Thursday, October 11, 2018


आयुष्मान भारत का सपना
जौनपुर चंदवक थाना क्षेत्र के भूलनडीह गाँव निवासी दुर्गा यादव 2001 में किसी गंभीर बीमारी से ग्रसित हो गया, जौनपुर और आस-पास इलाज कराने का भरसक प्रयास किया, परंतु ठीक नहीं हुआ। बीमारी से परेशान वह अपने रिश्तेदार के पास मुंबई गया। रिश्तेदार उसे चर्च लेकर गया, जहाँ पादरी इलाज के साथ-साथ प्रार्थना भी कराने लगा। उसकी बीमारी ठीक हो गई, पादरी ने उसे पूर्ण रूप से विश्वास दिला दिया कि उसकी बीमारी प्रभु यीशू के प्रार्थना से ही ठीक हुई है और ईसाई धर्म अपना लेने से सारे शारीरिक एवं मानसिक कष्टों से छुटकारा मिल जाता है। वह धर्म बदलकर ईसाई बनगया। उसकी सोच एकदम बदल चुकी थी। वह जब 2007 में गाँव वापस आया तो देखते-देखते कुछ ही कुछ ही वर्षों में भूलनडीह समेत जौनपुर तथा उसके आस-पास के तीन जिलों आजमगढ़, वाराणसी व गाजीपुर के 250 गाँवों में धर्म परिवर्तन का नेटवर्क फैला दिया। दुर्गा यादव अब तक दस हजार से ज्यादा लोगों को हिन्दू से ईसाई धर्म में परिवर्तित कर चुका है। गाँव-गाँव में विशेष चर्च व प्रार्थना सभा बन चुके हैं। प्रत्येक रविवार व मंगलवार को विशेष प्रार्थना सभा होती है, जिसमें जटिल रोगों व प्रेतबाधा से मुक्ति के नाम पर लोगों को आकर्षित किया जाता है। गरीबी, अशिक्षा तथा अनेक शारीरीक व मानसिक बीमारियों से त्रस्त लोग पादरियों के लोभ-लालच व बहकावे में आकर जमा होते हैं, बड़ी चालाकी से जिसके गले में क्रॉस की निशानी वाली ताबीज तथा हाथों में बाइबिल थमा दिया जाता है। यह दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी महत्वाकांक्षी योजना प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (आयुष्मान भारत) को 23 सितंबर को झारखंड जैसे पिछड़े आदिवासी राज्य से लॉन्च किया, जिसे इस दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य योजना भी कहा जा रहा है। अभी देश के 29 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों के 445 जिलों में यह योजना लागू होने जा रही है, क्योंकि ओडिशा, पश्चिम बंगाल, पंजाब जैसे कुछ राज्यों ने अभी इसे नहीं अपनाया है। इसके तहत 10 करोड़ परिवारों यानी करीब 50 करोड़ लोगों को सालाना 5 लाख रुपये तक के मुफ्त इलाज की सुविधा मिलेगी। इस स्कीम के तहत 10.74 करोड़ परिवारों के करीब 50 करोड़ लोग लाभार्थी होंगे। इनमें से करीब 8 करोड़ ग्रामीण परिवार हैं तो करीब 2.4 करोड़ शहरी परिवार हैं। इस तरह देश की करीब 40 प्रतिशत आबादी को इसके तहत मेडिकल कवर मिल जाएगा। लाभार्थी परिवार पैनल में शामिल सरकारी या निजी अस्पताल में प्रति साल 5 लाख रुपये तक का कैसलेस इलाज करा सकेंगे।
आज जो जौनपुर के आस-पास में हो रहा है। वह काम दशकों से देश के सुदूर गरीब, पिछड़े आदिवासी क्षेत्रों में मिशनरियों द्वारा बड़ी चालाकी से शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवा के नाम पर किया जा रहा है। वह चाहे झारखंड, ओडिशा, बंगाल हों या फिर उत्तर-पूर्व के आदिवासी क्षेत्र प्रदेश। चर्च के प्रतिनिधि सेवा के नाम पर भोले-भाले आदिवासियों को उसकी मजबूरी का फायदा उठाकर उनका धर्म परिवर्तित करते रहे हैं। उनकी हिम्मत इतनी बढ़ गई कि अब वे उत्तर प्रदेश जैसे मैदानी क्षे़त्र में, जहाँ सबकी नजर रहती है, वहाँ भी ये समाज के हाशिए पर जीने वाले लोगों की गरीबी और बीमारियों का फायदा उठाकर धर्म-परिवर्तित करने लगे। शासन हाथ पर हाथ धरे बैठा रहता है। पुलिस के मुँह को चर्च के बेसुमार पैसों से बंद कर दिया जाता है। सबकुछ धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर चलता रहा है। अनेक राजनीतिक दल एवं तथाकथित प्रबुद्ध समाज उनकी चिकनी-चुपड़ी बातों में आकर उनकी सेवा की तारीफ करते नहीं अघाते हैं। अब जबकि सर से पानी बहने लगा है और हर गाँव व समाज से अलगाव, हिंसा और सामाजिक विघटन की वारदातें सामने आने लगीं तो हाय-तौबा मची है।
हम किसी चर्च या संगठन के उपर शासन एवं सरकार की सुशासन की कमजोरियों का ठीकरा फोड़कर निश्चिंत नहीं हो सकते। आज भी समाज का बहुत बड़ा तबका स्वास्थ्य सेवाओं के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहा है। उनके पिछड़े इलाके में अस्पताल एवं डॉक्टर उन्हें सेवा देते नहीं। जिसके कारण वे बीमार होकर झोलाछाप डॉक्टरों, ओझाएवं तांत्रिक बाबाओं की शरण में जाते हैं तथा अंधविश्वासों की चपेट में आकर मानसिक बीमारी का शिकार बन जाते हैं। ऐसे में अगर कोई उन्हें उनके कष्टों से निजात दिलाने की बात करता है तो वे उन्हें अपना देवदूत मान बैठते हैं। भूलनडीह में धर्म परिवर्तन करने वाले लोगों से जब पूछा गया तो हर व्यक्ति का एक ही जवाब था कि चर्च उसके शारीरिक और मानसिक परेशानियों को दूर कर रहा है।
ऐसी परिस्थिति में प्रधानमंत्री जन आरोग्य जैसी योजनाएँ इन पिछड़े लोगों के लिए तो रामबाण साबित हो सकता हैं, बशर्ते कि इस योजनानुसार पूरी सरकारी मशीनरी इसे सफल बनाने का गंभीर प्रयास करे। जन आरोग्य योजना में निजी अस्पतालों को भी बहुत बड़ी जिम्मेदारी दी गई है। सिर्फ पैसे के लिए उनके द्वारा आजमाए जा रहे अनेक तरह के धतकर्मों को देखकर इनसे बहुत आशा तो नहीं जगती। सरकार द्वारा मुहैया कराए जा रहे पाँच लाख को आसानी से हड़पने के लिए वे कितने तरीके निकाल लेंगे, इसका अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है।
सरकार जब तक सरकारी क्षेत्र के अस्पतालों का विस्तार एवं उनकी सेवा गुणवत्ता पर विशेष ध्यान नहीं देगी, तबतक लोगों को इन परेशानियों से निजात नहीं मिलेगी। लोगों को अपने कष्टों से निजात चाहिए, और सरकारों को इनकी मूलभूत आवश्यकताओं की पूरी जिम्मेदारी लेनी होगी। इसको पैसों एवं आँकड़ों से नहीं मापा जा सकता कि कितने पैसों का बीमा दिया गया है। पैसे देखकर तो निजी स्कूल एवं अस्पताल व्यापार करते हैं। सरकार से तो लोग सेवा एवं सुशासन की ही आशा करते हैं, जो उनका अधिकार भी है। केन्द्र सरकार की इस योजना को स्वास्थ्य क्षेत्र में सुधार के लिए उठाया गया एक मजबूत कदम कह सकते हैं, परंतु गाँव से लेकर शहरों तक सुविधायुक्त सरकारी अस्पतालों के विस्तार से ही यह योजना सफल हो सकेगी। हम यही आशा करते हैं कि सभी को आयुष्मान बनाने का केन्द्र सरकार का सपना साकार हो, ताकि किसी व्यक्ति एवं समाज को अंधविश्वासों के अंधकूप में गिरकर तिल-तिलकर मरना न पड़े।

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