Friday, July 4, 2014


रहस्यमयी बीमारी के टीके!
बिहार के मुजफ्फरपुर में रहस्यमय बुखार ने कहर मचा रखा है। ये जानलेवा बुखार एक महीने में करीब डेढ़ सौ मासूमों की जान ले चुका है। सैंकड़ों बच्चे अस्पताल में ज़िंदगी की जंग लड़ रहे हैं। डॉक्टरों का कहना है कि इस बुखार के लक्षण काफी हद तक इंसेफेलाइटिस यानी दिमागी बुखार से मिलते जुलते हैं। मानसून जहाँ देश के लोगों के लिए खुशहाली लेकर आता है, वहीं देश के कई हस्सों खासकर बिहार के मुजप्फरपुर, वैशाली तथा इसके आस-पास के जिलों तथा उत्तर प्रदेश के गोरखपुर, देवरिया, कुशीनगर जैसे इलाकों में जापानी इंसेफेलाइटिस के रूप में यह यह पिछले दो दशकों से अधिक समय से दहशत का प्रतीक बन कर आता रहा है जिसमें हर वर्ष हज़ारों बच्चे मौत के ग्रास बन जाते हैं।  
इन्सेफ्लाइटिस या जापानी बुखार के फैलने के कई कारण हैं। इसके लिए जिम्मेदार मच्छर आमतौर पर लंबे समय से जमा गंदे पानी में पैदा होते हैं। इसी तरह सूअर की लार से पैदा होने वाला बैक्टीरिया जब पेयजल में पहुंच जाता है या उस पानी के संपर्क में कोई व्यक्ति आता है तो उसका संक्रमण होना प्रारंभ हो जाता है। ग्रामीण तथा शहरों की झुग्गी बस्तियों में साफ पेयजल न होने, गंदे नालों-तालाबों में मछली पकड़ने, पशुओं को नहलाने आदि के चलते लगातार संपर्क में आते रहने की वजह से लोगों में इस रोग के संक्रमण का खतरा बना रहता है।
यह शुभ संकेत है कि केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री को जैसे ही इसकी सूचना मिली और वे तुरंत हरकत में आ गये और मुजप्फरपुर जाकर सभी प्रभावित जिलों के लिए तत्काल ही टीकाकरण के विशेष अभियान को प्रारंभ किया। इस अवसर पर उन्होंने इसमें स्वयंसेवी संस्थाओं, इंडियन मेडिकल एसोसिएशन, धार्मिक संगठनों और यहाँ तक कि स्कूली बच्चों को भी शामिल करने का आह्वान किया ताकि सभी बच्चों को टीका लगाना सुनिश्चित किया जा सके। उन्होंने मुजफ्फरपुर में अलग से वायरोलॉजी लैब लगाने की जरूरत को भी माना।
टीकाकरण अभियान के प्रति कई विशेषज्ञ डॉक्टरों ने इसकी सफलता को लेकर आशंका व्यक्त की है क्योंकि इन्सेफ्लाइटिस, जापानी बुखार और डेंगू के इलाज के लिए अब तक कोई अचूक दवा नहीं खोजी जा सकी है। फिर डॉक्टरों के लिए पहचान करना मुश्किल होता है कि किस प्रकार के बैक्टीरिया के प्रकोप से इन्सेफ्लाइटिस फैल रहा है। यहाँ तक कि कई बार बीमारी के लक्षण एक होने के बावजूद अलग-अलग रोगी में अलग-अलग बैक्टीरिया पाए जा सकते हैं। इसी कारण शायद इसे रहस्यमयी या अज्ञात बीमारी माना जाता है।
इस बुखार को हम रहस्यमयी, अज्ञात या जापानी कुछ भी नाम दें लें, एक तथ्य जो इस बीमारी के बारे उभर कर आता है वह यह है कि इस बीमारी का सबसे बड़ा शिकार समाज के अति निम्न और अतिदलित समुदाय के लोग हैं जो गंदे नालों और नारकीय अवस्था में झुग्गी-झोपडियों में रहने को अभिशप्त हैं। इनके अधिकांश मासूम बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। इनके इलाज की कौन पूछे, पेट भर भोजन भी मुश्किल से मिल पाता है। इसलिए सिर्फ टीकाकरण से इनको कितना फायदा पहुँचेगा कहना मुश्किल है क्योंकि इन्हें जीवन बसर तो इन नारकीय परिस्थितियों में ही करना है। हाँ टीकाकरण, समुचित साफ-सफाई और  खून, बलगम आदि की जांच के लिए उन्नत प्रयोगशालाओं की व्यवस्था कर इन रोगों की रोकथाम तो की ही जा सकती है।
