Thursday, March 7, 2019


वन्दे भारत के पत्थरबाज!
चौथी बार भी पत्थरबाजी का शिकार बनने के बाद अपने जख्मों को सहलाते हुए वन्दे भारत एक्सप्रेसअपनी गति की तरंग-लय में कुछ सोचती-विचारती गतिमान है कि जब मेरे पहियों के ट्रैक पर चहलकदमी यानी ट्रायल प्रारंभ हुआ और अब जब यात्रियों को लेकर तेज रफ्तार पकड़ रही हूँ, मुझपर यह तीसरी बार पत्थरबाजी हुई है। मूर्ख शैतान पत्थरबाजों को मेरी चमक-दमक के साथ तेज चौकड़ी भरना रास नहीं आ रहा। इन्हें पता होना चाहिए कि मेरी गुणों और गति में आधुनिक भारत के अधिकांश लोगों के सपनों की धड़कन बसी है। लोग आज समय के साथ चलना चाहते हैं, जब पूरी दुनिया नवगति, नवलय से आगे बढ़ रही है तो भारत के लोग कबतक लस्टम-पस्टम करते हुए घंटों के सफर को दिनों में पूरा करते हुए पीछे घिसटते रहें। हाँ, यह सही है कि हर देश और समाज में ऐसे लोग होते ही हैं, जो तर्क-विज्ञान और आधुनिकता को धता बताते हुए अतीत और कठमुल्लेपन के शिकार होते हैं क्योंकि विवेक और आधुनिकता को समर्थन देने से उनका धंधा-पानी बंद होने का डर होता है। जरा सोचिए, जब पहली बार हाईस्पीड रेल की बात हुई थी तो अच्छे-खासे गुणीजनों ने कैसा उपहास उड़ाया था।
यह सिर्फ मेरे साथ ही थोड़ा ही हुआ है, यहाँ की बेटियों के साथ भी यही सब होता रहा, जब उसने नए जमाने के अनुरूप पुरुषों के संग कदम-ताल मिलाकर चलना प्रारंभ किया। उसे रोकने के लिए क्या-क्या नहीं होता रहा है। पहले तो उसके जन्म से पहले भ्रूण में ही मार देने की कोशिश, किसी तरह अगर जन्म हो गया तो पालन-पोषण और समान शिक्षा में हजार तरह के शारीरिक, मानसिक रोड़े, उससे किसी तरह आगे बढ़ी तो कैरियर, शादी, घर-गृहस्थी में हर जगह कहीं दहेज, कहीं तेजाब, तो कहीं तलाक, तलाक और तलाक के नाम पर वज्रपात! देश और दुनिया में न जाने कितनी बेटियों को अपने मूलभूत अधिकार पाने और स्वतंत्र होकर सर उठाकर जीने की चाहत में संगसार कर दिया गया। परंतु फिर भी बेटियाँ हारने वाली नहीं हैं, वे आगे बढ़ रहीं हैं, सरपट भाग रही हैं, हर मोर्चे पर झंडे गाड़ रही हैं।
भारत के मस्तक कश्मीर में तो आए दिन पत्थरबाजी होती है। ये पत्थरबाज उन जवानों पर पत्थरबाजी करते हैं, जो इनकी सुरक्षा और देश की रक्षा के लिए अपना घर-बार छोड़कर इनकी सेवा में अपनी जान को जोखिम में डालकर दिन-रात डटे हुए हैं। ये भाड़े के पत्थरबाज नहीं जानते हैं कि वे जिनके इशारे पर पत्थरबाजी कर रहे हैं, वे उनकी आजादी, जीने का अधिकार, उनके सपने, आशाओं, आकांक्षाओं और उनके कश्मीर, जिसे वे जन्नत कहते हैं, सबको मिटाकर सांप्रदायिक कट्टरता की अंधी सुरंग में ले जा रहे हैं। ये युवा भारत में लोकतंत्र की हवा में श्वास लेते हुए पले-बढ़े हैं, इन्हें यह नहीं पता कि उन्हें कट्टरपंथी आजादी के नाम पर जो सुनहरे सपने दिखा रहे हैं, वह इनको कितना घोर रक्तरंजित मध्यकालीन अंधकार में डूबी असभ्य दुनिया में ले जाने वाला है।
एक दिन मेरे साथ सफर करते हुए दो यात्री मुझ पर हुई पत्थरबाजी पर बहस करते हुए कह रहे थे कि अनेक बार, खासकर बिहार, उत्तरप्रदेश, दिल्ली आदि से गुजरनेवाली रेल में लाइन के बगल में खेलते-खड़े बच्चे बिना किसी कारण के ही पत्थरबाजी कर देते हैं, इससे लोगों की जान-माल और सरकारी संपत्ति का भारी नुकसान होता है, परंतु जब आप देश के दूसरे क्षेत्रों, खासकर दक्षिण भारत से गुजरने वाली रेल के सफर में अकसर देखने को मिलता है कि बच्चे बाय-बाय करते और शुभकामनाएँ देते हुए मिलेंगे। दूसरे ने उनसे काफी हद तक सहमति जताते हुए जोड़ा कि ऐसा नहीं है, यहाँ भी अनेक बार स्वागत करते मिल जाएंगे। कोई भी बच्चा माँ के पेट से तो ढेला फेंकना सीखकर आता नहीं, इसके लिए उसका परिवार तथा माता-पिता द्वारा दिए जा रहे संस्कार, समाज जिसमें वह पल रहा है, उसके नैतिक मूल्य तथा उसकी शिक्षा जिम्मेदार है।
आगे बढ़ती वन्दे भारत सोचती है, कुछ साल पहले ही तो भारतीय रेल का क्या बुरा हाल था, हर तरफ रेल से लेकर हर स्टेशन पर कैसी गंदगी का अंबार था, लेट-लतीफी से यात्रियों का हाल बुरा था। दुर्घटनाओं और लूट-खसोट की कोई सुनवाई नहीं, किसी की जिम्मेदारी तय नहीं। रेल मंत्रालय को एक दुधारू गाय समझकर इस मंत्रालय पर हर नेता की नजर रहती, रेलमंत्री इसके बजट में सिर्फ नई रेल की घोषणा करते, अपने चहेतों को ठेके और नौकरी बाँटते, जिसमें जमकर भ्रष्टाचार होता। परिणाम यह हुआ कि रेल दौड़ना तो दूर, रेंगती हुई विलंब से गंतव्य तक पहुंचती। ऐसे माहौल में बुलेट रेल, और हाईस्पीड रेल की बात ही क्या, सेमी हाईस्पीड रेल भी उनके लिए सपना ही था। केन्द्र सरकार की संकल्प शक्ति, कार्यक्षमता के कारण अपने ही देश में मेक इन इंडियाके तहत बनी मैं सेमी हाईस्पीड वंदे भारत रेलवे ट्रैक पर फर्राटे भर रही हूँ, कुछ महीनों में मेरी अनेक सखियाँ भी देश के कोने-कोने में द्रुत लय-ताल मिलएँगी और मुझे पूरा विश्वास है कि 2022 तक बुलेट रेल हवा से बातें करने लगेगी।
शरमाती-इठलाती आगे सरपट भागती वह सपनों में खो जाती है, मैं तो वन्दे भारत रेलपूरे भारत को वन्दे भारतकरने के सपने को साकार करने का एक छोटा सा साधन मात्र हूँ, मेरे जैसे हजारों साधन, चाहे वह शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा, कृषि, उद्योग, पर्यावरण जैसे अनेक संसाधनों की कड़ियाँ जब जुगलबंदी करते हुए तीव्र गति से अपनी सेवा देंगी। भारत का हर बच्चा स्कूल जाएगा। किसान और मजदूरों को मेहनत की पूरी कीमत मिलेगी। बेटियाँ बिंदास होकर अपने सपने को साकार करेंगी। हर युवा को उसकी योग्यता और क्षमता के अनुरूप रोजगार मिलेगा। कोई बुजुर्ग, विधवा या बेवा किसी की मोहताज नहीं होंगी। हर वर्ग निर्भय होकर सम्मान से जीएगा और समय पर सबको इंसाफ मिलेगा। पहाड़ हरे-भरे होंगे, नदियाँ स्वच्छ और स्वतः प्रवहमान होंगी, हर आँगन व हर डाल पर चिड़िया गुंजायमान होंगी और अनगिनत फूल खिलखिलाएँगे। नासमझ पत्थरबाजों को समझाने का प्रयास हो, नकारात्मक प्रगति के रोड़ेबाजों को समय से समुचित सजा मिले। तभी होगा असली वंदे भारत!



