Friday, September 5, 2014



प्रधानमंत्री की टीम इंडियामें पंचायत प्रमुख भी शामिल हों
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी लगातार इस बात पर जोर दे रहे हैं कि केन्द्र और राज्य सरकार, यानी प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों की एक टीम एक साथ विकास का कार्य करेगी, तभी पूरे देश का संघीय ढाँचे के अनुरूप एक समान विकास संभव होगा। इसके लिए उन्होंने योजना आयोग तक को पूरी तरह से बदलने का फैसला कर लिया जिसे देश के संघीय ढाँचे के लिए रोड़ा माना जाता रहा है। प्रधानमंत्री ने लालकिले से सभी गाँवों को इंटरनेट से जोड़ने का वादा किया एवं सभी सांसदों से अपने-अपने क्षेत्रों में हर साल एक-एक गाँव गोद लेकर उन्हें आदर्श गाँव के रूप में विकसित करने का आह्वान किया।  
प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों की टीम अगर एक होकर विकास कार्यों को अंजाम दे तो पूरे देश में विकास को एक नई दिशा मिलेगी, जो कि कई बार दलीय, क्षेत्रीय एवं अहं के टकरावों के कारण विकास के मार्ग में बाधक बनती है। परंतु क्या सिर्फ केन्द्र और राज्य सरकारों के प्रयास से ही पूरे देश का सर्वांगीण विकास संभव है? पंचायती राज लागू होने के बाद भी क्या बिना गाँवों और ग्राम पंचायतों के प्रतिनिधियों का साथ लिए पूरे देश का विकास संभव है? क्षेत्र के सांसदों द्वारा प्रत्येक वर्ष एक ग्राम को गोद लेने भर से क्या लाखों गाँवों का विकास संभव है?
गाँधी जी स्वराज की धुरी गाँव को मानते थे। इसके लिए वे जीवनपर्यन्त संघर्ष करते रहे। उनका सपना था कि ‘‘प्रत्येक गाँव एक ऐसा परिपूर्ण गणराज्य होना चाहिए जो अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अपने पड़ोसियों पर आश्रित न हो।’’ अर्थात प्रत्येक गाँव हर मामले में आत्मनिर्भर हो। अगर देश का प्रत्येक गाँव और शहर आत्मनिर्भर हो जाए तो देश के सामने अधिकांश मुँहबाए खड़ी समस्याएँ जैसे भूख, बेरोजगारी, महँगाई, भ्रष्टाचार, अलगाववाद का समाधान न हो जाए?
अब तक विकास का केन्द्रबिन्दु गाँधी जी के विचारों के विरुद्ध देश की राजधानी दिल्ली तथा राज्यों की राजधानियाँ रहीं, उस समय के सत्तारूढ़ कर्ताधर्ता गाँधी जी के विचारों को दकियानुसी मानते थे। रूढ़िग्रस्त, जातिवादी, सामंतवादी भारतीय ग्रामीण समाज को देखते हुए इसमें कुछ सच्चाई भी थी। परंतु स्वतंत्रता के सड़सठ सालों के बाद तथा क्रमिक संवैधानिक सुधारों, केन्द्रीकरण के अनेक विरोधाभासों तथा इसके कारण पैदा हुई अनेक समस्याओं के कारण आज आसानी से महसूस किया जा रहा है कि पंचायतों और ग्रामीण विकास के माध्यम से ही भारतीय गणराज्य को मजबूत बनाया जा सकता है।
संविधान के 73वें संशोधन से ग्रामीण भारत में सत्‍ता के समीकरण में बदलाव आया है। समाज के गरीब वर्ग के लोगों का सशक्तीकरण हुआ। देश के 600 जिला पंचायतों, 6000 मंडल पंचायतों और दो लाख तीस हजार ग्राम पंचायतों के जरिए 28 लाख प्रतिनिधि हमारे लोकतंत्र का हिस्सा बन गए हैं। कुछ शुरुआती दिक्कतों के बाद समाज के सभी वर्गों ने हर स्तर पर दलितों, आदिवासियों, पिछड़ों एवं महिलाओं के लिए पचास प्रतिशत आरक्षण तक स्वीकार कर लिया है। परंतु अब सिर्फ इसके चुने जाने भर के गुणगान करने से काम नहीं चलने वाला है। लोगों में अब विकास की जबर्दस्त भूख जगी है। अब वे सभी छोटे-मोटे कार्यों के लिए दिल्ली और अपनी राजधानियों की ओर रुख करने को तैयार नहीं हैं। इसके लिए ग्राम पंचायतों को ही प्राथमिक विकास केन्द्र और सेवा एवं संसाधन केन्द्र बनाना होगा।
विकास केन्द्र के रूप में पंचायत भवन के अंतर्गत ही खाद्यान्न भंडार-गृह, प्राथमिक शिक्षा एवं स्वास्थ्य केन्द्र, इत्यादि हों। यही कृषि व्यवस्था जिसके अंतर्गत सिचाई, जैविक खाद, बीज इत्यादि की व्यवस्था करेगी तथा अनाजों की उचित भंडारण की भी व्यवस्था करेगी, ताकि गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों को भूख से बचाने के लिए केन्द्र सरकार की ओर न देखना पड़े। खाद्यान्नों की उचित विपणन एवं वितरण की व्यवस्था भी खुद करेगी और अपने लोगों को महंगाई के मार से भी बचायेगी।  सबों के लिए प्राथमिक शिक्षा एवं प्राथमिक स्वास्थ्य की व्यवस्था यहीं सुनिश्चित होगी। आम लोगों की सभी कल्याणकारी योजनाएँ यहीं उन क्षेत्रों के अनुरूप विशेषज्ञों की सलाह से बने और उनका क्रियान्वयन हो, अगर कुछ विशेष योजनाएँ केन्द्र सरकार की या राज्य सरकारों की हो तो वह भी ग्राम पंचायतों के माध्यम से ही लागू हों। इसके अलावा सड़क, नाला, उर्जा, ग्रामीण उधोग धंधे, वनीकरण, पर्यावरण इत्यादि सबके विकास एवं संरक्षण की व्यवस्था खुद करें। 
