Monday, January 12, 2015

सामाजिक न्याय का सपना

हमारा पूरा स्वतंत्रता संग्राम राजनैतिक, सामाजिक एवं आर्थिक समानता का संघर्ष था। वर्षों के अनथक संघर्ष के बाद हमें आजादी मिली। देश की सत्ता भारतीय प्रजातांत्रिक नेतृत्व के हाथ आई और समान मताधिकार के माध्यम से राजनीतिक समानता मिली। परंतु सामाजिक समानता एवं आर्थिक समानता अभी भी दूर की कौड़ी थी। इसलिए भारत के संविधान के प्रस्तावना में ही ‘‘सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक न्याय’’ को प्रमुखता देकर यहाँ के आम लोगों के सपनों को साकार करने कि प्रतिबद्धता को अभिव्यक्ति दी गई। स्वतंत्रता मिले और संविधान के लागू होने के बाद सालों-साल गुजरते गए परंतु आर्थिक एवं सामाजिक समानता का यह सपना मृग मरिचिका ही बनी रही क्योंकि जिस सामाजिक न्याय के माध्यम से इसे कार्यरूप दिया जाना था वह भाषणों, नारों, विधान पालिकाओं के शोर तथा संस्थाओं एवं आयोगों के भूल-भुलैये में सिमट कर रह गया।
सभी सभी एकमत रहे हैं कि देश का विकास एवं समृद्धि जरूरी है। अगर वह हो गया तो सामाजिक एवं आर्थिक समानता का सपना भी खुद-ब-खुद साकार हो जाएगी। विकास एवं प्रगति के लिए काम भी हुए जो कि हर तरफ दिखता भी है परंतु विषमता की दरार पहले से भी अधिक चौड़ी होती गई। उदारवादी एवं बाजारवादी व्यवस्था में तो अब यह सपना जटिल से जटिलतर होता गया है। इस विकास में अनेक ऐसे आयाम जुड़ते जा रहे हैं जो समाज के गरीब बहुसंख्यक वर्ग एवं पर्यावरण को हाशिए पर ढकेलने वाला साबित हो रहा है। जिसका परिणाम गरीबी, भूखमरी, कुपोषण, प्रदूषण, गाँवों से शहरों में पलायन, बालश्रम पर्यावरण का विनाश, लैंगिग असमानता, असमान शिक्षा एवं अनेक तरह की बीमारियों का महामारी का रूप धारण कर लेना जैसी समस्याओं से देश को सामना करना पड़ रहा है। यह अजीब विडंबना है कि एक तरफ महाशक्ति के रूप में भारत को उभरने की बात वहीं दूसरी तरफ अपनी मौलिक सामान्य आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए दर-दर की ठोकरें खाते बहुसंख्यक करोडों लोग।
इस महीने के प्रारंभ में प्रधान न्यायाधीश एचएल दत्तू ने सामाजिक न्याय पीठका गठन कर सामाजिक न्याय के सपनें को फिर से हवा दी। सर्वोच्च न्यायालय यह एक और आविष्कार है। यह इस उद्देश्य से गठित किया गया है कि सामाजिक समस्याओं और नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों से जुड़े मामलों की निगरानी हो और उनका तेजी से निपटारा हो सके। न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर और न्यायमूर्ति यूसी ललित की ये पीठ 12 दिसंबर से काम शुरू भी कर दिया है। हर शुक्रवार को दोपहर बाद 2 बजे यह बैठेगी और देखेगी कि संबंधित मामलों में कोर्ट के निर्देशों का किस तरह पालन हो रहा है। इस बेंच के दायरे में जन अधिकारों से जुड़े उन क्षेत्रों के मामले होंगे, जिनमें संवैधानिक तंत्र के ऊपर सक्रिय भूमिका निभाने का दायित्व है। मकसद है संवैधानिक लक्ष्यों को प्राप्त करना। इन उद्देश्यों से किसी को असहमति नहीं होगी। लेकिन यह प्रश्न अवश्य उठेगा कि न्यायपालिका कहाँ तक अपना दायरा बढ़ायेगी? सामान्य नागरिक कब तक अपनी मौलिक आवश्यकताओं को पाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय तक दस्तक देती रहेगी? अबतक हमारी कार्यपालिका ऐसी व्यवस्था या तंत्र क्यों नहीं विकसित कर पाई है कि जिससे सामान्य जन को सर्वसमावेशी और न्यायपूर्ण सार्वजनिक सेवा सर्वसुलभ हो सके?
भारतीय संविधान के मुताबिक न्यायपालिका का काम विवादों का निपटारा और कानूनों पर उनकी भावना के अनुरूप अमल सुनिश्चित कराना है। मगर बाद में उसे खुद अपने निर्णयों से सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के बुनियादी ढांचे और नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा की जिम्मेदारी अपने कंधों पर ले लेनी पड़ी। इस बीच उसने जन हित याचिका का आविष्कार किया, जिससे किसी मामले में तीसरे पक्ष द्वारा हस्तक्षेप संभव हो गया। फिर पर्यावरण कानूनों पर अमल के लिए बेंच बनाई गई। अब सामाजिक न्यायके लिए ऐसा किया गया है, जिसके दायरे में लगभग जीवन के हर क्षेत्रों को समेटा जा सकता है। जाहिर है, कोर्ट ने समाज की अंतर्चेतना के रक्षक अथवा वाहक की भूमिका अपनाने की दिशा में एक और बड़ा कदम बढ़ाया है। मगर इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि जिन मुद्दों का संबंध व्यापक सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था से है, उनका न्यायिक समाधान ढूँढना अक्सर अप्रभावी होता है। इन सवालों पर बहस और समाधान का क्षेत्र तो संसद और कार्यपालिका है। इस बात के अनेक उदाहरण हैं जिसमें समान नागरिक संहिता, लाखों बच्चियों के गायब होने से पुलिस सुधार तक के अनेक मामले है, जिस बारे में में कोर्ट ने व्यापक चेतावनी एवं दिशा-निर्देश दिए। लेकिन राजनीतिक अनिच्छा के कारण बात आगे नहीं बढ़ी। आँकडों के मुताबिक फिलहाल सामाजिक न्यायसे जुड़े लगभग 200 से ज्यादा मामले कोर्ट में लंबित हैं। ये विभिन्न पीठों के पास हैं, जो शायद अब नई बेंच को भेज दिए जाएंगे।
जस्टिस दत्तू के मुताबिक संविधान की प्रस्तावना की मूल भावना शायद अब साकार हो सकेगी। दरअसल संविधान की प्रस्तावना में सामाजिक कल्याण पर विशेष जोर देते हुए मूल अधिकारों के माध्यम से इसे सुनिश्चित करने की बात कही गई है। आजादी के सात दशक बाद भी अगर सरकारों को चुनाव के समय लोगों के पेट भरने के लिए मुफ्त में अनाज बाँटने जैसी घोषणाएं करनी पड़ती है तो कल्याणकारी राज्य की संकल्पना अभी अपने मुकाम से कितनी दूर है। इस लिहाज से सामाजिक न्याय पीठ का महत्व संदेह से परे है खास कर तब जबकि देश में हर छोटा बड़ा काम अदालती आदेशों की मार से ही आगे बढ़ता हो।
दिक्कत यह है कि समस्याओं एवं शिकायतों का अंबार है और सामाजिक न्याय पीठ सप्ताह में सिर्फ एक दिन शुक्रवार को वह भी दोपहर बाद सुनवाई करेगी इसमें वह कितने मामलों को सुनवाई इतने कम समय में कर पायेगी और लोगों को कितना राहत मिल पायेगा कहना मुश्किल है। कार्यपालिका के लिए भी यह एक सबक है कि वह कम से कम संविधान लागू होने के 65 साल बाद भी एक ऐसी सुशासन की प्रणाली अपनाये जिससे अपनी हर छोटी समस्या को लेकर लोगों को सरकार से निराश होकर अदालतों का चक्कर न काटना पड़े। न्यायालय दिशा-निर्देश ही दे सकती है उसे अमल में लाने की जिम्मेदारी तो सरकार पर ही है। जिम्मेदार एवं संवेदनशील सरकार के इस काम में जनता, अनेक स्वैच्छिक संगठन एवं जनसंचार माध्यम भी उसके सहयोगी हों तभी सामाजिक न्याय एवं समानता का सपना पूरा हो सकता है।