सम्मानों का सम्मान
किसी भी पुरस्कार या सम्मान का गौरव तभी तक कायम रहता है, जबतक उसके लिए पारदर्शी व समुचित तरीके से उसके लिए योग्य, साहसी व प्रतिभावान कर्मयोगी व्यक्तियों को सम्मानित करने के लिए चयन किया जाता है। अगर योग्य व्यक्तियों को सम्मानित किया जाता है तो उसका तो मनोबल बढ़ता ही है, देश और समाज भी उससे लाभान्वित और प्रभावित होता है। इसके साथ खुद उस सम्मान का भी सम्मान बढ़ जाता है। हम लंबे समय तक किसी बड़े सम्मान का आदर सिर्फ इसलिए नहीं करते कि वह किसी महान व्यक्ति या बड़ी संस्था से जुड़ा हुआ है। महान व्यक्ति या संस्था का अपना प्रभामंडल होता अवश्य है, परंतु उस सम्मान या पुरस्कार का सम्मान तो लंबे समय तक तभी कायम रहेगा, जबतक उस सम्मान के उद्देश्यों एवं मानदंडो के अनुरूप जनतांत्रिक व पारदर्शी तरीके से व्यक्तियों व संस्थाओं को सम्मानित किया जाएगा। इसलिए सम्मानित करने वालों को कभी यह नहीं भूलना चाहिए कि किसी को सम्मानित कर वे सिर्फ उसे सम्मान दे रहे हैं, बल्कि योग्य एवं उचित व्यक्ति को सम्मानित कर खुद वह सम्मान भी सम्मानित होता है और अपनी प्रतिष्ठा व प्रभाव में चार चाँद लगाता है।
इस मायने में हर वर्ष 26 जनवरी की पूर्व संध्या पर घोषित किए जाने वाले पद्म पुरस्कारों को परखने का यह सही समय है। देश में यह पुरस्कार 1954 से दिए जा रहे हैं। बीते 65 सालों में देश के 4 हजार 417 नामी व्यक्तियों को सम्मानित किया जा चुका है। इन पुरस्कारों के लिए नामों के चयन की एक लंबी प्रक्रिया है। पात्र व्यक्तियों से उनके आवेदन अनुशंसाओं के साथ कलेक्टर के माध्यम से केंद्र सरकार को भेजे जाते हैं। अनुशंसित नामांकन पद्म पुरस्कार समिति के समक्ष रखे जाते हैं। समिति अपनी सिफारिशें प्रधानमंत्री को भेजती है। वहाँ से अंतिम मुहर के लिए सूची राष्ट्रपति के पास भेजी जाती है।
पद्म पुरस्कारों के शुरुआती दौर में सम्मानित ज्यादातर हस्तियाँ वे थीं, जिन्होंने अपना जीवन किसी विशिष्ट क्षेत्र में बिना किसी लोभ या लाभ के राष्ट्र सेवा में खपा दिया था। पहली सूची में जो 23 नाम थे, उनमें प्रख्यात वैज्ञानिक होमी जहाँगीर भाभा, शांति स्वरूप भटनागर, मूर्धन्य कवि मैथिलीशरण गुप्त, नामी शायर जोश मलीहाबादी, जनरल केएस थिमैया, सुप्रसिद्ध गायिका एमएस सुब्बालक्ष्मी आदि शामिल थे। लेकिन धीरे-धीरे पद्म पुरस्कार प्रतिभाओं के सम्मान के साथ निजी पसंद और राजनीतिक प्रतिबद्धता ही मुख्य आधार बनते गए। इसीलिए पद्म पुरस्कारों पर विवादों की घटा छाने लगी। कई ऐसे लोग भी राजनीतिक जोड-तोड़ के बल पर पद्म पुरस्कार पाने लगे, जो किसी साधारण पुरस्कार के भीे काबिल न थे। नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए सरकार आने के बाद यह बात भी उठी कि लगातार अनेक ऐसे लोगों को यह सम्मान मिलता रहा है, जो कि इसके योग्य नहीं हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि हमें देश में विविध क्षेत्रों में निष्काम भाव से काम कर रहे उन अलक्षित (अनसंग हीरो) नामों को ढूँढ़कर पुरस्कृत करना चाहिए। इस सरकार ने पद्म पुरस्कारों के लिए व्यक्ति चयन और आवेदन में एक महत्त्वपूर्ण बदलाव किया। दो साल पहले ऑनलाइन आवेदन शुरू हुए और कुछ ऐसे चेहरों को पद्म पुरस्कार मिले, जिसके बारे में उन्होंने खुद भी नहीं सोचा होगा। ऑनलाइन आवेदनों का रास्ता खुलने का नतीजा है कि वर्ष 2019 के पद्म पुरस्कारों के लिए अंतिम तिथि 15 सितम्बर, 2018 तक कुल 49,992 आवेदन मिले हैं, जो वर्ष 2010 में प्राप्त नामांकनों की अपेक्षा 32 गुना ज्यादा हैं। उस वर्ष 1313, तो वर्ष 2016 में 18768 और वर्ष 2017 में 35595 नामांकन प्राप्त हुए थे।
इस वर्ष पूर्व राष्ट्रपति व राजनेता प्रणब मुखर्जी, उनके साथ ही सामाजिक कार्यकर्ता और संघ विचारक नानाजी देशमुख तथा प्रख्यात संगीतकार भूपेन हजारिका को मरणोपरांत भारतरत्न से सम्मानित किया गया है। इन महान विभूतियों को सम्मानित कर सरकार ने पूरे देश को सकारात्मक शुभ संदेश दिया है। इसके अलावा पद्म पुरस्कारों में अधिकांश अचर्चित कर्म योद्धा हैं जिन्होंने समाज सेवा को ही अपनी जीवनचर्या बना लिया है, इनमें 96 वर्षीय वल्लभभाई वसराम हैं, जिन्होंने बिना किसी आधुनिक प्रयोगशाला के ही मधुवन गाजरका विकास किया। वह 65 वर्षों से जैविक कृषि प्रचार में संलग्न हैं। उन्हें पद्मश्री मिला है। ओडिशा की 69 वर्षीय कमला पुजारी ने बीज प्रजाति संरक्षण का बड़ा काम किया है। सुधांशु बिस्वास, 99 वर्षीय स्वतंत्रता सेनानी, जिन्होंने अपना जीवन गरीबों की सेवा के लिए समर्पित कर दिया। बिस्वास पश्चिम बंगाल में स्कूल, अनाथालय और डिस्पेंसरी चलाते हैं।
पद्म सम्मान के लिए इस बार कई ऐसे नायकों को चुना गया है, जो अब तक राष्ट्रीय मीडिया की चकाचौंध से दूर ही थे। इनमें मुजफ्फरपुर की राजकुमारी देवी के घर में बनाए अचार-मुरब्बा के अनेक दिग्गज भी मुरीद हैं। ओडिशा के चाय वाले गुरुजीके नाम से मशहूर डी प्रकाश राव भी इस सम्नान के लिए चुने गए। चाय बेचकर अनाथ और गरीबों को शिक्षा दे रहे हैं। झारखंड में जंगलों की रक्षा में जुटीं जमना टुडू उर्फ लेडी टार्जन भी ऐसा ही एक नाम हैं, जो अनेक विरोधों और खतरों के बावजूद वन संरक्षण में जुटी हुई हैं।
डॉ. स्मिता एवं डॉ. रवींद्र महाराष्ट्र के मेलघाट जिले के उपेक्षित क्षेत्र में 30 साल से कोरकू जनजातियों के बीच सक्रिय हैं। वे गरीबों के बीच प्राथमिक चिकित्सा केंद्र चला रहे हैं। चिकित्सा सेवा की राशि सिर्फ दो रुपये है। एम आर राजगोपाल को भारत में पैलिएटिव केयरका जनक माना जाता है। पैलिएटिव केयरका इस्तेमाल गंभीर रूप से बीमार मरीजों में दर्द कम करने के लिए किया जाता है। इसी तरह 66 वर्षीय एम चिन्ना पिल्लई भी पद्मश्री सूची में हैं। उन्होंने अपने दम पर हजारों महिलाओं के स्वयं सहायता समूह बनाए। बचत और साख की संस्थाएँ बनीं। इसके अलावा भी जमीन से जुड़े और विपरीत परिस्थितियों में समाजसेवा करने वाले अनेक अचर्चित नाम सूची में हैं।
इस वर्ष पद्म सम्मानों से सम्मानित लोगों की सूची और उनके कार्यों को देखकर यही कहा जा सकता है कि इस सम्मान से सम्मानित होकर विविध क्षेत्रों में सेवा कार्य करने वालों का ही मनोबल नहीं बढ़ा है बल्कि पद्म पुरस्कारों का भी पूरे देश और समाज में सम्मान बढ़ा है। 

पुल बनाएँ और बनें भी
पुल सबको जोड़ता है। एक इनसान को दूसरे इनसान से, एक समाज को दूसरे समाज से, गाँव को दूसरे गाँवों और शहर से, प्रदेश को दूसरे प्रदेश से, दूसरे देश से भी। मानव सभ्यता के विकास में पुलों का अहम योगदान है। आधुनिक भौतिक एवं सामाजिक-सामुदायिक विकास का अगर गंभीर अध्ययन किया जाए तो आग के बाद पुलों का ही योगदान ठहरेगा। इसके लिए एकतरफ जहाँ मानव ने दूरदराज के लोगों को पुल बनाकर भौगोलिक दूरियों को मिटाया, वहीं दूसरी तरफ मानव खुद भी पुल बनकर संबंधों यानी रिश्ते-नातों के अंतर्जाल बुनकर जंगली, अराजकतावादी समाज से आधुनिक सामाजिक व्यवस्था तक पहुँचा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार 25 दिसंबर को असम के डिब्रुगढ़ में भारत के सबसे लंबे रेल-सड़क बोगीबील पुल का उद्घाटन किया। इस दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने खुली जीप में सवार होकर एवं पैदल चलकर भी पुल का अवलोकन किया। ब्रह्मपुत्र की तेज और अथाह लहरों के बीच पुल बनाना कोई आसान काम नहीं था। उसका महत्त्व इससे भी समझा जा सकता है कि यह देश का सबसे लंबा पुल है, लगभग पाँच किलोमीटर लंबा। यह तकरीबन वैसा ही पुल है, जैसा एक पुल यूरोप में स्वीडन और डेनमार्क के बीच बना है, नीचे रेल की दोतरफा पटरियाँ और ऊपर तीन लेन की सड़क। इसे इतना मजबूत बनाया गया है कि बिना किसी बाधा के यह 120 वर्षों तक साथ निभाता रहेगा।
यह पुल जितना लंबा है, उससे कहीं लंबी इसकी कहानी है। सर्वप्रथम बोगीबील पर पुल बनाने की माँग दरअसल 1962 में चीनी आक्रमणके बाद ही उठी थी। बोगीबील पुल परियोजना साल 1985 में हुए असम समझौते की शर्तों का एक हिस्सा था। इसका शिलान्यास 1997 में उस समय के प्रधानमंत्री एच डी देवेगौड़ा ने किया था। वैसे इसे बनाने का काम ठीक ढंग से 2002 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने शुरू करवाया। 2004 से 2014 तक प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए के कार्यकाल में इस काम में गतिरोध बना रहा, जबकि केन्द्र और असम दोनों जगह कांग्रेस की सरकार थी। 2014 के चुनाव में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का यह पुल बनाने का एक मुख्य वादा था, जो अब साकार हुआ है।
बोगीबील पुल असम और अरुणाचल प्रदेश के लोगों की जिंदगी को तो आसान बनाएगा ही, साथ ही भारतीय सेना के लिए भी आधारभूत सुविधाएं अब सहज उपलब्ध होंगी। सेना की जरूरतों को देखते हुए ही इसको इतना मजबूत बनाया गया है कि इस पर न सिर्फ भारी-भरकम टैंकों की आवाजाही हो सकती है, बल्कि जरूरत पड़ने पर वायुसेना के जेट विमान भी उतारे जा सकते हैं। बोगीबील पुल से कुछ ही आगे भारत और चीन की सीमा है, यानी वह जगह, जहाँ चीन का लपलपाता विस्तारवाद हमेशा से भारत के लिए सिरदर्द बना हुआ है। इस मायने में यह पुल इस क्षेत्र में सेना को मिली एक नई सुविधा ही नहीं, बल्कि उसे एक नया आत्मविश्वास भी देगा।
यह पुल असम और अरुणाचल प्रदेश के पूर्वी क्षेत्र में ब्रह्मपुत्र नदी के उत्तर और दक्षिण तट के बीच संपर्क की सुविधा प्रदान करेगा। इससे अरुणाचल प्रदेश के अंजाव, चंगलांग, लोहित, निचली दिबांग घाटी, दिबांग घाटी और तिरप के दूरस्थ जिलों को ही लाभ नहीं होगा बल्कि उत्तर-पूर्व क्षेत्र के लिए एक जीवनरेखा के रूप में कार्य करेगा। यह न केवल डिब्रुगढ़ और अरुणाचल प्रदेश की राजधानी ईटानगर के बीच 150 किलोमीटर सड़क का फासला कम करेगा। पहले धेमाजी से डिब्रुगढ़ की 500 किलोमीटर की दूरी तय करने में 34 घंटे लगते थे, अब यह सफर महज 100 किलोमीटर का रह जाएगा और 3 घंटे लगेंगे। डिब्रुगढ़ से दिल्ली के बीच रेलयात्रा में कम से कम तीन घंटे का समय कम कर देगा यानी दिल्ली भी इसके दिल के ज्यादा करीब होगी।
सरकार यातायात, व्यापार, संचार के लिए पुल का निर्माण कर सकती है, यानी साधन मुहैया तो करा सकती है परंतु लोगों के दिलों को जोड़ने का पुल तो व्यक्ति और समाज को ही बनना और बनाना पड़ेगा। आधुनिक समय की सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि संचार के विविध पुल विकसित हो गए हैं और लगातार हो रहे हैं, परंतु समाज या रिश्तों को जोड़ने वाले सारे पुलों को हम खुद नेस्तनाबूद करते जा रहे हैं। कहीं जाति-संप्रदाय के नाम पर, तो कहीं क्षेत्र, भाषा एवं संस्कृति के नाम पर लोगों के बीच दूरियाँ बढ़ रही हैं। आज देश, प्रदेश, शहर, कस्बा, गाँव ही नहीं, हर घर में सारे रिश्तों के बीच भी दरारें बढ़ती जा रही हैं। कहने के लिए तो हर आदमी के पास ऐसा साधन है, जो बटन दबाते ही अपनों के सारे गिले-सिकवे दूर कर गले लग सकता है, मिनटों या कुछ ही देर में दूसरे के करीब पहुँच सकता है। परंतु अपनी झूठे अहं के कारण इतनी दूरियाँ बढ़ चुकी हैं कि वह सबकुछ होते हुए भी घुट-घुटकर मरने को अभिशप्त है। आज वह सोशल मीडिया के माध्यम से हजारों-लाखों लोगों से जुड़ा है, परंतु फिर भी नितांत अकेला है। हमने सामाजिक-मानवीय रिश्तों के हर व्यक्ति, हर संस्था को ध्वस्त कर दिया है और करते जा रहे हैं, जो मानवीय संबंधों के पुल का काम करते थे। जिसके कारण विविध भौतिक संसाधन होने के बावजूद अधिकांश व्यक्ति, परिवार, समाज अनेक सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक समस्याओं एवं संघर्षों में फँसकर हिंसा और विघटन से त्रस्त हैं।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बोगीबील पुल को राष्ट्र को सोंपकर क्षेत्रीय दूरियों को पाटने के लिए एक बहुत बड़ा कदम उठाया है। इस क्षेत्रीय दूरी के कारण ही उत्तर भारत एवं देश के अन्य भागों से पूर्वोत्तर भारत की दूरी बहुत ज्यादा लगती थी। ढोला-सादिया पुल के बाद बोगीबील पुल बन जाने से यह भौगोलिक दूरी काफी कम हो गई है। हमें इसी के साथ मानवीय संबंधों के पुल को भी इतना मजबूत करना पड़ेगा कि वो सांप्रदायिकता, जातीयता, क्षेत्रीयता और भाषाओं के नाम पर पैदा किए जाने वाली दरारों को पाटकर पूरे समाज और देश को एकता की डोर से जोड़ दे। सभ्यता की प्रगति के लिए पुल बनाना बहुत जरूरी है, साथ में पुल बनना भी, ताकि हम पूरे समाज और संसार को एक-दूसरे से जोड़ते रहें और जुड़े रहें।



