कमजोर
बुनियाद पर बुलंद इमारत!
आम चुनाव करीब है। देश में हर समस्या और उसके समाधान पर मंथन चल
रहा है। इस बार हर कोने से सिर्फ और सिर्फ प्रगति और विकास का शोर सुनाई पड़ रहा
है। आम लोगों को बुनियादी सुविधायें मुहैया कराने में केन्द्र एवं राज्य सरकारें
तथा सभी दल दिन-रात आँकड़ों की बाजीगरी में लगे हैं। यहां तक कि विदेशी पी.आर.
एजेंसियों तक को करोड़ों रुपया देकर उनकी सेवाएँ ली जा रही है। एक ऐसा माहौल बना है
मानो सत्ताधारी दल ने देश की सारी बुनियादी समस्याओं का समाधान कर दिया हो या हर
दल के पास सारे समाधान के सूत्र हाथ लग गए हों कि उनकी सरकार बनते ही सारी
समस्याएँ उड़न छू हो जाएँगी।
दूसरी तरफ हाल ही में संयुक्त राष्ट्र की ‘सबके लिए शिक्षा’ विषय पर यूनेस्को की ग्यारहवीं वैश्विक
निगरानी रिपोर्ट 2013/14 के मुताबिक भारत में अनपढ़ वयस्कों की आबादी करीब 28.7
करोड़ है। यह दुनिया में अशिक्षित लोगों का कुल 37 प्रतिशत है। रिपोर्ट में कहा गया
है कि भारत में सबसे अमीर युवतियों को पहले ही वैश्विक स्तर की साक्षरता मिल चुकी
है, लेकिन सबसे गरीब के लिए ऐसा 2080 तक ही
संभव है। कुछ वर्षों में सरकारी स्तर पर कराए गए अध्ययनों एवं ‘प्रथम’ जैसे स्वैच्छिक संगठन की सालाना रिपोर्टों में स्कूली शिक्षा की
दयनीय स्थिति का पता चलता रहा है। अब यूनेस्को की इस रिपोर्ट में भी जो तस्वीर
उभरी है, वह बताती है कि भारत में शिक्षा के प्रति
सरकारों का रवैया कितना लापरवाही भरा है। इन सभी रिपोर्टों ने पाँचवीं कक्षा तक के
विद्यार्थियों के सीखने की गति को लेकर घोर चिंताजनक तथ्य दिए हैं। कमजोर तबकों के
नब्बे फीसद बच्चे चार साल की स्कूली पढ़ाई-लिखाई पूरी करने के बावजूद लगभग निरक्षर
हैं। स्कूली शिक्षा में महाराष्ट्र और तमिलनाडु अपेक्षया अच्छी स्थिति में माने
जाते हैं,
पर
रिपोर्ट बताती है कि महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाकों के स्कूलों में पढ़ने वाले
चौवालीस प्रतिशत बच्चे दो अंकों का घटाव नहीं कर पाते हैं। तमिलनाडु के संदर्भ में
यह आँकड़ा तिरपन प्रतिशत बैठता है।
सरकारी स्कूलों में पढ़ाई-लिखाई के माहौल से लेकर शिक्षकों की कमी
आदि अनेक वजहों से शैक्षिक गुणवत्ता के स्तर में गिरावट एक बड़ी समस्या बनती गई है।
बिहार में अड़तीस और झारखंड में बयालीस प्रतिशत शिक्षक रोजाना किसी न किसी बहाने
गैरहाजिर रहते हैं। यह बेवजह नहीं है कि समृद्ध राज्यों में भी बेहद गरीब घरों के
बच्चों खासकर लड़कियों के बीच सीखने की क्षमता बेहद कमजोर बनी हुई है। शिक्षा
अधिकार कानून में दो प्रमुख कसौटियां रखी गई थी। एक यह कि 2013 तक स्कूलों में सभी
ढाँचागत सुविधाएं मुहैया करा दी जाएंगी। समय-सीमा पूरी हो जाने के बावजूद यह नहीं
हो सका है। दूसरी शर्त अपेक्षित शिक्षक-विद्यार्थी अनुपात सहित शैक्षिक गुणवत्ता
से संबंधित थी जो 2015 तक पूरी हो जानी चाहिए। आज हर राज्य में प्रशिक्षित
शिक्षकों के जगह पर खानापूर्ति के लिए पारा टिचरों या ठेके पर शिक्षक रखे गए हैं।
मौजूदा हालत को देखते हुए इस कसौटी का भी क्या हाल होगा, अंदाजा लगाया जा सकता है।
इस रिपोर्ट से पता चलता
है कि देश में बुनियादी शिक्षा की स्थिति कितनी दयनीय है। देश आज जितनी भी
समस्याओं से दो-चार है चाहे वह महिला हिंसा, जातीय एवं वर्गीय असमानता, अंधविश्वास, सांप्रदायिकता, आतंकवाद, बेरोजगारी या अलगाववाद तथा इससे उपजे अनेक तरह की समस्याएँ। जो
