Thursday, November 12, 2015

खुल रहे हैं दरवाजे!
पिछली दीवाली के समय हमारे ऑफिस के सामने वाले बच्चों के पार्क में बड़ी तेजी से साफ-सफाई, रंग-रोगन एवं नये-नये झूले, सी-सॉ, स्लाइडर, कुरसियां वगैरह लग रहे थे। ये सब पहले से भी थे, लेकिन बेकार... सारे जस-के-तस धूल खाते। दिनभर पूरा पार्क सुनसान। पिछले आठ सालों में कालकाजी के डी.डी. एवं पी.टी ब्लॉक नई दिल्ली के इस संभ्रांत एवं शक्तिशाली लोगों की कॉलोनी में, यहाँ के बच्चों को इन पार्को में शायद ही कभी खेलते एवं धमाचौकड़ी मचाते देखा होगा। उन्हें जब भी देखा, बड़ी-बड़ी गाड़ियों से स्कूल या कहीं से नौकरों या ड्राइवरों के संग आते-जाते। उस दिन भी अमीरों के इस शगल कि- हर दो-तीन साल में घर के सभी सामान को नये फैशन के हिसाब से बदल दोको मानकर आगे बढ़ जाता, परंतु सामने ही संगीता सिन्हा जी (पाँचवाँ स्तंभ की संपादक) एवं रेजिडेंस वेलफेयर एसोसिएशन की जॉली जी मिल गर्इं। मैंने पूछ ही लिया, यहाँ बच्चे तो खेलते नहीं, फिर इतना कुछ क्यों करवा रही हैं? दोनों ने एक साथ मुस्कराते हुए कहा, कल से देख लीजिएगा! मैंने कहा, चलिए देखते हैं। दूसरे दिन आया तो देखा, पूरा नजारा ही बदला हुआ था। पूरी तरह से सजा-धजा यह एस.बी.आई. चिल्ड्रेन पार्क बच्चों से गुलजार था। सभी के हाथों में मिठाई के पैकेट थे और सभी मस्ती में मशगूल थे। परंतु ये बच्चे इस कॉलोनी की चहारदीवारी के नहीं थे। ब्लॉक का पिछला दरवाजा, जिसके सामने झुग्गियों का लंबा विस्तार है। जहाँ बेचारे बच्चों को खेलने के लिए खतरनाक मुख्य सड़क के सिवा कुछ नहीं, जो कभी-कभी बड़ी दीवारों से या चोरी-छुपे इधर घुसकर आम-जामुन तोड़कर जल्दी से जल्दी भागने की फिराक में रहते थे, के लिए खोल दिया गया था।
अमेरिका मैसाच्यूसेट्स के जूलिया वाइज और जेफ कॉफमैन ऐसे दंपत्ती हैं, जो अपनी कमाई के सिर्फ छह फीसद पर गुजारा कर लेते हैं और बाकी सारी कमाई जरूरतमंदों की सहायता में दान कर देते हैं। जूलिया एक समाजसेविका हैं जबकि जेफ गूगल में सॉफ्टवेयर इंजीनियर। इस दंपत्ती का मानना है कि अपनी जरूरी आवश्यकताओं की पूर्ति के बाद इस दुनिया को ज्यादा बेहतर बनाने के लिए सारी कमाई जरूरतमंदों को दान करके हमें बहुत सकून मिलता है। भारतीय आईटी क्षेत्र के दिग्गज अजीम प्रेमजी ने सॉफ्टवेयर कंपनी विप्रो में अपनी लगभग आधी हिस्सेदारी परोपकारी कार्यों के नाम कर दी है। अजीम प्रेमजी फाउंडेशन वर्षों से विभिन्न राज्य सरकारों के साथ घनिष्ठ साझेदारी में समाज के हासिए पर जीनेवाले घरों के बच्चों की शिक्षा में गुणात्मक सुधार के लिए अभिनव कार्य कर रहा है। पटना सुपर थर्टी के कुमार आनंद ने अपने प्रयास से समाज के ऐसे दबे-वंचित घरों के विद्यार्थियों के लिए आई.आई.टी. जैसे संस्थानों के दरवाजे खोल दिए, जिसकी किसी ने कल्पना तक नहीं की होगी। पटना महावीर मंदिर ट्रस्ट और इसके प्रमुख किशोर कुणाल के अभिनव प्रयास से आज पटना में पाँच अस्पताल, जिसमें महावीर कैंसर अस्पताल भी शामिल है और छठा हृदय रोगों के लिए विशेष अस्पताल जल्द ही प्रारंभ होने वाला है, आम लोगों के लिए चलाया जा रहा है।  इसके अलावा समाज में ऐसी छोटी एवं बड़ी अनेकों पहल समाज के अनेक क्षेत्रों के लोग कर रहे हैं।
इसी महीने सूचना के अधिकार कानून के दस वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में उत्सव समारोह मनाया गया। इस कानून के लागू होने पर आम जनता की लिए सरकार की आलमारियों में फाइलों में बंद अनेक ऐसे दस्तावेजों तक उनकी पहुँच हो गई, जिससे सरकार तथा नौकरशाही के मनमानियों पर बहुत हद तक पाबंदी लगी और शासन में पारदर्शिता आई। इसके अलावा लोगों को सेवा का अधिकार भी मिला है। इधर न्यायपालिका ने भी लोकहित में अनेक फैसले किए हैं। सामाजिक न्याय पीठ की स्थापना एक ऐसा ही अनुठा प्रयास है इसके अंतर्गत महिलाओं, बच्चों एवं उपेक्षित वर्ग से संबंधित समस्याओं को सही समय पर दक्षतापूर्ण निणर्य दिया जा सके, ताकि ये भी समाज में सर उठाकर सम्मान से जी सकें।
उपरोक्त सभी विविध क्षेत्रों में आ रहे सकारात्मक बदलाव की एक झलक मात्र है। यह खुशी की बात है कि सरकार और समाज को यह बात अब तीव्र गति से महसूस हो रही है और अनेक गंभीर प्रयास भी हो रहे हैं। हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि दरवाजे अभी खुलने प्रारंभ हुए हैं, समाज का जो वर्ग इन चहारदीवारियों से सदियों से दूर रहा है, वह एक कौतूहल, डर और उत्सुकता से अंदर प्रवेश करने का प्रयास कर रहा है। दूसरी तरफ इन चहारदीवारियों या सत्ता प्रतिष्ठानों के कर्ता-धर्ता भी आशंका और भय से सहमे हुए हैं। यही कारण है कि सरकार के अधिकारी लोगों को सूचनाएँ मुहैया कराने में अडंगेबाजी लगाते हैं यहाँ तक कि अनेक सूचनाकर्मियों की हत्याएँ भी की गई हैं। पटना महावीर मंदिर जैसे देश में हजारों की संख्या में मंदिर एवं धर्मस्थल हैं, जिनके पास अरबों-खरबों की सम्पत्ति है। विप्रो जैसी सैकडों कंपनियाँ हैं जिनके पास अपार बेकार पड़ा धन है। अगर वे भी स्वास्थ्य एवं शिक्षा जैसे क्षेत्रों में सेवा देकर देश एवं सामान्य मानवी के भविष्य को सँवारने में लग जाएं तो हमारा देश और समाज अभी से ज्यादा सुंदर हो जाएगा।

