेरिकी सुख-सुविधा देने वाले अनेक निजी अस्पतालों में वे सेवा देने लगे हैं, जिसमें कहने को तो वे भारत में हैं, परंतु वे इलाज यूरोपीय और अमेरिकी एवं अन्य अमीर विदेशी नागरिकों का ही या उनके समान ही खर्च करनेवाले एवं उनके ही अंदाज में जीने वाले भारतीयों का कर रहे हैं। जिसमें उन्हें विदेशों के समान ही मोटी रकम और सुख-सुविधा मिल रही है। इसमें गाँव और गरीब का नाम कहीं नहीं आता। 
पिछले दिनों दुर्गापूजा में झारखंड के देवघर जिले में बसे अपने गाँव गया था। पहुँचकर थोड़ा आराम कर ही रहा था कि पड़ोस के घर जोरों का शोर सुनाई पड़ा। जाकर देखा तो पूरे गाँव के लोग वहीं जमा थे। घर के अंदर किसी गुणी-मंतरी ने किसी की आत्मा को वहाँ से निकालने के लिए मजमा लगा रखा था। मैंने मिथलेश से, जो रिश्ते में भतीजा लगता है, पूछा कि क्या बात है, तो उसने फूट-फूटकर रोते हुए अपनी आपबीती सुनायी। संक्षेप में यह कि शादी के काफी दिनों बाद बाप बना था। बच्चा पैदा होने का दिन आ गया था, उसकी पत्नी दर्द से बेचैन थी, लेकर देबीपुर अस्पताल गया परंतु वहाँ डॉक्टर या नर्स कोई नहीं मिला, फिर देवघर गया। सदर अस्पताल में भर्ती किया, परंतु वहां भी डॉक्टर रात को नदारद थी। बच्चा होने को था परंतु नर्स ठीक से ध्यान नहीं दे रही थी, बोलने पर उलटा गाली देती थी। पत्नी की हालत बिगड़ रही थी, बच्चा आधा बाहर आ चुका था, परंतु पूरी तरह से बाहर आ नहीं पा रहा था। नर्स ने उसे जल्दी प्राइवेट नर्सिंग होम लेकर जाने की सलाह दी। वह किसी तरह संभालते हुए पास के नर्सिंग होम में गया, वहाँ डॉक्टर ने ऑपरेशन करके बच्चा निकाला, फिर बच्चे के कमजोर होने की हवाला देकर बेबी इनक्यूबेटर में चार दिन तक रखा। फिर बताया कि बच्चा मर गया। उधर पत्नी भी लगातार बेहोशी में थी। अस्पताल ने साठ हजार रुपए का बिल भरने को कहा, वह डॉक्टर के सामने खूब रोया, परंतु उसने टका सा जवाब दिया, मरीज को ले जाना है तो पहले पैसा भरो, नहीं तो फीस बढ़ती रहेगी। उस समय कई नाते-रिश्तेदारों से संपर्क किया, परंतु कुछ हासिल नहीं हुआ; अंत में देवघर के एक दबंग नगर पार्षद जिनके लिए चुनाव में प्रचार का काम किया था, उनके पास जाकर रोया-गिड़गिड़ाया तब उसने डॉक्टर को कुछ पैसा एवं धमकी देकर वहां से उसके मरे बच्चे एवं पत्नी को मुक्त कराया। दो महीने बाद भी पत्नी अभी तक खाट पर पड़ी है और कमजोरी तथा सही इलाज के बिना विक्षिप्तावस्था में पहुँच गई है। अब ओझा-गुणी उसके मरे बच्चे की आत्मा की शांति के नाम पर लूट रहे हैं।
हमेशा मस्ती में रहने वाला हुल्लड़बाज मिथलेश दो साल पहले ही पिता की मृत्यु के बाद विधवा माँ समेत घर का बोझ किसी तरह ढो रहा है। कैसे उस दिन वह अपने मरे बच्चे और मरणासन्न पत्नी को लेकर लौटा होगा? इसकी पत्नी अपने बच्चे को खोकर इलाज के अभाव में दिमागी तौर पर भी असंतुलित होती जा रही है और अब आत्मा व उसकी शांति के नाम पर अंधविश्वासों की एक अंतहीन सुरंग में धंसता जा रहा है। अगर सही समय पर इसकी पत्नी को सही इलाज मिल जाता तो क्या हँसता-खेलता, बच्चे की किलकारियों से गूँजता एक खुशहाल परिवार नहीं होता? मिथलेश तो एक उदाहरण मात्र है। ऐसी घटनाएँ रोज हजारों की संख्या में हो रही हैं, यहाँ तक कि दिल्ली में भी बड़े-बड़े अस्पतालों में डॉक्टरों और अस्पताल प्रशासन की बेपरवाही और बेरुखी के कारण गर्भवती महिलाएं एवं मरीज अस्पताल के बाहर दम तोड़ते देखे जाते हैं। क्या अब समय नहीं आ गया है कि सरकार जिन डॉक्टरों को बनाने में देश के आम गरीब नागरिकों का करोड़ों रुपया लगाती है, उनको संस्थानों में नामांकन से पहले एक समझौता-पत्र पर हस्ताक्षर कराए कि आप डिग्री लेने के बाद देश के किसी भी कोने में आवश्यकतानुसार सेवा देंगे, नहीं तो अपनी शिक्षा का पूरा खर्च खुद उठायेंगे?

इसके पहले यूपीए सरकार के स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद गाँवों के डॉक्टरों के लिए अलग कोर्स एवं योजना जोर-शोर से लेकर आये थे, परंतु वह भ्रष्टाचार और लालफीताशाही के चंगुल में कहाँ बिला गये, पता नहीं। अधिकांश राज्य सरकारें अभी तक डॉक्टरों को इस बात पर राजी करने में हलकान होती रही हैं कि डॉक्टर सरकारी सेवा करते हुए निजी प्रैक्टिस न करें और गाँवों में भी अपनी सेवाएँ दें। काश! प्रधानमंत्री की सलाह या मार्मिक अपील का कुछ असर इन डॉक्टरों पर हो और वे गाँवों की ओर रुख करें, ताकि गाँव के बीमारों को शहरों की ओर पलायन न करना पड़े और वहाँ से भी लुट-हारकर अंत में अंधविश्वासों का शिकार बन ओझा-गुनियों के जाल में फँसकर असमय मौत के मुँह में न समाना पड़े।