Friday, September 5, 2014



प्रधानमंत्री की टीम इंडियामें पंचायत प्रमुख भी शामिल हों
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी लगातार इस बात पर जोर दे रहे हैं कि केन्द्र और राज्य सरकार, यानी प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों की एक टीम एक साथ विकास का कार्य करेगी, तभी पूरे देश का संघीय ढाँचे के अनुरूप एक समान विकास संभव होगा। इसके लिए उन्होंने योजना आयोग तक को पूरी तरह से बदलने का फैसला कर लिया जिसे देश के संघीय ढाँचे के लिए रोड़ा माना जाता रहा है। प्रधानमंत्री ने लालकिले से सभी गाँवों को इंटरनेट से जोड़ने का वादा किया एवं सभी सांसदों से अपने-अपने क्षेत्रों में हर साल एक-एक गाँव गोद लेकर उन्हें आदर्श गाँव के रूप में विकसित करने का आह्वान किया।  
प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों की टीम अगर एक होकर विकास कार्यों को अंजाम दे तो पूरे देश में विकास को एक नई दिशा मिलेगी, जो कि कई बार दलीय, क्षेत्रीय एवं अहं के टकरावों के कारण विकास के मार्ग में बाधक बनती है। परंतु क्या सिर्फ केन्द्र और राज्य सरकारों के प्रयास से ही पूरे देश का सर्वांगीण विकास संभव है? पंचायती राज लागू होने के बाद भी क्या बिना गाँवों और ग्राम पंचायतों के प्रतिनिधियों का साथ लिए पूरे देश का विकास संभव है? क्षेत्र के सांसदों द्वारा प्रत्येक वर्ष एक ग्राम को गोद लेने भर से क्या लाखों गाँवों का विकास संभव है?
गाँधी जी स्वराज की धुरी गाँव को मानते थे। इसके लिए वे जीवनपर्यन्त संघर्ष करते रहे। उनका सपना था कि ‘‘प्रत्येक गाँव एक ऐसा परिपूर्ण गणराज्य होना चाहिए जो अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अपने पड़ोसियों पर आश्रित न हो।’’ अर्थात प्रत्येक गाँव हर मामले में आत्मनिर्भर हो। अगर देश का प्रत्येक गाँव और शहर आत्मनिर्भर हो जाए तो देश के सामने अधिकांश मुँहबाए खड़ी समस्याएँ जैसे भूख, बेरोजगारी, महँगाई, भ्रष्टाचार, अलगाववाद का समाधान न हो जाए?
अब तक विकास का केन्द्रबिन्दु गाँधी जी के विचारों के विरुद्ध देश की राजधानी दिल्ली तथा राज्यों की राजधानियाँ रहीं, उस समय के सत्तारूढ़ कर्ताधर्ता गाँधी जी के विचारों को दकियानुसी मानते थे। रूढ़िग्रस्त, जातिवादी, सामंतवादी भारतीय ग्रामीण समाज को देखते हुए इसमें कुछ सच्चाई भी थी। परंतु स्वतंत्रता के सड़सठ सालों के बाद तथा क्रमिक संवैधानिक सुधारों, केन्द्रीकरण के अनेक विरोधाभासों तथा इसके कारण पैदा हुई अनेक समस्याओं के कारण आज आसानी से महसूस किया जा रहा है कि पंचायतों और ग्रामीण विकास के माध्यम से ही भारतीय गणराज्य को मजबूत बनाया जा सकता है।
संविधान के 73वें संशोधन से ग्रामीण भारत में सत्‍ता के समीकरण में बदलाव आया है। समाज के गरीब वर्ग के लोगों का सशक्तीकरण हुआ। देश के 600 जिला पंचायतों, 6000 मंडल पंचायतों और दो लाख तीस हजार ग्राम पंचायतों के जरिए 28 लाख प्रतिनिधि हमारे लोकतंत्र का हिस्सा बन गए हैं। कुछ शुरुआती दिक्कतों के बाद समाज के सभी वर्गों ने हर स्तर पर दलितों, आदिवासियों, पिछड़ों एवं महिलाओं के लिए पचास प्रतिशत आरक्षण तक स्वीकार कर लिया है। परंतु अब सिर्फ इसके चुने जाने भर के गुणगान करने से काम नहीं चलने वाला है। लोगों में अब विकास की जबर्दस्त भूख जगी है। अब वे सभी छोटे-मोटे कार्यों के लिए दिल्ली और अपनी राजधानियों की ओर रुख करने को तैयार नहीं हैं। इसके लिए ग्राम पंचायतों को ही प्राथमिक विकास केन्द्र और सेवा एवं संसाधन केन्द्र बनाना होगा।