कालका जी डी.डी ब्लॉक जैसे दिल्ली एवं देश के अनेक शहरों में अनगिनत ऊँची दीवारों एवं सलाखों से बंद ब्लॉक बना दिए गए हैं और करीब-करीब सबके पिछवाड़े में र्झुिग्गयों का विस्तार भी होता है। इन ब्लॉकों के जीवन में गति इन्हीं झुग्गियों के लोगों की सेवाओं पर टिकी है। फिर भी इसमें पलनेवाले बच्चे अपनी नैसर्गिक अधिकार, दौड़ने-खेलने के लिए जगह तक के लिए तरसते हैं। पहले भले कुछ लोगों को इनके प्रवेश देने पर अनेक तरह की आशंकाएँ हो पर साल भर के अपने अनुभव से यही कह सकता हूँ कि झुग्गियों एवं गरीबों के बच्चे भी कम समझदार नहीं हैं। आज तक इन बच्चों ने किसी का कुछ भी नुकसान नहीं किया है न ही कुछ तोड़ा-फोड़ा है। ये खूब मस्ती में खेलते-भागते हैं। हमारे ऑफिस के बाहरी गेट खुला रहने के बावजूद उसके नलके से पानी पीने के लिए भी पूछकर आते हैं। यहाँ के रेजिडेंस ऐसोसिएशन जैसे विश्वास एवं उदारता की जरूरत है। 21वीं सदी जनतंत्र की सदी है इसमें इसमें सिर्फ बाजारों को खोलने से प्रगति नहीं वाला बल्कि दिल, दिमाग और हर बंद ब्लॉकों के दरवाजे खोलने पड़ेगें।              

