साधेंगे और सधेंगे भी
दिल्ली
में द्वारका-वैशाली मेट्रो रूट से वैशाली जाते समय जैसे ही यमुना बैंक स्टेशन में
पहुँचते हैं, लोगों का एक ऐसा रेला दरवाजा खुलते ही
प्रवेश करता है, मानो यमुना नदी में अनायास कोई बाढ़ आई
हो, जो सबकुछ बहाकर ले जायेगी। इसमें हर वर्ग के
लोग शामिल होते हैं-ज्यादातर कर्मचारी एवं मजदूर। पहले से भरे मेट्रो में अच्छे
मजबूत कद-काठी के लोगों तक को सँभलना मुश्किल हो जाता है। मजबूरी बस सभी एक-दूसरे
से चिपककर सफर करते हैं। इसमें कइयों का बूरे हाल हो जाता हैं खासकर उन लोगों का, जो अब तक अकेले कारों में सफर के आदी रहे हैं, व सड़कों पर ट्रैफिक के बुरे हाल के चलते और समय
पर कार्यस्थल पर पहुँचने की बाध्यता के कारण मेट्रो से सफर करने को बाध्य हैं। कुछ
अर्सा पहले तक ये तथाकथित बड़े लोग इन निम्न वर्गों के साथ सीट में बैठते समय या
साथ में खड़े यात्रा करते समय नाक-भों सिकोड़ते, ऊलजलूल गंदे, बिहारी आदि शब्द बकते हुए मारने-फाड़ने तक पर
उतर जाते थे, परंतु अब बर्दाश्त करने लगे हैं। और
इधर निम्न वर्गांे में भी साथ-साथ यात्रा करते हुए आचार-व्यवहार में पहले से अधिक
नफासत एवं शालीनता आई है।
कुछ
ऐसा ही नजारा अभी दिल्ली विधानसभा चुनाव में देखने को मिला। चुनाव प्रचार में ‘भारतीय जनता पार्टी’ और ‘आम
आदमी पार्टी’ ने एक-दूसरे के विरुद्ध ऐसे भाषण, नारे एवं प्रचार किया या जिसे लोकतांत्रिक
मर्यादा के अंतर्गत नहीं रखा जा सकता खासकर केन्द्र में सत्तारूढ़ भाजपा एवं उसके
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जैसे बड़े कद के व्यक्ति के लिए दिल्ली विधानसभा
जैसा चुनाव, जोकि पूर्ण राज्य भी नहीं है, को इतनी गंभीरता से लेना कई निरपेक्ष जनों को
भी अखर रहा था। परंतु जिस तरह के परिणाम आये, जिसमें ‘आप’ पार्टी
को भारी सफलता मिली। अपनी पार्टी ‘भाजपा’ के हार के बावजूद प्रधानमंत्री ने जिस सहजता और
सद्भाव से अरविंद केजरीवाल को बधाई दी और उनसे मिलकर विकास के मोर्चे पर हरसंभव
सहयोग का आश्वासन दिया, यह हमारे जनतंत्र की मजबूती की निशानी
है।
आजादी
के बाद कई दशकों तक सत्ता पर ऊँची जातियों का ही वर्चस्व था। इसका मूल कारण यह था
कि कांग्रेस के अधिकांश पढ़े-लिखे इसी वर्ग ने स्वतंत्रता आंदोलन की अगुवाई की थी।
परंतु जैसे-जैसे जनतंत्र मजबूत होता गया, लोगों की भागीदारी बढ़ती गई पिछड़े और दलितों की
भी शासन और सत्ता में भागीदारी बढ़ती गई। अब तक तो समाज के सभी वर्ग सत्ता और शासन
का नेतृत्व कर चुके हैं और कर रहे हैं। आज देश के अधिकांश राज्यों के मुख्यमंत्री
पिछड़े एवं दलित वर्ग से आते हैं। मौजूदा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी पिछड़े वर्ग
से हैं। अब सभी दल एवं वर्ग समझ चुके हैं कि एक जाति एवं वर्ग का शासन देश में अब
नहीं चलने वाला। किसी भी दल को सत्ता प्राप्त करने के लिए हर समुदाय एवं वर्गों को
प्रतिनिधित्व देना एवं उसका दिल जीतना आवश्यक हो गया है। यही कारण है कि 2014 के आमचुनाव से ही करीब-करीब सभी दलों का
एजेंडा जाति एवं वर्ग से ऊपर उठकर विकास के मुद्दे पर केंद्रित गया है।