विकास केन्द्र के रूप में पंचायत भवन के अंतर्गत ही खाद्यान्न भंडार-गृह, प्राथमिक शिक्षा एवं स्वास्थ्य केन्द्र, इत्यादि हों। यही कृषि व्यवस्था जिसके अंतर्गत सिचाई, जैविक खाद, बीज इत्यादि की व्यवस्था करेगी तथा अनाजों की उचित भंडारण की भी व्यवस्था करेगी, ताकि गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों को भूख से बचाने के लिए केन्द्र सरकार की ओर न देखना पड़े। खाद्यान्नों की उचित विपणन एवं वितरण की व्यवस्था भी खुद करेगी और अपने लोगों को महंगाई के मार से भी बचायेगी।  सबों के लिए प्राथमिक शिक्षा एवं प्राथमिक स्वास्थ्य की व्यवस्था यहीं सुनिश्चित होगी। आम लोगों की सभी कल्याणकारी योजनाएँ यहीं उन क्षेत्रों के अनुरूप विशेषज्ञों की सलाह से बने और उनका क्रियान्वयन हो, अगर कुछ विशेष योजनाएँ केन्द्र सरकार की या राज्य सरकारों की हो तो वह भी ग्राम पंचायतों के माध्यम से ही लागू हों। इसके अलावा सड़क, नाला, उर्जा, ग्रामीण उधोग धंधे, वनीकरण, पर्यावरण इत्यादि सबके विकास एवं संरक्षण की व्यवस्था खुद करें। 
सेवा एवं संसाधन केन्द्र या डाटा सेन्टर कार्यालय भी पंचायत भवन के अंतर्गत ही हो। इसका काम पंचायत के अंदर आने वाले हर आदमी एवं उसके पूरे परिवार का ब्योरा होगा, जिसमें शिक्षा, रोजगार के साधन, उसके आय-व्यय तथा पंचायतों के अंदर भूमि, वन, जलसंसाधन खेत, पशुओं इत्यादि से संबंधित सारे आंकड़े होंगे जो इंटरनेट के माध्यम से ब्लाक, जिले, राज्य की राजधानियों तथा अंत में केन्द्र दिल्ली के शोध एवं विकासमीनारों से जुड़े होंगे। पंचायत के इस कार्यालय में पंचायत के अंतर्गत आने वाले संसाधनों का रोज नवीनीकरण किया जाएगा, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति को जन्म-मरण, शादी ब्याह, जाति तथा आय के óोतों इत्यादि का पंजीकरण तथा  प्रमाणपत्र भी यहीं से प्राप्त होगा।
इस कार्यालय के माध्यम से जहाँ लोगों को छोटे-छोटे कार्यों के लिए जिलों के कार्यालयों से मुक्ति मिलेगी, वहीं पंचायतों को अपनी विकास योजनाएँ बनाने में आसानी होगी। चूंकि ये आँकड़े ब्रॉडबेंड इंटरनेट से जिलों, राज्यों की राजधानियों एवं केन्द्र से जुड़े होंगे, जिनसे असीमित आँकड़े राज्यों एवं केन्द्र सरकार को बैठे-बिठाए मिल जाएँगे जिस पर वे प्रत्येक वर्ष अरबों रुपये शोध के लिए खर्च करते रहे हैं। इससे उन्हें प्रत्येक दस वर्ष में अरबों रुपये खर्च कर जनगणना, पशुगणना से मुक्ति मिलेगी तथा कृषि, वन, एवं अनेक ग्रामीण संसाधनों से संबंधित अनेक प्रकार के नित नये आँकड़े उपलब्ध होते रहेंगे।

प्रधानमंत्री ने यह स्वागत योग्य कदम उठाया है कि योजना आयोग से मुक्ति पा ली है। परंतु सांसदों को प्रत्येक वर्ष सिर्फ एक गाँव को गोद लेने भर से लोगों की विकास की भूख नहीं मिटनेवाली। आजादी के इतने दिनों के बाद आज भी गाँवों को गोद लेने की नहीं, बल्कि पंचायतों उसे सहारा देकर अपने पाँवों से चलने लायक बनाने की है आज की आवश्यकता सिर्फ प्रधानमंत्री एवं मुख्यमंत्री की टीम की नहीं बल्कि उसमें पंचायत के प्रधानों को भी शामिल कर एक मजबूत टीम बनाने की है, जो परस्पर संवाद और संचार के माध्यम से विकास की राह में आने वाली हर बाधा का समाधान निकाले। यही असली टीम इंडियाहोगी, जिससे पूरे देश का सर्वांगीण विकास संभव होगा।  

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