Monday, January 12, 2015

सामाजिक न्याय का सपना

हमारा पूरा स्वतंत्रता संग्राम राजनैतिक, सामाजिक एवं आर्थिक समानता का संघर्ष था। वर्षों के अनथक संघर्ष के बाद हमें आजादी मिली। देश की सत्ता भारतीय प्रजातांत्रिक नेतृत्व के हाथ आई और समान मताधिकार के माध्यम से राजनीतिक समानता मिली। परंतु सामाजिक समानता एवं आर्थिक समानता अभी भी दूर की कौड़ी थी। इसलिए भारत के संविधान के प्रस्तावना में ही ‘‘सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक न्याय’’ को प्रमुखता देकर यहाँ के आम लोगों के सपनों को साकार करने कि प्रतिबद्धता को अभिव्यक्ति दी गई। स्वतंत्रता मिले और संविधान के लागू होने के बाद सालों-साल गुजरते गए परंतु आर्थिक एवं सामाजिक समानता का यह सपना मृग मरिचिका ही बनी रही क्योंकि जिस सामाजिक न्याय के माध्यम से इसे कार्यरूप दिया जाना था वह भाषणों, नारों, विधान पालिकाओं के शोर तथा संस्थाओं एवं आयोगों के भूल-भुलैये में सिमट कर रह गया।
सभी सभी एकमत रहे हैं कि देश का विकास एवं समृद्धि जरूरी है। अगर वह हो गया तो सामाजिक एवं आर्थिक समानता का सपना भी खुद-ब-खुद साकार हो जाएगी। विकास एवं प्रगति के लिए काम भी हुए जो कि हर तरफ दिखता भी है परंतु विषमता की दरार पहले से भी अधिक चौड़ी होती गई। उदारवादी एवं बाजारवादी व्यवस्था में तो अब यह सपना जटिल से जटिलतर होता गया है। इस विकास में अनेक ऐसे आयाम जुड़ते जा रहे हैं जो समाज के गरीब बहुसंख्यक वर्ग एवं पर्यावरण को हाशिए पर ढकेलने वाला साबित हो रहा है। जिसका परिणाम गरीबी, भूखमरी, कुपोषण, प्रदूषण, गाँवों से शहरों में पलायन, बालश्रम पर्यावरण का विनाश, लैंगिग असमानता, असमान शिक्षा एवं अनेक तरह की बीमारियों का महामारी का रूप धारण कर लेना जैसी समस्याओं से देश को सामना करना पड़ रहा है। यह अजीब विडंबना है कि एक तरफ महाशक्ति के रूप में भारत को उभरने की बात वहीं दूसरी तरफ अपनी मौलिक सामान्य आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए दर-दर की ठोकरें खाते बहुसंख्यक करोडों लोग।
इस महीने के प्रारंभ में प्रधान न्यायाधीश एचएल दत्तू ने सामाजिक न्याय पीठका गठन कर सामाजिक न्याय के सपनें को फिर से हवा दी। सर्वोच्च न्यायालय यह एक और आविष्कार है। यह इस उद्देश्य से गठित किया गया है कि सामाजिक समस्याओं और नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों से जुड़े मामलों की निगरानी हो और उनका तेजी से निपटारा हो सके। न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर और न्यायमूर्ति यूसी ललित की ये पीठ 12 दिसंबर से काम शुरू भी कर दिया है। हर शुक्रवार को दोपहर बाद 2 बजे यह बैठेगी और देखेगी कि संबंधित मामलों में कोर्ट के निर्देशों का किस तरह पालन हो रहा है। इस बेंच के दायरे में जन अधिकारों से जुड़े उन क्षेत्रों के मामले होंगे, जिनमें संवैधानिक तंत्र के ऊपर सक्रिय भूमिका निभाने का दायित्व है। मकसद है संवैधानिक लक्ष्यों को प्राप्त करना। इन उद्देश्यों से किसी को असहमति नहीं होगी। लेकिन यह प्रश्न अवश्य उठेगा कि न्यायपालिका कहाँ तक अपना दायरा बढ़ायेगी? सामान्य नागरिक कब तक अपनी मौलिक आवश्यकताओं को पाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय तक दस्तक देती रहेगी? अबतक हमारी कार्यपालिका ऐसी व्यवस्था या तंत्र क्यों नहीं विकसित कर पाई है कि जिससे सामान्य जन को सर्वसमावेशी और न्यायपूर्ण सार्वजनिक सेवा सर्वसुलभ हो सके?
