Friday, July 4, 2014


रहस्यमयी बीमारी के टीके!
बिहार के मुजफ्फरपुर में रहस्यमय बुखार ने कहर मचा रखा है। ये जानलेवा बुखार एक महीने में करीब डेढ़ सौ मासूमों की जान ले चुका है। सैंकड़ों बच्चे अस्पताल में ज़िंदगी की जंग लड़ रहे हैं। डॉक्टरों का कहना है कि इस बुखार के लक्षण काफी हद तक इंसेफेलाइटिस यानी दिमागी बुखार से मिलते जुलते हैं। मानसून जहाँ देश के लोगों के लिए खुशहाली लेकर आता है, वहीं देश के कई हस्सों खासकर बिहार के मुजप्फरपुर, वैशाली तथा इसके आस-पास के जिलों तथा उत्तर प्रदेश के गोरखपुर, देवरिया, कुशीनगर जैसे इलाकों में जापानी इंसेफेलाइटिस के रूप में यह यह पिछले दो दशकों से अधिक समय से दहशत का प्रतीक बन कर आता रहा है जिसमें हर वर्ष हज़ारों बच्चे मौत के ग्रास बन जाते हैं।  
इन्सेफ्लाइटिस या जापानी बुखार के फैलने के कई कारण हैं। इसके लिए जिम्मेदार मच्छर आमतौर पर लंबे समय से जमा गंदे पानी में पैदा होते हैं। इसी तरह सूअर की लार से पैदा होने वाला बैक्टीरिया जब पेयजल में पहुंच जाता है या उस पानी के संपर्क में कोई व्यक्ति आता है तो उसका संक्रमण होना प्रारंभ हो जाता है। ग्रामीण तथा शहरों की झुग्गी बस्तियों में साफ पेयजल न होने, गंदे नालों-तालाबों में मछली पकड़ने, पशुओं को नहलाने आदि के चलते लगातार संपर्क में आते रहने की वजह से लोगों में इस रोग के संक्रमण का खतरा बना रहता है।
यह शुभ संकेत है कि केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री को जैसे ही इसकी सूचना मिली और वे तुरंत हरकत में आ गये और मुजप्फरपुर जाकर सभी प्रभावित जिलों के लिए तत्काल ही टीकाकरण के विशेष अभियान को प्रारंभ किया। इस अवसर पर उन्होंने इसमें स्वयंसेवी संस्थाओं, इंडियन मेडिकल एसोसिएशन, धार्मिक संगठनों और यहाँ तक कि स्कूली बच्चों को भी शामिल करने का आह्वान किया ताकि सभी बच्चों को टीका लगाना सुनिश्चित किया जा सके। उन्होंने मुजफ्फरपुर में अलग से वायरोलॉजी लैब लगाने की जरूरत को भी माना।
टीकाकरण अभियान के प्रति कई विशेषज्ञ डॉक्टरों ने इसकी सफलता को लेकर आशंका व्यक्त की है क्योंकि इन्सेफ्लाइटिस, जापानी बुखार और डेंगू के इलाज के लिए अब तक कोई अचूक दवा नहीं खोजी जा सकी है। फिर डॉक्टरों के लिए पहचान करना मुश्किल होता है कि किस प्रकार के बैक्टीरिया के प्रकोप से इन्सेफ्लाइटिस फैल रहा है। यहाँ तक कि कई बार बीमारी के लक्षण एक होने के बावजूद अलग-अलग रोगी में अलग-अलग बैक्टीरिया पाए जा सकते हैं। इसी कारण शायद इसे रहस्यमयी या अज्ञात बीमारी माना जाता है।
इस बुखार को हम रहस्यमयी, अज्ञात या जापानी कुछ भी नाम दें लें, एक तथ्य जो इस बीमारी के बारे उभर कर आता है वह यह है कि इस बीमारी का सबसे बड़ा शिकार समाज के अति निम्न और अतिदलित समुदाय के लोग हैं जो गंदे नालों और नारकीय अवस्था में झुग्गी-झोपडियों में रहने को अभिशप्त हैं। इनके अधिकांश मासूम बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। इनके इलाज की कौन पूछे, पेट भर भोजन भी मुश्किल से मिल पाता है। इसलिए सिर्फ टीकाकरण से इनको कितना फायदा पहुँचेगा कहना मुश्किल है क्योंकि इन्हें जीवन बसर तो इन नारकीय परिस्थितियों में ही करना है। हाँ टीकाकरण, समुचित साफ-सफाई और  खून, बलगम आदि की जांच के लिए उन्नत प्रयोगशालाओं की व्यवस्था कर इन रोगों की रोकथाम तो की ही जा सकती है।