Saturday, October 3, 2015

सबको सहज सुलभ हो स्वास्थ्य सेवा 
सात साल का अविनाश, छह साल का अमन और 38 वर्षीय हरीश, इन तीनों में समानता सिर्फ यही है कि इन तीनों की जान डेंगू के चपेट में आकर सही समय पर समुचित इलाज नहीं मिलने। एक अस्पताल के इलाज से इनकार करने और दूसरेश्‍ तीसरे, चौथे, पाँचवे, छठे और उससे भी आगे इलाज के लिए भागने तथा अस्पतालों के डॉक्टरों के अमानवीय उपेक्षा के बीच हुई। अविनाश की मौत से उसके माता-पिता को ऐसा सदमा लगा कि दोनों नें एकसाथ एक ऊँची इमारत से छलांग लगाकर जान दे दी। यह तो सिर्फ गिनती के उदाहरण हैं। दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में चक्कर लगाने पर अनेकों दर्द भरी दास्तान और दारुण कोहराम इन दिनों सुनने को मिल रहा है।
डेंगू के कारण राजधानी दिल्ली में अफरातफरी इसलिए ज्यादा मची है कि यह राजधानी है, यह मीडिया तथा प्रबुद्ध लोगों के केन्द्र में है। नहीं तो, हर वर्ष पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और बंगाल में इंसेफ्लाइटिस या जापानी बुखार से हजारों गरीब और दलित के बच्चे मौत के मुँह में समा जाते है। बड़े-बड़े डॉक्टर, विशेषज्ञ और नेता इसे रहस्यमयी बीमारी बताकर, व्याख्यान देकर जिम्मेदारी से मुक्त हो जाते हैं। भारत में अभी भी टीबी से मरने वाले लोग सबसे ज्यादा हैं। हमारे यहाँ प्रसव के दौरान जच्चा-बच्चा की मौतों के आँकड़े बेहद डरावने हैं। दुनिया में बाल-मृत्यु की कुल घटनाओं में एक चौथाई सिर्फ भारत में होती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 55 प्रतिशत शिशुओं की मृत्यु का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष कारण कुपोषण ही है। 
1946 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने हर नागरिक के लिए स्वास्थ्य के अधिकार को स्थापित किया। इसके बाद 1948 में मानवाधिकार घोषणा-पत्र के अनुच्छेद 25 के रूप में इसे शामिल किया गया। सन् 2000 में संयुक्त राष्ट्र ने स्वास्थ्य अधिकार को लेकर कुछ मानक तय किए। ये मानक हैं- उपलब्धता यानी सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाएँ आम लोगों को उपलब्ध हों। इनमें पीने का साफ पानी, साफ-सफाई युक्त अस्पताल, प्रशिक्षित चिकित्साकर्मी और आवश्यक जरूरी दवाएँ। स्वास्थ्य सेवाएँ लोगों की शारीरिक और आर्थिक स्थिति के अनुसार उनकी पहुँच में हों। सभी स्वास्थ्य सुविधाएँ चिकित्सा के नैतिक मापदंडों के अनुरूप हों और अच्छी गुणवत्ता पर आधारित हों।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 47 के अनुसार राज्य अपने लोगों के पोषाहार स्तर और जीवन स्तर को ऊँचा करने तथा लोक स्वास्थ्य के सुधार को लेकर अपने प्राथमिक कर्त्तव्यों को मानेगा... पर यह व्यवस्था राज्य के नीति निर्देशक तत्वों के अर्न्तगत है। जो सिर्फ दिखाने का दांत भर है। देश की न्यायालयों ने अनुच्छेद 21 के तहत दैहिक स्वतंत्रता के संरक्षण के अधिकार को जीवन और स्वास्थ्य के अधिकार के साथ जोड़कर मानव की गरिमा और सम्मान के साथ जीने का अधिकार माना है। इस कानूनी व्याख्या के बावजूद गरीब का जीवन हर समय मौत के आगोश में है।
केन्द्र सरकार ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति- 2015 के जिस मसौदे पर जनता की राय माँगी है उसके अनुसार आने वाले दिनों में चिकित्सा देश के नागरिकों का मौलिक अधिकार बन जाएगी। सिद्धांततः यह क्रांतिकारी बात है। पिछली यूपीए सरकार के दस साल के शासन के दौरान पहले पाँच साल में स्वास्थ्य मंत्री आर. रामदास एम्स के डॉक्टरों और वहाँ के विधार्थियों से सिर्फ इस बात पर उलझे रहे कि एम्स के विद्यार्थियों को अपने शिक्षा के दौरान गाँवों में सेवा देना अनिवार्य हो या नहीं, जबकि दूसरे पाँच साल के दौरान स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद गाँव के एमबीबीएस के लिए तीन वर्षीय कोर्स बनाने और वह लागू कैसे हो, इसी जद्दोजहद में लगे रहे। यूपीए सरकार और योजना आयोग इस ऊहापोह से उबर नहीं पाया कि स्वास्थ्य क्षेत्र में सरकारी बजट बढ़े या निजी अस्पतालों को बढ़ावा दिया जाए। इस बीच आम लोग अनेक तरह की बीमारियों की चपेट में आ-आकर मरते रहे। पूर्वी उत्तर प्रदेश में जापानी बुखार से मरते पीड़ित परिवार के लोग यूपीए अध्यक्षा सोनिया गांधी को रक्त से लिखे अनेकों पत्र भेजते रहे। पूरे देश में निजी अस्पतालों के स्वास्थ्य सेवा की लाभ की फसल लहलहाती रही। 
दुनिया के अनेक देशों में स्वास्थ्य के अधिकार को बकायदा मौलिक अधिकार का दर्जा दिया गया है लेकिन भारत सरकार अपने नागरिकों को समुचित प्राथमिक इलाज की भी व्यवस्था नहीं कर पाई। अनेक योजनाएँ अवश्य प्रारंभ हुई पर भ्रष्टाचार और प्रशासनिक ढिलाई की भेंट चढ़ गई। इसका सबसे बड़ा खामियाजा हमारे गाँव और गरीब को भुगतना पड़ा। मोदी सरकार की स्वास्थ्य नीति में सबसे महत्त्वपूर्ण बात स्वास्थ्य को मौलिक अधिकार का दर्जा देना है। यदि ऐसा होता है तो सरकार की विभिन्न महत्त्वपूर्ण योजनाएँ स्वास्थ्य सेवा के केन्द्र में रखकर बनाई जाने लगेंगी। दूसरी मुख्य बात इस मसौदे में यह है कि स्वास्थ्य पर सार्वजनिक व्यय को बढ़ाकर जीडीपी के 2.5 प्रतिशत तक लाना, जो अभी उसका 1.2 प्रतिशत है। इसके अलावा प्रसव के दौरान जच्चा-बच्चा की मृत्यु की घटनाओं में कमी लाने के प्रयासों पर जोर, संक्रामक रोगों पर नियंत्रण पर प्रमुखता से ध्यान, असंक्रामक रोगों की बढ़ती संख्या से निपटने का प्रयास, सरकारी अस्पतालों में सभी को मुफ्त दवाएँ और रोग जाँच सुविधाएँ उपलब्ध कराने का प्रस्ताव तथा सार्वजनिक क्षेत्र के साथ निजी क्षेत्र की भूमिका पर भी जोर है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने बीमारियों का जो अंतरराष्ट्रीय वर्गीकरण किया है, उसके अंत में जेड-59.5 कोड नाम जिस बीमारी को दिया गया, वह है नितांत गरीबी। हमारी सरकार को यह मूल बात समझना पड़ेगा कि दुनिया का सबसे बड़ा रोग नितांत गरीबी से हमारा देश अभी नहीं उबरा है और अगर उबर भी जाए तो भी बुनियादी प्राथमिक शिक्षा एवं स्वास्थ्य की जिम्मेदारी सरकार की ही है और रहेगी भी। कोई निजी अस्पताल नुकसान उठाकर यह सेवा नहीं देनेवाला। उसकी स्थापना तो देशी अमीरों तथा डॉलर के लिए विदेशियों के इलाज हेतु हेल्थ टुरिज्म या हॉस्पिटल हॉस्पिटेलिटी के लिए किया जाता है। उसे बीमार, गरीब और गाँव से क्या मतलब?  
केन्द्र सरकार की नई स्वास्थ्य नीति आशा जगाती है। सरकार सभी वर्गों को घर के करीब प्राथमिक चिकित्सा की समुचित व्यवस्था करे। समय पर समुचित प्राथमिक उपचार मिल जाने से नब्बे प्रतिशत बीमारियों का इलाज वहीं हो जाता है। समाज के सभी वर्गों को समान रूप से स्वस्थ परिवेश में जीने की यह मौलिक आवश्यकता है। अगर यह मिल जाए तो कोई अमन अनेक बड़े अस्पतालों के दरवाजे से दुरदुराए जाते हुए समुचित इलाज के अभाव में दम नहीं तोड़ेगा। किसी अविनाश के माता-पिता व्यवस्था से व्यथित होकर एकसाथ छत से छलाँग लगाकार खुद अपना विनाश नहीं करेगा।