Friday, December 5, 2014

सुरंग मार्ग

सुरंग का नाम आते ही दिलोदिमाग में काले अंधेरे में डूबा, डर, भय और जुगुप्सा का आभास लिए धरती के अंदर बना किसी चोर रास्ते का भाव जगता है। सामान्यतः सुरंग जमीन के नीचे  कुछ खास उद्ेदश्य से ही बनाए जाती है। जिसमें सामान्य सामाजिक आदमी का कुछ लेना-देना नहीं होता है, क्यों कि सामान्य जन तो जीवन भर सीधे सरल रास्ते को तलाशते और उसपर चलते-चलते ही मर-खप जाता है। ज्यादातर मामलों में सुरंग का रास्ता तो कोई असामाजिक, अपराधी या गैरकानूनी काम करने वाले ही बनाते हैं। हाँ कई बार सरकार भी अपने कई काम आसान करने के लिए या विषम, दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों में अपने कारोबार चलाने के लिए विकास के नाम पर सुरंग बनवाती है। फिर भी यह कभी भी आम रास्ता नहीं बन पाता, क्योंकि सुरंग तो किसी खास ध्येय से ही बनाई जाती है, जो नकारात्मक भाव ही पैदा करती है।
दिल्ली के मुखर्जी नगर स्थित बाल सुधार गृह से छः किशोरों ने सुरंग बनाकर भागने की कोशिश की मगर बाल सुधार गृह प्रशासन की नजर पड़ जाने से कामयाब नहीं हो सके। पिछले महीने 25-26 अक्तूबर के दरम्यान हरियाणा-सोनीपत के गोहाना कस्बे में पंजाब नेशनल बैंक में चोर सुरंग बनाकर सेंधमारी करते हुए बैंक के 86 लॉकरों को तोड़कर भारी मात्रा में सोने के गहने और नकदी लेकर चंपत हो गए। चोंरों के पास से 43 किलोग्राम सोना और ढाई लाख से ज्यादा रुपये पुलिस ने बरामद किए हैं। जम्मू-कश्मीर में भारत के नियंत्रण रेखा पर पाकिस्तान की तरफ से भारत की सीमा में सुरंग मिलती रहती है, इसके माध्यम से पाकिस्तान आतंकवादियों की घुसपैठ कराने का प्रयास करता है। जेलों से अकसर अपराधी कभी जेल की दीवार फांदकर, कभी तोड़कर तो कभी सुरंग बनाकर फरार होते रहे हैं। पता चला है कि ढोंगी संत रामपाल भी अपने भक्तों को चमत्कृत करने के लिए सुरंगों के माध्यम से ही अकस्मात उनके बीच प्रकट होता था। अंग्रेज शासन ने पहाड़ी राज्यों की दुर्गम जगहों पर खनिज पदार्थो से धनी क्षेत्रों में अपनी लूट के कार्य को अंजाम देने के लिए पहाड़ों को काटकर विकास के नाम पर सुरंग बनाई, जिनका विस्तार आज भी जारी है।
चोरी-छिपे अंधेरी रातों और भय की विषम परिस्थितियों में सैकड़ों मिटर तक सुरक्षित सुरंग खोदकर गलत कार्यों को अंजाम देना किसी अदम्य साहसी, शक्तिशाली और शातिर दिमाग का ही काम हो सकता है जिसे सिर्फ कानून व्यवस्था का मामला समझकर नहीं सुधारा जा सकता। दिल्ली के मुखर्जी नगर समेत अनेक बाल सुधार गृहों के बच्चे पहले भी तोड़-फोड़कर और दीवार फांदकर भागते रहे हैं और अनेक जांच कमेटियों एवं विशेषज्ञों की रिपोर्ट आई हैं कि ये कहने भर को सुधार गृह हैं यहाँ की परिस्थितियाँ ऐसी हैं कि इसमें जितने बच्चे को सुधार के लिए भेजा जाता है, उसमें से अधिकांश शातिर अपराधी बनकर निकलते हैं। इनमें ज्यादा बच्चों को जानवरों की तरह ठंूसा जाना। ज्यादा उम्र के किशोर अपराधी और छोटे बच्चे को एक साथ रखा जाना, भोजन, स्वास्थ्य एवं सुरक्षा की लचर व्यवस्था, कई जगह यहाँ तक देखा गया है कि इन गृहों के जिम्मेदार लोग और बड़े किशोर अपराधी बच्चों का यौन-शोषण तक करते हैं। यहाँ के बच्चे इसे सुधार गृह नहीं, बच्चों के जेल के नाम से जानते हैं।