इस बीमारी को जितनी रहस्यमयी समझा जाता है उतनी है नहीं, बल्कि इसके सर्वाधिक शिकार होने वाले आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर अतिदलित डोम, मुसहर जैसी जातियों का पूरा जीवन ही रहस्यमयी है। कोई भी स्वस्थ्य मानसिकता वाला व्यक्ति क्या यह कल्पना कर सकता है कि इस समुदाय के बच्चे और सुअरों के छौने एकसाथ गंदे नालों में समाई झुग्गियों में अभी भी रेंगने को मजबूर हैं। न खेती के लिए कोई जमीन, न रहने को मकान की कोई व्यवस्था, शिक्षा और स्वास्थ्य की व्यवस्था की कौन पूछे? पहले खेतों में मुस (मुस से मुसहर बना है) यानी चूहे के मांस तथा चूहे द्वारा चुराये अनाज से जीवन निवर्हन होता था अब दैनिक दिहाड़ी तथा सुअर पालन आदि से किसी तरह जीवन-बसर हो जाए यही बहुत है। कुल मिलाकर पूरा जीवन महाकवि निरालाके शब्दों में ‘‘जीवन ही दुःख की कथा रही, क्या कहूँ आज जो नहीं कही’’ वाली स्थिति है। इसलिए सर्वप्रथम इनके नारकीय विषम जीवन जीने के रहस्यों से परदा उठाना आवश्यक है कि कैसे ये इंसान के रूप में इनका अस्तित्व आज भी कैसे बचा है? क्योंकि इनके दुःखद त्रासद कुपोषित जीवन के रहस्यों में ही इस बीमारी का बीज है। इनके दुःखद जीवन की परिस्थितियों में अगर सुधार हो जाए तो यह जापानी बुखार भी अपने आप बंगाल की खाड़ी में समुद्र में समाकर कहीं और आसियां तलाश लेगा।
केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन द्वारा प्रारंभ किए गए अभियान के कारण ही देश को पोलियो जैसी महामारी से मुक्ति मिली है। परंतु इंसेफेलाइटिस या दिमागी बुखार के बारे में जो तथ्य उभर कर आए हैं वे यह है कि पोलियो के टीके की तरह इस बीमारी के टीके से उसके उन्मूलन की कोई गारंटी नहीं है क्योंकि कई बार बीमारी के लक्षण एक होने के बावजूद अलग-अलग रोगी में अलग-अलग बैक्टीरिया पाए जा सकते हैं। ऐसे में एक ही दवाई हर क्षेत्र और सभी बच्चों पर कारगर होने पर संदेह है। परंतु सबसे अच्छी बात यह है कि स्वास्थ्य मंत्री एक डॉक्टर के साथ-साथ एक सफल राजनेता भी हैं, जिन्हें यह अवश्य पता होगा कि इस बीमारी के इलाज के लिए एक ऐसे टीके की आविष्कार की आवश्यकता है जिससे यह समुदाय विकास के मुख्यधारा में शामिल हो सके तथा इनके सामाजिक और आर्थिक स्थिति में सुधार आए। ये स्वस्थ और स्वच्छ वातावरण में रह सकें और इनके बच्चे कुपोषण से मुक्त हो सकें। इसके बाद भी अगर कोई इस बीमारी के शिकार हों तो उन्हें तत्काल समुचित इलाज भी त्वरित गति से मिल जाए उसकी भी सारी व्यवस्था उपलब्ध हो।
आशा है ऐसा टीका बनाने में बिहार के नये मुख्यमंत्री, जो सौभाग्य से अतिदलित मुसहर समुदाय से ही हैं तथा उत्तर प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री डॉ. हर्षवर्धन का पूरा साथ देंगे ताकि इस रहस्यमय बीमारी का जड़मूल से उन्मूलन हो सके। इसी बरसाती मौसम में ऐसे टीके का सभी को इंतजार है ताकि बरसात सभी लोगों के लिए एकसाथ मनोहारी और मंगलकारी बन कर आए किसी के जिगर के टुकड़े को लीलने नहीं!   

