Friday, December 5, 2014

सुरंग मार्ग

सुरंग का नाम आते ही दिलोदिमाग में काले अंधेरे में डूबा, डर, भय और जुगुप्सा का आभास लिए धरती के अंदर बना किसी चोर रास्ते का भाव जगता है। सामान्यतः सुरंग जमीन के नीचे  कुछ खास उद्ेदश्य से ही बनाए जाती है। जिसमें सामान्य सामाजिक आदमी का कुछ लेना-देना नहीं होता है, क्यों कि सामान्य जन तो जीवन भर सीधे सरल रास्ते को तलाशते और उसपर चलते-चलते ही मर-खप जाता है। ज्यादातर मामलों में सुरंग का रास्ता तो कोई असामाजिक, अपराधी या गैरकानूनी काम करने वाले ही बनाते हैं। हाँ कई बार सरकार भी अपने कई काम आसान करने के लिए या विषम, दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों में अपने कारोबार चलाने के लिए विकास के नाम पर सुरंग बनवाती है। फिर भी यह कभी भी आम रास्ता नहीं बन पाता, क्योंकि सुरंग तो किसी खास ध्येय से ही बनाई जाती है, जो नकारात्मक भाव ही पैदा करती है।
दिल्ली के मुखर्जी नगर स्थित बाल सुधार गृह से छः किशोरों ने सुरंग बनाकर भागने की कोशिश की मगर बाल सुधार गृह प्रशासन की नजर पड़ जाने से कामयाब नहीं हो सके। पिछले महीने 25-26 अक्तूबर के दरम्यान हरियाणा-सोनीपत के गोहाना कस्बे में पंजाब नेशनल बैंक में चोर सुरंग बनाकर सेंधमारी करते हुए बैंक के 86 लॉकरों को तोड़कर भारी मात्रा में सोने के गहने और नकदी लेकर चंपत हो गए। चोंरों के पास से 43 किलोग्राम सोना और ढाई लाख से ज्यादा रुपये पुलिस ने बरामद किए हैं। जम्मू-कश्मीर में भारत के नियंत्रण रेखा पर पाकिस्तान की तरफ से भारत की सीमा में सुरंग मिलती रहती है, इसके माध्यम से पाकिस्तान आतंकवादियों की घुसपैठ कराने का प्रयास करता है। जेलों से अकसर अपराधी कभी जेल की दीवार फांदकर, कभी तोड़कर तो कभी सुरंग बनाकर फरार होते रहे हैं। पता चला है कि ढोंगी संत रामपाल भी अपने भक्तों को चमत्कृत करने के लिए सुरंगों के माध्यम से ही अकस्मात उनके बीच प्रकट होता था। अंग्रेज शासन ने पहाड़ी राज्यों की दुर्गम जगहों पर खनिज पदार्थो से धनी क्षेत्रों में अपनी लूट के कार्य को अंजाम देने के लिए पहाड़ों को काटकर विकास के नाम पर सुरंग बनाई, जिनका विस्तार आज भी जारी है।
चोरी-छिपे अंधेरी रातों और भय की विषम परिस्थितियों में सैकड़ों मिटर तक सुरक्षित सुरंग खोदकर गलत कार्यों को अंजाम देना किसी अदम्य साहसी, शक्तिशाली और शातिर दिमाग का ही काम हो सकता है जिसे सिर्फ कानून व्यवस्था का मामला समझकर नहीं सुधारा जा सकता। दिल्ली के मुखर्जी नगर समेत अनेक बाल सुधार गृहों के बच्चे पहले भी तोड़-फोड़कर और दीवार फांदकर भागते रहे हैं और अनेक जांच कमेटियों एवं विशेषज्ञों की रिपोर्ट आई हैं कि ये कहने भर को सुधार गृह हैं यहाँ की परिस्थितियाँ ऐसी हैं कि इसमें जितने बच्चे को सुधार के लिए भेजा जाता है, उसमें से अधिकांश शातिर अपराधी बनकर निकलते हैं। इनमें ज्यादा बच्चों को जानवरों की तरह ठंूसा जाना। ज्यादा उम्र के किशोर अपराधी और छोटे बच्चे को एक साथ रखा जाना, भोजन, स्वास्थ्य एवं सुरक्षा की लचर व्यवस्था, कई जगह यहाँ तक देखा गया है कि इन गृहों के जिम्मेदार लोग और बड़े किशोर अपराधी बच्चों का यौन-शोषण तक करते हैं। यहाँ के बच्चे इसे सुधार गृह नहीं, बच्चों के जेल के नाम से जानते हैं।