सोनीपत के गोहाना पंजाब नेशनल बैंक के लॉकर में सुरंगों के माध्यम से डाके पर हम चाहे जितना चोरों और पुलिस को कोसें पर ध्यान इस ओर भी देना जरूरी है कि कस्बे के एक बैंक के लॉकर में 350 लॉकरों में सिर्फ 86 लॉकरों को ही तोड़कर चोर करोंड़ों के गहने और नकदी ले गये। पुलिस ने 43 किलोग्राम सोना चोरों से हासिल किया है। बाकी के लॉकरों में कितने सोने और नकदी अभी होंगे इसका न तो बैंक को पता है और न ही इसका कोई बीमा होता है। यानी कि कोई चाहे कहीं से किसी माध्यम से गहने और नकदी लाइए और लॉकर का निर्धारित चार्ज चुकाते हुए इसमें रखिए। यानी सरकारी बैंक भी कानून के सुरंगों के माध्यम से काली कमाई करनेवालों को विदेश के स्विस बैंकों आदि जैसी सुरक्षा देश में हर जगह मुहैया कराते हैं। नहीं तो यूपी नोएडा प्राधिकरण का एक डिप्लोमाधारी इंजीनियर यादव सिंह जैसे अनेक अधिकारियों एवं कर्मचारियों के पास अवैध अरबों की संपत्ति, जिसका अधिकांश हिस्सा बैंक के लॉकरों में ही जमा होता है, अबतक कैसे सुरक्षित रहता।
दिल्ली में जब मेट्रो रेल सार्वजनिक परिवहन के रूप में चलाने की बात हुई तो इसे भी सिर्फ जमीन के भीतर से ही सुरंग बनाकर चलाने की बात हुई थी, परंतु मेट्रोमेन श्रीधरन एवं उनके सहयोगियों के दिमाग में यह बात आई कि यहाँ जो मेट्रो पर सवारी करेगा, वह बहुसंख्यक समाज तो आजीवन झुग्गी-झोंपड़ियों की सुरंगनुमा जिंदगी जीने के लिए अभिशप्त है, वह सिर्फ काम पर जाने के लिए ही सुरंगनुमा गलियों से निकलकर सड़कों पर आसमान का दीदार करता है और फिर रात तक सुरंगनुमा माहौल में बंद हो जाता है। दूसरी तरफ अमीर अभिजात वर्ग तो दिल्ली से बाहर के लिए आसमानी उड़ान और दिल्ली के अंदर तो रहस्य और रोमांच से भरपूर सुरंगों की सवारी ही गाँठना चाहते थे। मेट्रोमेन ने बीच का रास्ता निकालते हुए जमीनी भौगोलिक स्थितियों के अनुरूप कहीं सुरंगो में से, कहीं जमीन पर तो कहीं जमीन के उपर पुलों के माध्यम से सुगम रास्ता बनाया, ताकि कुछ समय के लिए ही सही, समाज के सभी वर्ग अपने-अपने सपनों के मनोनुकूल अपनी दूरियों को पाटकर हमसफर हो सकें। मजबूरीवश ही सही, एक-दूसरे के करीब रह सकें, एक-दूसरे को समझ सकें।
सरकार को भी दिल्ली मेट्रो के बनाये सामाजिक-आर्थिक-तार्किक रास्ते की तकनीक को समझकर समाज के सभी वर्गों के समान रूप से शिक्षा, स्वास्थ्य एवं सभी सार्वजनिक संसाधनों पर सभी की पहुंच को आसान करना चाहिए, ताकि पूरा समाज समान रूप से प्रगति कर सके। अब तक यही होता रहा है कि समाज के तथाकथित उच्च वर्ग कानून एवं नीतियों के बीच अवैध सुरंगों के माध्यम से देश के अधिकांश संसाधनों पर कब्जा करते रहे हैं, जबकि सामान्य गरीब व्यक्ति को अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भी जमीनी रास्ते पर धक्के खाता, घिसटता, टूटता-हारता रहा है। जब कोई सामान्य अपराधी सुरंग मार्ग बनाता है तो अपने कारनामे को अंजाम देकर जल्दी से जल्दी वहाँ से भागने के फिराक में रहता है जबकि तथाकथित सफेदपोश अपराधी, जिनमें राजनेता, सरकारी कर्मचारी, व्यापारी एवं तथाकथित संत, सभी सम्मिलित हैं, अवैध सुरंग मार्ग को ही स्थायी आम रास्ता समझ बैठे हैं और बड़ी बेशर्मी से उसे न्यायोचित भी ठहराने लगे हैं। सरकार और समाज को इस प्रवृत्ति पर तत्काल रोक लगानी होगी। लोकतांत्रिक सरकार एवं सभ्य समाज को हमेशा जमीनी, सरल-सुगम मार्ग को निष्कंटक बनाते रहना चाहिए, ताकि देश का हर नागरिक उसके माध्यम से अपनी-अपनी मंजिल को पा सके।