माँ से मिला दो!
दस साल का मासूम जुबैल उ.प्र. के एटा से साइकिल लेकर दिल्ली के लिए निकल पड़ा। साढ़े तीन घंटे में 35 किलोमीटर सिकंदराराऊ रेलवे क्रॉसिंग तक आते-आते थककर चूर हो गया। उसके बाद उसकी हालत साइकिल चलाने लायक नहीं रही। उसे अब आगे जाने की कोई तरकीब नहीं सूझ रही थी। भूख-प्यास से व्याकुल मासूम रुआंसा होकर एक ई-रिक्शा चालक के पास गया और अपने पास के जमा पूंजी पाँच रुपये देकर बोला, ‘अंकल, आप मुझे मेरी माँ के पास दिल्ली तक छोड़ दोगे। मैं अपनी माँ से दो साल से नहीं मिला हूँ।
ई-रिक्शा चालक उसकी बातें सुनकर परेशान हो गया। वह बच्चे को लेकर कोतवाली पहुँचा और प्रभारी निरीक्षक मनोज कुमार शर्मा को सौंप दिया। शर्मा ने बच्चे को उसके पिता मोहम्मद महफूज को सुपुर्द कर दिया। मोहम्मद महफूज निवासी कांशीराम टाउनशिप, एटा का पहली पत्नी से पाँच वर्ष पूर्व तलाक हो चुका है। वह दिल्ली में रहती है। मोहम्मद महफूज एवं उसकी पहली पत्नी ने दूसरी जगह शादी करके अपनी अलग दुनिया बसा ली है। पहली पत्नी से हुए तीन बच्चे अपने पिता के पास ही रहते हैं। महफूज की दूसरी पत्नी से भी एक पुत्र है। पहली पत्नी अपने बच्चों से मिलने करीब दो वर्ष पूर्व आई थी। जुबैल एटा के रानी अवंतीबाई पब्लिक स्कूल में दूसरी कक्षा का छात्र है। उस दिन वह सुबह सात बजे घर से अपनी साइकिल पर स्कूल के लिए निकला था, लेकिन उसके मन में अपनी माँ से मिलने की धुन सवार थी। यह सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि जुबैल ने अपने माँ-बाप के तलाक के बाद अपने आप को कितना अकेला महसूस किया होगा, बेचैनी में कितनी रातों तक वह सोया नहीं होगा, वह अकसर अपने पिता से माँ से मिलाने को कहता रहा।
एक बच्चा जैविक, भौतिक एवं मानसिक अपनी हर आवश्यकताओं के लिए माँ की ओर ही देखता है और माँ उसकी भाषा एवं मनोभावों को समझकर उसकी सारी आवश्कताओं को पूरा करती है। कभी उसे भूख भी लगती है तो वह हमेशा बोलकर नहीं माँगता बल्कि दूसरे बहाने कर-करके रोता है, माँ उसकी मानसिकता को पढ़कर कभी लाड़ से तो कभी डाँटकर खिलाती है। इस उम्र में दुनिया-जहान के बेशुमार प्रश्न उसके जेहन में पैदा होते रहते हैं, वह अपने माता-पिता से ही सहज समाधान पाता है। अनेक आवश्यकताओं के अलावा उसे नींद भी माँ की ही थपकी से आती है और माँ-बाप के सुरक्षा कवच के अंदर सपनों की दुनिया में खो जाता है। एक बच्चे का पूरा व्यक्तित्व उसके माता-पिता के सामूहिक पालन-पोषण पर ही फलित होता है।
जब से हम इस तथाकथित आधुनिकता के भ्रमजाल में फँसे हैं, अपने परिवार और समाज से कटते चले जा रहे हैं। एक समय वह भी था, जब बच्चा अपने माता-पिता से ज्यादा दादा-दादी, नाना-नानी, चाचा-चाची, मामा-मामी एवं बुआ-मौसियों से भरे घर में पलता और बढ़ता था, परंतु धीरे-धीरे, खासकर शहरी समाज में सबसे कटता-सिकुड़ता बच्चा सिर्फ अपने माँ-पिता के बीच का होकर रह गया; अब तो स्थिति यह हो गई कि बच्चे को अपने माँ या बाप से भी बिछुड़कर घुट-घुटकर जीना पड़ रहा है। जुबैल जैसे मुस्लिम बच्चों की त्रासदी का तो क्या कहना, जिसने तलाक के बाद माँ को भी खोया और बाप की नई शादी के बाद पिता को भी। नई शादी के बाद बाप भी वैसा कहाँ रह पाता है, जिस लाड़-प्यार का वह आदी रहता आया है।
माँ-बाप सिर्फ अपने-अपने निजी स्वार्थ, जरूरतों या एक-दूसरे से बदले की भावना के वसीभूत होकर तलाक ले लेते हैं और अपने मासूम बच्चों को उनके मूलभूत अधिकारों से वंचित कर उसे अकेलेपन से जूझने के लिए छोड़ देते हैं। बच्चा अकेलेपन में अंदर-अंदर टूटता-बिखरता रहता है और एक भग्न हृदय और भग्न मस्तिष्क वाला व्यक्तित्व तैयार होकर समाज के बीच आता है, जिसके कारण हिंसा के अनेक रूप नित नए रूप में सामने आते हैं।
कुछ वर्ष पहले ऑस्ट्रेलिया में वहाँ के लोगों के ज्यादा हिंसक होने पर एक शोध कराया गया था, उसका निष्कर्ष था कि ऑस्ट्रेलिया के द्वीपों पर जब ब्रिटेन ने 17वीं और 18वीं शताब्दी में वहाँ के मूल निवासियों को खदेड़कर कब्जा किया तो वहाँ ब्रिटेन के लोगों को बसाना प्रारंभ किया, जिसमें बहुत बड़ी संख्या में अपने माँ-पिता से अलग कर बच्चों को भी जबरन बसने भेज दिया गया था। अपने माता-पिता एवं सगे-संबंधियों से बिछुड़कर वे हिंसक होते चले गए, वहाँ के मूल आदिवासियों के ऊपर अनेक अत्याचार किए। उनका हिंसक मनोभाव सदियों बाद अनेक पीढ़ियों के बाद उनके अभी के वंशज भी इसी प्रवृत्ति से मुक्त नहीं हो पाए हैं।
हम एक ऐसे हत्यारे समय में जीने को अभिशप्त हैं, जहाँ हर घड़ी मीडिया में वीभत्स तरीके से नृशंस हत्याएँ परोसी जा रही हैं। कहीं कोई किशोर अपने माता-पिता की हत्या कर रहा है, तो कहीं बाप ही मासूम बच्चों समेत पूरे परिवार का खात्मा कर रहा है, कोई पति अपनी पत्नी की हत्या कर रहा है तो कहीं पत्नी ही अपने पति को सुपारी देकर मरवा रही है। व्यापार, राजनीति, आपसी रंजीश, रोडरेज, और पार्किंग के लिए आए दिन होने वाली हत्याएँ तो आम हैं। हमारी संवेदनाएँ इतनी कुंद होती जा रही हैं। हम मुश्किल से ठहरकर इन सब के पीछे के कारणों पर गहराई से सोच पाते हैं कि हिंसा के अनेक कारणों में से एक बहुत बड़ा कारण परिवार के हिंसक माहौल में बच्चों का पालन-पोषण है।
सदियों पहले ब्रिटेन ने अपने देश के बच्चों को उनके माता-पिता और घर-समाज से अलग कर ऑस्ट्रेलिया के द्वीपों में वहाँ के आदिवासियों को उजाड़ते हुए हिंसा का जो बीज-वपन उनमें किया, कई पीढ़ियों के बाद हिंसा की वह विषबेल आज भी फल-फूल रही है। हमारे बच्चे पहले संयुक्त परिवार और अब माता-पिता से भी विलगित होकर जिस उदास-उजाड़ टापू में पलने को अभिशप्त हो रहे हैं, वह हमारे समाज रूपी समुद्र में नित नए हिंसक ज्वार ला रहा है और परिवार का पूरा ताना-बाना बिखर रहा है। मासूम जुबैल दिल्ली तक दस्तक देने का प्रयास करते हुए मिन्नतें कर रहा है कि मुझे मेरी माँ से मिला दो, मेरा हँसता-खेलता बचपन बचा लो! 