सोनीपत के गोहाना पंजाब नेशनल बैंक के लॉकर में सुरंगों के माध्यम से डाके पर हम चाहे जितना चोरों और पुलिस को कोसें पर ध्यान इस ओर भी देना जरूरी है कि कस्बे के एक बैंक के लॉकर में 350 लॉकरों में सिर्फ 86 लॉकरों को ही तोड़कर चोर करोंड़ों के गहने और नकदी ले गये। पुलिस ने 43 किलोग्राम सोना चोरों से हासिल किया है। बाकी के लॉकरों में कितने सोने और नकदी अभी होंगे इसका न तो बैंक को पता है और न ही इसका कोई बीमा होता है। यानी कि कोई चाहे कहीं से किसी माध्यम से गहने और नकदी लाइए और लॉकर का निर्धारित चार्ज चुकाते हुए इसमें रखिए। यानी सरकारी बैंक भी कानून के सुरंगों के माध्यम से काली कमाई करनेवालों को विदेश के स्विस बैंकों आदि जैसी सुरक्षा देश में हर जगह मुहैया कराते हैं। नहीं तो यूपी नोएडा प्राधिकरण का एक डिप्लोमाधारी इंजीनियर यादव सिंह जैसे अनेक अधिकारियों एवं कर्मचारियों के पास अवैध अरबों की संपत्ति, जिसका अधिकांश हिस्सा बैंक के लॉकरों में ही जमा होता है, अबतक कैसे सुरक्षित रहता।
दिल्ली में जब मेट्रो रेल सार्वजनिक परिवहन के रूप में चलाने की बात हुई तो इसे भी सिर्फ जमीन के भीतर से ही सुरंग बनाकर चलाने की बात हुई थी, परंतु मेट्रोमेन श्रीधरन एवं उनके सहयोगियों के दिमाग में यह बात आई कि यहाँ जो मेट्रो पर सवारी करेगा, वह बहुसंख्यक समाज तो आजीवन झुग्गी-झोंपड़ियों की सुरंगनुमा जिंदगी जीने के लिए अभिशप्त है, वह सिर्फ काम पर जाने के लिए ही सुरंगनुमा गलियों से निकलकर सड़कों पर आसमान का दीदार करता है और फिर रात तक सुरंगनुमा माहौल में बंद हो जाता है। दूसरी तरफ अमीर अभिजात वर्ग तो दिल्ली से बाहर के लिए आसमानी उड़ान और दिल्ली के अंदर तो रहस्य और रोमांच से भरपूर सुरंगों की सवारी ही गाँठना चाहते थे। मेट्रोमेन ने बीच का रास्ता निकालते हुए जमीनी भौगोलिक स्थितियों के अनुरूप कहीं सुरंगो में से, कहीं जमीन पर तो कहीं जमीन के उपर पुलों के माध्यम से सुगम रास्ता बनाया, ताकि कुछ समय के लिए ही सही, समाज के सभी वर्ग अपने-अपने सपनों के मनोनुकूल अपनी दूरियों को पाटकर हमसफर हो सकें। मजबूरीवश ही सही, एक-दूसरे के करीब रह सकें, एक-दूसरे को समझ सकें।
सरकार को भी दिल्ली मेट्रो के बनाये सामाजिक-आर्थिक-तार्किक रास्ते की तकनीक को समझकर समाज के सभी वर्गों के समान रूप से शिक्षा, स्वास्थ्य एवं सभी सार्वजनिक संसाधनों पर सभी की पहुंच को आसान करना चाहिए, ताकि पूरा समाज समान रूप से प्रगति कर सके। अब तक यही होता रहा है कि समाज के तथाकथित उच्च वर्ग कानून एवं नीतियों के बीच अवैध सुरंगों के माध्यम से देश के अधिकांश संसाधनों पर कब्जा करते रहे हैं, जबकि सामान्य गरीब व्यक्ति को अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भी जमीनी रास्ते पर धक्के खाता, घिसटता, टूटता-हारता रहा है। जब कोई सामान्य अपराधी सुरंग मार्ग बनाता है तो अपने कारनामे को अंजाम देकर जल्दी से जल्दी वहाँ से भागने के फिराक में रहता है जबकि तथाकथित सफेदपोश अपराधी, जिनमें राजनेता, सरकारी कर्मचारी, व्यापारी एवं तथाकथित संत, सभी सम्मिलित हैं, अवैध सुरंग मार्ग को ही स्थायी आम रास्ता समझ बैठे हैं और बड़ी बेशर्मी से उसे न्यायोचित भी ठहराने लगे हैं। सरकार और समाज को इस प्रवृत्ति पर तत्काल रोक लगानी होगी। लोकतांत्रिक सरकार एवं सभ्य समाज को हमेशा जमीनी, सरल-सुगम मार्ग को निष्कंटक बनाते रहना चाहिए, ताकि देश का हर नागरिक उसके माध्यम से अपनी-अपनी मंजिल को पा सके।



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