Saturday, November 15, 2014

डॉक्टरों पर नकेल!

यह तो बताना मुश्किल है कि भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के दीक्षांत समारोह में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी डॉक्टरों को सलाह दे रहे थे या मार्मिक अपील कर रहे थे कि वे छुट्टियों में समय निकालकर पिछड़े इलाकों व गाँवों में जाकर गरीबों का इलाज करें। उन्होंने कहा कि मैं 365 दिन की बात नहीं कर रहा। छुट्टियाँ सभी को मिलती हैं, उन दिनों में थोड़ा समय निकालें और पिछड़े इलाकों में जाकर इलाज करें। इसके पहले भी अनेक समारोहों में पूर्व राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री से लेकर स्वास्थ्य मंत्रियों तक डॉक्टरों से अपील से लेकर चिरौरी तक करते रहे हैं कि समाज की गरीब जनता के हितों को ध्यान में रखते हुए केवल अधिक धन के लिए संस्थान को छोड़ कर विदेश एवं निजी अस्पतालों में न जाएँ और गाँवों में भी अपनी सेवा दें। परंतु इसका कोई सकारात्मक नतीजा नहीं निकला, जिसका जिक्र खुद केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ हर्षवर्धन ने अपने भाषण में किया और कहा कि पहले यहाँ से पढ़ाई करने वाले अधिकांश डॉक्टर विदेश चले जाते थे। अब भी 40 प्रतिशत विदेश पलायन कर जाते हैं। हाल ही में भुवनेश्वर एम्स के उद्घाटन में स्वास्थ्य मंत्री ने बताया था कि एक एमबीबीएस तैयार करने में संस्थान को लगभग आठ से दस करोड़ रुपये खर्च करने पड़ते हैं।
कुछ वर्ष पहले दिल्ली स्थित मीडिया स्टडी ग्रुप के एक अध्ययन में यह तथ्य उजागर हुआ था कि सिर्फ एम्स से पढ़ाई करके निकलने वाले डॉक्टरों में 53 फीसद विदेश चले जाते हैं। अब भी 40 प्रतिशत से मतलब डॉ. हर्षवर्धन का यह नहीं है कि पलायन में कमी आई है, बल्कि पलायन तो पहले से भी ज्यादा बढ़ा ही है। अब हो यह रहा है कि देश के महानगरों में ही यूरोपीय एवं अमेरिकी सुख-सुविधा देने वाले अनेक निजी अस्पतालों में वे सेवा देने लगे हैं, जिसमें कहने को तो वे भारत में हैं, परंतु वे इलाज यूरोपीय और अमेरिकी एवं अन्य अमीर विदेशी नागरिकों का ही या उनके समान ही खर्च करनेवाले एवं उनके ही अंदाज में जीने वाले भारतीयों का कर रहे हैं। जिसमें उन्हें विदेशों के समान ही मोटी रकम और सुख-सुविधा मिल रही है। इसमें गाँव और गरीब का नाम कहीं नहीं आता। 
पिछले दिनों दुर्गापूजा में झारखंड के देवघर जिले में बसे अपने गाँव गया था। पहुँचकर थोड़ा आराम कर ही रहा था कि पड़ोस के घर जोरों का शोर सुनाई पड़ा। जाकर देखा तो पूरे गाँव के लोग वहीं जमा थे। घर के अंदर किसी गुणी-मंतरी ने किसी की आत्मा को वहाँ से निकालने के लिए मजमा लगा रखा था। मैंने मिथलेश से, जो रिश्ते में भतीजा लगता है, पूछा कि क्या बात है, तो उसने फूट-फूटकर रोते हुए अपनी आपबीती सुनायी। संक्षेप में यह कि शादी के काफी दिनों बाद बाप बना था। बच्चा पैदा होने का दिन आ गया था, उसकी पत्नी दर्द से बेचैन थी, लेकर देबीपुर अस्पताल गया परंतु वहाँ डॉक्टर या नर्स कोई नहीं मिला, फिर देवघर गया। सदर अस्पताल में भर्ती किया, परंतु वहां भी डॉक्टर रात को नदारद थी। बच्चा होने को था परंतु नर्स ठीक से ध्यान नहीं दे रही थी, बोलने पर उलटा गाली देती थी। पत्नी की हालत बिगड़ रही थी, बच्चा आधा बाहर आ चुका था, परंतु पूरी तरह से बाहर आ नहीं पा रहा था। नर्स ने उसे जल्दी प्राइवेट नर्सिंग होम लेकर जाने की सलाह दी। वह किसी तरह संभालते हुए पास के नर्सिंग होम में गया, वहाँ डॉक्टर ने ऑपरेशन करके बच्चा निकाला, फिर बच्चे के कमजोर होने की हवाला देकर बेबी इनक्यूबेटर में चार दिन तक रखा। फिर बताया कि बच्चा मर गया। उधर पत्नी भी लगातार बेहोशी में थी। अस्पताल ने साठ हजार रुपए का बिल भरने को कहा, वह डॉक्टर के सामने खूब रोया, परंतु उसने टका सा जवाब दिया, मरीज को ले जाना है तो पहले पैसा भरो, नहीं तो फीस बढ़ती रहेगी। उस समय कई नाते-रिश्तेदारों से संपर्क किया, परंतु कुछ हासिल नहीं हुआ; अंत में देवघर के एक दबंग नगर पार्षद जिनके लिए चुनाव में प्रचार का काम किया था, उनके पास जाकर रोया-गिड़गिड़ाया तब उसने डॉक्टर को कुछ पैसा एवं धमकी देकर वहां से उसके मरे बच्चे एवं पत्नी को मुक्त कराया। दो महीने बाद भी पत्नी अभी तक खाट पर पड़ी है और कमजोरी तथा सही इलाज के बिना विक्षिप्तावस्था में पहुँच गई है। अब ओझा-गुणी उसके मरे बच्चे की आत्मा की शांति के नाम पर लूट रहे हैं।
हमेशा मस्ती में रहने वाला हुल्लड़बाज मिथलेश दो साल पहले ही पिता की मृत्यु के बाद विधवा माँ समेत घर का बोझ किसी तरह ढो रहा है। कैसे उस दिन वह अपने मरे बच्चे और मरणासन्न पत्नी को लेकर लौटा होगा? इसकी पत्नी अपने बच्चे को खोकर इलाज के अभाव में दिमागी तौर पर भी असंतुलित होती जा रही है और अब आत्मा व उसकी शांति के नाम पर अंधविश्वासों की एक अंतहीन सुरंग में धंसता जा रहा है। अगर सही समय पर इसकी पत्नी को सही इलाज मिल जाता तो क्या हँसता-खेलता, बच्चे की किलकारियों से गूँजता एक खुशहाल परिवार नहीं होता? मिथलेश तो एक उदाहरण मात्र है। ऐसी घटनाएँ रोज हजारों की संख्या में हो रही हैं, यहाँ तक कि दिल्ली में भी बड़े-बड़े अस्पतालों में डॉक्टरों और अस्पताल प्रशासन की बेपरवाही और बेरुखी के कारण गर्भवती महिलाएं एवं मरीज अस्पताल के बाहर दम तोड़ते देखे जाते हैं। क्या अब समय नहीं आ गया है कि सरकार जिन डॉक्टरों को बनाने में देश के आम गरीब नागरिकों का करोड़ों रुपया लगाती है, उनको संस्थानों में नामांकन से पहले एक समझौता-पत्र पर हस्ताक्षर कराए कि आप डिग्री लेने के बाद देश के किसी भी कोने में आवश्यकतानुसार सेवा देंगे, नहीं तो अपनी शिक्षा का पूरा खर्च खुद उठायेंगे?

इसके पहले यूपीए सरकार के स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद गाँवों के डॉक्टरों के लिए अलग कोर्स एवं योजना जोर-शोर से लेकर आये थे, परंतु वह भ्रष्टाचार और लालफीताशाही के चंगुल में कहाँ बिला गये, पता नहीं। अधिकांश राज्य सरकारें अभी तक डॉक्टरों को इस बात पर राजी करने में हलकान होती रही हैं कि डॉक्टर सरकारी सेवा करते हुए निजी प्रैक्टिस न करें और गाँवों में भी अपनी सेवाएँ दें। काश! प्रधानमंत्री की सलाह या मार्मिक अपील का कुछ असर इन डॉक्टरों पर हो और वे गाँवों की ओर रुख करें, ताकि गाँव के बीमारों को शहरों की ओर पलायन न करना पड़े और वहाँ से भी लुट-हारकर अंत में अंधविश्वासों का शिकार बन ओझा-गुनियों के जाल में फँसकर असमय मौत के मुँह में न समाना पड़े।

Friday, October 17, 2014

संपूर्ण स्वच्छता अभियान!