Thursday, October 11, 2018


आयुष्मान भारत का सपना
जौनपुर चंदवक थाना क्षेत्र के भूलनडीह गाँव निवासी दुर्गा यादव 2001 में किसी गंभीर बीमारी से ग्रसित हो गया, जौनपुर और आस-पास इलाज कराने का भरसक प्रयास किया, परंतु ठीक नहीं हुआ। बीमारी से परेशान वह अपने रिश्तेदार के पास मुंबई गया। रिश्तेदार उसे चर्च लेकर गया, जहाँ पादरी इलाज के साथ-साथ प्रार्थना भी कराने लगा। उसकी बीमारी ठीक हो गई, पादरी ने उसे पूर्ण रूप से विश्वास दिला दिया कि उसकी बीमारी प्रभु यीशू के प्रार्थना से ही ठीक हुई है और ईसाई धर्म अपना लेने से सारे शारीरिक एवं मानसिक कष्टों से छुटकारा मिल जाता है। वह धर्म बदलकर ईसाई बनगया। उसकी सोच एकदम बदल चुकी थी। वह जब 2007 में गाँव वापस आया तो देखते-देखते कुछ ही कुछ ही वर्षों में भूलनडीह समेत जौनपुर तथा उसके आस-पास के तीन जिलों आजमगढ़, वाराणसी व गाजीपुर के 250 गाँवों में धर्म परिवर्तन का नेटवर्क फैला दिया। दुर्गा यादव अब तक दस हजार से ज्यादा लोगों को हिन्दू से ईसाई धर्म में परिवर्तित कर चुका है। गाँव-गाँव में विशेष चर्च व प्रार्थना सभा बन चुके हैं। प्रत्येक रविवार व मंगलवार को विशेष प्रार्थना सभा होती है, जिसमें जटिल रोगों व प्रेतबाधा से मुक्ति के नाम पर लोगों को आकर्षित किया जाता है। गरीबी, अशिक्षा तथा अनेक शारीरीक व मानसिक बीमारियों से त्रस्त लोग पादरियों के लोभ-लालच व बहकावे में आकर जमा होते हैं, बड़ी चालाकी से जिसके गले में क्रॉस की निशानी वाली ताबीज तथा हाथों में बाइबिल थमा दिया जाता है। यह दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी महत्वाकांक्षी योजना प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (आयुष्मान भारत) को 23 सितंबर को झारखंड जैसे पिछड़े आदिवासी राज्य से लॉन्च किया, जिसे इस दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य योजना भी कहा जा रहा है। अभी देश के 29 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों के 445 जिलों में यह योजना लागू होने जा रही है, क्योंकि ओडिशा, पश्चिम बंगाल, पंजाब जैसे कुछ राज्यों ने अभी इसे नहीं अपनाया है। इसके तहत 10 करोड़ परिवारों यानी करीब 50 करोड़ लोगों को सालाना 5 लाख रुपये तक के मुफ्त इलाज की सुविधा मिलेगी। इस स्कीम के तहत 10.74 करोड़ परिवारों के करीब 50 करोड़ लोग लाभार्थी होंगे। इनमें से करीब 8 करोड़ ग्रामीण परिवार हैं तो करीब 2.4 करोड़ शहरी परिवार हैं। इस तरह देश की करीब 40 प्रतिशत आबादी को इसके तहत मेडिकल कवर मिल जाएगा। लाभार्थी परिवार पैनल में शामिल सरकारी या निजी अस्पताल में प्रति साल 5 लाख रुपये तक का कैसलेस इलाज करा सकेंगे।
आज जो जौनपुर के आस-पास में हो रहा है। वह काम दशकों से देश के सुदूर गरीब, पिछड़े आदिवासी क्षेत्रों में मिशनरियों द्वारा बड़ी चालाकी से शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवा के नाम पर किया जा रहा है। वह चाहे झारखंड, ओडिशा, बंगाल हों या फिर उत्तर-पूर्व के आदिवासी क्षेत्र प्रदेश। चर्च के प्रतिनिधि सेवा के नाम पर भोले-भाले आदिवासियों को उसकी मजबूरी का फायदा उठाकर उनका धर्म परिवर्तित करते रहे हैं। उनकी हिम्मत इतनी बढ़ गई कि अब वे उत्तर प्रदेश जैसे मैदानी क्षे़त्र में, जहाँ सबकी नजर रहती है, वहाँ भी ये समाज के हाशिए पर जीने वाले लोगों की गरीबी और बीमारियों का फायदा उठाकर धर्म-परिवर्तित करने लगे। शासन हाथ पर हाथ धरे बैठा रहता है। पुलिस के मुँह को चर्च के बेसुमार पैसों से बंद कर दिया जाता है। सबकुछ धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर चलता रहा है। अनेक राजनीतिक दल एवं तथाकथित प्रबुद्ध समाज उनकी चिकनी-चुपड़ी बातों में आकर उनकी सेवा की तारीफ करते नहीं अघाते हैं। अब जबकि सर से पानी बहने लगा है और हर गाँव व समाज से अलगाव, हिंसा और सामाजिक विघटन की वारदातें सामने आने लगीं तो हाय-तौबा मची है।
हम किसी चर्च या संगठन के उपर शासन एवं सरकार की सुशासन की कमजोरियों का ठीकरा फोड़कर निश्चिंत नहीं हो सकते। आज भी समाज का बहुत बड़ा तबका स्वास्थ्य सेवाओं के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहा है। उनके पिछड़े इलाके में अस्पताल एवं डॉक्टर उन्हें सेवा देते नहीं। जिसके कारण वे बीमार होकर झोलाछाप डॉक्टरों, ओझाएवं तांत्रिक बाबाओं की शरण में जाते हैं तथा अंधविश्वासों की चपेट में आकर मानसिक बीमारी का शिकार बन जाते हैं। ऐसे में अगर कोई उन्हें उनके कष्टों से निजात दिलाने की बात करता है तो वे उन्हें अपना देवदूत मान बैठते हैं। भूलनडीह में धर्म परिवर्तन करने वाले लोगों से जब पूछा गया तो हर व्यक्ति का एक ही जवाब था कि चर्च उसके शारीरिक और मानसिक परेशानियों को दूर कर रहा है।
ऐसी परिस्थिति में प्रधानमंत्री जन आरोग्य जैसी योजनाएँ इन पिछड़े लोगों के लिए तो रामबाण साबित हो सकता हैं, बशर्ते कि इस योजनानुसार पूरी सरकारी मशीनरी इसे सफल बनाने का गंभीर प्रयास करे। जन आरोग्य योजना में निजी अस्पतालों को भी बहुत बड़ी जिम्मेदारी दी गई है। सिर्फ पैसे के लिए उनके द्वारा आजमाए जा रहे अनेक तरह के धतकर्मों को देखकर इनसे बहुत आशा तो नहीं जगती। सरकार द्वारा मुहैया कराए जा रहे पाँच लाख को आसानी से हड़पने के लिए वे कितने तरीके निकाल लेंगे, इसका अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है।
सरकार जब तक सरकारी क्षेत्र के अस्पतालों का विस्तार एवं उनकी सेवा गुणवत्ता पर विशेष ध्यान नहीं देगी, तबतक लोगों को इन परेशानियों से निजात नहीं मिलेगी। लोगों को अपने कष्टों से निजात चाहिए, और सरकारों को इनकी मूलभूत आवश्यकताओं की पूरी जिम्मेदारी लेनी होगी। इसको पैसों एवं आँकड़ों से नहीं मापा जा सकता कि कितने पैसों का बीमा दिया गया है। पैसे देखकर तो निजी स्कूल एवं अस्पताल व्यापार करते हैं। सरकार से तो लोग सेवा एवं सुशासन की ही आशा करते हैं, जो उनका अधिकार भी है। केन्द्र सरकार की इस योजना को स्वास्थ्य क्षेत्र में सुधार के लिए उठाया गया एक मजबूत कदम कह सकते हैं, परंतु गाँव से लेकर शहरों तक सुविधायुक्त सरकारी अस्पतालों के विस्तार से ही यह योजना सफल हो सकेगी। हम यही आशा करते हैं कि सभी को आयुष्मान बनाने का केन्द्र सरकार का सपना साकार हो, ताकि किसी व्यक्ति एवं समाज को अंधविश्वासों के अंधकूप में गिरकर तिल-तिलकर मरना न पड़े।

Friday, September 7, 2018


साक्षर को शिक्षित करने की चुनौती
सामान्य अर्थ में साक्षर वह कहलाता है जो सहज तरीके से पढ़ने, लिखने एवं सरल गणितीय समस्याओं को हल करने की क्षमता हासिल कर ले। एक साक्षर व्यक्ति से यह उम्मीद की जाती है कि वह हस्ताक्षर करने से पहले किसी दस्तावेज को पढ़ सके, सड़क के संकेतों को समझ सके, तथा रोजमर्रा के हिसाब-किताब को रख सके ताकि सहज ढंग से दैनिक गतिविधियों को संचालित किया जा सके। आंकडों के संदर्भ में देंखे तो भारत में साक्षरता के आंकड़े सालोसाल बढ़ रहे हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार 74.04 प्रतिशत साक्षरता थी जबकि इस समय 2018 में साक्षरता लगभग 80 प्रतिशत है, जो कि विश्व की औसत साक्षरता दर 84 प्रतिशत से कम है। अगर हम अनेक किंतु-परंतुओं को परे रखकर आंकड़ों में मूल्यांकन करें तो ठीक-ठाक प्रगति मानी जा सकती है।
शिक्षा एक व्यापक अवधारणा है। शिक्षित होने के लिए साक्षरता सहायक तो हो सकती है, अनिवार्य नहीं। भारतीय संदर्भ में अनेक संत-महात्मा, लोककवि, अनेक शासक एवं सामान्य जन, प्रकांड विद्वान एवं ज्ञानी हुए, इस ज्ञान परंपरा में निरक्षरता कभी बाधा नहीं बनी। शिक्षा सिर्फ डिग्री प्राप्त करने और परीक्षा पास करने की मोहताज नहीं है। शिक्षा लोगों को ज्ञान के माध्यम से एक संपूर्ण मानव बनाती है। यह दिमाग के नित नए दरवाजे-खिड़कियां खोलकर चीजों को नए तरीके से समझने में मदद करती है। यह इंसान को अनेक पूर्वग्रहों, अंधविश्वासों आदि से छुटकारा पाने तथा तार्किक, जनतांत्रिक बनाकर समभाव एवं सहयोग के माध्यम से मानव मूल्यों के लिए संघर्ष करने में सक्षम बनाती है।
हिन्द स्वराजमें गांधीजी ने लिखा है कि ‘‘तालीम (शिक्षा) का अर्थ अगर सिर्फ अक्षर ज्ञान ही हो, तो वह तो एक साधन जैसा ही हुआ। उसका अच्छा उपयोग भी हो सकता है और बुरा भी। एक शस्त्र से चीर-फाड़ करके बीमार को अच्छा किया जा सकता है और वही शस्त्र किसी की जान लेने के काम में लाया जा सकता है।’’ गांधी की शिक्षा की मंशा बच्चों को सुधार-सँवार कर आदर्श नागरिक बनाना है। उनका मानना था कि बुनियादी शिक्षा हिंदुस्तान के तमाम बच्चों को हिंदुस्तान की सभ्यता और संस्कृति के अनुरूप बनाती है। यह तालीम बालक के मन और शरीर दोनों का विकास करती है। संक्षेप में गांधीजी के शिक्षा का उद्देश्य जीविकोपार्जन, चारित्रिक विकास, सांस्कृतिक विकास, व्यक्ति और समाज का विकास, सामाजिक पुनर्निर्माण, सदाचार और नैतिकता, राष्ट्रीय एकता, आत्मानुभूति, ईश्वर प्राप्ति तथा व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास है।
आधुनिक जीवन में साक्षरता की भूमिका बहुत बढ़ गई है। आज जीवन के किसी भी क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए साक्षरता ही तो प्राथमिक सीढ़ी है। भारत के बच्चों को दो तरह से साक्षर किया जा रहा है एक तो वह जिसे सरकारी स्कूल कहा जाता है, जिसमें दोपहर के भोजन के लालच में बच्चे स्कूल जा रहे हैं और जैसे-तैसे साक्षर होकर देश की साक्षरता के आंकड़े दुरुस्त करने में सरकार का सहयोग कर रहे हैं और अकुशल बेरोजगारों की फौज में शामिल हो रहे हैं। दूसरे विशेष साक्षरता वाले अंग्रेजी माध्यम के वे पब्लिक स्कूल हैं, जो मोटी फीस लेकर कामयाब होने वाले विशेषज्ञ साक्षर पैदा कर रहे हैं। इस वर्ग में शिशु के पैदा होने के दो साल के अंदर ही प्ले स्कूलों के माध्यम से ही साक्षरता प्रारंभ हो जाती है जो तब कहीं जाकर रुकती है जब वह कोई प्रशासनिक अधिकारी, डॉक्टर, इंजीनियर, प्रबंधक, पत्रकार प्रोफेसर, वकील आदि बनकर अपने-अपने क्षेत्रों में सफलता का परचम फहराता है। इसके लिए हर बच्चे के माँ-बाप सबकुछ करने को तैयार हैं, जिसमें कोई समझौता, कोई कीमत मायने नहीं रखती, बस उसे किसी तरह सफलता मिल जाए!
इतने समझौते और संघर्ष के बाद जब वह बच्चा सार्वजनिक जीवन में प्रवेश करता है तो उन्हें वास्तविक अर्थ में शिक्षित माना जा सकता है? अगर ऐसा हो गया होता तो क्या आज भी पद के अनुरूप दहेज की कीमत तय होती? हर विभाग के अंदर भ्रष्टाचार से सामान्य लोगों का जीना दूभर रहता? डॉक्टरों के रहते गरीब मरीज लाइलाज मरते? इसी का एक तबका आतंकवाद और नक्सलवाद में शामिल होता? इसी तरह इंजीनियर, सी.ए, शिक्षक, प्रोफेसर आदि अनेक क्षेत्रों के कितने लोग दावे के साथ कह सकते हैं कि वे राष्ट्रनिर्माण व व्यापक सामाजिक हित के लिए कर्तव्यों का ईमानदारी पूर्वक निर्वहन कर रहे हैं? अगर अपनी सफलता का दोहन सिर्फ निजी स्वार्थ पूर्ति के लिए ही करना है तो फिर ये किस मायने में शिक्षित हुए? इन्हें ज्यादा से ज्यादा सिर्फ विशेष डिग्रीधारी साक्षर माना जा सकता है, जो अपनी विशेष साक्षरता का उपयोग एवं दुरुपयोग सिर्फ अपने निजी भौतिक स्वार्थ के लिए करते हैं।
आज के दौर में देश और समाज को अनपढ़ों से ज्यादा खतरा दोनों तरह से तैयार किए जा रहे साक्षर कुपढ़ों से है। हर दिन गाँव, कस्बों एवं शहरों में हिंसा, बलात्कार एवं सार्वजनिक संपत्तियों का विनाश का एक नया वीभत्स रूप सामने आ रहा है। जिसे सोशल मीडिया के माध्यम से त्वरित गति से फैलाया जा रहा है। वह इन्हीं साक्षर कुपढ़ों की कारस्तानी है। दूसरी तरफ डिग्रीधारी विशेष बौद्धिक साक्षर वर्ग, जिसमें साहित्यकार, लेखकों एवं पत्रकारों का भी एक तबका नित घटने वाली अनेक तरह की हिंसा, उपद्रव और बलात्कार जैसी शर्मनाक घटनाओं के तथ्यों एवं आंकड़ों को तोड़-मोड़कर पद और प्रतिष्ठानों में जगह पाने के लिए दलीय राजनीति में फंसकर बड़ी बेशर्मी से वैमनस्य फैलाने में सूत्रधार की भूमिका निभा रहे हैं। 
यह नहीं कहा जा सकता है कि इन दोनों माध्यमों से निकले साक्षरों में शिक्षित कोई है ही नहीं, अगर नहीं होता तो पूरी व्यवस्था ध्वस्त हो जाती। इन्हीं माध्यमों से निकला एक समूह अपने परिवार, समाज और अच्छे शिक्षकों एवं स्वयं के प्रयास से शिक्षित होकर राष्ट्रनिर्माण और समाजसेवा में जी-जान से लगा है। परंतु कुपढ़ साक्षर आज हर जगह हावी होते जा रहे हैं। आज निरक्षरों को साक्षर करने से भी बड़ी चुनौती इन साक्षरों को सही मायने में शिक्षित करने की है। इन्हें मानवता और भारतीय जीवन मूल्यों के अनुरूप शिक्षित नहीं किया गया तो आनेवाले समय में परिवार, समाज, राजनीति, पर्यावरण जैसे अनेक क्षेत्रों में अनेक तरह की हिंसा, विघटन एवं विध्वंस अभी से कई गुणा बढ़ने वाले हैं। 



