चोरी की शिक्षा
जिस
तरह बिहार एवं उत्तर प्रदेश की मैट्रिक परीक्षा में विधार्थियों द्वारा की और कराई
जा रही चोरी को टीवी चैनलों एवं समाचार पत्रों द्वारा उपहास उड़ाते हुए दिखाया जा
रहा है और लोग कहकहे लगा रहे हैं। वह हिन्दी पट्टी खासकर बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य
प्रदेश जैसे राज्यों को नजदीक से जाननेवाले जानकारों के लिए उतनी आश्चर्यजनक, चौकानेवाली घटना नहीं हैं। इस वर्ष जिस तरह से
चार-पाँच मंजिले स्कूलों एवं भवनों पर चोरी कराने के लिए लड़कों को हनुमान की तरह
कुदते-फांदते,
चढ़ते देख रहे हैं, वास्तव में यह सरकारी शिक्षा व्यवस्था की कई
दशकों से होती उतनी मंजिल पतन की बानगी है जो अब चरमराकर पतन के पाताल तक पहुँच गई
है।
जैसा
कि पूर्व मुख्यमंत्री लालू यादव जी खिलखिलाते हुए कह रहे थे, मेरा राज पुनः आयेगा तो किसी को भी छत और
खिड़कियों पर लटककर चोरी करने या करवाने की जरूरत नहीं रहेगी। सबको किताब-कॉपी दे
दी जाएगी कि खुलेआम लिखो। यह लोग भूले नहीं हांेगे कि जब वे कुछ साल पहले
मुख्यमंत्री थे तो धडल्ले से सभी स्तर पर हो रहे परीक्षाओं में कदाचार को बढ़ावा
देने में कोई कोर-कसर उन्होंने नहीं छोड़ी थी। जिस क्षेत्र में जिस जाति का बाहुबल
था पूरे स्कूल या कॉलेज में उसी जाति के नेताओं की मनमानी और धडल्ले से चोरी चलती
थी। यहाँ तक कि कई स्कूल और कॉलेज में कार्यालय की खिड़की सुबह से शाम तक खास
परीक्षार्थियों के लिए खुला छोड़ दिया जाता था ताकि परीक्षार्थी उत्तर की कॉपी शाम
तक अपने घर से लिखकर इस खिड़की में डाल दें। हाँ जबसे नीतीश राज यानी सुशासन वाला
राज आया तो इसमें कुछ रोक अवश्य लगी थी फिर भी उतना नहीं कि जितना कि सुशासन के
गुणगान में हमारे पत्रकार बंधुओं को बिहार में सबकुछ सुशासित-सुभाषित लगने लगा था।
उत्तर
प्रदेश में जब भारी मात्रा में हो रही नकल को रोकने के लिए कल्याण सिंह सरकार ने
कानून बनाया और तत्कालीन शिक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कड़ाई से उसे अनुपालन करवाकर
कदाचार को रोका तो राजनीतिक कोहराम मच गया था समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह
ने इसे अगले विधानसभा चुनाव का मुख्य मुद्दा ही बना दिया और अपनी सरकार बनते ही
मुख्यमंत्री की शपथ लेने के बाद तत्काल कैबिनेट बैठक करके पहला काम इस कानून को
निरस्त करने का किया था। वह समाजवाद इतना फला-फुला कि अब राज्य लोक सेवा आयोग
(यूपीपीएससी) के प्रश्नपत्र परीक्षा के पहले से ही धडल्ले से लाखों रुपये में बिक
रही है। मध्य प्रदेश इस मामले में थोड़ा अलग है क्योंकि वहाँ जो भी होता है अभिनव
एवं सभ्य अंदाज में होता है। यानी व्यापमं वाले अंदाज में। जिसमें परीक्षा वगैरह
सब सलीके से हो चुकने के बाद अंतिम परिणाम के समय परीक्षार्थी के नाम फोटो बदलकर
पूरा परिणाम खास लोगों के नाम कर दिया जाता है और सामान्य योग्य अभ्यर्थी जिंदगी
भर अपने गरीब और सामान्य होने के भाग्य पर लहू के आंसु बहाने को विवश होकर रह जाते
हैं।
इधर
के अनेक वर्षों के अनेक स्वतंत्र शिक्षा संस्थाओं के रिपोर्ट को उठा कर देख लें सब
इन क्षेत्रों में शिक्षा व्यवस्था खासकर प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा की चरमराने
की बानगी से भरी पड़ी हैं। अनेक सर्वे इस बात की तस्दीक करती रही है कि सातवीं और