परिवर्तन
सिर्फ सत्ता केन्द्रों में ही आया हो, ऐसा
नहीं है। परिवर्तन लोकतंत्र के सभी स्तंभों में आया है, उसी का प्रतिबिंब सत्ता प्रतिष्ठानों में दिखाई
पड़ रहा है। सरकार के तीनों स्तंभों में अब तक काफी बदलाव आ गया है। विधायिका में
अब करीब-करीब देश की सभी जातियों एवं समुदायों को प्रतिनिधित्व मिल रहा है। उसी
तरह न्यायपालिका में भी काफी परिवर्तन आया है। सभी समुदायों एवं वर्गों की
हिस्सेदारी इसमें भी बढ़ी है। यह पहले से अधिक विकेन्द्रित हुआ है। इन्होंने
समय-समय पर ऐसे फैसले दिए हैं, जिससे
जनतंत्र को मजबूती मिली है। चाहे वह शीर्ष सत्ता द्वारा देश में आपातकाल को विफल
करना हो या भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए अनेक संवैधानिक कदम उठाने हों, पी.आई.एल. के माध्यम से अनेक जनहितकारी फैसले
देने हों या पर्यावरण को सुरक्षित रखने के लिए ग्रीन बैंच या सामाजिक न्याय पीठ
बनाना हो,
जिसके माध्यम से हाँसिए पर जीने वालों को
जल्द से जल्द न्याय मुहैया कराना हो।
चौथा
स्तंभ यानी मीडिया भी अब काफी मुखर हो चला है, खासकर इलेक्ट्रोनिक मीडिया, जिसमें आम लोगों के नजर में सत्ता से लेकर समाज
की सभी अच्छी और बुरी खबरों तक जनता की पहुँच एवं भागीदारी बढ़ गई है। इसके बावजूद
कोई मीडिया का मठाधीश अगर किसी पक्ष को खास तवज्जो देती है तो उसके प्रतिस्पर्धी
चैनल उसको विरोध में तैयार बैठा होता है। और अगर मिलकर भी कुछ दबाना चाहें तो आम
जन के हाथों में सबसे बड़ा हथियार अब सोशल मीडिया के रूप में आ गया है, जिसके इस्तेमाल से अब कुछ दबा-छुपा नहीं रह
सकता। इसके अलावा स्वैच्छिक क्षेत्र, जिसे
लोकतंत्र का पाँचवाँ स्तंभ भी कहा जाता है, जनांदोलनों एवं समाज-सेवा के माध्यम से हमेशा
से जनतंत्र को मजबूत करता रहा है और कर रहा है।
जनतंत्र
के सभी स्तंभ या इसके सभी तत्वों में समन्वय के साथ-साथ निरंतर एक प्रतिस्पर्धी भाव
भी चलता रहता है। एक अंग जहाँ यह मानकर चलता है कि हम दूसरे दल या स्तंभ को साध
रहे हैं,
वहीं वह उसी समय अपने अंदर से सधता भी
रहता है। दिल्ली विधानसभा चुनाव में जनता को शायद लगा कि देश के स्तर पर मोदी जी
नीतियाँ ठीक हो सकती हैं, परंतु लोकल लेवल पर अगर एक अच्छा
विकल्प मौजूद है तो हम उसे क्यों न आजमायें और यहाँ कि जनता ने यही किया। उसी तरह ‘आम आदमी पार्टी’ एवं उसके नेतृत्व को सरकार के बाहर रहकर आंदोलन
करने में और वादे करने में कोई रोक नहीं थी, जिसपर उनको जनसमर्थन तो मिल गया, परंतु अब सरकार में रहकर उन्हें केन्द्र सरकार
से सामंजस्य बिठाते हुए सारे वादे पूरे करने पडेंगे।
इस
तरह एक-दूसरे को साधने और साथ-साथ सधते जाने की यह प्रक्रिया ही जनतांत्रिक
प्रणाली को जीवंत एवं मजबूत बनाये रखता है। अल्पकालिक समय के लिए भले ही यह लगे कि
यह किसी की हार या जीत हुई है, परंतु
यह तो लंबी लोकतांत्रिक प्रक्रिया का पड़ाव मात्र है। यह किसी कि हार जीत की नहीं
बल्कि जीवंत जनतंत्र का प्रतीक है जो सबको लोकतांत्रिक ढांचे के अनुरूप साधती रहती
है।
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