Tuesday, August 5, 2014

गुलगुलिया समाज

गुलगुलियाशब्द अकसर माँ-बाबूजी या किसी बड़े-बुजुर्ग से सुनने को तभी मिलता जब हमउम्र सभी भाई-बहन एक साथ इकट्ठे खेलते, खूब शोर करते हुए उधम मचाते। तो वहाँ मौजूद सभी बड़े बोल पड़ते, पता नहीं कहाँ से यह गुलगुलिया का दंगल जमा हो गया...अनस कर रखा है। या फिर जब पड़ोसी के घर से जिस दिन गरीबी और अभाव के मारे चूल्हे का धुआँ नहीं उठता और मार-पीट एवं गाली-गलौज पूरे गाँव में गूंजती। जिसे सुनकर हमेशा सभी कहते कि यह गुलगुलिया का घर कभी शांति से नहीं रह सकता। परंतु प्रत्यक्ष गुलगुलिया समाज से सामना तो तब हुआ जब एक दिन हम सभी बच्चे पड़ोस गाँव के अपने स्कूल से छुट्टी के बाद लौट रहे थे। अपने गाँव के पिछवाड़े पीपल की छाया के नीचे काफी लोगों का जमावड़ा लगा था। जिसमें औरत, मर्द, किशोर बच्चे सभी थे। सभी दीन-हीन कंगले, फटे, मैले-कुचैले कपड़ों में अजीब भाषा में काँव-काँव कर रहे थे, एक दूसरे पर चीख-चिल्ला रहे थे। बच्चों को तो पीट भी रहे थे। खुले में ईंट-मिट्टी का बना चूल्हा जल रहा था, उसमें भात पक रहा था। फिर अंदर गाँव में अजब नजारा था, सभी के घरों के आगे उनके दो-तीन बच्चे और औरतें कटोरा लेकर खाने को कुछ माँग रहे हैं। घर आने पर देखा कि घर के पिछवाड़े आठ-दस लोग भाले, तीर-धनुष आदि लेकर तेजी से भाग रहे हैं और पलक झपकते ही दो-तीन बिल्ली एवं बिलारों का शिकार कर लिया। तुरंत आग के हवाले कर उसे सबने मिल कर नोच-नोचकर खाना शुरू कर दिया। मन इनके प्रति घृणा से भर गया। ये मुश्किल से गाँव में दो-तीन दिन रहें होंगे, परंतु इतने कम समय में ही इन्होंने अपने और आस-पास के गाँव के सभी बिल्ली, नदी-तालाब के मछलियों एवं अनेक आजाद पशु-पक्षियों का शिकार कर भक्षण कर डाला था। दो दिनों में गाँव के सारे लोग इनसे आजिज आ चुके थे।
उस उम्र में जितना समझ पाया था, उसका मतलब था- गुलगुलिया का दंगल यानी पूरी तरह से अराजक समाज, कोई किसी की न सुने, सब अपनी-अपनी कहें, चीखें-चिल्लायें, कोई किसी को मारे-पीटे, खासकर शक्तिशाली कमजोर के साथ जैसा चाहे व्यवहार करे। वर्षों तक इस समाज से कभी सामना नहीं हुआ, परंतु गुलगुलिया शब्द जरूर याद रहा। चौंका तब, जब इस महीने के प्रारंभ में गुलगुलिया समाज को मीडिया की सुर्खियों में देखा। झारखंड में बोकारो के पास गोमिया इलाके में गुलगुलिया धौड़ा में एक गुलगुलिया युवक ने नशे की हालत में बस्ती के दूसरे घर में एक महिला के साथ छेड़छाड़ की। महिला के शोर मचाने के बाद आरोपी युवक भाग गया। इस घटना को लेकर गुलगुलिया समाज की बैठक हुई। इसमें मुखिया ने आरोपी युवक की बहन के साथ दुष्कर्म करके बदला चुकाने का फैसला सुनाया। पंचायत के फैसले के बाद महिला लड़की को खींचकर पंचायत में लाई और उसे अपने पति के हवाले कर दिया। उसके पति ने लड़की को पास की झाड़ी में ले जाकर उसका बलात्कार किया। खून से लथपथ चीखती, कराहती लड़की अपने घर पहुंची।
झारखंड और बंगाल में आज भी खानाबदोश गुलगुलिया समाज सामाजिक, आर्थिक व वैचारिक विकास से कोसों दूर जीवन जीने को मजबूर है। गुलगुलिया परिवार के लोग भीख मांग व रिक्शा चलाकर जीविका उपार्जन करते हैं। इस समाज का एक भी बच्चा स्कूल की चौखट तक नहीं पहुँच पाया है और पूरी दुनिया से अलग-थलग हैं। अधिकांश लोगों के पास न तो बी पी एल कार्ड और न ही वोटर कार्ड है।