अनेक तरह से देश को कमजोर किए हुए हैं। अगर गहराई से चिंतन और विश्लेषण किया जाए
तो सबके मूल में यह घोर विषमतावादी बुनियादी शिक्षा का होना है। क्या इसकी कल्पना
की जा सकती है कि जो बच्चा पाँचवीं कक्षा तक ठीक से किताब तक नहीं पढ़ पाता हो या
जोड़-घटाव नहीं जानता हो, वह दसवीं कक्षा तक भी पहुँचकर लैंगिक
समानता की बात उसके जेहन में आ पायेगा या फिर सदियों से जड़ जमाए रूढ़िवादी भेदभाव
या अंधविश्वासों के खिलाफ उठ खड़ा होगा, पिछले साल निर्भया कांड में क्रूरता की सारी सीमाएँ लाँघने वाला
किशोर लड़का जिसको सजा दिलाने के बारे में किशोर कानून में बदलाव लाने की बात की
जोर-शोर से की जा रही है। उसी पॉश इलाके आर.के. पुरम के झुग्गी का रहने वाला था, जहाँ देश को चलाने वाले सारे नीति-नियंता
अधिकारियों का निवास है। उसी के पास शिक्षा के विश्व प्रसिद्ध अनेक शिक्षा संस्थान, केन्द्रीय विद्यालय और प्रसिद्ध डी.पी.एस.
जैसे स्कूल हैं, जहाँ सरकारी अधिकारियों तथा कथित बड़े
लोगों के बच्चे पढ़ते हैं, परंतु यहीं निवास करने वाले झुग्ग्यिों के
बच्चों के लिए सारी संस्थाओं में प्रवेश निषेध है। कल्पना करें अगर उस किशोर की
यहाँ के किसी भी स्कूल में अगर प्रवेश मिला होता और पढ़ रहा होता तो क्या वह ऐसा
घृणित कुकर्म करता!
आखिर सरकार और राजनीतिक दल कब इस बात को समझेंगे कि जबतक हर वर्ग, हर समुदाय तथा हर क्षेत्र के बच्चों को कम
से कम बारहवीं कक्षा तक एक समान नैतिक, मूल्यपरक गुणवत्तaपूर्ण शिक्षा नहीं मिलती देश प्रगति नहीं
कर सकता। इसके लिए सरकार को समान स्कूलिंग व्यवस्था की नीति अपनानी पड़ेगी। इसमें
देश के प्रधानमंत्री से लेकर एक सफाईकर्मी तथा करोड़पति से लेकर गरीब से गरीब मजदूर
तथा शहर से लेकर गाँव तक के बच्चे घर के समीप समान स्कूलों में शिक्षा प्राप्त करें।
समान स्कूलिंग शिक्षा व्यवस्था से सभी वर्गों के बच्चों के बीच एक सहसंबंध विकसित
होगा। बहुत सारी मनोग्रंथियों की दीवारें ढहेंगी। आपस में समन्वय स्थापित होगा।
इससे बहुत सारी सामाजिक समस्याओं का समाधान अपने आप मिल जाएगा। कहीं निवेश की
वास्तविक जरूरत है तो वह है बुनियादी शिक्षा का क्षेत्र। बुनियादी प्राथमिक शिक्षा
को मुनाफाखोर प्राइवेट पब्लिक स्कूलों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता है। यह पूरे
विश्व का माना हुआ तथ्य है कि अपने देश की बुनियाद को मजबूत करने के लिए बुनियादी
शिक्षा का भार सरकार को ही उठाना पड़ता है।
देश की प्रगति की बुनियाद, अपने बच्चों की शिक्षा व्यवस्था को मजबूत
करना ही होगा,
ताकि
देश हर वर्ग,
हर
क्षेत्र,
हर
वर्ग, हर समुदाय के नवांकुरों को एकसमान आधुनिक, लोकतांत्रिक, मूल्यपरक, समतावादी, वैज्ञानिक मिजाज को बढ़ावा देने वाली
शिक्षा मिल सके। इसपर किया गया निवेश का फल स्त्री हिंसा, जातीय एवं वर्गीय असमानता, अंधविश्वास, सांप्रदायिकता, आतंकवाद, बेरोजगारी या अलगाववाद जैसी समस्याओं को
काफी हद तक पनपने से रोकने के रूप में मिलेगी। मजबूत बुनियाद पर चाहे जितनी मंजिल
बनाना चाहें बेधड़क बनाइए। इमारत हमेशा बुलंद रहेगा कोई भूकंप या आंधी-पानी उसको
कमजोर नहीं कर पाएगा। क्या सभी दल इस मुद्दे पर सहमत होंगे और आने वाली नई केन्द्र
सरकार इसे कार्यरूप देगी!
1 comment:
awesome
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