Wednesday, September 2, 2015

समान शिक्षा तो प्राथमिक सोपान है

इलाहाबाद उच्च न्यायालय का शिक्षा में बुनियादी सुधार से संबंधी अहम् फैसला आए चौबीस घंटे भी नही बीते थे। समान स्कूलिंग व्यवस्था का सपना देखने वाले शिक्षाविद्, समान शिक्षा के लिए संघर्षरत अनेक स्वैच्छिक संगठन तथा मीडिया इसका स्वागत व विवेचन की तैयारी में ही लगे थे कि उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा शिव कुमार पाठक को नौकरी से बर्खास्त कर देने का समाचार आ गया। जिससे साफ पता चल गया कि सरकार को अदालत का यह फैसला कितना नागवार गुजरा है। प्रदेश में शिक्षा की बदहाल स्थिति के खिलाफ इलाहाबाद उच्च न्यायालय में लम्भुआ सुल्तानपुर के शिक्षक शिव कुमार पाठक ने ही इलाहाबाद उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी। इस जनहित याचिका पर न्यायाधीश सुधीर अग्रवाल की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने दो टूक फैसला सुनाते हुए कहा कि सभी नौकरशाहों, कर्मचारियों, न्यायाधीशों और जनप्रतिनिधियों के बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ें। अदालत का कहना है कि अगर सरकार से वेतन लेने वालों के बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ने लगेंगे तो सरकारी स्कूलों की स्थिति सुधर जाएगी। अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार के मुख्य सचिव को छह माह के भीतर उक्त व्यवस्था करने का आदेश दिया है।
जब  सर्वोच्च न्यायालय के अनेकों हस्तक्षेप के बाद शिक्षा का अधिकारकानून बना था तो लग रहा था कि वे दिन अब करीब हैं जब अमीर और गरीब सबको अनिवार्य और समान शिक्षा एक साथ मिल पायेगी। सरकार या राज्य यह व्यवस्था करेगी कि प्रधानमंत्री से लेकर एक अदने से चपरासी और टाटा, बिड़ला, अंबानी तथा झुग्गी-झोपड़ी में रहनेवाले के बच्चे, सभी एक साथ अपने घर के करीब समान सुविधाओं वाली शिक्षा प्राप्त करेंगे। परंतु इस कानून में ऐसे-ऐसे नियम व शर्तें जोड़ दी गई कि कानून अमल में आते ही सारे सपने टूट-बिखरकर भ्रष्टतंत्र और शिक्षा के दलालों के प्राइवेट स्कूलों की दहलीज पर घुटने टेक बैठा। देश के अभागे गरीब, दलित बच्चे निरंतर अव्यवस्था के शिकार सरकारी स्कूलों में प्रदुषित मिड डे मील खाने और सिर्फ देश की साक्षरता के आँकड़े बढ़ाने के लिए बच गए।  
स्वतंत्रता संग्राम में अपना सब कुछ बलिदान करने वाले स्वतंत्रता सेनानियों एवं संविधान निर्माताओं का सपना था कि देश के सभी नागरिकों को राजनीतिक, आर्थिक एवं सामाजिक जनतंत्र मिले और इसकी बुनियाद समान शिक्षा का अधिकार है। संविधान के अनुच्छेद 21ए से मिली शिक्षा को मौलिक अधिकार व अनुच्छेद 45 में दर्ज नीति-निर्देशक सिद्धांत सभी के लिए शैक्षिक अवसरों की समानता तय करने का प्रावधान करते हैं। 1966 में कोठारी आयोग, 1985-86 की नई शिक्षा नीति से लेकर अनेक समितियों और रिर्पोटों ने समान शिक्षा प्रणाली को मान्यता दी गई। इसके अलावा समान पड़ोस में समान स्कूलिंग व्यवस्था के लिए अनेक शिक्षाविद् व स्वैच्छिक संगठन मांग करते रहे तथा आंदोलनरत रहे। परंतु सरकारी तंत्र निरंतर प्राथमिक शिक्षा की बदहाली को देखकर देखकर भी अनदेखा किए रहा। शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे अपने मूलभूत कर्त्तव्यों से निरंतर मुँह मोड़े रहने का ही परिणाम है कि अदालतों को बार-बार हस्तक्षेप कर आदेश व चेतावनी देनी पड़ रही है।
दशकों शिक्षा की उपेक्षा के कारण ही प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्चतम शिक्षा तक में निजीकरण का बोलबाला हो गया। आज गाँवों से लेकर महानगरों तक, सभी जगह निजी स्कूलों का ही बोलबाला है। गरीब से गरीब भी जो अपने बच्चों को पढ़ाना चाहता है, वह सरकारी स्कूलों की तरफ देखना नहीं चाहता और निजी स्कूलों के जालफाँस में फँसने को मजबूर है। सरकारी स्कूलों की स्थिति निरंतर जर्जर होती चली गई। शिक्षकों की भर्ती वर्षों से नहीं हो रही है, उसकी जगह पर मामूली वेतन पर ठेके या संविदा पर शिक्षक रखे जा रहे हैं, जिनके पास न तो समुचित डिग्री है न ही वे प्रशिक्षित होते हैं। संविदा शिक्षकों की नियुक्तियाँ शिक्षा को बेहतर बनाने के नजरिये से नहीं, बल्कि पंचायत स्तर पर ही वोट बैंक, भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद को ध्यान में रखकर की जाती हैं। शिक्षकों को भी यह एहसास है कि नौकरी उन्हें उपकृत करने के लिए दी गई है, पढ़ाने के लिए नहीं। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस फैसले में उत्तर प्रदेश में भी शिक्षकों की भर्ती की प्रक्रिया को गलत बताया है। सरकारी स्कूलों का स्तर इतना गिर चुका है कि शिक्षक खुद अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में पढ़ने नहीं भेजते।
राजनेता, मंत्री, अफसर व सरकारी कर्मचारी जिनके पास नीतियों को लागू करने का अधिकार और पैसा दोनों है, वे जब अपने बच्चों को निजी स्कूलों में पढ़ाते हैं तो सरकारी स्कूलों की सुध लेने वाला कौन बचता है? संविधान के दर्शन, अच्छे से अच्छे कानून एवं नीतियां सिर्फ हाथी के दाँत बनकर रह जाती हैं। देश के सभी जाने-माने शिक्षाविदों से लेकर आमजन और इलाहाबाद उच्च न्यायालय का भी यही मानना है कि जब देश के नीति निर्माताओं, उसके अनुपालन करवाने वाले तथा अन्य सक्षम लोगों के बच्चे भी इन स्कूलों में पढ़ने लगेंगे तभी वे इन स्कूलों की मूलभूत सुविधाओं और शैक्षिक गुणवत्ता सुधारने की ओर ध्यान देंगे।
न्यायालय का फैसला वर्तमान शिक्षा व्यवस्था की वजह से समाज में गरीब और अमीर, शक्तिशाली और सामान्य के बीच लगातार बढ़ती दरार को भी पाटने का प्रयास है। आज समाज में जितनी भी हिंसा और उथल-पुथल मची है, वह समाज में अनेक वर्गों के बीच बढ़ती इस शैक्षिक विषमता का परिणाम है। प्राथमिक शिक्षा ही वह बुनियाद है जिसके बल पर कोई देश और समाज रूपी महल तैयार होता है। अगर बुनियाद की तामीर ही सामाजिक भेदभाव एवं अनेक वर्गों में अलगाव के विषाक्त गारे पर पड़ेगी तो महल को बनने से पहले भरभराकर विध्वंस होने से कौन बचा पाएगा!

आज पूरा देश, खासकर हिन्दी प्रदेशों एवं उत्तर प्रदेश सरकार को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले को आने वाले समय के गंभीर परिणामों से बचने के लिए एक अवसर एवं चुनौती दोनों रूप में स्वीकार करना चाहिए। फैसले को सकारात्मक भाव से लेकर समाज में समन्वय का बीज वपन कर सभी नवांकुरों को समान रूप से बढ़ने, फलने-फूलने का माहौल पैदा करना चाहिए। न कि याचिकाकर्ता शिव कुमार पाठक को दंडित-उत्पीड़ित कर और इस फैसले को सर्वोच्च न्यायलय में चुनौती देकर मुद्दे को टालने का प्रयास करना चाहिए। सरकार को समझना चाहिए कि अब समय काफी बदल चुका है। अब लैपटॉप, बेरोजगारी भत्ते और मिड डे मील के लालीपॉप से गुणवत्तापूर्ण समान शिक्षा की यह भूख शांत नहीं होने वाली है। समान स्कूलिंग या समान शिक्षा की माँग तो प्राथमिक सोपान है। अगर इस सोपान पर देश के सभी बच्चों के कदम एकसाथ मजबूती से जम जाये तो वह राजनीतिक जनतंत्र के साथ-साथ सामाजिक एवं आर्थिक जनतंत्र का मार्ग प्रशस्त करेगा! 