सेवा एवं संसाधन केन्द्र या डाटा सेन्टर कार्यालय भी पंचायत भवन के अंतर्गत ही हो। इसका काम पंचायत के अंदर आने वाले हर आदमी एवं उसके पूरे परिवार का ब्योरा होगा, जिसमें शिक्षा, रोजगार के साधन, उसके आय-व्यय तथा पंचायतों के अंदर भूमि, वन, जलसंसाधन खेत, पशुओं इत्यादि से संबंधित सारे आंकड़े होंगे जो इंटरनेट के माध्यम से ब्लाक, जिले, राज्य की राजधानियों तथा अंत में केन्द्र दिल्ली के शोध एवं विकासमीनारों से जुड़े होंगे। पंचायत के इस कार्यालय में पंचायत के अंतर्गत आने वाले संसाधनों का रोज नवीनीकरण किया जाएगा, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति को जन्म-मरण, शादी ब्याह, जाति तथा आय के óोतों इत्यादि का पंजीकरण तथा  प्रमाणपत्र भी यहीं से प्राप्त होगा।
इस कार्यालय के माध्यम से जहाँ लोगों को छोटे-छोटे कार्यों के लिए जिलों के कार्यालयों से मुक्ति मिलेगी, वहीं पंचायतों को अपनी विकास योजनाएँ बनाने में आसानी होगी। चूंकि ये आँकड़े ब्रॉडबेंड इंटरनेट से जिलों, राज्यों की राजधानियों एवं केन्द्र से जुड़े होंगे, जिनसे असीमित आँकड़े राज्यों एवं केन्द्र सरकार को बैठे-बिठाए मिल जाएँगे जिस पर वे प्रत्येक वर्ष अरबों रुपये शोध के लिए खर्च करते रहे हैं। इससे उन्हें प्रत्येक दस वर्ष में अरबों रुपये खर्च कर जनगणना, पशुगणना से मुक्ति मिलेगी तथा कृषि, वन, एवं अनेक ग्रामीण संसाधनों से संबंधित अनेक प्रकार के नित नये आँकड़े उपलब्ध होते रहेंगे।

प्रधानमंत्री ने यह स्वागत योग्य कदम उठाया है कि योजना आयोग से मुक्ति पा ली है। परंतु सांसदों को प्रत्येक वर्ष सिर्फ एक गाँव को गोद लेने भर से लोगों की विकास की भूख नहीं मिटनेवाली। आजादी के इतने दिनों के बाद आज भी गाँवों को गोद लेने की नहीं, बल्कि पंचायतों उसे सहारा देकर अपने पाँवों से चलने लायक बनाने की है आज की आवश्यकता सिर्फ प्रधानमंत्री एवं मुख्यमंत्री की टीम की नहीं बल्कि उसमें पंचायत के प्रधानों को भी शामिल कर एक मजबूत टीम बनाने की है, जो परस्पर संवाद और संचार के माध्यम से विकास की राह में आने वाली हर बाधा का समाधान निकाले। यही असली टीम इंडियाहोगी, जिससे पूरे देश का सर्वांगीण विकास संभव होगा।  

Tuesday, August 5, 2014

गुलगुलिया समाज

गुलगुलियाशब्द अकसर माँ-बाबूजी या किसी बड़े-बुजुर्ग से सुनने को तभी मिलता जब हमउम्र सभी भाई-बहन एक साथ इकट्ठे खेलते, खूब शोर करते हुए उधम मचाते। तो वहाँ मौजूद सभी बड़े बोल पड़ते, पता नहीं कहाँ से यह गुलगुलिया का दंगल जमा हो गया...अनस कर रखा है। या फिर जब पड़ोसी के घर से जिस दिन गरीबी और अभाव के मारे चूल्हे का धुआँ नहीं उठता और मार-पीट एवं गाली-गलौज पूरे गाँव में गूंजती। जिसे सुनकर हमेशा सभी कहते कि यह गुलगुलिया का घर कभी शांति से नहीं रह सकता। परंतु प्रत्यक्ष गुलगुलिया समाज से सामना तो तब हुआ जब एक दिन हम सभी बच्चे पड़ोस गाँव के अपने स्कूल से छुट्टी के बाद लौट रहे थे। अपने गाँव के पिछवाड़े पीपल की छाया के नीचे काफी लोगों का जमावड़ा लगा था। जिसमें औरत, मर्द, किशोर बच्चे सभी थे। सभी दीन-हीन कंगले, फटे, मैले-कुचैले कपड़ों में अजीब भाषा में काँव-काँव कर रहे थे, एक दूसरे पर चीख-चिल्ला रहे थे। बच्चों को तो पीट भी रहे थे। खुले में ईंट-मिट्टी का बना चूल्हा जल रहा था, उसमें भात पक रहा था। फिर अंदर गाँव में अजब नजारा था, सभी के घरों के आगे उनके दो-तीन बच्चे और औरतें कटोरा लेकर खाने को कुछ माँग रहे हैं। घर आने पर देखा कि घर के पिछवाड़े आठ-दस लोग भाले, तीर-धनुष आदि लेकर तेजी से भाग रहे हैं और पलक झपकते ही दो-तीन बिल्ली एवं बिलारों का शिकार कर लिया। तुरंत आग के हवाले कर उसे सबने मिल कर नोच-नोचकर खाना शुरू कर दिया। मन इनके प्रति घृणा से भर गया। ये मुश्किल से गाँव में दो-तीन दिन रहें होंगे, परंतु इतने कम समय में ही इन्होंने अपने और आस-पास के गाँव के सभी बिल्ली, नदी-तालाब के मछलियों एवं अनेक आजाद पशु-पक्षियों का शिकार कर भक्षण कर डाला था। दो दिनों में गाँव के सारे लोग इनसे आजिज आ चुके थे।