Wednesday, July 2, 2014

मुक्तिदायिनी को मुक्त करो

हाँ मैंने, तुम्हारी गंगा मैया ने तुम्हें बुलाया है। तुम्हारे सेवा, भक्ति और साहस के बारे में मुझे मेरी प्यारी बहन साबरमती ने बताया था। सबको मुक्ति देने वाली मुक्तिदायिनी गंगा आज खुद अपनी मुक्ति के लिए तड़प रही है। इसलिए मैंने तुम्हें अपना उद्धार करने लायक सत्ता की शक्ति दी है। इतनी शक्ति की तुम पूरे देश की सभी बीमार माँओं एवं उसके भूखे, बीमार बच्चों की दशा सुधार सको। मोदी इस अपार शक्ति को पाकर अभिभूत हो, श्रद्धा व करूणा से गंगा मैया के चरणों में आकर सिर झूकाकर ध्यान में लीन थे।
गंगा मैया ने कहा, मेरे लाल, खुशी के अवसर पर गमगीन, किंकर्त्तव्यूविमूढ़ होकर क्यों बैठ गया है\  तुम भी कहीं यही योजना तो नहीं बना रहे हो कि घाटों पर गंगा स्वच्छता अभियान चलाएगा, पानी शुद्ध करने के लिए विदेशों से बड़े-बड़े इंजीनियर व बड़ी-बड़ी मशिनें मँगवाओगे और मैं कुछ दिनों में शुद्ध हो जाऊँगी, हुंह, अगर यह सच है तो तुम भी उन्हीं नेताओं और योजना आयोग में बैठे विश्व बैंक के योजनाकारों जैसे ही निकलोगे जो वर्षों से सबकुछ तुरत-फुरत करके इन कार्यों के बहाने देश को अरबों रुपए के कर्ज में डालकर अपने करोड़ों के वारे-न्यारे करते आ रहे हैं।
मुझे पूरा विश्वास है कि तुम ऐसा नहीं सोच रहे हो। पर मेरे उद्धार के लिए तुम्हें भगीरथ से भी ज्यादा शक्तिशाली, धैर्यवान व दृढ़प्रतिज्ञ होना पड़ेगा। वह अपने अतीत में डूबते हुए कहने लगी- जानते हो, जब भगीरथ ने अपने पूर्वजों की मुक्ति के लिए सदियों तक घनघोर तपस्या की और उसके अदम्य दृढ़ भक्ति और शक्ति के आगे नतमस्तक हो देवताओं ने मुझे मेरी इच्छा के विरुद्ध धरती पर आने को विवश कर दिया। मैं भी गुस्से में सोचकर चली कि मेरी ऊर्जा शक्ति और गति को धरतीलोक क्या सँभाल पायेगा... मैं सीधे पाताललोक में समा जाऊँगी। परंतु नीलकंठ शिव ने मेरी सारी योजनाओं को विफल कर दिया। मेरे सारे गुस्से का शमन कर दिया।
मैंने भगीरथ के पुरखों को मुक्ति दी और फिर स्वर्गलोक को लौटने का उपाय सोच ही रही थी, तभी देखा कि मैं जहाँ-जहाँ से गुजरी हूँ, वहाँ के पर्वत-पहाड़, मैदानों में असीम हरियाली छा गई है। एक नई मानव सभ्यता पलने लगी है। पूरी प्रकृति विविध जीव-जंतुओं से गुलजार हो गई है। यहाँ के सभी वासी खुशी से मुझे मैया-मैया कहके बुलाने लगे हैं। मैं एक गुस्सैल ऊर्जा शक्ति जब-जब यह मैया शब्द सुनती, प्रेम और करुणा की भावनाओं में बह जाती। और इन मानवी भावनाओं के आगे विवश होकर मैं यहीं की होकर रह गई। सदियाँ बीतती गईं। शहर, गाँव, मैदान, पहाड़ हर जगह से कल-कल, छल-छल निरंतर बहती रही। हमारे तटों पर भरपूर अनाज पैदा होता, लोग खुशहाली में खूब उत्सव मनाते। कोई भी उत्सव मेरे बिना अधूरा होता। सभी बूढ़े-बुजुर्ग, महिलाएँ, किशोरियाँ, बच्चे गाते-झूमते हुए आते और मैया-मैया कहकर अपने घर और समाज की सभी छोटी-बड़ी बातों को बताते। मैं इनकी श्रद्धा पर निहाल हो जाती, मुझे लगता कि मैं हर परिवार का अभिन्न हिस्सा हूँ, स्वर्गलोक यही है।