Thursday, June 4, 2015

कल्पवृक्ष बना वंशवृक्ष

भारतीय जनमानस में बहुत गहरे तक यह व्याप्त है कि कल्पवृक्ष से जिस वस्तु की भी याचना की जाए, वह उसे यह दे देता है। इसका नाश कल्पांत तक नहीं होता। कल्पवृक्ष देवलोक का एक वृक्ष है। पुराणों के अनुसार समुद्रमंथन से प्राप्त 14 रत्नों में कल्पवृक्ष भी था। यह इंद्र को दे दिया गया था और इंद्र ने इसकी स्थापना सुरकानन में कर दी थी। यही कारण है कि हम भारतीय अनेक वृक्षों को कल्पवृक्ष मानकर पूजा करते हैं और कामना करते हैं कि उसकी कृपा से हमारी सारी मनोकामनाएँ पूरी हो जाएँगी। यह कल्पना या विश्वास कुछ इसी तरह का है जैसा कि महात्मा गांधी का रामराज्य की अवधारणा। स्वतंत्रता के समय देश की अधिकांश जनता ने गांधी जी एवं अनेक जननेताओं के नेतृत्व में स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लिया और अनेकों कुर्बानियाँ इस सोच के साथ दीं कि कांग्रेस नामक कल्पवृक्ष के छाया तले सबके प्रयासों से गुलामी से मुक्ति मिलगी और राम राज्यकायम होगा।
सदियों की गुलामी से मुक्ति मिली। अपने लोगों के हाथ में शासन की बागडोर भी आ गई। गांधी का कांग्रेस जो कभी विविध वृक्षों का बागीचा था वह शासन में आते ही राष्ट्रीय वृक्षबरगद की भूमिका में आ गई बरगद के वृक्ष की शाखाएँ दूर-दूर तक फैली हुई तथा जड़ें गहरी होती हैं। जड़ों और तने से और शाखाएँ बनती हैं। इसके इस विशेषता के कारण इसे अक्षय वटभी कहा जाता है, क्योंकि यह पेड कभी नष्ट नहीं होता है। इसकी छाया तले पशु-पक्षी एवं अनेक जीव-जंतु सुकून, भोजन एवं आवास पाते हैं और कल्पवृक्ष का एहसास करते हैं। आज भी गाँव के लोग इसी पेड़ की छाया में पंचायत करते हैं, यह मानकर कि यहाँ नीर-क्षीर-विवेक होगा और इंसाफ मिलेगा।
परंतु आजादी के छः दसकों बाद लोगों का यह भ्रम अब पूरी तरह से टूट गया है कि जिस कांग्रेेस रूपी कल्पवृक्षने उन्हें रामराज्यका सपना दिखाया था वह स्वप्न ही बनकर रह गया। कांग्रेस जिस बरगद को कल्पवृक्ष मानकर जनता को यह विश्वास दिलाती रही कि बरगद के समान ज्यों-ज्यों वह पुरानी होगी त्यों-त्यों उसके नये बरोह धरती की ओर फैलता जाएगा व नयी जड़ बनकर उसकी शाखा पूरे देश में फैल जाएगी। उसके तले सारे देश का रामराज्यका सपना साकार होगा। परंतु हुआ इसका उल्टा क्योंकि जिस बरगद को जनता ने कल्पवृक्ष समझा था वह कुछ सालों बाद ही वंशवृक्ष में तब्दील हो गया और एक ही परिवार का राज कायम हो गया। लोगों को यह बात बहुत बाद में समझ आया कि कांग्रेस जो कि कभी विविध वृक्षों की एक बाग थी बाद में क्रमशः जो भी उसके जड़ एवं तने का हिस्सा बनने से इंकार किया, उन वृक्षों को इस बाग से असमय उखाड़ दिया गया या पलायन को मजबूर कर दिया गया। उसी के नकल में अनेक प्रदेशों में भी कुछ ही वंशवृक्ष का शासन कायम होता गया। जो अब बड़ी ही निर्लज्जता से अपने परिवार एवं कुनबे के विकास तक ही सीमित होकर रह गया है। 
इस सच्चाई से कोई मुँह नहीं मोड़ सकता है कि वट वृक्ष के तले अनेक जीवों का पालन-पोषण होता है। परंतु यह भी सच्चाई है कि इसके आस-पास किसी भी स्वतंत्र पेड़-पौधों का पनपना और विकसित होना मुश्किल है। इसमें कुछ घास-झाड़ी वगैरह उगते भी हैं तो वे जड़विहीन होते हैं। सिर्फ देखने भर की उनमें हरियाली होती है। इतने बड़े भौगोलिक, सामाजिक, धार्मिक, अनेक विविधताओं से भरे इस देश में जिसमें अगर हम सिर्फ भौगोलिक एवं वनस्पति की विविधता पर ही नजर डालें तो भारत को अनेक वनस्पति प्रदेशों में वर्गीकृत किया जाता है- हिमालय प्रदेशीय या पर्वतीय वृक्ष, उष्णार्द्र सदाबहार वृक्ष, आर्द्र मानसूनी वृक्ष, उष्णार्द्र पतझड़ वृक्ष, मरुस्थलीय वृक्ष तथा दलदली अथवा ज्वार भाटा क्षेत्रों के वृक्ष। इन वृक्षों व वनों में हजारों तरह के विविध पेड़-पौधे हैं जो वहाँ की भौगोलिक परिस्थितियों के अनुरूप यहां के बाशिन्दों एवं पर्यावरण को जीवंत बनाते हैं।
गांधी जी जब रामराज्यकी बातें करते थे तो साथ में यह जोड़ना नहीं भूलते थे कि हर व्यक्ति, हर गाँव, हर प्रदेश स्वावलंबी होगा तभी स्वराज और रामराज्य आएगा। यही कारण है कि जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी यह कहते हैं कि देश का सिर्फ दिल्ली या अकेला प्रधानमंत्री नहीं, बल्कि इंडिया टीमयानी प्रधानमंत्री के साथ सभी राज्यों के विभिन्न दलों के मुख्यमंत्री मिलकर काम करें, तभी देश का एक समान विकास होगा। तो इस पर जनता का भारी समर्थन मिलता है। प्रधानमंत्री को इससे एक कदम आगे बढ़कर सभी जिला पंचायतों और ग्राम पंचायतों को भी अपनी इस टीम में शामिल कर सबकी भागीदारी सुनिश्चित करनी चाहिए ताकि हर गाँव, हर शहर, हर प्रदेश के लोग अपनी परिस्थितियों एवं विविधताओं के अनुरूप एक दूसरे के सहयोग से खुद स्वावलंबी बनंे तभी देश सही मायने में प्रगति करेगा।
भारतीय मानस में पैठा कल्पवृक्ष या रामराज्य की अवधारणा कोई कल्पना या यूटोपिया भले लगती हो, परंतु इसे ठीक से समझने की आवश्यकता है। अगर हम सही अर्थों में सबका साथ सबका विकासके नीतिवाक्य पर चलते हुए विविध पेड़-पौधों को विकसित होने दें तो, हमें अनेकों फल मिलेंगे, हजारों फूल खिलेंगे, हजारों तरह की रंग-बिरंगी चिड़िया चहचहाएँगी। सभी जीव-जंतु भारत के इस उपवन को गुलजार करेंगे। समय से सभी मौसम आएँगे। नदियाँ निर्बाध बहेंगी। बर्फ में ढके पर्वत नर्म धूप से नहा कर आभा बिखेरेंगे। सभी खेत हरे-भरे रहेंगे। किसान शाम को चौपालों पर कहकहे लगाएँगे। बच्चे खिलखिलाएँगें। सभी को समान रूप से शिक्षा, स्वास्थ्य एवं सुरक्षा जैसी मूल सुविधाएं मिलेगा।