उस उम्र में जितना समझ पाया था, उसका मतलब था- गुलगुलिया का दंगल यानी पूरी तरह से अराजक समाज, कोई किसी की न सुने, सब अपनी-अपनी कहें, चीखें-चिल्लायें, कोई किसी को मारे-पीटे, खासकर शक्तिशाली कमजोर के साथ जैसा चाहे व्यवहार करे। वर्षों तक इस समाज से कभी सामना नहीं हुआ, परंतु गुलगुलिया शब्द जरूर याद रहा। चौंका तब, जब इस महीने के प्रारंभ में गुलगुलिया समाज को मीडिया की सुर्खियों में देखा। झारखंड में बोकारो के पास गोमिया इलाके में गुलगुलिया धौड़ा में एक गुलगुलिया युवक ने नशे की हालत में बस्ती के दूसरे घर में एक महिला के साथ छेड़छाड़ की। महिला के शोर मचाने के बाद आरोपी युवक भाग गया। इस घटना को लेकर गुलगुलिया समाज की बैठक हुई। इसमें मुखिया ने आरोपी युवक की बहन के साथ दुष्कर्म करके बदला चुकाने का फैसला सुनाया। पंचायत के फैसले के बाद महिला लड़की को खींचकर पंचायत में लाई और उसे अपने पति के हवाले कर दिया। उसके पति ने लड़की को पास की झाड़ी में ले जाकर उसका बलात्कार किया। खून से लथपथ चीखती, कराहती लड़की अपने घर पहुंची।
झारखंड और बंगाल में आज भी खानाबदोश गुलगुलिया समाज सामाजिक, आर्थिक व वैचारिक विकास से कोसों दूर जीवन जीने को मजबूर है। गुलगुलिया परिवार के लोग भीख मांग व रिक्शा चलाकर जीविका उपार्जन करते हैं। इस समाज का एक भी बच्चा स्कूल की चौखट तक नहीं पहुँच पाया है और पूरी दुनिया से अलग-थलग हैं। अधिकांश लोगों के पास न तो बी पी एल कार्ड और न ही वोटर कार्ड है।
इसके अलावा ठीक इसी समय घटी दो घटनायें ऐसी हैं, जो यह सोचने को मजबूर करती हैं कि गुलगुलिया मानसिकता सिर्फ सुदूर झारखंड या बंगाल के पिछड़े समाज तक ही सीमित नहीं है बल्कि दिल्ली के तथाकथित सभ्य समाज या लखनऊ के सत्ता के शीर्ष तक को अपने आगोश में ले लिया है। पहली घटना उत्तरी दिल्ली के मल्कागंज की है। जहां 77 साल के एक बुजुर्ग ने 14 साल की नाबालिग नौकरानी के साथ 10 दिनों तक बलात्कार किया। बुजुर्ग मालिक नाबालिग नौकरानी को पहले जबरन अश्लील फिल्में दिखाता था और फिर उसके साथ दुष्कर्म किया करता था। लड़की को बुजुर्ग के चंगुल से पुलिस द्वारा तब छुड़ाया गया जब एक पड़ोसी ने घर के अंदर से आ रही उसकी चीखें सुनीं।
दूसरी लखनऊ के मोहनलालगंज इलाके के उस जघन्य कांड की बात, जहाँ महिला के साथ दुष्कर्म और नृशंस हत्या के बाद उसकी लाश को नग्नावस्था में सड़क के किनारे फेंक दिया गया। जिसे घंटों तक पुलिस उसी अवस्था में उसे उलट-पुलट करती रही और अनेक पत्रकार गण अपने कैमरे से उसके फोटो उतारते रहे। प्रदेश सत्ता के शीर्ष पर बैठे युवा मुख्यमंत्री के पिता और समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष श्री मुलायम सिंह यादव ने इस जघन्य घटना पर सफाई दी कि यहाँ की जनसंख्या के अनुपात में दुष्कर्म बहुत कम हैं। प्रदेश के संविधान प्रमुख राज्यपाल अजीज कुरैशी ने तो साफ-साफ कह दिया कि मैं और यहाँ की सरकार क्या भगवान भी ऐसे दुष्कर्म के कांडों को नहीं रोक सकते।
ऐसे अनेक हृदय विदारक दुष्कर्म कांड रोज मीडिया की सुर्खियां बन रहे हैं। उपरोक्त तीन घटनायें ऐसी हैं, जो अलग-अलग समाजों से हैं। पहली घटना झारखंड के गुलगुलिया समाज की, जो सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक रूप से अत्यंत पिछड़ा समाज है। जहाँ पंचायत और उसका मुखिया एक औरत के अपमान का बदला आरोपी की मासूम बहन से लेता है। खुलेआम आँख के बदले आँख की नीति के तहत। दूसरी घटना सभ्य समाज दिल्ली की है, जिसमें कोई बिगड़ैल किशोर या युवा नहीं बल्कि मध्यवर्गीय पढ़ा-लिखा मृत्यु के मुहाने पर बैठा 77 वर्षीय बुजुर्ग है जो लगातार दस दिनों तक कैद कर नाबालिग नौकरानी को अपनी हवश का शिकार बनाता रहा। इस बुजुर्ग व्यक्ति के कुकृत्य को किस श्रेणी में रखें? क्या यह बुजुर्ग भी उसी कमजोर की शिकार करने वाली अराजक गुलगुलिया मानसिकता से ग्रसित नहीं है?