निर्मल हृदय की निर्ममता
रांची स्थित निर्मल हृदयमें मासुम बच्चों को बेचने की खबरों से सालों पहले घटी एक दुखद घटना बरबस याद आ गई। मैं इंटर पास करके दिल्ली आगे की पढ़ाई करने आया था। मेरे बड़े भाई मदनगीर के पास दक्षिणपुरी में झुग्गी बासिंदो के लिए 20 गज की जमीन पर बने कमरे में किराये पर रहते थे। दिन में वे ऑफिस चले जाते थे और मैं ज्यादातर कमरे पर ही रहता था। बगल में ही रहने वाला एक लड़का दीपक जो मुझसे कुछ छोटा यानी 15-16 साल का, सुंदर, लंबा और छरहरा किशोर था। हमेशा मेरी सहायता करने के लिए तत्पर रहता, अक्सर शाम को पास के किसी पार्क मंदिर या मार्केट घुमाने ले चलता। एक दिन दोपहर में कुछ पढ़ते हुए आंखे लग गई थीं। नीचे गली में एकाएक बड़ा शोर सुनाई पड़ा देखा तो लोमहर्षक दृश्य देखकर आवाक् रह गया। पता चला कि दीपक विराट सिनेमा के पास मैदान में दोस्तों के साथ खेल रहा था, किसी बात पर लड़ाई हुई और किसी लड़के ने उसके सीने में बड़ा सा चाकू जोरों से घुसेड़ दिया। वह लहू से लथपथ तीव्र गति से माँ...माँऽऽऽ...चिल्लाते हुए करीब एक किलोमिटर की दूरी चंद मिनटों में ही तय करके अपनी गली में खाट पर बैठी अपनी माँ की छाती में समाता चला गया और कुछ ही पलों में दम तोड़ दिया। उसकी आखें जड़ हो गईं, मां पत्थर बन गई! पूरी गली स्तब्ध जहाँ का तहाँ जम गयी थी।
बीमार, असहाय, गरीबों को सहारा देनेवाली, संवेदना और ममता की प्रतिमूर्ति मानी जानेवाली मदर टेरेसा, जिन्हें भारत रत्न, नोबेल पुरस्कार, तथा मृत्यु के बाद संत का दर्जा दिया गया। उनकी संस्था मिशनरीज ऑफ चौरिटीकी ओर से संचालित संस्था निर्मल हृदयपर बड़ी मात्रा में बच्चे को बेचने एवं मानव तस्करी में संलग्न पाया गया है। झारखंड की राजधानी रांची स्थित निर्मल हृदयकी संचालिका सिस्टर कोंसिलिया बाखला, सिस्टर मेरिडियन और कर्मचारी अनिमा को 4 जुलाई को गिरफ्तार कर लिया गया है। पुलिस को दिए बयान के मुताबिक सिस्टर कोंसिलिया ने स्वीकारा है कि उसने अब तक छह बच्चों को अवैध तरीके से बेचा है। यह मामला तब खुला जब यूपी के सोनभद्र जिले के ओबरा निवासी सौरभ अग्रवाल बाल कल्याण समिति के पास शिकायत लेकर पहुंचे कि उन्हें उनका बच्चा वापस नहीं दिया जा रहा है। इस बच्चे को उन्होंने पाँच मई को 1.20 लाख रु. में खरीदा था।
एफआईआर में दर्ज जानकारी के मुताबिक गुमला की एक रेप पीड़िता अविवाहित लड़की ने बीते एक मई को रांची सदर अस्पताल में बच्चा को जन्म दिया। इस नवजात को कर्मचारी अनिमा इंदवार तथा सिस्टर कोंसिलिया ने अग्रवाल दंपती को बेच दिया। इधर 30 जून को सीडबल्यूसी के सदस्यों ने संस्था का दौरा किया था। इससे डरकर अनिमा ने उसी दिन अग्रवाल दंपति को फोन कर कहा कि बच्चे को अदालत में पेश करना है, उसे लेकर रांची आ जाइए। उन्होंने बच्चे को दो जुलाई अनिमा को दे दिया। तीन जुलाई को बच्चे की जानकारी लेने वह संस्था पहुंचे, जहाँ उन्हें बच्चे से नहीं मिलने दिया गया। इसके बाद उसी दिन उन्होंने इसकी शिकायत सीडबल्यूसी से की। सूचना मिलते ही चेयरमैन रूपा कुमारी निर्मल हृदयपहुंची।
बाल कल्याण समिति, जिला समाज कल्याण अधिकारी, पुलिस तथा अन्य अधिकारियों की प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि निर्मल हृदय में रहीं पीड़िताओं जिनमें बिन ब्याही मां, रेप की शिकार बेसहारा लड़कियां-महिलाएं जो बच्चा जनने वाली होती हैं, उन्हें निर्मल हृदयमें रखा जाता है। इन्हीं से जन्मे और शिशु भवन में रखे गए 280 बच्चों का कोई अता-पता नहीं है। अब तक की जांच के दौरान जब्त किए गए कागजात के अनुसार 2015 से 2018 तक उक्त दोनों जगहों (निर्मल हृदय, शिशु भवन) में 450 गर्भवती पीड़िताओं को भर्ती कराया गया। इनसे जन्मे 170 बच्चों को बाल कल्याण समिति के समक्ष प्रस्तुत किया गया या जानकारी दी गई। शेष 280 बच्चों का कोई अता-पता नहीं है।
इस काले धंधे से जुड़े लोगों की पहुँच इतनी है कि बच्चों की खरीद-बिक्री के खेल पर हाथ डालने वाले सीडब्ल्यूसी के तत्कालीन अध्यक्ष ओमप्रकाश सिंह और सदस्य मु.अफजल जब 2015 में डोरंडा स्थित शिशु भवन का निरीक्षण करने गए थे। इस दौरान उन्हें वहां घुसने से रोका गया, जबरन जांच के लिए घुसे तो छेड़छाड़ का आरोप लगाकर साजिश के तहत बर्खास्त करा दिया गया। इसके बाद लंबे समय तक अध्यक्ष का पद खाली रहने के बाद अपने अनुकूल जहांआरा को प्रभारी अध्यक्ष बनवाया गया ताकि वे मिलजुलकर इस कुकृत्य को चलाते रहें।
मदर टेरेसा पर उनके जीते जी और मरने के बाद भी देश-विदेश के अनेक लोगों ने समाजसेवा के नाम पर धर्म परिवर्तन करवाने तथा तथा दुनिया भर से चंदे के रूप में मिलने वाले अरबों रुपयों का गलत इस्तेमाल का आरोप लगता रहा है। जिसपर अधिकांश लोगों ने ध्यान नहीं दिया तथा उन्हें असहायों की माँ मानते रहे और उनकी संस्थाओं को सम्मान देते रहे। परंतु अब जब निर्मल हृदय की अनेक शाखाओं द्वारा बच्चों को बेचने और मानव तस्करी के नित नए प्रमाण मिल रहे हैं तो यह बड़ा विश्वासघात है।
बीसेक साल पहले दिल्ली के दक्षिणपुरी के दीपक को किसी ने चाकू मारा वह जनून में आखिरी दम तक मौत से संघर्ष करते हुए माँ के आंचल में समा जाना चाहता था उसे यह एहसास था कि यहाँ सारे कष्टों से मुक्ति मिल जाएगी। असहाय, अत्यंत दुखी और बलात्कार की शिकार अनेक लड़कियां और औरतें भी इसी आशा से निर्मल हृदय की शरण लेती हैं कि वहां उन्हें एक नया जीवन मिलेगा, परंतु निर्मल हृदयमें तो उनके मजबूरियों को ही व्यापार में बदलकर मानव तस्करी की जा रही है। यह तो ठीक यही बात हुई कि दीपक मरणांतक पीड़ा से चीत्कार करते हुए आ रहा हो, उधर उसकी माँ मानव अंग के तस्करों से पहले से ही सौदा कर तैयार रखा हो कि जैसे ही दीपक आए मरने से पहले ही उसके सारे अंगों को निकाल-निकालकर बेच दे। निर्मल हृदयकी निर्मम हृदयहीनता मानव समाज एवं सभ्यता की बहुत बड़ी त्रासदी है!