खुशी-खुशी समय बितता रहा। होश तो मुझे तब आया जब अचानक हर जगह रक्तरंजित लाशें अपने तटों और धाराओं में नजर आने लगी। मुझे लाशों से कभी घृणा नहीं रही बल्कि मैं तो उसी की मुक्ति के लिए धरती पर आई थी, परंतु अकारण इतनी मार-काट, यहाँ तक कि आदमी तो आदमी, मेरे किनारे निरीह जानवरों के कत्लगाह ही बन गए और उनके सारे लहू, मांस, गंदगी सब मुझमें प्रवाहित किया जाने लगा। ऐसा समय आ गया जब मुझसे जीवन का आशीर्वाद मांगने वाला व्यक्ति मुझमें डूबकर आत्महत्या करने लग गया, इनमें महिलाएँ ज्यादा होतीं। सीवर और नालों में बहते बजबजाती गंदगी में मुझे अकसर कन्या भ्रूण मिलती, जो यह विलाप करती होती कि मैया मैंने किसी का क्या बिगाड़ा कि मुझे जन्म से पहले ही मृत्यु के हवाले कर दिया... इतना ही नहीं, किनारे के शहरों से छोटी-छोटी नदियों की जगह बड़े-बड़े नालों से गंदा पानी मुझमें आकर मिलने लगा, हद हो गई, जंगल खत्म होती गई, पहाड़ नंगे होते गए, अनेक प्रकार के जीव-जंतु गायब होने लगे। अंत में बिजली और विकास के नाम पर जगह-जगह मुझे ही बाँध दिया। और इस सदानीरा को बंदी बना लिया। अब लोगों के चेहरे से खुशी नदारद थी। हर जगह भूख, बीमारी, अशिक्षा, और मार-काट, हिंसा का रोना, दिन-रात सुनते-सुनते मैं थक-हार गई। मुझे अब उस फैसले पर पछतावा होने लगा जब मैंने इनके असीम प्यार में फँसकर यहीं बहने का फैसला किया था।
तू यही सोच रहा है ना, क्या करना है... कैसे करना है... बेटा अबतक की सारी बातों से तुम समझ ही गए होगे कि मैं भारतीय संस्कृति और समाज की जननी हूँ। मैं बीमार इसलिए होती गई कि समाज और संस्कृति बीमार होती गई है। सिर्फ मेरे लिए स्वच्छता अभियान चलाने से मैं स्वस्थ और स्वच्छ नहीं होने वाली। इसके लिए पूरे जनमानस को स्वच्छ करना पड़ेगा, ऐसी व्यवस्था कायम करनी पड़ेगी कि समाज के हर तबके को समान शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा, मिले। समाज के हर व्यक्ति को भूख से निजात मिले, सारे प्राकृतिक संसाधनों का अनावश्यक दोहन बंद हो। खासकर पहाड़ों, जंगलों एवं नदियों का अतिक्रमण बंद हो। ऐसा विकास किस काम का जिससे लोगों की भूख मिटने की जगह बढ़ती ही जाए और बढते-बढ़ते इतना बढ़ जाए कि नदी, धरती, आकाश-पाताल सबकुछ निगलने तक बात जा पहुँचे।
मुझे स्वच्छ करने से पहले पूरे समाज के स्वास्थ्य को ठीक करने का प्रयास करो क्योंकि जब लोग शिक्षित, संस्कारित और खुशहाल होंगे, मुझे निर्बाध बहने देंगे तो मैं तो ऐसे ही स्वस्थ, स्वच्छ, अविरल और निर्मल हो जाऊँगी। इससे पहले की स्थिति हाथ से निकल जाए कुछ करो बेटा! तुम्हें पता होगा इतिहास की ऐसी ही किसी भयंकर त्रासदी की मारी मेरी सहोदर बहन सरस्वती धरती में समा चुकी है। सरस्वती जब पाताललोक से समायी थी तो वह अकेले नहीं समायी थी उसके साथ बसी-बसायी पूरी एक जीवंत सभ्यता भी समा गई थी!

अभी भी संशय से मुझे निहार रहा है मेरे भगीरथ! एक समय मैनें तुम्हारे पुरखों का उद्धार किया था आज तुम्हें मेरा उद्धार करना है। मैं सब समझ रही हूँ, तुममें बहुत शक्ति है तुमने तो मुझसे सिर्फ 300 कमल मांगे थे, मैंने तो इसके अतिरिक्त भी अनेक सुगंधित फूलों से तेरा दामन भर दिया, तुम्हें और कितनी शक्ति चाहिए... नरेन्द्र मोदी ने पुनः माँ का स्पर्श किया और संकल्प भाव से दिल्ली का रूख किया!   

Tuesday, April 1, 2014



क्या तुम्हारे घर में भी कोई मरा!