अंत में उस बेशर्म, बेपरवाह उत्तर प्रदेश की लोकतांत्रिक सरकार के बारे में क्या कहा जाए, जिसे जनता ने अपने सुशासन और कल्याण के लिए चुना? जो राज्यपाल शासन व्यवस्था संवैधानिक एवं न्यायपूर्ण ढंग से चले, उसी के लिए पदासिन हो, वही अगर अपनी जिम्मेदारियों को भगवान पर टाल दे तो उस शासन व्यवस्था को बर्बर और अराजक गुलगुलिया व्यवस्था नहीं कहें तो क्या कहें?
गुलगुलिया मानसिकता आज देश, समाज और सत्ता के हर हिस्से में व्याप्त हो गयी है। आज एक ऐसे समवेत प्रयास की आवश्यकता है ताकि गुलामी की इस गुलगुलिया मानसिकता से मुक्ति मिल सके, तभी हमारी लोकतंत्र और स्वतंत्रता सर्वहितकारी व शाश्वत बनी रहेगी।   

Friday, July 4, 2014


रहस्यमयी बीमारी के टीके!
बिहार के मुजफ्फरपुर में रहस्यमय बुखार ने कहर मचा रखा है। ये जानलेवा बुखार एक महीने में करीब डेढ़ सौ मासूमों की जान ले चुका है। सैंकड़ों बच्चे अस्पताल में ज़िंदगी की जंग लड़ रहे हैं। डॉक्टरों का कहना है कि इस बुखार के लक्षण काफी हद तक इंसेफेलाइटिस यानी दिमागी बुखार से मिलते जुलते हैं। मानसून जहाँ देश के लोगों के लिए खुशहाली लेकर आता है, वहीं देश के कई हस्सों खासकर बिहार के मुजप्फरपुर, वैशाली तथा इसके आस-पास के जिलों तथा उत्तर प्रदेश के गोरखपुर, देवरिया, कुशीनगर जैसे इलाकों में जापानी इंसेफेलाइटिस के रूप में यह यह पिछले दो दशकों से अधिक समय से दहशत का प्रतीक बन कर आता रहा है जिसमें हर वर्ष हज़ारों बच्चे मौत के ग्रास बन जाते हैं।  
इन्सेफ्लाइटिस या जापानी बुखार के फैलने के कई कारण हैं। इसके लिए जिम्मेदार मच्छर आमतौर पर लंबे समय से जमा गंदे पानी में पैदा होते हैं। इसी तरह सूअर की लार से पैदा होने वाला बैक्टीरिया जब पेयजल में पहुंच जाता है या उस पानी के संपर्क में कोई व्यक्ति आता है तो उसका संक्रमण होना प्रारंभ हो जाता है। ग्रामीण तथा शहरों की झुग्गी बस्तियों में साफ पेयजल न होने, गंदे नालों-तालाबों में मछली पकड़ने, पशुओं को नहलाने आदि के चलते लगातार संपर्क में आते रहने की वजह से लोगों में इस रोग के संक्रमण का खतरा बना रहता है।
यह शुभ संकेत है कि केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री को जैसे ही इसकी सूचना मिली और वे तुरंत हरकत में आ गये और मुजप्फरपुर जाकर सभी प्रभावित जिलों के लिए तत्काल ही टीकाकरण के विशेष अभियान को प्रारंभ किया। इस अवसर पर उन्होंने इसमें स्वयंसेवी संस्थाओं, इंडियन मेडिकल एसोसिएशन, धार्मिक संगठनों और यहाँ तक कि स्कूली बच्चों को भी शामिल करने का आह्वान किया ताकि सभी बच्चों को टीका लगाना सुनिश्चित किया जा सके। उन्होंने मुजफ्फरपुर में अलग से वायरोलॉजी लैब लगाने की जरूरत को भी माना।
टीकाकरण अभियान के प्रति कई विशेषज्ञ डॉक्टरों ने इसकी सफलता को लेकर आशंका व्यक्त की है क्योंकि इन्सेफ्लाइटिस, जापानी बुखार और डेंगू के इलाज के लिए अब तक कोई अचूक दवा नहीं खोजी जा सकी है। फिर डॉक्टरों के लिए पहचान करना मुश्किल होता है कि किस प्रकार के बैक्टीरिया के प्रकोप से इन्सेफ्लाइटिस फैल रहा है। यहाँ तक कि कई बार बीमारी के लक्षण एक होने के बावजूद अलग-अलग रोगी में अलग-अलग बैक्टीरिया पाए जा सकते हैं। इसी कारण शायद इसे रहस्यमयी या अज्ञात बीमारी माना जाता है।
