Thursday, November 12, 2015

खुल रहे हैं दरवाजे!
पिछली दीवाली के समय हमारे ऑफिस के सामने वाले बच्चों के पार्क में बड़ी तेजी से साफ-सफाई, रंग-रोगन एवं नये-नये झूले, सी-सॉ, स्लाइडर, कुरसियां वगैरह लग रहे थे। ये सब पहले से भी थे, लेकिन बेकार... सारे जस-के-तस धूल खाते। दिनभर पूरा पार्क सुनसान। पिछले आठ सालों में कालकाजी के डी.डी. एवं पी.टी ब्लॉक नई दिल्ली के इस संभ्रांत एवं शक्तिशाली लोगों की कॉलोनी में, यहाँ के बच्चों को इन पार्को में शायद ही कभी खेलते एवं धमाचौकड़ी मचाते देखा होगा। उन्हें जब भी देखा, बड़ी-बड़ी गाड़ियों से स्कूल या कहीं से नौकरों या ड्राइवरों के संग आते-जाते। उस दिन भी अमीरों के इस शगल कि- हर दो-तीन साल में घर के सभी सामान को नये फैशन के हिसाब से बदल दोको मानकर आगे बढ़ जाता, परंतु सामने ही संगीता सिन्हा जी (पाँचवाँ स्तंभ की संपादक) एवं रेजिडेंस वेलफेयर एसोसिएशन की जॉली जी मिल गर्इं। मैंने पूछ ही लिया, यहाँ बच्चे तो खेलते नहीं, फिर इतना कुछ क्यों करवा रही हैं? दोनों ने एक साथ मुस्कराते हुए कहा, कल से देख लीजिएगा! मैंने कहा, चलिए देखते हैं। दूसरे दिन आया तो देखा, पूरा नजारा ही बदला हुआ था। पूरी तरह से सजा-धजा यह एस.बी.आई. चिल्ड्रेन पार्क बच्चों से गुलजार था। सभी के हाथों में मिठाई के पैकेट थे और सभी मस्ती में मशगूल थे। परंतु ये बच्चे इस कॉलोनी की चहारदीवारी के नहीं थे। ब्लॉक का पिछला दरवाजा, जिसके सामने झुग्गियों का लंबा विस्तार है। जहाँ बेचारे बच्चों को खेलने के लिए खतरनाक मुख्य सड़क के सिवा कुछ नहीं, जो कभी-कभी बड़ी दीवारों से या चोरी-छुपे इधर घुसकर आम-जामुन तोड़कर जल्दी से जल्दी भागने की फिराक में रहते थे, के लिए खोल दिया गया था।
अमेरिका मैसाच्यूसेट्स के जूलिया वाइज और जेफ कॉफमैन ऐसे दंपत्ती हैं, जो अपनी कमाई के सिर्फ छह फीसद पर गुजारा कर लेते हैं और बाकी सारी कमाई जरूरतमंदों की सहायता में दान कर देते हैं। जूलिया एक समाजसेविका हैं जबकि जेफ गूगल में सॉफ्टवेयर इंजीनियर। इस दंपत्ती का मानना है कि अपनी जरूरी आवश्यकताओं की पूर्ति के बाद इस दुनिया को ज्यादा बेहतर बनाने के लिए सारी कमाई जरूरतमंदों को दान करके हमें बहुत सकून मिलता है। भारतीय आईटी क्षेत्र के दिग्गज अजीम प्रेमजी ने सॉफ्टवेयर कंपनी विप्रो में अपनी लगभग आधी हिस्सेदारी परोपकारी कार्यों के नाम कर दी है। अजीम प्रेमजी फाउंडेशन वर्षों से विभिन्न राज्य सरकारों के साथ घनिष्ठ साझेदारी में समाज के हासिए पर जीनेवाले घरों के बच्चों की शिक्षा में गुणात्मक सुधार के लिए अभिनव कार्य कर रहा है। पटना सुपर थर्टी के कुमार आनंद ने अपने प्रयास से समाज के ऐसे दबे-वंचित घरों के विद्यार्थियों के लिए आई.आई.टी. जैसे संस्थानों के दरवाजे खोल दिए, जिसकी किसी ने कल्पना तक नहीं की होगी। पटना महावीर मंदिर ट्रस्ट और इसके प्रमुख किशोर कुणाल के अभिनव प्रयास से आज पटना में पाँच अस्पताल, जिसमें महावीर कैंसर अस्पताल भी शामिल है और छठा हृदय रोगों के लिए विशेष अस्पताल जल्द ही प्रारंभ होने वाला है, आम लोगों के लिए चलाया जा रहा है।  इसके अलावा समाज में ऐसी छोटी एवं बड़ी अनेकों पहल समाज के अनेक क्षेत्रों के लोग कर रहे हैं।
इसी महीने सूचना के अधिकार कानून के दस वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में उत्सव समारोह मनाया गया। इस कानून के लागू होने पर आम जनता की लिए सरकार की आलमारियों में फाइलों में बंद अनेक ऐसे दस्तावेजों तक उनकी पहुँच हो गई, जिससे सरकार तथा नौकरशाही के मनमानियों पर बहुत हद तक पाबंदी लगी और शासन में पारदर्शिता आई। इसके अलावा लोगों को सेवा का अधिकार भी मिला है। इधर न्यायपालिका ने भी लोकहित में अनेक फैसले किए हैं। सामाजिक न्याय पीठ की स्थापना एक ऐसा ही अनुठा प्रयास है इसके अंतर्गत महिलाओं, बच्चों एवं उपेक्षित वर्ग से संबंधित समस्याओं को सही समय पर दक्षतापूर्ण निणर्य दिया जा सके, ताकि ये भी समाज में सर उठाकर सम्मान से जी सकें।
उपरोक्त सभी विविध क्षेत्रों में आ रहे सकारात्मक बदलाव की एक झलक मात्र है। यह खुशी की बात है कि सरकार और समाज को यह बात अब तीव्र गति से महसूस हो रही है और अनेक गंभीर प्रयास भी हो रहे हैं। हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि दरवाजे अभी खुलने प्रारंभ हुए हैं, समाज का जो वर्ग इन चहारदीवारियों से सदियों से दूर रहा है, वह एक कौतूहल, डर और उत्सुकता से अंदर प्रवेश करने का प्रयास कर रहा है। दूसरी तरफ इन चहारदीवारियों या सत्ता प्रतिष्ठानों के कर्ता-धर्ता भी आशंका और भय से सहमे हुए हैं। यही कारण है कि सरकार के अधिकारी लोगों को सूचनाएँ मुहैया कराने में अडंगेबाजी लगाते हैं यहाँ तक कि अनेक सूचनाकर्मियों की हत्याएँ भी की गई हैं। पटना महावीर मंदिर जैसे देश में हजारों की संख्या में मंदिर एवं धर्मस्थल हैं, जिनके पास अरबों-खरबों की सम्पत्ति है। विप्रो जैसी सैकडों कंपनियाँ हैं जिनके पास अपार बेकार पड़ा धन है। अगर वे भी स्वास्थ्य एवं शिक्षा जैसे क्षेत्रों में सेवा देकर देश एवं सामान्य मानवी के भविष्य को सँवारने में लग जाएं तो हमारा देश और समाज अभी से ज्यादा सुंदर हो जाएगा।