2 अक्तूबर गाँधी जयंती पर खुद झाड़ू लगाने निकलेंगे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। प्रधानमंत्री ने स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लालकिले से स्वच्छ भारत अभियानकी घोषणा की थी। केंद्र सरकार की योजना इस अभियान को जन-आंदोलन का रूप देकर आर्थिक गतिविधियों से जोड़ना है। सरकार का लक्ष्य गांधी की 150वीं जयंती 2019 तक पूरे देश को स्वच्छ भारत में तब्दील करना है।
यह बात जगजाहिर है कि गंदगी और प्रदूषण के कारण ही लोग अधिकांश बीमारियों का शिकार हो रहे हैं और भारी मात्रा में जन-धन का नुकसान हो रहा है। गाँव-शहर, नदियां, पहाड़ हर जगह गंदगी का अंबार है। कोई भी सार्वजनिक स्थल, चाहे वह सरकारी कार्यालय, शिक्षा संस्थान, बस अड्डा, रेलवे स्टेशन या रेल के डब्बे हों, यहाँ तक कि बीमारियों से निजात दिलाने वाले सरकारी अस्पताल ही क्यों न हों, गंदगी से अँटे मिलेंगे, कोई भी सड़क नहीं, जिसके किनारे गंदगी के ढेर न मिल जाएँ। अगर कूड़े का ढेर न मिले तो उसपर चलने वाले वाहन अपने प्रदूषित धुएँ से उसकी आपूर्ति कर देंगे। किसी भी शहर के अच्छे से अच्छे संभ्रान्त कॉलोनियों में आगे से भले साफ-सुथरा दिखाई पड़े, परंतु उसके पिछवाड़े गंदगी के सैलाब में समाये झुग्गी-झोंपड़ियों का विस्तार होगा, जिसमें सिर्फ गंदगी और प्रदूषण का ही साम्राज्य होता है। अकसर इसी के बीच से शहर का गंदा नाला निकलता है, जिसमें आदमी और कुत्ते, सुअर सभी एक साथ रेंगते हैं। यहाँ आदमी और गंदे जानवरों का भेद मिट जाता है सिर्फ गरीब और अमीर का फर्क साफ दिखाई देता है। शहर ही नहीं बल्कि हमारे गाँव, देश की अधिकांश नदियाँ, जंगल, जमीन, पहाड़ यहाँ तक कि जमीन के नीचे पाताल तक गंदगी और प्रदूषण की मार से ग्रस्त हैं।
यह गंदगी तो प्रत्यक्ष तौर पर दिखाई पड़ जाती है, इसके अलावे हमारे देश में अनेकों तरह की अप्रत्यक्ष मानसिक गंदगी के भी अंबार हैं, जो एक तरह से प्रत्यक्ष गंदगी के जनक हैं। इसके अनेंको रूप हैं, जिनमें मुख्य हैं- भ्रष्टाचार, आतंकवाद, जातिवाद, सांप्रदायिकता और अंधविष्वास आदि। इसके और इसकी अनेकों विषबेल के कारण ही देश अनेक तरह की जानलेवा बीमारियों से ग्रसित है। आजादी के बाद अबतक की सारी सरकारें इन गंदगियों से लड़ने के वादे के साथ सत्ता में आती रही हैं, परंतु सत्ता पाते ही कुछ दिनों में पता चलता है कि वह खुद ही इस गंदगी का आकंठ शिकार होकर बीमार हो गई और इन बीमारियों को पालते-पोसते कई गुणा ज्यादा गंदगी खुद फैलाने लगी है।
महात्मा गाँधी आजीवन दोनों तरह की गंदगियों से लड़ते रहे। उनके रोज के क्रियाकलाप का अध्ययन करने पर आसानी से समझा जा सकता है कि वे किस तरह अपने आवास, अपना शौचालय तथा आसपास की सफाई खुद करते थे। जिसे अधिकांश लोग छोटा काम मानकर दूसरे पर आश्रित रहते हैं। कई बार तो बहुत बड़े-बड़े नेता और खुद उनके परिवार के लोग ही उनको इन साधारण कामों में लगे देखकर खिन्न हो जाया करते थे, परंतु उनके लिए स्वच्छता का महत्त्व सर्वोपरि था। गाँधीजी एक ऐसे सफाईकर्मी थे, जिन्होंने स्वच्छता का अनवरत अभियान अपने शरीर, घर और मन से प्रारंभ कर राजनीतिक गंदगी यानी अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति के लिए स्वतंत्रता अभियान से लेकर देश में फैले छुआछूत, अंधविश्वास, सांप्रदायिकता जैसे अनेकों गंदगियों के खिलाफ अनेकों आंदोलन और अभियान चलाते हुए शहीद हो गए, ताकि पूरी मानव जाति स्वच्छता, स्वतंत्रता, समानता, भाईचारे तथा पूरी प्रकृति के सहअस्तित्व के साथ सदियों-सदियों तक सम्मान के साथ अपना अस्तित्व बचाये रह सके। 
देश की आजादी व गाँधीजी की मृत्यु के बाद विकास के लिए एक अराजक दौड़ में हम गाँधीजी के स्वच्छता अभियान से लगातार दूर होते गए। इसी का परिणाम है कि आज देश एकतरफ गंदगी और प्रदूषण के मार से कराह रहा है तो दूसरी तरफ भ्रष्टाचार, जातिवाद, सांप्रदायिकता, अंधविश्वास, आतंकवाद जैसी अनेकों गंदगियों से अनेकों भयावह समस्याओं से जूझ रहा है। ऐसे में प्रधानमंत्री का गाँधीजी के सपनों को आगे रखकर प्रारंभ किया जा रहा यह सफाई अभियान क्या सफल हो पाएगा? यह अभियान क्या सिर्फ दिखनेवाले कूड़े और गंदगी की सफाई तक ही सीमित रहेगा या उससे आगे जाकर सार्वजनिक जीवन में आए अनेक प्रकार की जानलेवा अप्रत्यक्ष गंदगियों से मुक्ति दिलाकर वास्तविक प्रगति का भी मार्ग प्रशस्त करेगा?
इसमें कोई संदेह नहीं है कि स्वच्छ भारत अभियान के लिए प्रधानमंत्री खुद आगे आकर जिस तरह का संदेश दे रहे हैं, उसमें भी प्रत्यक्ष दिखने वाली गंदगी और अप्रत्यक्ष रूप से आम लोग और पूरे देश को संपूर्ण स्वच्छ और स्वस्थ करने के बुनियादी बीज इसमें दिखाई पड़ रहे हैं। इस स्वच्छता अभियान में जिस तरह सभी सरकारी और सार्वजनिक क्षेत्रों, ग्रामीण व शहरी स्थानिय निकायों, स्वयं सहायता समूहों, युवा संगठनों, बाजार संगठनों व व्यापारिक-औद्योगिक संगठनों एवं मीडिया को शरीक होने का आह्वान किया है, उससे यह आशा जगती है कि इस सफाई अभियान के दौरान देश में हर स्तर पर ऐसी रचनात्मक उर्जा पैदा करेगी, जिससे सभी तरह की गंदगियों का सफाया होगा।
घर, सड़क, सार्वजनिक स्थल, नदियाँ, पहाड़, पाताल सभी प्रदूाण मुक्त होंगे, देश से भ्रष्टाचार का नामोनिशान मिट जाएगा, कहीं भी जाति, धर्म, वर्ग और लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं होगा। मेट्रो की तरह सारी रेलगाड़ियों में एक ही क्लास होगी। सभी वर्गों के बच्चे अपने घर के पास समान रूप से समान स्कूल में अपनी मातृभाषा में शिक्षा पायेंगे। बड़ी-बड़ी बहुमंजिली इमारतांे के पीछे झुग्गी-झोंपड़ियों का विस्तार नहीं होगा। किसी भी कॉलोनी या अपार्टमेंट के एक फ्लैट में मृत्यु का मातम हो, उसी समय पड़ोस के मकान या फ्लैट में जश्न से पूरा माहौल गुंजायमान नहीं होगा। बीच भरी सड़क में किसी राहगीर की कोई हत्या या किसी महिला के आबरू से खिलवाड़ कर कोई खुलेआम फरार नहीं हो पाएगा और विकास का समान हिस्सा गाँधी के उस अंतिम व्यक्ति तक भी निर्बाध पहँुचेगा।