इस बुखार को हम रहस्यमयी, अज्ञात या जापानी कुछ भी नाम दें लें, एक तथ्य जो इस बीमारी के बारे उभर कर आता है वह यह है कि इस बीमारी का सबसे बड़ा शिकार समाज के अति निम्न और अतिदलित समुदाय के लोग हैं जो गंदे नालों और नारकीय अवस्था में झुग्गी-झोपडियों में रहने को अभिशप्त हैं। इनके अधिकांश मासूम बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। इनके इलाज की कौन पूछे, पेट भर भोजन भी मुश्किल से मिल पाता है। इसलिए सिर्फ टीकाकरण से इनको कितना फायदा पहुँचेगा कहना मुश्किल है क्योंकि इन्हें जीवन बसर तो इन नारकीय परिस्थितियों में ही करना है। हाँ टीकाकरण, समुचित साफ-सफाई और  खून, बलगम आदि की जांच के लिए उन्नत प्रयोगशालाओं की व्यवस्था कर इन रोगों की रोकथाम तो की ही जा सकती है।
इस बीमारी को जितनी रहस्यमयी समझा जाता है उतनी है नहीं, बल्कि इसके सर्वाधिक शिकार होने वाले आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर अतिदलित डोम, मुसहर जैसी जातियों का पूरा जीवन ही रहस्यमयी है। कोई भी स्वस्थ्य मानसिकता वाला व्यक्ति क्या यह कल्पना कर सकता है कि इस समुदाय के बच्चे और सुअरों के छौने एकसाथ गंदे नालों में समाई झुग्गियों में अभी भी रेंगने को मजबूर हैं। न खेती के लिए कोई जमीन, न रहने को मकान की कोई व्यवस्था, शिक्षा और स्वास्थ्य की व्यवस्था की कौन पूछे? पहले खेतों में मुस (मुस से मुसहर बना है) यानी चूहे के मांस तथा चूहे द्वारा चुराये अनाज से जीवन निवर्हन होता था अब दैनिक दिहाड़ी तथा सुअर पालन आदि से किसी तरह जीवन-बसर हो जाए यही बहुत है। कुल मिलाकर पूरा जीवन महाकवि निरालाके शब्दों में ‘‘जीवन ही दुःख की कथा रही, क्या कहूँ आज जो नहीं कही’’ वाली स्थिति है। इसलिए सर्वप्रथम इनके नारकीय विषम जीवन जीने के रहस्यों से परदा उठाना आवश्यक है कि कैसे ये इंसान के रूप में इनका अस्तित्व आज भी कैसे बचा है? क्योंकि इनके दुःखद त्रासद कुपोषित जीवन के रहस्यों में ही इस बीमारी का बीज है। इनके दुःखद जीवन की परिस्थितियों में अगर सुधार हो जाए तो यह जापानी बुखार भी अपने आप बंगाल की खाड़ी में समुद्र में समाकर कहीं और आसियां तलाश लेगा।
केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन द्वारा प्रारंभ किए गए अभियान के कारण ही देश को पोलियो जैसी महामारी से मुक्ति मिली है। परंतु इंसेफेलाइटिस या दिमागी बुखार के बारे में जो तथ्य उभर कर आए हैं वे यह है कि पोलियो के टीके की तरह इस बीमारी के टीके से उसके उन्मूलन की कोई गारंटी नहीं है क्योंकि कई बार बीमारी के लक्षण एक होने के बावजूद अलग-अलग रोगी में अलग-अलग बैक्टीरिया पाए जा सकते हैं। ऐसे में एक ही दवाई हर क्षेत्र और सभी बच्चों पर कारगर होने पर संदेह है। परंतु सबसे अच्छी बात यह है कि स्वास्थ्य मंत्री एक डॉक्टर के साथ-साथ एक सफल राजनेता भी हैं, जिन्हें यह अवश्य पता होगा कि इस बीमारी के इलाज के लिए एक ऐसे टीके की आविष्कार की आवश्यकता है जिससे यह समुदाय विकास के मुख्यधारा में शामिल हो सके तथा इनके सामाजिक और आर्थिक स्थिति में सुधार आए। ये स्वस्थ और स्वच्छ वातावरण में रह सकें और इनके बच्चे कुपोषण से मुक्त हो सकें। इसके बाद भी अगर कोई इस बीमारी के शिकार हों तो उन्हें तत्काल समुचित इलाज भी त्वरित गति से मिल जाए उसकी भी सारी व्यवस्था उपलब्ध हो।
आशा है ऐसा टीका बनाने में बिहार के नये मुख्यमंत्री, जो सौभाग्य से अतिदलित मुसहर समुदाय से ही हैं तथा उत्तर प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री डॉ. हर्षवर्धन का पूरा साथ देंगे ताकि इस रहस्यमय बीमारी का जड़मूल से उन्मूलन हो सके। इसी बरसाती मौसम में ऐसे टीके का सभी को इंतजार है ताकि बरसात सभी लोगों के लिए एकसाथ मनोहारी और मंगलकारी बन कर आए किसी के जिगर के टुकड़े को लीलने नहीं!   