आठवीं के बच्चे किताब ठीक से नहीं पढ पाते, चार
लाइन शुद्ध लिख नहीं पाते और मामूली गुणा-भाग के प्रश्न हल नहीं कर पाते। परंतु
साक्षरता के आंकडे सालों-साल बढ़ते जाते हैं। शिक्षा का मतलब सिर्फ साक्षरता भर
बनकर रह गया है। यानी सिर्फ अपना नाम भर लिख लेना। इसके लिए अनेक कारण जिम्मेदार
रहें जिसमें प्रमुख हैं- राज्य सरकारों का शिक्षा के प्रति बिल्कुल ध्यान नहीं
देना और जानबूझकर स्थिति को आंख मुंदकर बिगड़ते देखते रहना। योग्य शिक्षकों की
नियुक्ति कई दशकों से नहीं करना, स्कूल एवं शिक्षा के आवश्यक संसाधनों
का विस्तार नहीं करना। स्कूलों पर जबर्दस्ती अधिक से अधिक नामांकन के आंकड़े पेश
करके दिखाने के लिए प्रोत्साहित करना जैसे अनेक कारणों को गिनाया जा सकता है। इन
सबके पीछे जो आपराधीक सोच यह रहा कि शिक्षा मुहैया कराने के मौलिक कर्त्तव्य से
सरकारों का किनारा कर लेना और प्राइवेट शिक्षा की दुकानों को हर स्तर पर बढ़ावा
देना।
मध्य
प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने अपने शासन काल में अनेक क्षेत्रों
में अनेकों अभिनव योगदान दिए परंतु एक योगदान जिसे सभी हिन्दी राज्यों ने हाथोंहाथ
लिया था वह था शिक्षा मित्रों या ठेकेदारी पर शिक्षकों की नियुक्ति। इन शिक्षकों
को न तो कई सालों से पढ़ाई-लिखाई से कुछ खास लेना-देना था और न ही इनकी प्रशिक्षण
की कोई व्यवस्था। सरकारों ने अपने नौनिहालों को भाग्य-भरोसे इन ठेके के चार-पाँच
हजार वेतन पर नियुक्त बेचारे बेरोजगारों के हाथों सोंप दिया और शिक्षकों के वेतन
पर होने वाले खर्च से निजात पा ली। नतीजा यह हुआ कि हर कस्बे शहर से लेकर महानगरों
तक प्राइवेट स्कूल खुल गये और जो भी माता-पिता अपने बच्चों को इनमें भेजने लायक थे
वे इन दुकानों की शरण में आ गये। जो गरीब कुपोषित बचे वे खिचड़ी या दलिया से भूख
मिटाने व साक्षरता के आँकड़े बढ़ाने भर के लिए सरकारी स्कूल जा रहे हैं। बिहार में
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के शासन में आते ही सभी वर्गो के लिए समान स्कूलिंग
व्यवस्था के लिए मुचकुंद दुबे की अध्यक्षता में समिति बनाई थी पर वर्षों पहले वह
रिपोर्ट आ जाने के बावजूद उसे किस कूड़ेदान में डाल दिया गया पता नहीं। उनके एक दशक
से ज्यादा के शासनकाल में कितने शिक्षकों की नियुक्ति हुई कोई बता सकता है?
आजादी
के बाद कम से कम बहुसंख्यक सामान्य जनों के लिए प्रगति की अगली मंजिल पर जाने के
लिए शिक्षा की जो सार्वजनिक सामान्य सीढ़ियां हुआ करती थी उसे जब कुछ दसकों से
लगातार नष्ट कर उसके जगह पर खंदक खोदा जा रहा हो। इतना ही नहीं सफलता के ऊँचे
सोपानों पर चढने के लिए कुछ खास वर्गों के लिए कहीं एस्केलेटर तो कहीं व्यापमं
जैसी लिफ्ट की व्यवस्था कर दी गई हो। तो फिर सफलता की मृग मरिचिका पाले सामान्य
वर्ग बोर्ड परीक्षा पास करने के लिए तीन मंजिले-चार मंजिले हनुमान कूद का रास्ता
अपना कर चोरी कर या करवा रहा है तो इसमें आश्चर्य या विस्मय की कौन सी बात है? अब ये लोग उन गरीब बेचारों पर हँस रहे हैं
जिन्हें पूरी जिंदगी जीने की न्यूनतम आवश्यकताओं के लिए इसी तरह गाँव से शहरों, महानगरों और जहाँ भी आशा की रोशनी दिखाई दे हर
उस मंजिल तक कूदते-फांदते रहना है!
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