भारतीय संविधान के मुताबिक न्यायपालिका का काम विवादों का निपटारा और कानूनों पर उनकी भावना के अनुरूप अमल सुनिश्चित कराना है। मगर बाद में उसे खुद अपने निर्णयों से सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के बुनियादी ढांचे और नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा की जिम्मेदारी अपने कंधों पर ले लेनी पड़ी। इस बीच उसने जन हित याचिका का आविष्कार किया, जिससे किसी मामले में तीसरे पक्ष द्वारा हस्तक्षेप संभव हो गया। फिर पर्यावरण कानूनों पर अमल के लिए बेंच बनाई गई। अब सामाजिक न्यायके लिए ऐसा किया गया है, जिसके दायरे में लगभग जीवन के हर क्षेत्रों को समेटा जा सकता है। जाहिर है, कोर्ट ने समाज की अंतर्चेतना के रक्षक अथवा वाहक की भूमिका अपनाने की दिशा में एक और बड़ा कदम बढ़ाया है। मगर इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि जिन मुद्दों का संबंध व्यापक सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था से है, उनका न्यायिक समाधान ढूँढना अक्सर अप्रभावी होता है। इन सवालों पर बहस और समाधान का क्षेत्र तो संसद और कार्यपालिका है। इस बात के अनेक उदाहरण हैं जिसमें समान नागरिक संहिता, लाखों बच्चियों के गायब होने से पुलिस सुधार तक के अनेक मामले है, जिस बारे में में कोर्ट ने व्यापक चेतावनी एवं दिशा-निर्देश दिए। लेकिन राजनीतिक अनिच्छा के कारण बात आगे नहीं बढ़ी। आँकडों के मुताबिक फिलहाल सामाजिक न्यायसे जुड़े लगभग 200 से ज्यादा मामले कोर्ट में लंबित हैं। ये विभिन्न पीठों के पास हैं, जो शायद अब नई बेंच को भेज दिए जाएंगे।
जस्टिस दत्तू के मुताबिक संविधान की प्रस्तावना की मूल भावना शायद अब साकार हो सकेगी। दरअसल संविधान की प्रस्तावना में सामाजिक कल्याण पर विशेष जोर देते हुए मूल अधिकारों के माध्यम से इसे सुनिश्चित करने की बात कही गई है। आजादी के सात दशक बाद भी अगर सरकारों को चुनाव के समय लोगों के पेट भरने के लिए मुफ्त में अनाज बाँटने जैसी घोषणाएं करनी पड़ती है तो कल्याणकारी राज्य की संकल्पना अभी अपने मुकाम से कितनी दूर है। इस लिहाज से सामाजिक न्याय पीठ का महत्व संदेह से परे है खास कर तब जबकि देश में हर छोटा बड़ा काम अदालती आदेशों की मार से ही आगे बढ़ता हो।
दिक्कत यह है कि समस्याओं एवं शिकायतों का अंबार है और सामाजिक न्याय पीठ सप्ताह में सिर्फ एक दिन शुक्रवार को वह भी दोपहर बाद सुनवाई करेगी इसमें वह कितने मामलों को सुनवाई इतने कम समय में कर पायेगी और लोगों को कितना राहत मिल पायेगा कहना मुश्किल है। कार्यपालिका के लिए भी यह एक सबक है कि वह कम से कम संविधान लागू होने के 65 साल बाद भी एक ऐसी सुशासन की प्रणाली अपनाये जिससे अपनी हर छोटी समस्या को लेकर लोगों को सरकार से निराश होकर अदालतों का चक्कर न काटना पड़े। न्यायालय दिशा-निर्देश ही दे सकती है उसे अमल में लाने की जिम्मेदारी तो सरकार पर ही है। जिम्मेदार एवं संवेदनशील सरकार के इस काम में जनता, अनेक स्वैच्छिक संगठन एवं जनसंचार माध्यम भी उसके सहयोगी हों तभी सामाजिक न्याय एवं समानता का सपना पूरा हो सकता है।



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