Wednesday, July 2, 2014

मुक्तिदायिनी को मुक्त करो

हाँ मैंने, तुम्हारी गंगा मैया ने तुम्हें बुलाया है। तुम्हारे सेवा, भक्ति और साहस के बारे में मुझे मेरी प्यारी बहन साबरमती ने बताया था। सबको मुक्ति देने वाली मुक्तिदायिनी गंगा आज खुद अपनी मुक्ति के लिए तड़प रही है। इसलिए मैंने तुम्हें अपना उद्धार करने लायक सत्ता की शक्ति दी है। इतनी शक्ति की तुम पूरे देश की सभी बीमार माँओं एवं उसके भूखे, बीमार बच्चों की दशा सुधार सको। मोदी इस अपार शक्ति को पाकर अभिभूत हो, श्रद्धा व करूणा से गंगा मैया के चरणों में आकर सिर झूकाकर ध्यान में लीन थे।
गंगा मैया ने कहा, मेरे लाल, खुशी के अवसर पर गमगीन, किंकर्त्तव्यूविमूढ़ होकर क्यों बैठ गया है\  तुम भी कहीं यही योजना तो नहीं बना रहे हो कि घाटों पर गंगा स्वच्छता अभियान चलाएगा, पानी शुद्ध करने के लिए विदेशों से बड़े-बड़े इंजीनियर व बड़ी-बड़ी मशिनें मँगवाओगे और मैं कुछ दिनों में शुद्ध हो जाऊँगी, हुंह, अगर यह सच है तो तुम भी उन्हीं नेताओं और योजना आयोग में बैठे विश्व बैंक के योजनाकारों जैसे ही निकलोगे जो वर्षों से सबकुछ तुरत-फुरत करके इन कार्यों के बहाने देश को अरबों रुपए के कर्ज में डालकर अपने करोड़ों के वारे-न्यारे करते आ रहे हैं।
मुझे पूरा विश्वास है कि तुम ऐसा नहीं सोच रहे हो। पर मेरे उद्धार के लिए तुम्हें भगीरथ से भी ज्यादा शक्तिशाली, धैर्यवान व दृढ़प्रतिज्ञ होना पड़ेगा। वह अपने अतीत में डूबते हुए कहने लगी- जानते हो, जब भगीरथ ने अपने पूर्वजों की मुक्ति के लिए सदियों तक घनघोर तपस्या की और उसके अदम्य दृढ़ भक्ति और शक्ति के आगे नतमस्तक हो देवताओं ने मुझे मेरी इच्छा के विरुद्ध धरती पर आने को विवश कर दिया। मैं भी गुस्से में सोचकर चली कि मेरी ऊर्जा शक्ति और गति को धरतीलोक क्या सँभाल पायेगा... मैं सीधे पाताललोक में समा जाऊँगी। परंतु नीलकंठ शिव ने मेरी सारी योजनाओं को विफल कर दिया। मेरे सारे गुस्से का शमन कर दिया।
मैंने भगीरथ के पुरखों को मुक्ति दी और फिर स्वर्गलोक को लौटने का उपाय सोच ही रही थी, तभी देखा कि मैं जहाँ-जहाँ से गुजरी हूँ, वहाँ के पर्वत-पहाड़, मैदानों में असीम हरियाली छा गई है। एक नई मानव सभ्यता पलने लगी है। पूरी प्रकृति विविध जीव-जंतुओं से गुलजार हो गई है। यहाँ के सभी वासी खुशी से मुझे मैया-मैया कहके बुलाने लगे हैं। मैं एक गुस्सैल ऊर्जा शक्ति जब-जब यह मैया शब्द सुनती, प्रेम और करुणा की भावनाओं में बह जाती। और इन मानवी भावनाओं के आगे विवश होकर मैं यहीं की होकर रह गई। सदियाँ बीतती गईं। शहर, गाँव, मैदान, पहाड़ हर जगह से कल-कल, छल-छल निरंतर बहती रही। हमारे तटों पर भरपूर अनाज पैदा होता, लोग खुशहाली में खूब उत्सव मनाते। कोई भी उत्सव मेरे बिना अधूरा होता। सभी बूढ़े-बुजुर्ग, महिलाएँ, किशोरियाँ, बच्चे गाते-झूमते हुए आते और मैया-मैया कहकर अपने घर और समाज की सभी छोटी-बड़ी बातों को बताते। मैं इनकी श्रद्धा पर निहाल हो जाती, मुझे लगता कि मैं हर परिवार का अभिन्न हिस्सा हूँ, स्वर्गलोक यही है।
खुशी-खुशी समय बितता रहा। होश तो मुझे तब आया जब अचानक हर जगह रक्तरंजित लाशें अपने तटों और धाराओं में नजर आने लगी। मुझे लाशों से कभी घृणा नहीं रही बल्कि मैं तो उसी की मुक्ति के लिए धरती पर आई थी, परंतु अकारण इतनी मार-काट, यहाँ तक कि आदमी तो आदमी, मेरे किनारे निरीह जानवरों के कत्लगाह ही बन गए और उनके सारे लहू, मांस, गंदगी सब मुझमें प्रवाहित किया जाने लगा। ऐसा समय आ गया जब मुझसे जीवन का आशीर्वाद मांगने वाला व्यक्ति मुझमें डूबकर आत्महत्या करने लग गया, इनमें महिलाएँ ज्यादा होतीं। सीवर और नालों में बहते बजबजाती गंदगी में मुझे अकसर कन्या भ्रूण मिलती, जो यह विलाप करती होती कि मैया मैंने किसी का क्या बिगाड़ा कि मुझे जन्म से पहले ही मृत्यु के हवाले कर दिया... इतना ही नहीं, किनारे के शहरों से छोटी-छोटी नदियों की जगह बड़े-बड़े नालों से गंदा पानी मुझमें आकर मिलने लगा, हद हो गई, जंगल खत्म होती गई, पहाड़ नंगे होते गए, अनेक प्रकार के जीव-जंतु गायब होने लगे। अंत में बिजली और विकास के नाम पर जगह-जगह मुझे ही बाँध दिया। और इस सदानीरा को बंदी बना लिया। अब लोगों के चेहरे से खुशी नदारद थी। हर जगह भूख, बीमारी, अशिक्षा, और मार-काट, हिंसा का रोना, दिन-रात सुनते-सुनते मैं थक-हार गई। मुझे अब उस फैसले पर पछतावा होने लगा जब मैंने इनके असीम प्यार में फँसकर यहीं बहने का फैसला किया था।
तू यही सोच रहा है ना, क्या करना है... कैसे करना है... बेटा अबतक की सारी बातों से तुम समझ ही गए होगे कि मैं भारतीय संस्कृति और समाज की जननी हूँ। मैं बीमार इसलिए होती गई कि समाज और संस्कृति बीमार होती गई है। सिर्फ मेरे लिए स्वच्छता अभियान चलाने से मैं स्वस्थ और स्वच्छ नहीं होने वाली। इसके लिए पूरे जनमानस को स्वच्छ करना पड़ेगा, ऐसी व्यवस्था कायम करनी पड़ेगी कि समाज के हर तबके को समान शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा, मिले। समाज के हर व्यक्ति को भूख से निजात मिले, सारे प्राकृतिक संसाधनों का अनावश्यक दोहन बंद हो। खासकर पहाड़ों, जंगलों एवं नदियों का अतिक्रमण बंद हो। ऐसा विकास किस काम का जिससे लोगों की भूख मिटने की जगह बढ़ती ही जाए और बढते-बढ़ते इतना बढ़ जाए कि नदी, धरती, आकाश-पाताल सबकुछ निगलने तक बात जा पहुँचे।
मुझे स्वच्छ करने से पहले पूरे समाज के स्वास्थ्य को ठीक करने का प्रयास करो क्योंकि जब लोग शिक्षित, संस्कारित और खुशहाल होंगे, मुझे निर्बाध बहने देंगे तो मैं तो ऐसे ही स्वस्थ, स्वच्छ, अविरल और निर्मल हो जाऊँगी। इससे पहले की स्थिति हाथ से निकल जाए कुछ करो बेटा! तुम्हें पता होगा इतिहास की ऐसी ही किसी भयंकर त्रासदी की मारी मेरी सहोदर बहन सरस्वती धरती में समा चुकी है। सरस्वती जब पाताललोक से समायी थी तो वह अकेले नहीं समायी थी उसके साथ बसी-बसायी पूरी एक जीवंत सभ्यता भी समा गई थी!