Friday, June 22, 2018


योग हमें प्रकृतिस्थ बनाता है
प्रकृति दो शब्दों से बना है प्र+कृति प्र का अर्थ है प्रकृष्ट, सर्वोत्तम। कृति का अर्थ है रचना। अर्थात ऐसी रचना, जो सर्वोत्तम है। उपभोगवादी अप्राकृतिक जीवन शैली अपनाकर हम सर्वोत्तम रचना प्रकृति का विनाश करते चले जा रहे हैं। योगहमें प्रकृतिस्थ बनाता है। योग का अर्थ है जुड़ना। योग की विभिन्न क्रियाओं के माध्यम से हम प्रकृति से जुड़ते हैं। प्रकृति ही हर जीव-जाति के लिए जीने के साधन जुटाती रही है। पृथ्वी पर साफ पानी, साफ हवा और वनस्पति तथा खनिज उपलब्ध कराती है। आज हमारी प्रकृति और पर्यावरण खतरे में है। ऐसे में योग ही ऐसा माध्यम है, जो जीवन की होड़ और दौड़ को सही रास्ते पर लाने में मार्गदर्शन कर सकता है।
आदियोगी शिव प्रकृतिपुरुष हैं। शिव ही महायोगी हैं। शिव प्रथम गृहस्थ हैं। यह सुनने में भले ही अटपटा लगे परंतु वास्तविकता यही है कि प्रकृतिपुरुष शिव स्वयं परस्पर विरोधी शक्तियों के बीच सामंजस्य बनाए रखने के सुंदरतम प्रतीक हैं। शिव का जो प्रचलित रूप है, वह है शीश पर चंद्रमा और गले में अत्यंत विषैला नाग। चंद्रमा आदिकाल से ही शीतलता प्रदान करने वाला, लेकिन नाग? अपने विष की एक बूँद से किसी भी प्राणी के जीवन को कालकवलित कर देने वाला। अनियंत्रित उर्जाप्रवाह यानी गंगा को अपनी जटाओं में बाँधकर नियंत्रित करने वाले और समुद्रमंथन से निकले हलाहल को कंठ में धारण करनेवाले नीलकंठ। कैसा अद्भुत संतुलन है। शिव अर्धनारीश्वर हैं। पुरुष और प्रकृति (स्त्री) का सम्मिलित रूप। वे अर्ध नारीश्वर होते हुए भी कामजित हैं। प्रकृति यानी पार्वती उनकी पत्नी हैं, लेकिन हैं वीतरागी। शिव गृहस्थ होते हुए भी श्मशान में रहते हैं। मतलब काम और संयम का सम्यक संतुलन। भोग भी, विराग भी; शक्ति भी, विनयशीलता भी। आसक्ति इतनी कि पत्नी उमा के यज्ञवेदी में कूदकर प्राण दे देने पर उनके शव को लेकर शोक में तांडव करने लगते हैं। विरक्ति इतनी कि पार्वती से शिव के विवाह की प्रेरणा पैदा करने के लिए प्रयत्नशील कामदेव को भस्म करने के बाद वे पुनः ध्यानरत हो जाते हैं।
योगिक संस्कृति में शिव को ईश्वर नहीं, आदि योगी माना जाता है। यह शिव ही थे, जिन्होंने मानव-मन में योग का बीज बोया।योग विद्या के मुताबिक 15 हजार साल से भी पहले शिव ने योग सिद्धि प्राप्त की और हिमालय पर एक प्रचंड और भाव विभोर कर देने वाला नृत्य किया। कुछ देर वे परमानंद में पागलों की तरह नृत्य करते, फिर शांत होकर पूरी तरह से निश्चल हो जाते। इस अनोखे अनुभव के बारे में लोग अनजान थे, आखिरकार लोगों की दिलचस्पी बढ़ी और वे इसे जानने को उत्सुक होकर धीरे-धीरे उनके पास पहुँचे। लेकिन उनके हाथ कुछ नहीं लगा, थक-हारकर वापस लौट आए। परंतु उनमें से सात लोग थोड़े हठी किस्म के थे। उन्होंने ठान लिया कि वे शिव से इस राज को जानकर ही रहेंगे।
शिव ने उन्हें डराया, कहा इस रहस्य को जानने के लिए बहुत कठिन साधना की आवश्यकता है। तुम लोग कभी इसे हासिल नहीं कर पाओगे। उन्होंने शिव की बात को चुनौती की तरह लिया, वर्षों-वर्ष साधना करते रहे, लेकिन शिव थे कि उन्हें नजरअंदाज करते जा रहे थे। उनकी 84 साल की लंबी साधना के बाद शिव ने इन तपस्वियों को देखा तो पाया कि हाँ, अब ये इतने पक चुके हैं कि योग का ज्ञान हासिल कर सकते हैं। अब उन्हें और नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इनका गुरु बनने का निर्णय लिया। इस तरह शिव स्वयं आदिगुरु बने। तभी से इस दिन को गुरु पूर्णिमाकहा जाने लगा। केदारनाथ से थोड़ा ऊपर जाने पर एक झील है, जिसे कांति सरोवर कहते हैं। इस झील के किनारे शिव दक्षिण दिशा की ओर मुड़कर बैठ गए और अपनी कृपा लोगों पर बरसाने लगे। इस तरह आम जन में योग विज्ञान का संचार हुआ।
शिव के दो रूप हैं, सौम्य और रौद्र। जब शिव अपने सौम्य रूप में होते हैं, तो प्रकृति में लय बनी रहती है। पुराणों में शिव को पुरुष और प्रकृति का पर्याय माना गया है। यानी पुरुष और प्रकृति का सम्यक संतुलन ही आकाश, पदार्थ, ब्रह्मांड और ऊर्जा को नियंत्रित रखते हुए गतिमान बनाए रखता है। प्रकृति में जो कुछ भी है, आकाश, पाताल, पृथ्वी, अग्नि, वायु, सबमें संतुलन बनाए रखने का नाम ही शिवत्व है। वेदों में शिव को रुद्र कहा गया है। काफी बाद में रचे गए पुराणों और उपनिषदों में रुद्र का ही नाम शिवहो गया और रौद्र स्वरूप में रुद्रको जाना गया। वस्तुतः प्रकृति और पुरुष के बीच असंतुलन होने के परिणामस्वरूप रौद्र रूप प्रकट होता है। प्रकृति में जहाँ कहीं मानव असंतुलन की ओर अग्रसर हुआ है, तब शिव ने रौद्र रूप धारण किया है। लय और प्रलय में संतुलन बनाए रखने वाले शिव की भूमि रुद्रप्रयाग, चमोली, उत्तरकाशी तथा अन्यत्र अनेक प्राकृतिक आपदा इसके उदाहरण हैं।
हमें योगी शिव के समन्वयी स्वरूप का ध्यान करना चाहिए। अपने भीतर के संतुलन के साथ-साथ प्रकृति के संतुलन को भी बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए। तभी जीवन में लय को कायम रख सकेंगे। योगिक क्रियाओं के माध्यम से योग इंसान को अपने अंदर अनेक तरह के बीमारियों एवं दूषित विचारों को दूर करने का अवसर देता है। योग हर इंसान को स्वयं को नियंत्रित कर प्रकृतिस्थ यानी सरल-सहज बनाता है। यह स्वस्थ मन, स्वस्थ तन, स्वस्थ पर्यावरण एवं स्वस्थ समाज की ओर लौटने का अवसर देता है। मानव द्वारा अपने निजी स्वार्थ, लोभ और लालसा के लिए पर्यावरण का इतना विनाश करने के बावजूद, अभी भी हमारे पास रामबाण इलाज योगहै, जिसके माध्यम से हम इस ब्रह्मांड और मानव सभ्यता को बचा सकते हैं। यदि हम अभी भी नहीं चेते और अनियंत्रित अप्राकृतिक उपभोगवाद की ओर भागते रहे तो सर्वस्व विनाश से कोई नहीं बचा सकता। शिव जब शक्ति यानी प्रकृति युक्त होता है, तभी समर्थ और रचनात्मक होता है। शक्ति के वियोग में शिव भयंकर विनाशकारी नृत्य करते हैं!

