Saturday, October 3, 2015

सबको सहज सुलभ हो स्वास्थ्य सेवा 
सात साल का अविनाश, छह साल का अमन और 38 वर्षीय हरीश, इन तीनों में समानता सिर्फ यही है कि इन तीनों की जान डेंगू के चपेट में आकर सही समय पर समुचित इलाज नहीं मिलने। एक अस्पताल के इलाज से इनकार करने और दूसरेश्‍ तीसरे, चौथे, पाँचवे, छठे और उससे भी आगे इलाज के लिए भागने तथा अस्पतालों के डॉक्टरों के अमानवीय उपेक्षा के बीच हुई। अविनाश की मौत से उसके माता-पिता को ऐसा सदमा लगा कि दोनों नें एकसाथ एक ऊँची इमारत से छलांग लगाकर जान दे दी। यह तो सिर्फ गिनती के उदाहरण हैं। दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में चक्कर लगाने पर अनेकों दर्द भरी दास्तान और दारुण कोहराम इन दिनों सुनने को मिल रहा है।
डेंगू के कारण राजधानी दिल्ली में अफरातफरी इसलिए ज्यादा मची है कि यह राजधानी है, यह मीडिया तथा प्रबुद्ध लोगों के केन्द्र में है। नहीं तो, हर वर्ष पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और बंगाल में इंसेफ्लाइटिस या जापानी बुखार से हजारों गरीब और दलित के बच्चे मौत के मुँह में समा जाते है। बड़े-बड़े डॉक्टर, विशेषज्ञ और नेता इसे रहस्यमयी बीमारी बताकर, व्याख्यान देकर जिम्मेदारी से मुक्त हो जाते हैं। भारत में अभी भी टीबी से मरने वाले लोग सबसे ज्यादा हैं। हमारे यहाँ प्रसव के दौरान जच्चा-बच्चा की मौतों के आँकड़े बेहद डरावने हैं। दुनिया में बाल-मृत्यु की कुल घटनाओं में एक चौथाई सिर्फ भारत में होती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 55 प्रतिशत शिशुओं की मृत्यु का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष कारण कुपोषण ही है। 
1946 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने हर नागरिक के लिए स्वास्थ्य के अधिकार को स्थापित किया। इसके बाद 1948 में मानवाधिकार घोषणा-पत्र के अनुच्छेद 25 के रूप में इसे शामिल किया गया। सन् 2000 में संयुक्त राष्ट्र ने स्वास्थ्य अधिकार को लेकर कुछ मानक तय किए। ये मानक हैं- उपलब्धता यानी सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाएँ आम लोगों को उपलब्ध हों। इनमें पीने का साफ पानी, साफ-सफाई युक्त अस्पताल, प्रशिक्षित चिकित्साकर्मी और आवश्यक जरूरी दवाएँ। स्वास्थ्य सेवाएँ लोगों की शारीरिक और आर्थिक स्थिति के अनुसार उनकी पहुँच में हों। सभी स्वास्थ्य सुविधाएँ चिकित्सा के नैतिक मापदंडों के अनुरूप हों और अच्छी गुणवत्ता पर आधारित हों।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 47 के अनुसार राज्य अपने लोगों के पोषाहार स्तर और जीवन स्तर को ऊँचा करने तथा लोक स्वास्थ्य के सुधार को लेकर अपने प्राथमिक कर्त्तव्यों को मानेगा... पर यह व्यवस्था राज्य के नीति निर्देशक तत्वों के अर्न्तगत है। जो सिर्फ दिखाने का दांत भर है। देश की न्यायालयों ने अनुच्छेद 21 के तहत दैहिक स्वतंत्रता के संरक्षण के अधिकार को जीवन और स्वास्थ्य के अधिकार के साथ जोड़कर मानव की गरिमा और सम्मान के साथ जीने का अधिकार माना है। इस कानूनी व्याख्या के बावजूद गरीब का जीवन हर समय मौत के आगोश में है।