अभी भी संशय से मुझे निहार रहा है मेरे भगीरथ! एक समय मैनें तुम्हारे पुरखों का उद्धार किया था आज तुम्हें मेरा उद्धार करना है। मैं सब समझ रही हूँ, तुममें बहुत शक्ति है तुमने तो मुझसे सिर्फ 300 कमल मांगे थे, मैंने तो इसके अतिरिक्त भी अनेक सुगंधित फूलों से तेरा दामन भर दिया, तुम्हें और कितनी शक्ति चाहिए... नरेन्द्र मोदी ने पुनः माँ का स्पर्श किया और संकल्प भाव से दिल्ली का रूख किया!   

Tuesday, April 1, 2014



क्या तुम्हारे घर में भी कोई मरा!

गौतम बुद्ध ईसा से लगभग 500 साल पहले हुए थे। जातक कथा की एक कहानी में अपने मृत शिशु के शोक में बेचैन गौतमी को भगवान बुद्ध कहते हैं, ‘‘जिस घर में कोई नहीं मरा हो, उस घर से सरसों के दाने माँग ला। फिर मैं तुझे दवा दूँगा, जिससे तेरा पुत्र पुनः जीवित हो जाएगा।’’ सदियों बाद 2014 में बुद्ध के ही कर्मभूमि में इसी से मिलता-जुलता एक वाक्य इन दिनों समाचारों में छाया हुआ है, ‘‘क्या तुम्हारे घर में भी कोई मरा!’’ यह कथन भगवान बुद्ध का नहीं बल्कि आज के लोकतांत्रिक लोककल्याणकारी गणराज्य भारत की सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश  के मुख्यमंत्री के पिता एवं समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव का है, जोकि खुद  सवा अरब के इस देश के प्रधानमंत्री पद का भी दावेदारी कर रहे हैं। मुलायम सिंह जी ने यह वाक्य तब कहा, जब एक पत्रकार ने डॉक्टरों की हड़ताल के चलते गंभीर हालत वाले मरीजों के मौत की बाबत उनसे सवाल पूछा था।
कानपुर के गणेश शंकर विद्यार्थी मेडिकल कॉलेज के छात्रों के साथ सपा विधायक इरफान सोलंकी व उनके गनर के द्वारा गत 28 फरवरी को मार-पीट के बाद उत्तर प्रदेश के सभी मेडिकल कॉलेजों में हड़ताल हो गई। बाद में यह हड़ताल प्रदेश के बाहर भी फैलने लगी। सात दिनों की हड़ताल में इलाज के अभाव में 40 मरीजों के मरने का अंदेशा है। उल्लेखनीय है कि पूरे प्रदेष में मरीजों के हालात बिगड़ते जाने के बाद हाई कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए उत्तर प्रदेश सरकार पर डॉक्टरों के खिलाफ की गई कार्रवाई और उन पर एस्मा लगाने पर कड़ी टिप्पणी करते हुए नाराजगी जताई। हाई कोर्ट ने डॉक्टरों के साथ सहानुभूति जताते हुए उनसे हड़ताल खत्म करने को कहा तब जाकर कहीं हालात काबू में आए।
बुद्ध ने जब उद्यान-भ्रमण के समय वृद्ध, बीमार और मृत व्यक्तियों को देखा, खुद उनके भीतर कई सवाल पैदा हुए थे। उनके भीतर सवाल पैदा न हों, इसके लिए राजसत्ता की ओर से कैसे प्रयत्न किये गए थे, इसका वर्णन अश्‍वघोष ने बुद्धचरितमें किया है, ‘हिमालय की तलहटी में जैसे हाथी अपने हथनियों के समूह के साथ घूमता है, वे सुन्दर स्त्रियाँ सिद्धार्थ को वैसे ही अपने आस-पास घुमा रही थीं। उनमें से कुछ सुन्दरियों ने शराब के नशे में कामातुर होकर अपने उन्नत वक्ष का स्पर्श कराने के लिए सिद्धार्थ की छाती को अपनी ओर खींच लिया। कुछ ने नशे में अभिनय करते हुए लता की तरह मृदु हाथों से उसे आलिंगन दिया। एक कहने लगी, हे आर्य, इसी समय मेरा भोग कीजिए।’’ जाहिर है, ये सब सुन्दर स्त्रियाँ स्वतः नहीं कर रही थीं बल्कि उन्हें इसी के लिए सत्ताधारी राजा द्वारा नियुक्त किया गया था कि सिद्धार्थ कभी आम लोगों के जीवन से जुड़ी मूल समस्याओं को जान ही न सके। अगर वे जान जायेंगे तो उनकी निर्द्वद्व सत्ता कई पीढ़ियों तक कायम नहीं रह सकेगी। इसलिए उनके आस-पास उन्हें सारे भौतिक सुखों का अंबार लगा दिया ताकि वे प्रश्‍नविहीन बनकर उसी में आजीवन रमे रहें। परंतु फिर भी सारी सुख-सुविधाएँ भी उन्हें ऐसे प्रश्‍नों  से रोक नही पाई।