 उसके लिए हमें अपने कल्पना-लोक से उतरकर जमीनी वास्तविकताओं को समझना पड़ेगा कि कल्पवृक्ष कोई एक पेड़ नहीं बल्कि विविध विशेषताओं वाली वनस्पतियाँ एवं पेड़-पौधे मिलकर कल्पवृक्ष बनते हैं। सभी के अनेक गुणों से ही पूरा पारिस्थितिकीय संतुलन कायम रहता है। इसी के मधुर फल से हमारी सारी मनोकामनाएँ पूरी हो सकती है। देश के सभी लोगों के इमानदारी पूर्वक समवेत प्रयास से ही रामराज्यभी संभव है।        

Saturday, May 9, 2015

सबके लिए हमेशा खुला है मध्यम मार्ग का द्वार

सिद्धार्थ, बुद्ध बनने के लिए सुंदर पत्नी यशोधरा, दुधमुँहे राहुल और कपिलवस्तु राज सिंहासन का मोह छोड़कर तपस्या के लिए चल पड़े। राजगृह पहुँचे, भिक्षा मांगते, घूमते-घूमते अलार कालाम और उद्दक रामपुत्र के पास पहुँचे। उनसे योग साधना सीखी। समाधि लगाना सीखा। पर संतोष नहीं हुआ। उरुवेला पहुँचे और तरह-तरह से घोर तपस्या करने लगे। पहले तो विविध प्रकार के आहार छोड़कर सिर्फ तिल-चावल खाकर तप करते रहे, फिर निराहार तपस्या। छः साल बीत गए। शरीर सूखकर कांटा हो गया, फिर भी ज्ञान की प्राप्ति नहीं हुई। एक दिन कुछ ग्रामीण स्त्रियां वहां से गुजरती हुई एक गीत गाते हुए जा रही थीं। उसका अर्थ था, ‘वीणा के तारों को ढ़ीला मत छोड़ दो। ढीला छोड़ देने से उनका सुरीला स्वर नहीं निकलेगा। पर तारों को इतना कसो भी मत कि वे टूट जाएं।बात सिद्धार्थ को जंच गई। वे मान गए कि नियमित आहार-विहार से ही योग सिद्ध होता है। अति किसी बात की अच्छी नहीं। किसी भी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए मध्यम मार्ग ही ठीक होता है और इसी मध्यम मार्ग पर चलकर उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई और वे भगवान बुद्ध बने।
बुद्ध ने तत्कालीन समाज में व्याप्त अनेक प्रकार की बुराइयों, धार्मिक व जातीय कट्टरताओं एवं अनेक प्रकार के जड़ जमाए अंधविश्वासों से मुक्ति का मार्ग बताया। समाज अधिक तर्कशील, आधुनिक और दुःखी और कमजोर लोगों एवं जीवों के प्रति करुणा का भाव जागृत कर एक सर्वसमावेशी समाज की ओर अग्रसर हुआ। उनके बताये मार्ग पर भारत समेत दुनिया के अनेक साधारण एवं शासक वर्ग ने चलकर अनेक कल्याणकारी कार्यों को अपनाया। वह चाहे अंगुलीमाल जैसा डाकू हो या फिर कलिंग युद्ध में हजारों लोगों की हत्याओं का दोषी सम्राट अशोक। यहां तक कि तलवार के बल पर भारत में सत्ता में आये मुस्लिम मुगल शासकों में सबसे सफल शासक अकबर भी कमोवेश इन्हीं सर्वसमावेशी नीतियों यानी मध्यम मार्ग पर चलते हुए समाज के हर वर्ग और समुदाय का दिल जीतते हुए एक सफल शासक बन सका। 
आधुनिक भारत में अधिकांश समाज सुधारक जिनमें स्वामी विवेकानंद, महात्मा गांधी, बाबा साहब भीमराव आंबेडकर तथा अनेक राजनीतिक सामाजिक नेताओं ने इसी मध्यम मार्ग पर चलकर देश में जनजागरण एवं करोड़ों लोगों के लिए मुक्ति का मार्ग दिखा सके। इन महापुरुषों ने हर तरह के अतिवाद का विरोध किया चाहे वह धार्मिक, जातिवादी एवं अनेक प्रकार की वैचारिक कट्टरता के विरुद्ध संघर्ष में ही अपना जीवन लगा दिया। भारत को न सिर्फ गुलामी से मुक्त किया बल्कि भारत को एक सर्वसमावेशी, आधुनिक, तर्कशील समानतावादी समाज बनाने का सपना देखा। जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण हमारा संविधान है।