गौतम बुद्ध ईसा से लगभग 500 साल पहले हुए थे। जातक कथा की एक कहानी में अपने मृत शिशु के शोक में बेचैन गौतमी को भगवान बुद्ध कहते हैं, ‘‘जिस घर में कोई नहीं मरा हो, उस घर से सरसों के दाने माँग ला। फिर मैं तुझे दवा दूँगा, जिससे तेरा पुत्र पुनः जीवित हो जाएगा।’’ सदियों बाद 2014 में बुद्ध के ही कर्मभूमि में इसी से मिलता-जुलता एक वाक्य इन दिनों समाचारों में छाया हुआ है, ‘‘क्या तुम्हारे घर में भी कोई मरा!’’ यह कथन भगवान बुद्ध का नहीं बल्कि आज के लोकतांत्रिक लोककल्याणकारी गणराज्य भारत की सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश  के मुख्यमंत्री के पिता एवं समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव का है, जोकि खुद  सवा अरब के इस देश के प्रधानमंत्री पद का भी दावेदारी कर रहे हैं। मुलायम सिंह जी ने यह वाक्य तब कहा, जब एक पत्रकार ने डॉक्टरों की हड़ताल के चलते गंभीर हालत वाले मरीजों के मौत की बाबत उनसे सवाल पूछा था।
कानपुर के गणेश शंकर विद्यार्थी मेडिकल कॉलेज के छात्रों के साथ सपा विधायक इरफान सोलंकी व उनके गनर के द्वारा गत 28 फरवरी को मार-पीट के बाद उत्तर प्रदेश के सभी मेडिकल कॉलेजों में हड़ताल हो गई। बाद में यह हड़ताल प्रदेश के बाहर भी फैलने लगी। सात दिनों की हड़ताल में इलाज के अभाव में 40 मरीजों के मरने का अंदेशा है। उल्लेखनीय है कि पूरे प्रदेष में मरीजों के हालात बिगड़ते जाने के बाद हाई कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए उत्तर प्रदेश सरकार पर डॉक्टरों के खिलाफ की गई कार्रवाई और उन पर एस्मा लगाने पर कड़ी टिप्पणी करते हुए नाराजगी जताई। हाई कोर्ट ने डॉक्टरों के साथ सहानुभूति जताते हुए उनसे हड़ताल खत्म करने को कहा तब जाकर कहीं हालात काबू में आए।
बुद्ध ने जब उद्यान-भ्रमण के समय वृद्ध, बीमार और मृत व्यक्तियों को देखा, खुद उनके भीतर कई सवाल पैदा हुए थे। उनके भीतर सवाल पैदा न हों, इसके लिए राजसत्ता की ओर से कैसे प्रयत्न किये गए थे, इसका वर्णन अश्‍वघोष ने बुद्धचरितमें किया है, ‘हिमालय की तलहटी में जैसे हाथी अपने हथनियों के समूह के साथ घूमता है, वे सुन्दर स्त्रियाँ सिद्धार्थ को वैसे ही अपने आस-पास घुमा रही थीं। उनमें से कुछ सुन्दरियों ने शराब के नशे में कामातुर होकर अपने उन्नत वक्ष का स्पर्श कराने के लिए सिद्धार्थ की छाती को अपनी ओर खींच लिया। कुछ ने नशे में अभिनय करते हुए लता की तरह मृदु हाथों से उसे आलिंगन दिया। एक कहने लगी, हे आर्य, इसी समय मेरा भोग कीजिए।’’ जाहिर है, ये सब सुन्दर स्त्रियाँ स्वतः नहीं कर रही थीं बल्कि उन्हें इसी के लिए सत्ताधारी राजा द्वारा नियुक्त किया गया था कि सिद्धार्थ कभी आम लोगों के जीवन से जुड़ी मूल समस्याओं को जान ही न सके। अगर वे जान जायेंगे तो उनकी निर्द्वद्व सत्ता कई पीढ़ियों तक कायम नहीं रह सकेगी। इसलिए उनके आस-पास उन्हें सारे भौतिक सुखों का अंबार लगा दिया ताकि वे प्रश्‍नविहीन बनकर उसी में आजीवन रमे रहें। परंतु फिर भी सारी सुख-सुविधाएँ भी उन्हें ऐसे प्रश्‍नों  से रोक नही पाई।