वृद्ध, बीमार एवं मृत्यु को देखकर, यौवन के कामुक प्रदर्शन और चारों तरफ के हिंसा को देखकर सिद्धार्थ को लगा, जीवन का कोई बड़ा उद्देश्‍य  होना चाहिए। इसलिए लगभग ढाई हजार साल पहले सिद्धार्थ बुद्ध बनने के लिए राज-पाट, माया-मोह सब त्यागकर निकल पड़े, आमलोगों को प्रश्‍न करने के लिए तमीज पैदा करने, संसार को तार्किक बनाने। लोकतंत्र को कायम करने बुद्ध बनकर उन्होंने आजीवन जो भी ज्ञान दिया, उसका सार यही है कि लोगों को प्रश्‍न करने की आजादी हो, उसमें तर्क करने की क्षमता पैदा हो, जिज्ञासाओं में ही सारी समस्याओं का समाधान है।
जातक कथा में वर्णित गौतमी की यह कथा तार्किकता को बल देता अनेकों उदाहरणों में एक है। जिसमें अपने मृत बच्चे को गोद में चिपकाये हुए वह उसे सिर्फ बीमार समझकर इलाज के लिए दर-दर भटक रही थी, उससे बुद्ध कहते हैं कि जिस घर में कोई नहीं मरा हो, उस घर से सरसों के दाने माँग ला। इस प्रश्‍न से गौतमी को समाधान मिल जाता है और वह मृतक बच्चे से मुक्त होकर जीवन की एक नई तार्किक दिशा पाती है।
मुलायम सिंह यादव का यह प्रतिप्रश्‍न भी इस आम चुनाव यानी भारतीय लोकतत्र का हर पाँच साल पर होनेवाले समुद्र मंथन का उन हजारों ज्वलंत मुद्दों और प्रश्‍नों में से एक मामूली प्रश्‍न ही हो सकता है, परंतु इसी में हमारी सभ्यता के विकास की कहानी और लोकतंत्र का मूल काला चरित्र सामने आ जाता है कि हमारे सत्तासीन लोग आज भी आमलोगों की समस्याओं के प्रति कितना अहंकार भरा नजरिया रखते हैं? जनता को आज भी जानवरों की तरह रखने पर विश्‍वास करते हैं? एक तरफ तो बाजार है, जो अपने मायाजाल में मॉल-मल्टीप्लेक्स में डियो, पोशाक और एक से बढ़कर सुन्दरियों और उनके सौन्दर्य प्रसाधन के विज्ञापन ऐसे दृश्‍य रचते हैं कि लोग इसी में गुम होकर प्रश्‍नविहीन होता जाए, वहीं दूसरी तरफ अनेक धार्मिक पाखंडी लोग ऋषि‍-मुनियों के भेष  में दिन-रात लोगों को तार्किकता और मूल प्रश्‍नों से भटकाकर अंधविश्‍वासी और अंधधार्मिक बनाने में तल्लीन हैं। इन सब में मूल बात यह है कि इन्हें सत्ताधारियों का पूरा समर्थन प्राप्त है ताकि लोगों के जीवन से जुड़े प्रष्नों से बरगलाया जा सके और वे लोकतंत्र के नाम पर सिर्फ अपने परिवार और कुनबों के बीच सत्ता को बनाये रखकर सत्ता का सुख भोग सकें।
आज देश में 16वीं लोकसभा का चुनाव दस्तक दे रहा है। हमें सत्ताधारियों के ऐसे प्रतिप्रश्‍नों से डरना नहीं है बल्कि और जोर-शोर से उनसे पूछना है कि हमें जवाब दें कि आज भी देश के सभी बच्चों को समान गुणात्मक शिक्षा क्यों नहीं मिल पा रही है? सभी लोगों के लिए समुचित स्वास्थ्य की व्यवस्था क्यों नहीं है? सभी को ‘’शुद्ध पानी और भोजन क्यों उपलब्ध नहीं है? सबको समान रूप से सुरक्षा और न्याय कब मिलेगा? सत्ता में समान रूप से सहभागी, देश के सभी वर्गों के लोग, खासकर महिलाएँ कब बनेंगी? मुलायम सिंह जी यह आपका कैसा समाजवाद है जो चाहे भ्रष्‍टाचार विरोधी लोकपाल कानून हो या महिला आरक्षण विधेयक, हमेशा इसके मार्ग में रोड़ा लगाता है? इस तरह के अनेकों प्रश्‍न हैं, जिनका देश के लोगों को जवाब चाहिए ताकि जनता सबको कसौटी पर कसकर अपना मतदान करे।
बुद्ध के जमाने से आज तक हमारी सभ्यता ने हजारों साल का फासला तय किया है। अनेकों समाजसुधारकों और स्वतंत्रता सेनानियों के निरंतर संघर्ष और बलिदान से हमें प्रश्‍न करने की आजादी मिली है। हम इतनी आसानी से नहीं झुकेंगे, इसका जवाब लोकतंत्र के इसी महायज्ञ में देंगे।