इसके अलावा ठीक इसी समय घटी दो घटनायें ऐसी हैं, जो यह सोचने को मजबूर करती हैं कि गुलगुलिया मानसिकता सिर्फ सुदूर झारखंड या बंगाल के पिछड़े समाज तक ही सीमित नहीं है बल्कि दिल्ली के तथाकथित सभ्य समाज या लखनऊ के सत्ता के शीर्ष तक को अपने आगोश में ले लिया है। पहली घटना उत्तरी दिल्ली के मल्कागंज की है। जहां 77 साल के एक बुजुर्ग ने 14 साल की नाबालिग नौकरानी के साथ 10 दिनों तक बलात्कार किया। बुजुर्ग मालिक नाबालिग नौकरानी को पहले जबरन अश्लील फिल्में दिखाता था और फिर उसके साथ दुष्कर्म किया करता था। लड़की को बुजुर्ग के चंगुल से पुलिस द्वारा तब छुड़ाया गया जब एक पड़ोसी ने घर के अंदर से आ रही उसकी चीखें सुनीं।
दूसरी लखनऊ के मोहनलालगंज इलाके के उस जघन्य कांड की बात, जहाँ महिला के साथ दुष्कर्म और नृशंस हत्या के बाद उसकी लाश को नग्नावस्था में सड़क के किनारे फेंक दिया गया। जिसे घंटों तक पुलिस उसी अवस्था में उसे उलट-पुलट करती रही और अनेक पत्रकार गण अपने कैमरे से उसके फोटो उतारते रहे। प्रदेश सत्ता के शीर्ष पर बैठे युवा मुख्यमंत्री के पिता और समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष श्री मुलायम सिंह यादव ने इस जघन्य घटना पर सफाई दी कि यहाँ की जनसंख्या के अनुपात में दुष्कर्म बहुत कम हैं। प्रदेश के संविधान प्रमुख राज्यपाल अजीज कुरैशी ने तो साफ-साफ कह दिया कि मैं और यहाँ की सरकार क्या भगवान भी ऐसे दुष्कर्म के कांडों को नहीं रोक सकते।
ऐसे अनेक हृदय विदारक दुष्कर्म कांड रोज मीडिया की सुर्खियां बन रहे हैं। उपरोक्त तीन घटनायें ऐसी हैं, जो अलग-अलग समाजों से हैं। पहली घटना झारखंड के गुलगुलिया समाज की, जो सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक रूप से अत्यंत पिछड़ा समाज है। जहाँ पंचायत और उसका मुखिया एक औरत के अपमान का बदला आरोपी की मासूम बहन से लेता है। खुलेआम आँख के बदले आँख की नीति के तहत। दूसरी घटना सभ्य समाज दिल्ली की है, जिसमें कोई बिगड़ैल किशोर या युवा नहीं बल्कि मध्यवर्गीय पढ़ा-लिखा मृत्यु के मुहाने पर बैठा 77 वर्षीय बुजुर्ग है जो लगातार दस दिनों तक कैद कर नाबालिग नौकरानी को अपनी हवश का शिकार बनाता रहा। इस बुजुर्ग व्यक्ति के कुकृत्य को किस श्रेणी में रखें? क्या यह बुजुर्ग भी उसी कमजोर की शिकार करने वाली अराजक गुलगुलिया मानसिकता से ग्रसित नहीं है?
अंत में उस बेशर्म, बेपरवाह उत्तर प्रदेश की लोकतांत्रिक सरकार के बारे में क्या कहा जाए, जिसे जनता ने अपने सुशासन और कल्याण के लिए चुना? जो राज्यपाल शासन व्यवस्था संवैधानिक एवं न्यायपूर्ण ढंग से चले, उसी के लिए पदासिन हो, वही अगर अपनी जिम्मेदारियों को भगवान पर टाल दे तो उस शासन व्यवस्था को बर्बर और अराजक गुलगुलिया व्यवस्था नहीं कहें तो क्या कहें?
गुलगुलिया मानसिकता आज देश, समाज और सत्ता के हर हिस्से में व्याप्त हो गयी है। आज एक ऐसे समवेत प्रयास की आवश्यकता है ताकि गुलामी की इस गुलगुलिया मानसिकता से मुक्ति मिल सके, तभी हमारी लोकतंत्र और स्वतंत्रता सर्वहितकारी व शाश्वत बनी रहेगी।   

1 comment:

डॉ. मोनिका शर्मा said...

आज के दौर में ये वीभत्स घटनाएँ , विकास और स्वाधीनता के सारे वादों को झुठलाती सी लगती हैं , दुखद हैं ....