केन्द्र सरकार ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति- 2015 के जिस मसौदे पर जनता की राय माँगी है उसके अनुसार आने वाले दिनों में चिकित्सा देश के नागरिकों का मौलिक अधिकार बन जाएगी। सिद्धांततः यह क्रांतिकारी बात है। पिछली यूपीए सरकार के दस साल के शासन के दौरान पहले पाँच साल में स्वास्थ्य मंत्री आर. रामदास एम्स के डॉक्टरों और वहाँ के विधार्थियों से सिर्फ इस बात पर उलझे रहे कि एम्स के विद्यार्थियों को अपने शिक्षा के दौरान गाँवों में सेवा देना अनिवार्य हो या नहीं, जबकि दूसरे पाँच साल के दौरान स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद गाँव के एमबीबीएस के लिए तीन वर्षीय कोर्स बनाने और वह लागू कैसे हो, इसी जद्दोजहद में लगे रहे। यूपीए सरकार और योजना आयोग इस ऊहापोह से उबर नहीं पाया कि स्वास्थ्य क्षेत्र में सरकारी बजट बढ़े या निजी अस्पतालों को बढ़ावा दिया जाए। इस बीच आम लोग अनेक तरह की बीमारियों की चपेट में आ-आकर मरते रहे। पूर्वी उत्तर प्रदेश में जापानी बुखार से मरते पीड़ित परिवार के लोग यूपीए अध्यक्षा सोनिया गांधी को रक्त से लिखे अनेकों पत्र भेजते रहे। पूरे देश में निजी अस्पतालों के स्वास्थ्य सेवा की लाभ की फसल लहलहाती रही। 
दुनिया के अनेक देशों में स्वास्थ्य के अधिकार को बकायदा मौलिक अधिकार का दर्जा दिया गया है लेकिन भारत सरकार अपने नागरिकों को समुचित प्राथमिक इलाज की भी व्यवस्था नहीं कर पाई। अनेक योजनाएँ अवश्य प्रारंभ हुई पर भ्रष्टाचार और प्रशासनिक ढिलाई की भेंट चढ़ गई। इसका सबसे बड़ा खामियाजा हमारे गाँव और गरीब को भुगतना पड़ा। मोदी सरकार की स्वास्थ्य नीति में सबसे महत्त्वपूर्ण बात स्वास्थ्य को मौलिक अधिकार का दर्जा देना है। यदि ऐसा होता है तो सरकार की विभिन्न महत्त्वपूर्ण योजनाएँ स्वास्थ्य सेवा के केन्द्र में रखकर बनाई जाने लगेंगी। दूसरी मुख्य बात इस मसौदे में यह है कि स्वास्थ्य पर सार्वजनिक व्यय को बढ़ाकर जीडीपी के 2.5 प्रतिशत तक लाना, जो अभी उसका 1.2 प्रतिशत है। इसके अलावा प्रसव के दौरान जच्चा-बच्चा की मृत्यु की घटनाओं में कमी लाने के प्रयासों पर जोर, संक्रामक रोगों पर नियंत्रण पर प्रमुखता से ध्यान, असंक्रामक रोगों की बढ़ती संख्या से निपटने का प्रयास, सरकारी अस्पतालों में सभी को मुफ्त दवाएँ और रोग जाँच सुविधाएँ उपलब्ध कराने का प्रस्ताव तथा सार्वजनिक क्षेत्र के साथ निजी क्षेत्र की भूमिका पर भी जोर है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने बीमारियों का जो अंतरराष्ट्रीय वर्गीकरण किया है, उसके अंत में जेड-59.5 कोड नाम जिस बीमारी को दिया गया, वह है नितांत गरीबी। हमारी सरकार को यह मूल बात समझना पड़ेगा कि दुनिया का सबसे बड़ा रोग नितांत गरीबी से हमारा देश अभी नहीं उबरा है और अगर उबर भी जाए तो भी बुनियादी प्राथमिक शिक्षा एवं स्वास्थ्य की जिम्मेदारी सरकार की ही है और रहेगी भी। कोई निजी अस्पताल नुकसान उठाकर यह सेवा नहीं देनेवाला। उसकी स्थापना तो देशी अमीरों तथा डॉलर के लिए विदेशियों के इलाज हेतु हेल्थ टुरिज्म या हॉस्पिटल हॉस्पिटेलिटी के लिए किया जाता है। उसे बीमार, गरीब और गाँव से क्या मतलब?  
केन्द्र सरकार की नई स्वास्थ्य नीति आशा जगाती है। सरकार सभी वर्गों को घर के करीब प्राथमिक चिकित्सा की समुचित व्यवस्था करे। समय पर समुचित प्राथमिक उपचार मिल जाने से नब्बे प्रतिशत बीमारियों का इलाज वहीं हो जाता है। समाज के सभी वर्गों को समान रूप से स्वस्थ परिवेश में जीने की यह मौलिक आवश्यकता है। अगर यह मिल जाए तो कोई अमन अनेक बड़े अस्पतालों के दरवाजे से दुरदुराए जाते हुए समुचित इलाज के अभाव में दम नहीं तोड़ेगा। किसी अविनाश के माता-पिता व्यवस्था से व्यथित होकर एकसाथ छत से छलाँग लगाकार खुद अपना विनाश नहीं करेगा।

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