वृद्ध, बीमार एवं मृत्यु को देखकर, यौवन के कामुक प्रदर्शन और चारों तरफ के हिंसा को देखकर सिद्धार्थ को लगा, जीवन का कोई बड़ा उद्देश्‍य  होना चाहिए। इसलिए लगभग ढाई हजार साल पहले सिद्धार्थ बुद्ध बनने के लिए राज-पाट, माया-मोह सब त्यागकर निकल पड़े, आमलोगों को प्रश्‍न करने के लिए तमीज पैदा करने, संसार को तार्किक बनाने। लोकतंत्र को कायम करने बुद्ध बनकर उन्होंने आजीवन जो भी ज्ञान दिया, उसका सार यही है कि लोगों को प्रश्‍न करने की आजादी हो, उसमें तर्क करने की क्षमता पैदा हो, जिज्ञासाओं में ही सारी समस्याओं का समाधान है।
जातक कथा में वर्णित गौतमी की यह कथा तार्किकता को बल देता अनेकों उदाहरणों में एक है। जिसमें अपने मृत बच्चे को गोद में चिपकाये हुए वह उसे सिर्फ बीमार समझकर इलाज के लिए दर-दर भटक रही थी, उससे बुद्ध कहते हैं कि जिस घर में कोई नहीं मरा हो, उस घर से सरसों के दाने माँग ला। इस प्रश्‍न से गौतमी को समाधान मिल जाता है और वह मृतक बच्चे से मुक्त होकर जीवन की एक नई तार्किक दिशा पाती है।
मुलायम सिंह यादव का यह प्रतिप्रश्‍न भी इस आम चुनाव यानी भारतीय लोकतत्र का हर पाँच साल पर होनेवाले समुद्र मंथन का उन हजारों ज्वलंत मुद्दों और प्रश्‍नों में से एक मामूली प्रश्‍न ही हो सकता है, परंतु इसी में हमारी सभ्यता के विकास की कहानी और लोकतंत्र का मूल काला चरित्र सामने आ जाता है कि हमारे सत्तासीन लोग आज भी आमलोगों की समस्याओं के प्रति कितना अहंकार भरा नजरिया रखते हैं? जनता को आज भी जानवरों की तरह रखने पर विश्‍वास करते हैं? एक तरफ तो बाजार है, जो अपने मायाजाल में मॉल-मल्टीप्लेक्स में डियो, पोशाक और एक से बढ़कर सुन्दरियों और उनके सौन्दर्य प्रसाधन के विज्ञापन ऐसे दृश्‍य रचते हैं कि लोग इसी में गुम होकर प्रश्‍नविहीन होता जाए, वहीं दूसरी तरफ अनेक धार्मिक पाखंडी लोग ऋषि‍-मुनियों के भेष  में दिन-रात लोगों को तार्किकता और मूल प्रश्‍नों से भटकाकर अंधविश्‍वासी और अंधधार्मिक बनाने में तल्लीन हैं। इन सब में मूल बात यह है कि इन्हें सत्ताधारियों का पूरा समर्थन प्राप्त है ताकि लोगों के जीवन से जुड़े प्रष्नों से बरगलाया जा सके और वे लोकतंत्र के नाम पर सिर्फ अपने परिवार और कुनबों के बीच सत्ता को बनाये रखकर सत्ता का सुख भोग सकें।
आज देश में 16वीं लोकसभा का चुनाव दस्तक दे रहा है। हमें सत्ताधारियों के ऐसे प्रतिप्रश्‍नों से डरना नहीं है बल्कि और जोर-शोर से उनसे पूछना है कि हमें जवाब दें कि आज भी देश के सभी बच्चों को समान गुणात्मक शिक्षा क्यों नहीं मिल पा रही है? सभी लोगों के लिए समुचित स्वास्थ्य की व्यवस्था क्यों नहीं है? सभी को ‘’शुद्ध पानी और भोजन क्यों उपलब्ध नहीं है? सबको समान रूप से सुरक्षा और न्याय कब मिलेगा? सत्ता में समान रूप से सहभागी, देश के सभी वर्गों के लोग, खासकर महिलाएँ कब बनेंगी? मुलायम सिंह जी यह आपका कैसा समाजवाद है जो चाहे भ्रष्‍टाचार विरोधी लोकपाल कानून हो या महिला आरक्षण विधेयक, हमेशा इसके मार्ग में रोड़ा लगाता है? इस तरह के अनेकों प्रश्‍न हैं, जिनका देश के लोगों को जवाब चाहिए ताकि जनता सबको कसौटी पर कसकर अपना मतदान करे।
बुद्ध के जमाने से आज तक हमारी सभ्यता ने हजारों साल का फासला तय किया है। अनेकों समाजसुधारकों और स्वतंत्रता सेनानियों के निरंतर संघर्ष और बलिदान से हमें प्रश्‍न करने की आजादी मिली है। हम इतनी आसानी से नहीं झुकेंगे, इसका जवाब लोकतंत्र के इसी महायज्ञ में देंगे।



Tuesday, March 4, 2014

कमजोर बुनियाद पर बुलंद इमारत!