Wednesday, May 2, 2018


विभाजन नहीं, विविधता चाहिए
जनतंत्र में चुनाव ही वह मौका होता है, जब मतदाता सत्ताधारी दल और विपक्षी दलों का हिसाब-किताब लेते हैं। वादों एवं विकास के मुद्दों पर उन्हें घेरते हैं और अपनी जरूरतों, उनकी घोषणाओं एवं संकल्पों पर संवाद करते हैं। कर्नाटक में विधानसभा चुनाव होने वाला है। पिछले पाँच सालों से मुख्यमंत्री सिद्धारमैया की कांग्रेस सरकार विकासात्मक कार्यों की डींगें हाँकती रही, मगर चुनाव के ठीक पहले ऐसी विभाजनकारी नीतियों को हवा दे दी है जो समाज, राज्य और देश के लिए घातक सिद्ध होने वाली हैं। उन्होंने सबसे पहले कर्नाटक राज्य के अलग झंडे की वकालत करते हुए केन्द्र सरकार को इसे मान्यता देने की माँग की, दूसरा लिंगायत समाज को हिन्दू धर्म से अलग धर्म की मान्यता देकर उसके लिए अल्पसंख्यक दर्जे की सिफारीश की।
लिंगायत शिव के उपासक हैं। इसकी स्थापना 12वीं सदी के समाज सुधारक और दर्शनशास्त्री संत बसवेश्वर के द्वारा हुई थी। संत बसवेश्वर का काल सभी तरह की संकीर्णताओं से आक्रांत था। बसवेश्वर बीच-बाजार और चौराहे के संत थे। वे आम जनता से अपनी बात पूरे आवेग और प्रखरता के साथ करते थे। जाति रहित समाज की स्थापना करने और भेदभाव तथा छुआछूत मिटाने के लिए उन्होंने ऊँची जाति ब्राम्हण कन्या रत्नाका विवाह नीची जाति के दलित, अस्पृश्य शीलवंतनामक युवक से करवाया। जिसका मूल्य उन्हें अपने सबसे प्रिय शिष्य के बलिदान से चुकाना पड़ा था। उन्होंने उसी काल में आदर्श संसद (अनुभव मंडप) का निर्माण किया था, जिसमें पुरुष और महिलाएँ तथा समाज के सभी वर्ग एवं जाति के लोगों की समान संख्या में भागीदारी थी। वे खुले वातावरण में बहस को प्रोत्साहित करते थे, जिसका रूप आज हमें संसदीय लोकतंत्र के रूप में देखने को मिलता है।
8वीं शताब्दी में दक्षिण भारत में जो अनेक भक्ति आंदोलन हुए, वहीं से लिंगायत समाज का उद्भव माना जाता है। लिंगायत यदा-कदा खुद को हिन्दू धर्म से अलग धर्म की मान्यता देने की माँग करते आये हैं। उनकी अपनी अलग पहचान को मुश्किल बनाता है उनमें और वीरशैव में समानता। हिन्दू धर्म में वीरशैव एक शैव समाज है। इसके अनुयायियों का मानना है कि संत बसवेश्वर लिंगायत समाज के संथापक नहीं, बल्कि एक समाज सुधारक थे, जो वीरशैव का हिस्सा है। वीरशैव जहाँ वेद और जाति व्यवस्था मानते थे, वहीं लिंगायतों ने शुरू से ही वेदों और जाति व्यवस्था को चुनौती दी।
हिन्दू धर्म को अनेक विद्वान अंग्रेजी के रिलीजन के अर्थ में धर्म न मानकर इसे हिन्दू संस्कृति की मान्यता देते हैं। सदियों से इसके अंदर से अनेक संप्रदाय बनते रहे, संग-संग पलते रहे, यहाँ तक कि एक दूसरे के विरुद्ध संघर्ष भी करते रहे, फिर भी एकमेव रहे। इस धर्म की खासियत ही सुधार के लिए संघर्ष, संवाद और सहअस्तित्व है। इस धर्म के लचीले स्वरूप में जब भी जड़ता की स्थिति निर्मित हुई, तब कोई न कोई महापुरुष ने आकर इसे गतिशीलता प्रदान कर इसकी सहिष्णुता को एक नई आभा से मंडित कर दिया। इस दृष्टि से प्राचीनकाल में बुद्ध और महावीर के द्वारा, मध्यकाल में शंकराचार्य, संत बसवेश्वर, गुरुनानक और चैतन्य महाप्रभु के माध्यम से तथा आधुनिक काल में राजा राम मोहन राय, स्वामी दयानन्द, स्वामी विवेकानन्द, महात्मा ज्योतिबा फुले, महात्मा गांधी तथा बाबा भीमराव अंबेडकर आदि अनेक सुधारकों के द्वारा किए गए प्रयास इस धर्म की धरोहर बन गए।
हिन्दू धर्मदर्शन में अनेक मत, संप्रदाय, धारा एवं वाद बनते रहे और इसकी उदारता से खुले आगोश में पुनः समाते चले गए। इसके अंदर वैष्णव, शैव तथा स्मृति हैं। वैष्णवों के अंदर अनेक उपसंप्रदाय हैं, जैसे वल्लभ, रामानंद आदि। उसी तरह शैव के अंदर दसनामी, नाथ, शाक्त आदि। सभी संप्रदाय एवं उपसंप्रदाय एक दूसरे से टकराते रहे हैं, फिर भी हिन्दू धर्म का हिस्सा बने रहे हैं। इसके अलावा चार्वाक का लोकायत दर्शन भी इसी धर्म का हिस्सा रहा है, जो न तो ईश्वर को मानता है और न ही किसी पूजा विधि को। दैहिक या भौतिक सुख ही इस दर्शन की सबसे बड़ी विशेषता है।
ऐसे में क्या चुनाव से ठीक पहले वोट की राजनीति के लिए कोई मुख्यमंत्री या सरकार हिन्दुओं को विभाजित कर नया धर्म बनाएगी? चुनावी फायदे के लिए कुछ सरकारी सुविधाओं का चारा डालकर उसे अल्पसंख्यक या पिछड़ा घोषित करेगी? क्या उनकी सरकार इसी तरह बौद्ध धर्म के संप्रदाय हीनयान, महायान, वज्रयान तथा नवयान को; जैन धर्म के दिगंबर और श्वेतांबर को; इस्लाम धर्म के शिया और सुन्नी को; ईसाइ धर्म के प्रोटेस्टैंट और रोमन कैथोलिक को पिछड़े का दर्जा देने के लिए अलग धर्म के तौर पर मान्यता देगी? उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश एन. संतोष हेगड़े ने सिद्धरमैया सरकार की आलोचना करते हुए कहा कि ‘‘किसी समुदाय को धर्म का दर्जा देने का काम सरकार का नहीं है। भारत के संविधान के तहत धर्मनिरपेक्ष सरकार है, वह किसी समुदाय के आंतरिक मामले में हस्तक्षेप करने का काम नहीं कर सकती।’’
इससे पहले सिद्धरमैया सरकार ने कन्नड़ लोगों की अस्मिता के नाम पर राज्य मंत्रिमंडल ने अलग झंडे को मंजूरी देकर गेंद केंद्र के पाले में डाल दी थी। लेकिन गृह मंत्रालय ने इसे खारिज करते हुए कहा कि झंडा कोड के तहत सिर्फ एक झंडे को मंजूरी दी गई है। इसलिए एक देश का एक झंडा ही होगा। जम्मू-कश्मीर का मामला अपवाद है, क्योंकि उसके लिए संविधान में अलग व्यवस्था है।
सवाल है कि चुनाव करीब आते ही उन्हें अलग लिंगायत समुदाय और कन्नड अस्मिता की चिंता क्यों सताने लगी? इसके पहले भी अनेक दल अनेक जाति एवं धर्म के लोगों को जो आरक्षण के दायरे में नहीं आते हैं, उनके सामने भी आरक्षण का चुग्गा डालकर वोट की फसल काटते रहे हैं। परंतु चुनाव के बाद यही वादे उनके गले की फाँस बनकर पूरे देश में जातिवादी हिंसा व नफरत का माहौल तैयार करते रहे हैं। हमारा समाज इतने सारे धर्मों, संप्रदायों, उपसंप्रदायों, जातियों, उपजातियों गोत्रों, कुलों और मूलों की अनन्त शृंखलाओं से बँधा है कि इसे जबरन छेड़ना हिंसा और अराजकता को ही न्योतना होगा। हर किसी को देश की विविधता में एकताका सम्मान करना चाहिए, न कि विभाजनकारी नीतियों को हवा देकर इसमें दरार पैदा करने का काम करना। बेहतर हो कि विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और नागरिक सुरक्षा जैसे सवाल हमारे चुनावों के मुख्य मुद्दे बनें। हमें विविधताओं से भरा भारत चाहिए, विभाजित भारत नहीं।



संसद में संवाद नहीं!
लोकतंत्र की संसदीय प्रणाली में संसद को देश की राजनीतिक, सामाजिक  आर्थिक व बहुविध आंतरिक व बाह्य स्थितियों का दर्पण माना जाता है, यानी संसद में पूरे देश के मुद्दों एवं हलचलों का प्रतिबिंब दिख जाता है कि देश किन परिस्थितियों से गुजर रहा है। परंतु लगातार कुछ वर्षों से संसद के बनावटी हुड़दंग और हंगामे को देखकर यही लगता है कि हमारे चुने गए प्रतिनिधियों को या तो जनता की अपेक्षाओं या आकांक्षाओं की समझ नहीं है या वे जानबूझकर किसी स्वार्थी हित के हाथों जनतंत्र व संसद की मर्यादा को मटियामेट कर रहे हैं। इसकी झाँकी इस महत्त्वपूर्ण बजट सेशन में देखने को मिल रही है, जिसमें विरोधी दलों द्वारा इस कदर हंगामा किया जा रहा है कि अनेक जरूरी विधेयकों एवं कार्यों की बात अगर छोड़ भी दें, यहाँ तक कि देश के भविष्य को तय करने वाला बजट तक लोकसभा में बिना कोई चर्चा-बहस के पारित हो गया। हद तो तब हो गई, जब इराक के मोसुल में आईएसआईएस के हाथों चार साल पहले बेरहमी से मारे गए 39 भारतीयों की पूरी जानकारी विदेश मंत्री सुषमा स्वराज लोकसभा में देना चाह रही थीं तो उन्हें बोलने तक नहीं दिया गया।
लोकसभा ने बिना चर्चा के ही वित्त विधेयक और विनियोग विधेयक 2018 को मंजूरी दे दी। इससे पहले विभिन्न मंत्रालयों और विभागों की 99 माँगों को गिलोटिन के जरिये मंजूरी दी गई। हाल के वर्षों में शायद यह पहला मौका है, जब पूरा बजट बिना चर्चा के लोकसभा में पारित हुआ हो। बजट को बिना बहस के पारित होना देश और लोकतंत्र के लिए उचित नहीं है। बजट सिर्फ आमदनी और खर्च का ब्योरा भर नहीं होता बल्कि पिछले वर्षों की शासकीय वित्तीय कार्यनीतियों और उसकी खामियों की समीक्षा, सुधार एवं सुझावों का दस्तावेज एवं देश के भविष्य का दिशा-निर्देश भी होता है। संसद सदस्यों, खासकर विपक्षी सदस्यों से यह अपेक्षा रहती है कि इसके हर पहलू का गहराई से अध्ययन एवं विश्लेषण कर इसके अंदर छुपे अनेक अव्यक्त प्रावधानों एवं तथ्यों को जोरदार बहस के माध्यम से उजागर करें, सरकार को घेरें एवं सुधार व जवाबदेही के लिए मजबूर कर दें। सरकार कई बार अपने दलीय हित या अनेक दवाब समूहों के फायदे के लिए बजट में दबे-छुपे कुछ ऐसा प्रावधान कर जाती है, जो देश के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है। परंतु यह कितना दुःखद है कि वित्तीय वर्ष की समयसीमा तथा विपक्षी सदस्यों की अनावश्यक अलोकतांत्रिक हुल्लड़बाजी में वित्त एवं विनियोग विधेयक यों ही बिना बहस के पारित हो गया।
एक दूसरा अत्यंत दुःखदायी विषय, विदेश मंत्री सुषमा स्वराज इराक के मोसुल से अगवा हुए 39 भारतीय नागरिकों की मौत की जानकारी लोकसभा में दे रही थीं, किंतु कांग्रेस के सांसदों द्वारा किए जा रहे अनावश्यक हंगामे के कारण वे पूरी जानकारी नहीं दे पायीं। असफल रहने पर उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा कि, ‘‘कांग्रेस ने मौत पर ओछी राजनीति की सारी हदें पार कर दीं, कांग्रेस पार्टी ने लोकसभा काररवाई को उस समय बाधित क्यों किया गया, जब मुझे इराक में मारे गए 39 भारतीयों की जानकारी देनी थी?’’ बयान के दौरान लोकसभा में कांग्रेस द्वारा हंगामे का नेतृत्व कांग्रेस के ज्योतिरादित्य सिंधिया ने राहुल गांधी के इशारे पर किया और लोकसभा अध्यक्ष द्वारा बार-बार आग्रह करने के बावजूद सिंधिया के नेतृत्व में कांग्रेस सदस्यों का शोर-शराबा जारी रहा। प्रेस कॉन्फ्रेंस में विदेश मंत्री ने बताया कि मृतकों में पंजाब के 27 लोग, हिमाचल के 4, बिहार के 6 और बंगाल के 2 लोग शामिल हैं।
इराक के मोसुल में 39 भारतीय कामगारों के जीवित होने की जिस झीनी-सी संभावना पर सैकड़ों विवश परिजनों की उम्मीद टिकी थी, वह एक झटके में टूट गई। यह त्रासदी चार साल पहले घटित हुई, पर उसकी पुष्टि अब हुई। काम की तलाश में दूसरे देश जाकर समूह में आतंकियों के हाथों मारे जाने से दुःखद कुछ नहीं हो सकता, लेकिन मौत के करीब चार साल तक उनके बारे में पता न चल पाना तो और भी दुर्भाग्यपूर्ण था। इस मामले में भारत सरकार चाहकर भी बहुत कुछ नहीं कर सकती थी। आईएस के कब्जे के दौरान मोसुल में जब इराक सरकार की ही पहुँच नहीं थी, तो बाहरी देशों की बात ही क्या? मोसुल के आईएस के कब्जे से मुक्त होते ही हमारी सरकार उनकी तलाश में सक्रिय हुई। रडार की मदद से एक गाँव के टीले पर सामूहिक कब्र का पता चला और निकाले गए शवों के डीएनए टेस्ट से मिलान कराने के बाद उनके भारतीय होने की पुष्टि हुई।
सबसे बड़े लोकतंत्र के प्रतिनिधि हे महानुभावो! अगर बजट और वित्त विधेयक जैसे महत्त्वपूर्ण दस्तावेज भी बिना आपकी बहसों के ही पारित हो जाते हैं। चार वर्षों से आशा और निराशा के भँवर में गोते खाते उन सैंकड़ों परिवारों तक 39 लोगों की निर्मम हत्या की पुष्ट खबर पहुँची, तब भी आपकी अंतरात्मा नहीं जगी। आपसे तो आशा थी कि सारी दलीय कटुता को परे रखकर तत्काल इस हत्या के पीछे के कारणों की चर्चा करते, सरकार की नीतियों में कोई खामी है तो उसे उजागर कर ऐसी घटनाओं के निवारण के लिए मजबूर करते। परंतु चर्चा-संवाद की तो बात ही दूर, आपने तो मंत्री महोदया को पूरी बात ही कहने नहीं दी। जिनके अवशेष के रूप में सिर्फ हड्डिया, उनके कड़े, केश, कंघे, जूते, कपड़े उनकी सुरक्षा के लिए माताओं, बहनों और पत्नी द्वारा बाँधे गऐ गंडे-ताबीज ही अवशेष बचे हैं, उनकी आत्मा की शांति के लिए तथा उनके आश्रित-पीड़ित परिवारों के गहरे घावों पर मरहम लगाने के लिए आपलोगों ने दो मिनट की मौन श्रद्धांजलि देना भी उचित नहीं समझा। वे बेचारे 25 से 30 हजार रुपये महीना कमाने के चक्कर में उस बियाबान में दरिंदों के हाथों निर्ममता से मारे गए और आपलोग जनता की गाढ़ी कमाई के करोड़ों रुपये हंगामे की भेंट प्रतिदिन चढ़ा रहे हैं। आप पर अगर इन दुखियारों की पीड़ा का भी असर नहीं हो रहा तो जनतंत्र के इस संप्रभू मंदिर में चुनकर आए महानुभावो, एक बार सोचिए, आप किसका प्रतिनिधित्व कर रहे हैं? हो सकता है, आप जिन मुद्दों पर बाधा उत्पन्न कर रहे हैं, वह भी महत्त्वपूर्ण हो, परंतु उसका भी समाधान तो वाद-प्रतिवाद-संवाद और नीति-निर्माण से ही निकलेगा न। फिर संसद में संवाद और संवेदनशीलता की जगह हंगामा क्यों?