 इस तरह अनेक गंदगियों से मुक्ति के लिए सिर्फ सरकार ही नहीं, पूरे समाज को इस सफाई अभियान में शामिल होना पड़ेगा। यहाँ प्रधानमंत्री की नेतृत्व क्षमता भी कसौटी पर होगी। क्या इनकी झाड़ू में भी वही नैतिक बल और आत्मशक्ति आ पायेगी, जो गांधी के एक मुट्ठी नमक उठा लेने में या दलितों को मंदिर प्रवेश जैसे मामूली दिखने वाली अभियानों के कारण भारत और पूरे दलित समुदाय की मुक्ति का मार्ग खोल दिया था। हमें सकारात्मक सोच रखनी चाहिए और स्वच्छ भारतनामक इस अँखुआते बीज को खाद, पानी देकर अनेक झंझावतों से बचाने में पूरा सक्रिय सहयोग देना चाहिए, ताकि 2019, गाँधीजी के 150वीं सालगिरह तक भारत गाँधी के यानी भारत के आम लोगों के सपनों का भारत बन जाए!  

Friday, September 5, 2014



प्रधानमंत्री की टीम इंडियामें पंचायत प्रमुख भी शामिल हों
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी लगातार इस बात पर जोर दे रहे हैं कि केन्द्र और राज्य सरकार, यानी प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों की एक टीम एक साथ विकास का कार्य करेगी, तभी पूरे देश का संघीय ढाँचे के अनुरूप एक समान विकास संभव होगा। इसके लिए उन्होंने योजना आयोग तक को पूरी तरह से बदलने का फैसला कर लिया जिसे देश के संघीय ढाँचे के लिए रोड़ा माना जाता रहा है। प्रधानमंत्री ने लालकिले से सभी गाँवों को इंटरनेट से जोड़ने का वादा किया एवं सभी सांसदों से अपने-अपने क्षेत्रों में हर साल एक-एक गाँव गोद लेकर उन्हें आदर्श गाँव के रूप में विकसित करने का आह्वान किया।  
प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों की टीम अगर एक होकर विकास कार्यों को अंजाम दे तो पूरे देश में विकास को एक नई दिशा मिलेगी, जो कि कई बार दलीय, क्षेत्रीय एवं अहं के टकरावों के कारण विकास के मार्ग में बाधक बनती है। परंतु क्या सिर्फ केन्द्र और राज्य सरकारों के प्रयास से ही पूरे देश का सर्वांगीण विकास संभव है? पंचायती राज लागू होने के बाद भी क्या बिना गाँवों और ग्राम पंचायतों के प्रतिनिधियों का साथ लिए पूरे देश का विकास संभव है? क्षेत्र के सांसदों द्वारा प्रत्येक वर्ष एक ग्राम को गोद लेने भर से क्या लाखों गाँवों का विकास संभव है?
गाँधी जी स्वराज की धुरी गाँव को मानते थे। इसके लिए वे जीवनपर्यन्त संघर्ष करते रहे। उनका सपना था कि ‘‘प्रत्येक गाँव एक ऐसा परिपूर्ण गणराज्य होना चाहिए जो अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अपने पड़ोसियों पर आश्रित न हो।’’ अर्थात प्रत्येक गाँव हर मामले में आत्मनिर्भर हो। अगर देश का प्रत्येक गाँव और शहर आत्मनिर्भर हो जाए तो देश के सामने अधिकांश मुँहबाए खड़ी समस्याएँ जैसे भूख, बेरोजगारी, महँगाई, भ्रष्टाचार, अलगाववाद का समाधान न हो जाए?
अब तक विकास का केन्द्रबिन्दु गाँधी जी के विचारों के विरुद्ध देश की राजधानी दिल्ली तथा राज्यों की राजधानियाँ रहीं, उस समय के सत्तारूढ़ कर्ताधर्ता गाँधी जी के विचारों को दकियानुसी मानते थे। रूढ़िग्रस्त, जातिवादी, सामंतवादी भारतीय ग्रामीण समाज को देखते हुए इसमें कुछ सच्चाई भी थी। परंतु स्वतंत्रता के सड़सठ सालों के बाद तथा क्रमिक संवैधानिक सुधारों, केन्द्रीकरण के अनेक विरोधाभासों तथा इसके कारण पैदा हुई अनेक समस्याओं के कारण आज आसानी से महसूस किया जा रहा है कि पंचायतों और ग्रामीण विकास के माध्यम से ही भारतीय गणराज्य को मजबूत बनाया जा सकता है।
संविधान के 73वें संशोधन से ग्रामीण भारत में सत्‍ता के समीकरण में बदलाव आया है। समाज के गरीब वर्ग के लोगों का सशक्तीकरण हुआ। देश के 600 जिला पंचायतों, 6000 मंडल पंचायतों और दो लाख तीस हजार ग्राम पंचायतों के जरिए 28 लाख प्रतिनिधि हमारे लोकतंत्र का हिस्सा बन गए हैं। कुछ शुरुआती दिक्कतों के बाद समाज के सभी वर्गों ने हर स्तर पर दलितों, आदिवासियों, पिछड़ों एवं महिलाओं के लिए पचास प्रतिशत आरक्षण तक स्वीकार कर लिया है। परंतु अब सिर्फ इसके चुने जाने भर के गुणगान करने से काम नहीं चलने वाला है। लोगों में अब विकास की जबर्दस्त भूख जगी है। अब वे सभी छोटे-मोटे कार्यों के लिए दिल्ली और अपनी राजधानियों की ओर रुख करने को तैयार नहीं हैं। इसके लिए ग्राम पंचायतों को ही प्राथमिक विकास केन्द्र और सेवा एवं संसाधन केन्द्र बनाना होगा।
विकास केन्द्र के रूप में पंचायत भवन के अंतर्गत ही खाद्यान्न भंडार-गृह, प्राथमिक शिक्षा एवं स्वास्थ्य केन्द्र, इत्यादि हों। यही कृषि व्यवस्था जिसके अंतर्गत सिचाई, जैविक खाद, बीज इत्यादि की व्यवस्था करेगी तथा अनाजों की उचित भंडारण की भी व्यवस्था करेगी, ताकि गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों को भूख से बचाने के लिए केन्द्र सरकार की ओर न देखना पड़े। खाद्यान्नों की उचित विपणन एवं वितरण की व्यवस्था भी खुद करेगी और अपने लोगों को महंगाई के मार से भी बचायेगी।  सबों के लिए प्राथमिक शिक्षा एवं प्राथमिक स्वास्थ्य की व्यवस्था यहीं सुनिश्चित होगी। आम लोगों की सभी कल्याणकारी योजनाएँ यहीं उन क्षेत्रों के अनुरूप विशेषज्ञों की सलाह से बने और उनका क्रियान्वयन हो, अगर कुछ विशेष योजनाएँ केन्द्र सरकार की या राज्य सरकारों की हो तो वह भी ग्राम पंचायतों के माध्यम से ही लागू हों। इसके अलावा सड़क, नाला, उर्जा, ग्रामीण उधोग धंधे, वनीकरण, पर्यावरण इत्यादि सबके विकास एवं संरक्षण की व्यवस्था खुद करें। 
सेवा एवं संसाधन केन्द्र या डाटा सेन्टर कार्यालय भी पंचायत भवन के अंतर्गत ही हो। इसका काम पंचायत के अंदर आने वाले हर आदमी एवं उसके पूरे परिवार का ब्योरा होगा, जिसमें शिक्षा, रोजगार के साधन, उसके आय-व्यय तथा पंचायतों के अंदर भूमि, वन, जलसंसाधन खेत, पशुओं इत्यादि से संबंधित सारे आंकड़े होंगे जो इंटरनेट के माध्यम से ब्लाक, जिले, राज्य की राजधानियों तथा अंत में केन्द्र दिल्ली के शोध एवं विकासमीनारों से जुड़े होंगे। पंचायत के इस कार्यालय में पंचायत के अंतर्गत आने वाले संसाधनों का रोज नवीनीकरण किया जाएगा, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति को जन्म-मरण, शादी ब्याह, जाति तथा आय के óोतों इत्यादि का पंजीकरण तथा  प्रमाणपत्र भी यहीं से प्राप्त होगा।
इस कार्यालय के माध्यम से जहाँ लोगों को छोटे-छोटे कार्यों के लिए जिलों के कार्यालयों से मुक्ति मिलेगी, वहीं पंचायतों को अपनी विकास योजनाएँ बनाने में आसानी होगी। चूंकि ये आँकड़े ब्रॉडबेंड इंटरनेट से जिलों, राज्यों की राजधानियों एवं केन्द्र से जुड़े होंगे, जिनसे असीमित आँकड़े राज्यों एवं केन्द्र सरकार को बैठे-बिठाए मिल जाएँगे जिस पर वे प्रत्येक वर्ष अरबों रुपये शोध के लिए खर्च करते रहे हैं। इससे उन्हें प्रत्येक दस वर्ष में अरबों रुपये खर्च कर जनगणना, पशुगणना से मुक्ति मिलेगी तथा कृषि, वन, एवं अनेक ग्रामीण संसाधनों से संबंधित अनेक प्रकार के नित नये आँकड़े उपलब्ध होते रहेंगे।