आम चुनाव करीब है। देश में हर समस्या और उसके समाधान पर मंथन चल रहा है। इस बार हर कोने से सिर्फ और सिर्फ प्रगति और विकास का शोर सुनाई पड़ रहा है। आम लोगों को बुनियादी सुविधायें मुहैया कराने में केन्द्र एवं राज्य सरकारें तथा सभी दल दिन-रात आँकड़ों की बाजीगरी में लगे हैं। यहां तक कि विदेशी पी.आर. एजेंसियों तक को करोड़ों रुपया देकर उनकी सेवाएँ ली जा रही है। एक ऐसा माहौल बना है मानो सत्ताधारी दल ने देश की सारी बुनियादी समस्याओं का समाधान कर दिया हो या हर दल के पास सारे समाधान के सूत्र हाथ लग गए हों कि उनकी सरकार बनते ही सारी समस्याएँ उड़न छू हो जाएँगी।
दूसरी तरफ हाल ही में संयुक्त राष्ट्र की सबके लिए शिक्षा विषय पर यूनेस्को की ग्यारहवीं वैश्विक निगरानी रिपोर्ट 2013/14 के मुताबिक भारत में अनपढ़ वयस्कों की आबादी करीब 28.7 करोड़ है। यह दुनिया में अशिक्षित लोगों का कुल 37 प्रतिशत है। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में सबसे अमीर युवतियों को पहले ही वैश्विक स्तर की साक्षरता मिल चुकी है, लेकिन सबसे गरीब के लिए ऐसा 2080 तक ही संभव है। कुछ वर्षों में सरकारी स्तर पर कराए गए अध्ययनों एवं प्रथम जैसे स्वैच्छिक संगठन की सालाना रिपोर्टों में स्कूली शिक्षा की दयनीय स्थिति का पता चलता रहा है। अब यूनेस्को की इस रिपोर्ट में भी जो तस्वीर उभरी है, वह बताती है कि भारत में शिक्षा के प्रति सरकारों का रवैया कितना लापरवाही भरा है। इन सभी रिपोर्टों ने पाँचवीं कक्षा तक के विद्यार्थियों के सीखने की गति को लेकर घोर चिंताजनक तथ्य दिए हैं। कमजोर तबकों के नब्बे फीसद बच्चे चार साल की स्कूली पढ़ाई-लिखाई पूरी करने के बावजूद लगभग निरक्षर हैं। स्कूली शिक्षा में महाराष्ट्र और तमिलनाडु अपेक्षया अच्छी स्थिति में माने जाते हैं, पर रिपोर्ट बताती है कि महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाकों के स्कूलों में पढ़ने वाले चौवालीस प्रतिशत बच्चे दो अंकों का घटाव नहीं कर पाते हैं। तमिलनाडु के संदर्भ में यह आँकड़ा तिरपन प्रतिशत बैठता है।
सरकारी स्कूलों में पढ़ाई-लिखाई के माहौल से लेकर शिक्षकों की कमी आदि अनेक वजहों से शैक्षिक गुणवत्ता के स्तर में गिरावट एक बड़ी समस्या बनती गई है। बिहार में अड़तीस और झारखंड में बयालीस प्रतिशत शिक्षक रोजाना किसी न किसी बहाने गैरहाजिर रहते हैं। यह बेवजह नहीं है कि समृद्ध राज्यों में भी बेहद गरीब घरों के बच्चों खासकर लड़कियों के बीच सीखने की क्षमता बेहद कमजोर बनी हुई है। शिक्षा अधिकार कानून में दो प्रमुख कसौटियां रखी गई थी। एक यह कि 2013 तक स्कूलों में सभी ढाँचागत सुविधाएं मुहैया करा दी जाएंगी। समय-सीमा पूरी हो जाने के बावजूद यह नहीं हो सका है। दूसरी शर्त अपेक्षित शिक्षक-विद्यार्थी अनुपात सहित शैक्षिक गुणवत्ता से संबंधित थी जो 2015 तक पूरी हो जानी चाहिए। आज हर राज्य में प्रशिक्षित शिक्षकों के जगह पर खानापूर्ति के लिए पारा टिचरों या ठेके पर शिक्षक रखे गए हैं। मौजूदा हालत को देखते हुए इस कसौटी का भी क्या हाल होगा, अंदाजा लगाया जा सकता है।
