Wednesday, July 2, 2014

मुक्तिदायिनी को मुक्त करो

हाँ मैंने, तुम्हारी गंगा मैया ने तुम्हें बुलाया है। तुम्हारे सेवा, भक्ति और साहस के बारे में मुझे मेरी प्यारी बहन साबरमती ने बताया था। सबको मुक्ति देने वाली मुक्तिदायिनी गंगा आज खुद अपनी मुक्ति के लिए तड़प रही है। इसलिए मैंने तुम्हें अपना उद्धार करने लायक सत्ता की शक्ति दी है। इतनी शक्ति की तुम पूरे देश की सभी बीमार माँओं एवं उसके भूखे, बीमार बच्चों की दशा सुधार सको। मोदी इस अपार शक्ति को पाकर अभिभूत हो, श्रद्धा व करूणा से गंगा मैया के चरणों में आकर सिर झूकाकर ध्यान में लीन थे।
गंगा मैया ने कहा, मेरे लाल, खुशी के अवसर पर गमगीन, किंकर्त्तव्यूविमूढ़ होकर क्यों बैठ गया है\  तुम भी कहीं यही योजना तो नहीं बना रहे हो कि घाटों पर गंगा स्वच्छता अभियान चलाएगा, पानी शुद्ध करने के लिए विदेशों से बड़े-बड़े इंजीनियर व बड़ी-बड़ी मशिनें मँगवाओगे और मैं कुछ दिनों में शुद्ध हो जाऊँगी, हुंह, अगर यह सच है तो तुम भी उन्हीं नेताओं और योजना आयोग में बैठे विश्व बैंक के योजनाकारों जैसे ही निकलोगे जो वर्षों से सबकुछ तुरत-फुरत करके इन कार्यों के बहाने देश को अरबों रुपए के कर्ज में डालकर अपने करोड़ों के वारे-न्यारे करते आ रहे हैं।
मुझे पूरा विश्वास है कि तुम ऐसा नहीं सोच रहे हो। पर मेरे उद्धार के लिए तुम्हें भगीरथ से भी ज्यादा शक्तिशाली, धैर्यवान व दृढ़प्रतिज्ञ होना पड़ेगा। वह अपने अतीत में डूबते हुए कहने लगी- जानते हो, जब भगीरथ ने अपने पूर्वजों की मुक्ति के लिए सदियों तक घनघोर तपस्या की और उसके अदम्य दृढ़ भक्ति और शक्ति के आगे नतमस्तक हो देवताओं ने मुझे मेरी इच्छा के विरुद्ध धरती पर आने को विवश कर दिया। मैं भी गुस्से में सोचकर चली कि मेरी ऊर्जा शक्ति और गति को धरतीलोक क्या सँभाल पायेगा... मैं सीधे पाताललोक में समा जाऊँगी। परंतु नीलकंठ शिव ने मेरी सारी योजनाओं को विफल कर दिया। मेरे सारे गुस्से का शमन कर दिया।
मैंने भगीरथ के पुरखों को मुक्ति दी और फिर स्वर्गलोक को लौटने का उपाय सोच ही रही थी, तभी देखा कि मैं जहाँ-जहाँ से गुजरी हूँ, वहाँ के पर्वत-पहाड़, मैदानों में असीम हरियाली छा गई है। एक नई मानव सभ्यता पलने लगी है। पूरी प्रकृति विविध जीव-जंतुओं से गुलजार हो गई है। यहाँ के सभी वासी खुशी से मुझे मैया-मैया कहके बुलाने लगे हैं। मैं एक गुस्सैल ऊर्जा शक्ति जब-जब यह मैया शब्द सुनती, प्रेम और करुणा की भावनाओं में बह जाती। और इन मानवी भावनाओं के आगे विवश होकर मैं यहीं की होकर रह गई। सदियाँ बीतती गईं। शहर, गाँव, मैदान, पहाड़ हर जगह से कल-कल, छल-छल निरंतर बहती रही। हमारे तटों पर भरपूर अनाज पैदा होता, लोग खुशहाली में खूब उत्सव मनाते। कोई भी उत्सव मेरे बिना अधूरा होता। सभी बूढ़े-बुजुर्ग, महिलाएँ, किशोरियाँ, बच्चे गाते-झूमते हुए आते और मैया-मैया कहकर अपने घर और समाज की सभी छोटी-बड़ी बातों को बताते। मैं इनकी श्रद्धा पर निहाल हो जाती, मुझे लगता कि मैं हर परिवार का अभिन्न हिस्सा हूँ, स्वर्गलोक यही है।