Friday, March 9, 2018


रोबोट का गौरैया प्रेम
फिर आ गया 20 मार्च, यानी विश्व गौरैया दिवस। सूचना एवं संचार माध्यमों में फिर से गौरैया के संरक्षण और उसके संवर्द्धन के बारे में खुब चर्चा-परिचर्चा होगी; अखबार, पत्र-पत्रिकाओं में लेख छपेंगे। फेसबुक एवं व्हाट्सएप पर गौरैयों की सुंदर-मनमोहक तस्वीरों एवं चीं-चीं करती, करतब दिखाती उसके विडियो के संग लाखों-करोड़ों की संख्या में संदेश भेजे जाएंगे। परंतु इन सबसे अनभिज्ञ गौरैया महानगरों एवं शहरों से लगातार पलायन करते हुए कहीं सुदूर क्रमशः घटते प्राकृतिक वन-प्रांतर में मिटती, सिमटती, विलुप्ति के कागार पर पहुँचती जाएगी।
सिर्फ गौरैया की बात क्या करें, मार्च महीना है, फगुआया मन है, बसंत अपने शबाब पर है। परंतु अभी तक कानों में कोयल की एक भी कूक सुनाई नहीं पड़ी। जबकि मैं मोबाइल का इयर फोन भी नहीं लगाता और पेड़-पौधों एवं पार्कों से होकर ऑफिस आते-जाते ज्यादा से ज्यादा पैदल चलता हूँ। मेरा ऑफिस भी चारों तरफ से घने वृक्षों से भरे पार्कों के बीच है। इतनी चेतावस्था रहने के बावजूद कोयल की कूक सुनाई नहीं पड़ी है। इसका मतलब यह है कि इस बसंत में भी बहुत कुछ मिलावट हो गई है। उस बसंत का क्या मतलब, जिसमें कोयल की कूक न हो, चहुँदिशी पीले-पीले फूलों से लदे पेड़-पौधे न हांे, आमों में मंजरी न दिखाई पड़े, नवसृजन के लिए विसर्जन यानी पतझड़ और फिर फूटते कोंपल अगर दिखे नहीं तो फिर काहे का वसंत?
गौरैया, कोयल ही नहीं, देखते-देखते गिद्ध का अस्तित्व भी समाप्तप्राय है, जबकि यह पक्षी अत्यंत विपरीत परिस्थितियों में भी जीवित रह सकता है। गिद्ध एक मृतोपजीवी पक्षी है, जो भोजन के लिए केवल मृत पशुओं पर निर्भर रहता है। इस तरह वह वातावरण के लिए कुशल एवं प्राकृतिक सफाईकर्मी है। इसका पाचनतंत्र इतना मजबूत होता है कि यह रोगाणुओं से परिपूर्ण सड़ा-गला मांस भी पचा सकता है। वह हमारे पर्यावरण एवं मानव जीवन को अनेक प्रकार के संक्रामक रोगों को फैलने से रोककर हमें बचाता है। 90 के दशक से पहले लगभग 40 लाख गिद्ध भारत में थे, जो लगभग 12 लाख टन सड़े-गले मांस को वार्षिक दर से समाप्त किया करते थे। परंतु पिछले दशकों में 99 प्रतिशत गिद्धों की आबादी समाप्त हो गई। जाँच के दौरान पाया गया कि मवेशियों के दर्द निवारण के लिए दी जाने वाली दवा में प्रयोग होने वाली रसायन डाइक्लोफेनेकइसके लिए जिम्मेदार है। इस दवा की रसायन पशुओं के मरने के बाद भी उसके शव में उपस्थित रहती है। इस तरह उसे खाते ही गिद्ध डाइक्लोफेनेक की विषाक्तता से समाप्तप्राय होता गया।
मनुष्य की बढ़ती असीम लालसा, उसकी शिकारी प्रवृत्ति और गिद्धदृष्टि ने एक ऐसी डिजीटल रोबोट सभ्यता को जन्म दिया है, जिसको किसी पारिस्थितिक संतुलन, जैव विविधता या वासंती बहुरंगी उत्सवलीला की आवश्यकता नहीं है। वह सिर्फ हिज मास्टर वॉयसबनकर चलायमान है। यह कृत्रिम बुद्धि वाला जानवर बहुत चुपके से हमारे जीवन में प्रवेश कर चुका है। कहा जा रहा है कि जल्द ही कार्यालयों में अनुवादकों, सचिव और क्लर्कों की जगह रोबोट ले लेगा। रोबोट कई मामलों में हमारे डॉक्टरों, इंजीनियरों और वैज्ञानिकों से भी बेहतर साबित हो सकते हैं। क्या पता, कल वह एक अच्छा डायरेक्टर, प्रशासक, विचारक, समाजशास्त्री, दार्शनिक और लेखक-संपादक भी हो। लेकिन यह कृत्रिम दिमाग जब जीवन के हर क्षेत्र में तैनात हो जाएगा तब क्या होगा? हम यह अनुमान नहीं लगा सकते कि यह कृत्रिम बुद्धि (रोबोट) कहाँ तक पहुँचेगी। महान वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग को लगता है कि यह आगे चलकर मानव सभ्यता के लिए खतरा साबित होगी। दार्शनिक बासट्राम को भी कहा है कि इस कृत्रिम दिमाग में इतनी क्षमता होगी कि यह मानव सभ्यता का ही सफाया कर सकती है।
आज हर तरफ दिख रहा है कि हम एक पोस्ट ह्यूमन यानी उत्तर मानव युग की ओर जा रहे है। एक ऐसा युग जहाँ मानव तो होगा परंतु हम रोबोट के गुलाम भर होंगे, वह जैसे नचाएगा हम वैसा नाचेंगे। हम जिस तरह से अपने सारे कार्य कंप्यूटरों एवे डिजीटल माध्यमों के हवाले करते जा रहे हैं वह दिन दूर नहीं है जब यह भस्मासुर अपने निर्माता के ही सर पर हाथ रखकर उसे भस्मीभूत करेगा। उसकी बानगी आज हर तरफ दिख तो रही है। नहीं दिख रही तो जरा कानों से इयर फोन हटाकर और मॉनिटर एवं मोबाइल से नजरें परे कर देख लीजिए, क्या आपको गौरैया की चीं-चीं आस-पास सुनाई पड़ रही है? क्या कोयल इस बसंत में कूक रहा है? क्या हमारे आयातित वृक्षों के बनावटी पार्को एवं जंगल में बसंती हवा झकोंरे मार रही है?  
भारत जैव विविधता से परिपूर्ण देश है। जहाँ पूरे विश्व का 8 प्रतिशत जैव विविधता वाला भाग मौजूद है। सभी प्राणी एक दूसरे से खाद्य शृंखला द्वारा जुड़े हैं। आज विश्व में कई पशु-पक्षी, जंगली प्रजातियाँ एवं विविध पेड़-पौधे या तो विलुप्त हो गए या उनका अस्तित्व संकट में है। पहले मानव नें अपनी असीम पिपाशाओं की पूर्ति के लिए पूरी पारिस्थितिकी का संतुलन बिगाड़ा। खुद अपने गाँव, घर-आँगन छोड़कर महानगरों में कबूतर के दड़बेनुमा अनेक मंजिली अट्टालिकाओं में कैद हुआ। उसी में बनावटी बोनसाई पौधे लगाए। वहीं पिंजरों में चिड़िया-तौते को पाला। वह यह भूल गया कि ऐसा करते हुए वह खुद भी स्वतंत्र व्यक्तित्व से गिरकर एक बोनसाई विचार का यानी बौना व्यक्तित्व बनता गया है। वह यहीं नहीं रुका और ज्यादा से ज्यादा सुख-सुविधा के लिए तिलस्मी डिजीटल दुनिया का गुलाम बनता गया। इसका ताजा उदाहरण सऊदी अरब है, जिसके हुक्मरानों ने महिलाओं को स्वतंत्र व्यक्तित्व नहीं माना और उन्हें अधिकांश स्वतंत्र नागरिक के मौलिक अधिकारों से मरहुम रखा, परंतु एक रोबोट रोबोट सोफियाको अपने देश की नागरिकता प्रदान कर यह सुनिश्चत किया है कि उसे वह सब अधिकार मिले जिसके लिए वहाँ की महिलाएं सदियों से तरसती रहीं।
मानव सिर्फ नन्हीं जीव गौैरैया ही नहीं खो रहा है बल्कि पूरी जैव विविधता, मानवीय प्रवृत्तियों- आचार-व्यवहार, नैतिकता एवं संवेदनाओं को खोते हुए खुद एक मशीनी पुतले यानी रोबोट में तब्दील होता जा रहा है। इस रोबोट मानव को असली गौरेया, कोयल, गिद्ध और बसंत से कोई मतलब नहीं है। यह विश्व गौरैया दिवस पर ट्वीटर, व्हाट्सएप, फेसबुक आदि के माध्यम से लाखों-करोड़ों गौरैया के फोटो, विडीयो युक्त बनावटी संवेदना-संदेश भेज देगा और बस...!