कालका जी डी.डी ब्लॉक जैसे दिल्ली एवं देश के अनेक शहरों में अनगिनत ऊँची दीवारों एवं सलाखों से बंद ब्लॉक बना दिए गए हैं और करीब-करीब सबके पिछवाड़े में र्झुिग्गयों का विस्तार भी होता है। इन ब्लॉकों के जीवन में गति इन्हीं झुग्गियों के लोगों की सेवाओं पर टिकी है। फिर भी इसमें पलनेवाले बच्चे अपनी नैसर्गिक अधिकार, दौड़ने-खेलने के लिए जगह तक के लिए तरसते हैं। पहले भले कुछ लोगों को इनके प्रवेश देने पर अनेक तरह की आशंकाएँ हो पर साल भर के अपने अनुभव से यही कह सकता हूँ कि झुग्गियों एवं गरीबों के बच्चे भी कम समझदार नहीं हैं। आज तक इन बच्चों ने किसी का कुछ भी नुकसान नहीं किया है न ही कुछ तोड़ा-फोड़ा है। ये खूब मस्ती में खेलते-भागते हैं। हमारे ऑफिस के बाहरी गेट खुला रहने के बावजूद उसके नलके से पानी पीने के लिए भी पूछकर आते हैं। यहाँ के रेजिडेंस ऐसोसिएशन जैसे विश्वास एवं उदारता की जरूरत है। 21वीं सदी जनतंत्र की सदी है इसमें इसमें सिर्फ बाजारों को खोलने से प्रगति नहीं वाला बल्कि दिल, दिमाग और हर बंद ब्लॉकों के दरवाजे खोलने पड़ेगें।              

1 comment:

डॉ. मोनिका शर्मा said...

सकारात्मक ऊर्जा और विचार लिए लेख । चाहें तो बहुत कुछ किया जा सकता है । राहें खोजी जा सकती हैं ।