खुशी-खुशी समय बितता रहा। होश तो मुझे तब आया जब अचानक हर जगह रक्तरंजित लाशें अपने तटों और धाराओं में नजर आने लगी। मुझे लाशों से कभी घृणा नहीं रही बल्कि मैं तो उसी की मुक्ति के लिए धरती पर आई थी, परंतु अकारण इतनी मार-काट, यहाँ तक कि आदमी तो आदमी, मेरे किनारे निरीह जानवरों के कत्लगाह ही बन गए और उनके सारे लहू, मांस, गंदगी सब मुझमें प्रवाहित किया जाने लगा। ऐसा समय आ गया जब मुझसे जीवन का आशीर्वाद मांगने वाला व्यक्ति मुझमें डूबकर आत्महत्या करने लग गया, इनमें महिलाएँ ज्यादा होतीं। सीवर और नालों में बहते बजबजाती गंदगी में मुझे अकसर कन्या भ्रूण मिलती, जो यह विलाप करती होती कि मैया मैंने किसी का क्या बिगाड़ा कि मुझे जन्म से पहले ही मृत्यु के हवाले कर दिया... इतना ही नहीं, किनारे के शहरों से छोटी-छोटी नदियों की जगह बड़े-बड़े नालों से गंदा पानी मुझमें आकर मिलने लगा, हद हो गई, जंगल खत्म होती गई, पहाड़ नंगे होते गए, अनेक प्रकार के जीव-जंतु गायब होने लगे। अंत में बिजली और विकास के नाम पर जगह-जगह मुझे ही बाँध दिया। और इस सदानीरा को बंदी बना लिया। अब लोगों के चेहरे से खुशी नदारद थी। हर जगह भूख, बीमारी, अशिक्षा, और मार-काट, हिंसा का रोना, दिन-रात सुनते-सुनते मैं थक-हार गई। मुझे अब उस फैसले पर पछतावा होने लगा जब मैंने इनके असीम प्यार में फँसकर यहीं बहने का फैसला किया था।
तू यही सोच रहा है ना, क्या करना है... कैसे करना है... बेटा अबतक की सारी बातों से तुम समझ ही गए होगे कि मैं भारतीय संस्कृति और समाज की जननी हूँ। मैं बीमार इसलिए होती गई कि समाज और संस्कृति बीमार होती गई है। सिर्फ मेरे लिए स्वच्छता अभियान चलाने से मैं स्वस्थ और स्वच्छ नहीं होने वाली। इसके लिए पूरे जनमानस को स्वच्छ करना पड़ेगा, ऐसी व्यवस्था कायम करनी पड़ेगी कि समाज के हर तबके को समान शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा, मिले। समाज के हर व्यक्ति को भूख से निजात मिले, सारे प्राकृतिक संसाधनों का अनावश्यक दोहन बंद हो। खासकर पहाड़ों, जंगलों एवं नदियों का अतिक्रमण बंद हो। ऐसा विकास किस काम का जिससे लोगों की भूख मिटने की जगह बढ़ती ही जाए और बढते-बढ़ते इतना बढ़ जाए कि नदी, धरती, आकाश-पाताल सबकुछ निगलने तक बात जा पहुँचे।
मुझे स्वच्छ करने से पहले पूरे समाज के स्वास्थ्य को ठीक करने का प्रयास करो क्योंकि जब लोग शिक्षित, संस्कारित और खुशहाल होंगे, मुझे निर्बाध बहने देंगे तो मैं तो ऐसे ही स्वस्थ, स्वच्छ, अविरल और निर्मल हो जाऊँगी। इससे पहले की स्थिति हाथ से निकल जाए कुछ करो बेटा! तुम्हें पता होगा इतिहास की ऐसी ही किसी भयंकर त्रासदी की मारी मेरी सहोदर बहन सरस्वती धरती में समा चुकी है। सरस्वती जब पाताललोक से समायी थी तो वह अकेले नहीं समायी थी उसके साथ बसी-बसायी पूरी एक जीवंत सभ्यता भी समा गई थी!

अभी भी संशय से मुझे निहार रहा है मेरे भगीरथ! एक समय मैनें तुम्हारे पुरखों का उद्धार किया था आज तुम्हें मेरा उद्धार करना है। मैं सब समझ रही हूँ, तुममें बहुत शक्ति है तुमने तो मुझसे सिर्फ 300 कमल मांगे थे, मैंने तो इसके अतिरिक्त भी अनेक सुगंधित फूलों से तेरा दामन भर दिया, तुम्हें और कितनी शक्ति चाहिए... नरेन्द्र मोदी ने पुनः माँ का स्पर्श किया और संकल्प भाव से दिल्ली का रूख किया!   

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