प्रधानमंत्री ने यह स्वागत योग्य कदम उठाया है कि योजना आयोग से मुक्ति पा ली है। परंतु सांसदों को प्रत्येक वर्ष सिर्फ एक गाँव को गोद लेने भर से लोगों की विकास की भूख नहीं मिटनेवाली। आजादी के इतने दिनों के बाद आज भी गाँवों को गोद लेने की नहीं, बल्कि पंचायतों उसे सहारा देकर अपने पाँवों से चलने लायक बनाने की है आज की आवश्यकता सिर्फ प्रधानमंत्री एवं मुख्यमंत्री की टीम की नहीं बल्कि उसमें पंचायत के प्रधानों को भी शामिल कर एक मजबूत टीम बनाने की है, जो परस्पर संवाद और संचार के माध्यम से विकास की राह में आने वाली हर बाधा का समाधान निकाले। यही असली टीम इंडियाहोगी, जिससे पूरे देश का सर्वांगीण विकास संभव होगा।  

Tuesday, August 5, 2014

गुलगुलिया समाज

गुलगुलियाशब्द अकसर माँ-बाबूजी या किसी बड़े-बुजुर्ग से सुनने को तभी मिलता जब हमउम्र सभी भाई-बहन एक साथ इकट्ठे खेलते, खूब शोर करते हुए उधम मचाते। तो वहाँ मौजूद सभी बड़े बोल पड़ते, पता नहीं कहाँ से यह गुलगुलिया का दंगल जमा हो गया...अनस कर रखा है। या फिर जब पड़ोसी के घर से जिस दिन गरीबी और अभाव के मारे चूल्हे का धुआँ नहीं उठता और मार-पीट एवं गाली-गलौज पूरे गाँव में गूंजती। जिसे सुनकर हमेशा सभी कहते कि यह गुलगुलिया का घर कभी शांति से नहीं रह सकता। परंतु प्रत्यक्ष गुलगुलिया समाज से सामना तो तब हुआ जब एक दिन हम सभी बच्चे पड़ोस गाँव के अपने स्कूल से छुट्टी के बाद लौट रहे थे। अपने गाँव के पिछवाड़े पीपल की छाया के नीचे काफी लोगों का जमावड़ा लगा था। जिसमें औरत, मर्द, किशोर बच्चे सभी थे। सभी दीन-हीन कंगले, फटे, मैले-कुचैले कपड़ों में अजीब भाषा में काँव-काँव कर रहे थे, एक दूसरे पर चीख-चिल्ला रहे थे। बच्चों को तो पीट भी रहे थे। खुले में ईंट-मिट्टी का बना चूल्हा जल रहा था, उसमें भात पक रहा था। फिर अंदर गाँव में अजब नजारा था, सभी के घरों के आगे उनके दो-तीन बच्चे और औरतें कटोरा लेकर खाने को कुछ माँग रहे हैं। घर आने पर देखा कि घर के पिछवाड़े आठ-दस लोग भाले, तीर-धनुष आदि लेकर तेजी से भाग रहे हैं और पलक झपकते ही दो-तीन बिल्ली एवं बिलारों का शिकार कर लिया। तुरंत आग के हवाले कर उसे सबने मिल कर नोच-नोचकर खाना शुरू कर दिया। मन इनके प्रति घृणा से भर गया। ये मुश्किल से गाँव में दो-तीन दिन रहें होंगे, परंतु इतने कम समय में ही इन्होंने अपने और आस-पास के गाँव के सभी बिल्ली, नदी-तालाब के मछलियों एवं अनेक आजाद पशु-पक्षियों का शिकार कर भक्षण कर डाला था। दो दिनों में गाँव के सारे लोग इनसे आजिज आ चुके थे।
उस उम्र में जितना समझ पाया था, उसका मतलब था- गुलगुलिया का दंगल यानी पूरी तरह से अराजक समाज, कोई किसी की न सुने, सब अपनी-अपनी कहें, चीखें-चिल्लायें, कोई किसी को मारे-पीटे, खासकर शक्तिशाली कमजोर के साथ जैसा चाहे व्यवहार करे। वर्षों तक इस समाज से कभी सामना नहीं हुआ, परंतु गुलगुलिया शब्द जरूर याद रहा। चौंका तब, जब इस महीने के प्रारंभ में गुलगुलिया समाज को मीडिया की सुर्खियों में देखा। झारखंड में बोकारो के पास गोमिया इलाके में गुलगुलिया धौड़ा में एक गुलगुलिया युवक ने नशे की हालत में बस्ती के दूसरे घर में एक महिला के साथ छेड़छाड़ की। महिला के शोर मचाने के बाद आरोपी युवक भाग गया। इस घटना को लेकर गुलगुलिया समाज की बैठक हुई। इसमें मुखिया ने आरोपी युवक की बहन के साथ दुष्कर्म करके बदला चुकाने का फैसला सुनाया। पंचायत के फैसले के बाद महिला लड़की को खींचकर पंचायत में लाई और उसे अपने पति के हवाले कर दिया। उसके पति ने लड़की को पास की झाड़ी में ले जाकर उसका बलात्कार किया। खून से लथपथ चीखती, कराहती लड़की अपने घर पहुंची।