इस बीमारी को जितनी रहस्यमयी समझा जाता है उतनी है नहीं, बल्कि इसके सर्वाधिक शिकार होने वाले आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर अतिदलित डोम, मुसहर जैसी जातियों का पूरा जीवन ही रहस्यमयी है। कोई भी स्वस्थ्य मानसिकता वाला व्यक्ति क्या यह कल्पना कर सकता है कि इस समुदाय के बच्चे और सुअरों के छौने एकसाथ गंदे नालों में समाई झुग्गियों में अभी भी रेंगने को मजबूर हैं। न खेती के लिए कोई जमीन, न रहने को मकान की कोई व्यवस्था, शिक्षा और स्वास्थ्य की व्यवस्था की कौन पूछे? पहले खेतों में मुस (मुस से मुसहर बना है) यानी चूहे के मांस तथा चूहे द्वारा चुराये अनाज से जीवन निवर्हन होता था अब दैनिक दिहाड़ी तथा सुअर पालन आदि से किसी तरह जीवन-बसर हो जाए यही बहुत है। कुल मिलाकर पूरा जीवन महाकवि निरालाके शब्दों में ‘‘जीवन ही दुःख की कथा रही, क्या कहूँ आज जो नहीं कही’’ वाली स्थिति है। इसलिए सर्वप्रथम इनके नारकीय विषम जीवन जीने के रहस्यों से परदा उठाना आवश्यक है कि कैसे ये इंसान के रूप में इनका अस्तित्व आज भी कैसे बचा है? क्योंकि इनके दुःखद त्रासद कुपोषित जीवन के रहस्यों में ही इस बीमारी का बीज है। इनके दुःखद जीवन की परिस्थितियों में अगर सुधार हो जाए तो यह जापानी बुखार भी अपने आप बंगाल की खाड़ी में समुद्र में समाकर कहीं और आसियां तलाश लेगा।
केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन द्वारा प्रारंभ किए गए अभियान के कारण ही देश को पोलियो जैसी महामारी से मुक्ति मिली है। परंतु इंसेफेलाइटिस या दिमागी बुखार के बारे में जो तथ्य उभर कर आए हैं वे यह है कि पोलियो के टीके की तरह इस बीमारी के टीके से उसके उन्मूलन की कोई गारंटी नहीं है क्योंकि कई बार बीमारी के लक्षण एक होने के बावजूद अलग-अलग रोगी में अलग-अलग बैक्टीरिया पाए जा सकते हैं। ऐसे में एक ही दवाई हर क्षेत्र और सभी बच्चों पर कारगर होने पर संदेह है। परंतु सबसे अच्छी बात यह है कि स्वास्थ्य मंत्री एक डॉक्टर के साथ-साथ एक सफल राजनेता भी हैं, जिन्हें यह अवश्य पता होगा कि इस बीमारी के इलाज के लिए एक ऐसे टीके की आविष्कार की आवश्यकता है जिससे यह समुदाय विकास के मुख्यधारा में शामिल हो सके तथा इनके सामाजिक और आर्थिक स्थिति में सुधार आए। ये स्वस्थ और स्वच्छ वातावरण में रह सकें और इनके बच्चे कुपोषण से मुक्त हो सकें। इसके बाद भी अगर कोई इस बीमारी के शिकार हों तो उन्हें तत्काल समुचित इलाज भी त्वरित गति से मिल जाए उसकी भी सारी व्यवस्था उपलब्ध हो।
आशा है ऐसा टीका बनाने में बिहार के नये मुख्यमंत्री, जो सौभाग्य से अतिदलित मुसहर समुदाय से ही हैं तथा उत्तर प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री डॉ. हर्षवर्धन का पूरा साथ देंगे ताकि इस रहस्यमय बीमारी का जड़मूल से उन्मूलन हो सके। इसी बरसाती मौसम में ऐसे टीके का सभी को इंतजार है ताकि बरसात सभी लोगों के लिए एकसाथ मनोहारी और मंगलकारी बन कर आए किसी के जिगर के टुकड़े को लीलने नहीं!   

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