 इस रिपोर्ट से पता चलता है कि देश में बुनियादी शिक्षा की स्थिति कितनी दयनीय है। देश आज जितनी भी समस्याओं से दो-चार है चाहे वह महिला हिंसा, जातीय एवं वर्गीय असमानता, अंधविश्वास, सांप्रदायिकता, आतंकवाद, बेरोजगारी या अलगाववाद तथा इससे उपजे अनेक तरह की समस्याएँ। जो अनेक तरह से देश को कमजोर किए हुए हैं। अगर गहराई से चिंतन और विश्लेषण किया जाए तो सबके मूल में यह घोर विषमतावादी बुनियादी शिक्षा का होना है। क्या इसकी कल्पना की जा सकती है कि जो बच्चा पाँचवीं कक्षा तक ठीक से किताब तक नहीं पढ़ पाता हो या जोड़-घटाव नहीं जानता हो, वह दसवीं कक्षा तक भी पहुँचकर लैंगिक समानता की बात उसके जेहन में आ पायेगा या फिर सदियों से जड़ जमाए रूढ़िवादी भेदभाव या अंधविश्वासों के खिलाफ उठ खड़ा होगा, पिछले साल निर्भया कांड में क्रूरता की सारी सीमाएँ लाँघने वाला किशोर लड़का जिसको सजा दिलाने के बारे में किशोर कानून में बदलाव लाने की बात की जोर-शोर से की जा रही है। उसी पॉश इलाके आर.के. पुरम के झुग्गी का रहने वाला था, जहाँ देश को चलाने वाले सारे नीति-नियंता अधिकारियों का निवास है। उसी के पास शिक्षा के विश्व प्रसिद्ध अनेक शिक्षा संस्थान, केन्द्रीय विद्यालय और प्रसिद्ध डी.पी.एस. जैसे स्कूल हैं, जहाँ सरकारी अधिकारियों तथा कथित बड़े लोगों के बच्चे पढ़ते हैं, परंतु यहीं निवास करने वाले झुग्ग्यिों के बच्चों के लिए सारी संस्थाओं में प्रवेश निषेध है। कल्पना करें अगर उस किशोर की यहाँ के किसी भी स्कूल में अगर प्रवेश मिला होता और पढ़ रहा होता तो क्या वह ऐसा घृणित कुकर्म करता!
आखिर सरकार और राजनीतिक दल कब इस बात को समझेंगे कि जबतक हर वर्ग, हर समुदाय तथा हर क्षेत्र के बच्चों को कम से कम बारहवीं कक्षा तक एक समान नैतिक, मूल्यपरक गुणवत्तaपूर्ण शिक्षा नहीं मिलती देश प्रगति नहीं कर सकता। इसके लिए सरकार को समान स्कूलिंग व्यवस्था की नीति अपनानी पड़ेगी। इसमें देश के प्रधानमंत्री से लेकर एक सफाईकर्मी तथा करोड़पति से लेकर गरीब से गरीब मजदूर तथा शहर से लेकर गाँव तक के बच्चे घर के समीप समान स्कूलों में शिक्षा प्राप्त करें। समान स्कूलिंग शिक्षा व्यवस्था से सभी वर्गों के बच्चों के बीच एक सहसंबंध विकसित होगा। बहुत सारी मनोग्रंथियों की दीवारें ढहेंगी। आपस में समन्वय स्थापित होगा। इससे बहुत सारी सामाजिक समस्याओं का समाधान अपने आप मिल जाएगा। कहीं निवेश की वास्तविक जरूरत है तो वह है बुनियादी शिक्षा का क्षेत्र। बुनियादी प्राथमिक शिक्षा को मुनाफाखोर प्राइवेट पब्लिक स्कूलों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता है। यह पूरे विश्व का माना हुआ तथ्य है कि अपने देश की बुनियाद को मजबूत करने के लिए बुनियादी शिक्षा का भार सरकार को ही उठाना पड़ता है।
देश की प्रगति की बुनियाद, अपने बच्चों की शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करना ही होगा, ताकि देश हर वर्ग, हर क्षेत्र, हर वर्ग, हर समुदाय के नवांकुरों को एकसमान आधुनिक, लोकतांत्रिक, मूल्यपरक, समतावादी, वैज्ञानिक मिजाज को बढ़ावा देने वाली शिक्षा मिल सके। इसपर किया गया निवेश का फल स्त्री हिंसा, जातीय एवं वर्गीय असमानता, अंधविश्वास, सांप्रदायिकता, आतंकवाद, बेरोजगारी या अलगाववाद जैसी समस्याओं को काफी हद तक पनपने से रोकने के रूप में मिलेगी। मजबूत बुनियाद पर चाहे जितनी मंजिल बनाना चाहें बेधड़क बनाइए। इमारत हमेशा बुलंद रहेगा कोई भूकंप या आंधी-पानी उसको कमजोर नहीं कर पाएगा। क्या सभी दल इस मुद्दे पर सहमत होंगे और आने वाली नई केन्द्र सरकार इसे कार्यरूप देगी!