झारखंड और बंगाल में आज भी खानाबदोश गुलगुलिया समाज सामाजिक, आर्थिक व वैचारिक विकास से कोसों दूर जीवन जीने को मजबूर है। गुलगुलिया परिवार के लोग भीख मांग व रिक्शा चलाकर जीविका उपार्जन करते हैं। इस समाज का एक भी बच्चा स्कूल की चौखट तक नहीं पहुँच पाया है और पूरी दुनिया से अलग-थलग हैं। अधिकांश लोगों के पास न तो बी पी एल कार्ड और न ही वोटर कार्ड है।
इसके अलावा ठीक इसी समय घटी दो घटनायें ऐसी हैं, जो यह सोचने को मजबूर करती हैं कि गुलगुलिया मानसिकता सिर्फ सुदूर झारखंड या बंगाल के पिछड़े समाज तक ही सीमित नहीं है बल्कि दिल्ली के तथाकथित सभ्य समाज या लखनऊ के सत्ता के शीर्ष तक को अपने आगोश में ले लिया है। पहली घटना उत्तरी दिल्ली के मल्कागंज की है। जहां 77 साल के एक बुजुर्ग ने 14 साल की नाबालिग नौकरानी के साथ 10 दिनों तक बलात्कार किया। बुजुर्ग मालिक नाबालिग नौकरानी को पहले जबरन अश्लील फिल्में दिखाता था और फिर उसके साथ दुष्कर्म किया करता था। लड़की को बुजुर्ग के चंगुल से पुलिस द्वारा तब छुड़ाया गया जब एक पड़ोसी ने घर के अंदर से आ रही उसकी चीखें सुनीं।
दूसरी लखनऊ के मोहनलालगंज इलाके के उस जघन्य कांड की बात, जहाँ महिला के साथ दुष्कर्म और नृशंस हत्या के बाद उसकी लाश को नग्नावस्था में सड़क के किनारे फेंक दिया गया। जिसे घंटों तक पुलिस उसी अवस्था में उसे उलट-पुलट करती रही और अनेक पत्रकार गण अपने कैमरे से उसके फोटो उतारते रहे। प्रदेश सत्ता के शीर्ष पर बैठे युवा मुख्यमंत्री के पिता और समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष श्री मुलायम सिंह यादव ने इस जघन्य घटना पर सफाई दी कि यहाँ की जनसंख्या के अनुपात में दुष्कर्म बहुत कम हैं। प्रदेश के संविधान प्रमुख राज्यपाल अजीज कुरैशी ने तो साफ-साफ कह दिया कि मैं और यहाँ की सरकार क्या भगवान भी ऐसे दुष्कर्म के कांडों को नहीं रोक सकते।
ऐसे अनेक हृदय विदारक दुष्कर्म कांड रोज मीडिया की सुर्खियां बन रहे हैं। उपरोक्त तीन घटनायें ऐसी हैं, जो अलग-अलग समाजों से हैं। पहली घटना झारखंड के गुलगुलिया समाज की, जो सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक रूप से अत्यंत पिछड़ा समाज है। जहाँ पंचायत और उसका मुखिया एक औरत के अपमान का बदला आरोपी की मासूम बहन से लेता है। खुलेआम आँख के बदले आँख की नीति के तहत। दूसरी घटना सभ्य समाज दिल्ली की है, जिसमें कोई बिगड़ैल किशोर या युवा नहीं बल्कि मध्यवर्गीय पढ़ा-लिखा मृत्यु के मुहाने पर बैठा 77 वर्षीय बुजुर्ग है जो लगातार दस दिनों तक कैद कर नाबालिग नौकरानी को अपनी हवश का शिकार बनाता रहा। इस बुजुर्ग व्यक्ति के कुकृत्य को किस श्रेणी में रखें? क्या यह बुजुर्ग भी उसी कमजोर की शिकार करने वाली अराजक गुलगुलिया मानसिकता से ग्रसित नहीं है?
अंत में उस बेशर्म, बेपरवाह उत्तर प्रदेश की लोकतांत्रिक सरकार के बारे में क्या कहा जाए, जिसे जनता ने अपने सुशासन और कल्याण के लिए चुना? जो राज्यपाल शासन व्यवस्था संवैधानिक एवं न्यायपूर्ण ढंग से चले, उसी के लिए पदासिन हो, वही अगर अपनी जिम्मेदारियों को भगवान पर टाल दे तो उस शासन व्यवस्था को बर्बर और अराजक गुलगुलिया व्यवस्था नहीं कहें तो क्या कहें?
गुलगुलिया मानसिकता आज देश, समाज और सत्ता के हर हिस्से में व्याप्त हो गयी है। आज एक ऐसे समवेत प्रयास की आवश्यकता है ताकि गुलामी की इस गुलगुलिया मानसिकता से मुक्ति मिल सके, तभी हमारी लोकतंत्र और स्वतंत्रता सर्वहितकारी व शाश्वत बनी रहेगी।