आजादी के बाद 60 सालों तक कांग्रेस पार्टी शासन में रही उसका मुख्य कारण यही मध्यमार्गी नीतियां रही थीं परंतु निरंतर उसमें विचलन आता चला गया और पार्टी सिर्फ सत्ता में बने रहने के लिए अनेक प्रकार के अतिवादों से घिरती चली गई। जहां एक खास तरह के वंशवादी अभिजात्य वर्ग की तानाशाही और भ्रष्टाचारियों को बढ़ावा दिया जिसके कारण सबको समान रूप से शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार एवं सम्मान का सपना सिर्फ संविधान एवं नीतियों के दायरों में ही सिमट कर रह गया। यहां तक कि अपने आप को धर्मनिरपेक्ष एवं जातिनिरपेक्ष का ढिंढोरा पीटते हुए भी हर तरह के कट्टरता को बढ़ावा देती रही। देश अनेक तरह की विकराल समस्याओं से घिरता चला गया।
इसी का परिणाम था कि 2014 के आम चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी जिसे कांग्रेस समेत अधिकांश विरोधी दल एवं मीडिया पिछले दस-बारह वर्षों से लगातार एक कट्टर हिंदूवादी नेता के रूप में पेश करते रहे थे। परन्तु उन्होंने लगातार अपने विचारों और अपने सकारात्मक रचनात्मक कदमों से अपने आप को एक सच्चे मध्यम मार्गी नेता के रूप में स्थापित किया। जिसे जनता ने भारी मतों से विजयी बनाकर देश की सत्ता सौंपी। सरकार में आते ही वे देश की हर समस्या के समाधान के लिए अनेक लोक कल्याणकारी, सर्मसमावेशी, त्वरित, स्पष्ट कदम उठा रहे हैं जिसे सभी आश्चर्य से आशा भरी नजरों से उनकी तरफ देख रहे हैं। आज पूरी दुनिया और उनके घोर विरोधी नेता और मीडिया भी यह मानने को मजबूर हैं कि मोदी सरकार की स्पष्ट, सर्वसमावेशी नीतियों ही देश का हित है। एक समय जो शक्तिशाली देश मोदी को अपने देश में आने देने से कतरा रहे थे वे आज उनके स्वागत में लाल कालीन बिछा रहे हैं। आज सब हैरत में हैं कि नरेन्द्र मोदी के बारे में उनका आकलन कितना गलत था।
दूसरी तरफ विरोधी दल कांग्रेस के नेता राहुल गांधी जो अपने आप को गांधीवादी या मध्यम मार्गी कहते नहीं थकते को, दूर-दूर तक दिखाई नहीं दे रहा है कि नरेन्द्र मोदी की क्या काट निकालें। आज उनकी पार्टी लगातार हार के सदमे से बिखराव की स्थिति में है। जिस राहुल गांधी को उन्होंने नेहरू, गांधी खानदान का होने के कारण अपना नेता बनाया वह लगातार दस वर्षों से अपने बचकानेपन की वजह से इतनी पुरानी पार्टी की नींव को निरंतर कमजोर कर अपनी जिम्मेदारियों से भागते फिर रहे हैं। इन दिखावटी कारनामों से थोड़ा मीडिया आकर्षण जरूर बनता है। परंतु इससे न तो किसी समस्या का हल निकलना है और न ही उनकी पार्टी की स्थिति में ही सुधार होने वाला है। खासकर तब जब सामने नरेन्द्र मोदी जैसा संघर्षशील तपे-तपाये नेता से मुकाबला हो।
मध्यम मार्गकोई कहीं का ईंट कहीं का रोड़ा...वाली चीज नहीं है जो कोई जब चाहे कहीं से चुनकर अपना मार्ग बना ले यह तो भगवान बुद्ध के बताये आठ तत्वों वाले अष्टांगिक मार्गों से बना है जिसमें- सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वचन, सम्यक काम, सम्यक आजीव, सम्यक व्यायाम, सम्यक स्मृति और सम्यक समाधि। इन आठ तत्‍वों को अपने में रचा-पचा लेने से ही मध्यम मार्ग निकलता है, जिसपर चलकर सबका कल्याण होता है। यह मध्यम मार्ग इतना मुश्किल भी नहीं है परंतु यह निरंतर सतत् प्रयास मांगता है जिसे बुद्ध या गांधी के साधारण संघर्षशील जीवन का अध्ययन कर समझा जा सकता है। यह मध्यम मार्ग का द्वार हमेशा सबके लिए खुला होता है चाहे वह कोई अंगुलीमाल डाकू हो, सम्राट अशोक हो, अकबर हो, नरेन्द्र मोदी हों या फिर राहुल गांधी। क्या राहुल गांधी इस मध्यम मार्ग के राहगीर बनेंगे? या अपने बचकानेपन की वजह से ही इतिहास बनने को अभिशप्त होंगे? इतिहास जिस एक राहुल को याद करता है वह तो सिद्धार्थ पुत्र दुधमुंहे राहुल हैं जिसे सिद्धार्थ, बुद्ध बनने के लिए नींद में छोड़ आए थे।



Saturday, April 4, 2015

चोरी की शिक्षा

जिस तरह बिहार एवं उत्तर प्रदेश की मैट्रिक परीक्षा में विधार्थियों द्वारा की और कराई जा रही चोरी को टीवी चैनलों एवं समाचार पत्रों द्वारा उपहास उड़ाते हुए दिखाया जा रहा है और लोग कहकहे लगा रहे हैं। वह हिन्दी पट्टी खासकर बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश जैसे राज्यों को नजदीक से जाननेवाले जानकारों के लिए उतनी आश्चर्यजनक, चौकानेवाली घटना नहीं हैं। इस वर्ष जिस तरह से चार-पाँच मंजिले स्कूलों एवं भवनों पर चोरी कराने के लिए लड़कों को हनुमान की तरह कुदते-फांदते, चढ़ते देख रहे हैं, वास्तव में यह सरकारी शिक्षा व्यवस्था की कई दशकों से होती उतनी मंजिल पतन की बानगी है जो अब चरमराकर पतन के पाताल तक पहुँच गई है।
जैसा कि पूर्व मुख्यमंत्री लालू यादव जी खिलखिलाते हुए कह रहे थे, मेरा राज पुनः आयेगा तो किसी को भी छत और खिड़कियों पर लटककर चोरी करने या करवाने की जरूरत नहीं रहेगी। सबको किताब-कॉपी दे दी जाएगी कि खुलेआम लिखो। यह लोग भूले नहीं हांेगे कि जब वे कुछ साल पहले मुख्यमंत्री थे तो धडल्ले से सभी स्तर पर हो रहे परीक्षाओं में कदाचार को बढ़ावा देने में कोई कोर-कसर उन्होंने नहीं छोड़ी थी। जिस क्षेत्र में जिस जाति का बाहुबल था पूरे स्कूल या कॉलेज में उसी जाति के नेताओं की मनमानी और धडल्ले से चोरी चलती थी। यहाँ तक कि कई स्कूल और कॉलेज में कार्यालय की खिड़की सुबह से शाम तक खास परीक्षार्थियों के लिए खुला छोड़ दिया जाता था ताकि परीक्षार्थी उत्तर की कॉपी शाम तक अपने घर से लिखकर इस खिड़की में डाल दें। हाँ जबसे नीतीश राज यानी सुशासन वाला राज आया तो इसमें कुछ रोक अवश्य लगी थी फिर भी उतना नहीं कि जितना कि सुशासन के गुणगान में हमारे पत्रकार बंधुओं को बिहार में सबकुछ सुशासित-सुभाषित लगने लगा था।
उत्तर प्रदेश में जब भारी मात्रा में हो रही नकल को रोकने के लिए कल्याण सिंह सरकार ने कानून बनाया और तत्कालीन शिक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कड़ाई से उसे अनुपालन करवाकर कदाचार को रोका तो राजनीतिक कोहराम मच गया था समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह ने इसे अगले विधानसभा चुनाव का मुख्य मुद्दा ही बना दिया और अपनी सरकार बनते ही मुख्यमंत्री की शपथ लेने के बाद तत्काल कैबिनेट बैठक करके पहला काम इस कानून को निरस्त करने का किया था। वह समाजवाद इतना फला-फुला कि अब राज्य लोक सेवा आयोग (यूपीपीएससी) के प्रश्नपत्र परीक्षा के पहले से ही धडल्ले से लाखों रुपये में बिक रही है। मध्य प्रदेश इस मामले में थोड़ा अलग है क्योंकि वहाँ जो भी होता है अभिनव एवं सभ्य अंदाज में होता है। यानी व्यापमं वाले अंदाज में। जिसमें परीक्षा वगैरह सब सलीके से हो चुकने के बाद अंतिम परिणाम के समय परीक्षार्थी के नाम फोटो बदलकर पूरा परिणाम खास लोगों के नाम कर दिया जाता है और सामान्य योग्य अभ्यर्थी जिंदगी भर अपने गरीब और सामान्य होने के भाग्य पर लहू के आंसु बहाने को विवश होकर रह जाते हैं।
इधर के अनेक वर्षों के अनेक स्वतंत्र शिक्षा संस्थाओं के रिपोर्ट को उठा कर देख लें सब इन क्षेत्रों में शिक्षा व्यवस्था खासकर प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा की चरमराने की बानगी से भरी पड़ी हैं। अनेक सर्वे इस बात की तस्दीक करती रही है कि सातवीं और आठवीं के बच्चे किताब ठीक से नहीं पढ पाते, चार लाइन शुद्ध लिख नहीं पाते और मामूली गुणा-भाग के प्रश्न हल नहीं कर पाते। परंतु साक्षरता के आंकडे सालों-साल बढ़ते जाते हैं। शिक्षा का मतलब सिर्फ साक्षरता भर बनकर रह गया है। यानी सिर्फ अपना नाम भर लिख लेना। इसके लिए अनेक कारण जिम्मेदार रहें जिसमें प्रमुख हैं- राज्य सरकारों का शिक्षा के प्रति बिल्कुल ध्यान नहीं देना और जानबूझकर स्थिति को आंख मुंदकर बिगड़ते देखते रहना। योग्य शिक्षकों की नियुक्ति कई दशकों से नहीं करना, स्कूल एवं शिक्षा के आवश्यक संसाधनों का विस्तार नहीं करना। स्कूलों पर जबर्दस्ती अधिक से अधिक नामांकन के आंकड़े पेश करके दिखाने के लिए प्रोत्साहित करना जैसे अनेक कारणों को गिनाया जा सकता है। इन सबके पीछे जो आपराधीक सोच यह रहा कि शिक्षा मुहैया कराने के मौलिक कर्त्तव्य से सरकारों का किनारा कर लेना और प्राइवेट शिक्षा की दुकानों को हर स्तर पर बढ़ावा देना। 
मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने अपने शासन काल में अनेक क्षेत्रों में अनेकों अभिनव योगदान दिए परंतु एक योगदान जिसे सभी हिन्दी राज्यों ने हाथोंहाथ लिया था वह था शिक्षा मित्रों या ठेकेदारी पर शिक्षकों की नियुक्ति। इन शिक्षकों को न तो कई सालों से पढ़ाई-लिखाई से कुछ खास लेना-देना था और न ही इनकी प्रशिक्षण की कोई व्यवस्था। सरकारों ने अपने नौनिहालों को भाग्य-भरोसे इन ठेके के चार-पाँच हजार वेतन पर नियुक्त बेचारे बेरोजगारों के हाथों सोंप दिया और शिक्षकों के वेतन पर होने वाले खर्च से निजात पा ली। नतीजा यह हुआ कि हर कस्बे शहर से लेकर महानगरों तक प्राइवेट स्कूल खुल गये और जो भी माता-पिता अपने बच्चों को इनमें भेजने लायक थे वे इन दुकानों की शरण में आ गये। जो गरीब कुपोषित बचे वे खिचड़ी या दलिया से भूख मिटाने व साक्षरता के आँकड़े बढ़ाने भर के लिए सरकारी स्कूल जा रहे हैं। बिहार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के शासन में आते ही सभी वर्गो के लिए समान स्कूलिंग व्यवस्था के लिए मुचकुंद दुबे की अध्यक्षता में समिति बनाई थी पर वर्षों पहले वह रिपोर्ट आ जाने के बावजूद उसे किस कूड़ेदान में डाल दिया गया पता नहीं। उनके एक दशक से ज्यादा के शासनकाल में कितने शिक्षकों की नियुक्ति हुई कोई बता सकता है?
आजादी के बाद कम से कम बहुसंख्यक सामान्य जनों के लिए प्रगति की अगली मंजिल पर जाने के लिए शिक्षा की जो सार्वजनिक सामान्य सीढ़ियां हुआ करती थी उसे जब कुछ दसकों से लगातार नष्ट कर उसके जगह पर खंदक खोदा जा रहा हो। इतना ही नहीं सफलता के ऊँचे सोपानों पर चढने के लिए कुछ खास वर्गों के लिए कहीं एस्केलेटर तो कहीं व्यापमं जैसी लिफ्ट की व्यवस्था कर दी गई हो। तो फिर सफलता की मृग मरिचिका पाले सामान्य वर्ग बोर्ड परीक्षा पास करने के लिए तीन मंजिले-चार मंजिले हनुमान कूद का रास्ता अपना कर चोरी कर या करवा रहा है तो इसमें आश्चर्य या विस्मय की कौन सी बात है? अब ये लोग उन गरीब बेचारों पर हँस रहे हैं जिन्हें पूरी जिंदगी जीने की न्यूनतम आवश्यकताओं के लिए इसी तरह गाँव से शहरों, महानगरों और जहाँ भी आशा की रोशनी दिखाई दे हर उस मंजिल तक कूदते-फांदते रहना है!