Thursday, October 11, 2018


आयुष्मान भारत का सपना
जौनपुर चंदवक थाना क्षेत्र के भूलनडीह गाँव निवासी दुर्गा यादव 2001 में किसी गंभीर बीमारी से ग्रसित हो गया, जौनपुर और आस-पास इलाज कराने का भरसक प्रयास किया, परंतु ठीक नहीं हुआ। बीमारी से परेशान वह अपने रिश्तेदार के पास मुंबई गया। रिश्तेदार उसे चर्च लेकर गया, जहाँ पादरी इलाज के साथ-साथ प्रार्थना भी कराने लगा। उसकी बीमारी ठीक हो गई, पादरी ने उसे पूर्ण रूप से विश्वास दिला दिया कि उसकी बीमारी प्रभु यीशू के प्रार्थना से ही ठीक हुई है और ईसाई धर्म अपना लेने से सारे शारीरिक एवं मानसिक कष्टों से छुटकारा मिल जाता है। वह धर्म बदलकर ईसाई बनगया। उसकी सोच एकदम बदल चुकी थी। वह जब 2007 में गाँव वापस आया तो देखते-देखते कुछ ही कुछ ही वर्षों में भूलनडीह समेत जौनपुर तथा उसके आस-पास के तीन जिलों आजमगढ़, वाराणसी व गाजीपुर के 250 गाँवों में धर्म परिवर्तन का नेटवर्क फैला दिया। दुर्गा यादव अब तक दस हजार से ज्यादा लोगों को हिन्दू से ईसाई धर्म में परिवर्तित कर चुका है। गाँव-गाँव में विशेष चर्च व प्रार्थना सभा बन चुके हैं। प्रत्येक रविवार व मंगलवार को विशेष प्रार्थना सभा होती है, जिसमें जटिल रोगों व प्रेतबाधा से मुक्ति के नाम पर लोगों को आकर्षित किया जाता है। गरीबी, अशिक्षा तथा अनेक शारीरीक व मानसिक बीमारियों से त्रस्त लोग पादरियों के लोभ-लालच व बहकावे में आकर जमा होते हैं, बड़ी चालाकी से जिसके गले में क्रॉस की निशानी वाली ताबीज तथा हाथों में बाइबिल थमा दिया जाता है। यह दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी महत्वाकांक्षी योजना प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (आयुष्मान भारत) को 23 सितंबर को झारखंड जैसे पिछड़े आदिवासी राज्य से लॉन्च किया, जिसे इस दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य योजना भी कहा जा रहा है। अभी देश के 29 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों के 445 जिलों में यह योजना लागू होने जा रही है, क्योंकि ओडिशा, पश्चिम बंगाल, पंजाब जैसे कुछ राज्यों ने अभी इसे नहीं अपनाया है। इसके तहत 10 करोड़ परिवारों यानी करीब 50 करोड़ लोगों को सालाना 5 लाख रुपये तक के मुफ्त इलाज की सुविधा मिलेगी। इस स्कीम के तहत 10.74 करोड़ परिवारों के करीब 50 करोड़ लोग लाभार्थी होंगे। इनमें से करीब 8 करोड़ ग्रामीण परिवार हैं तो करीब 2.4 करोड़ शहरी परिवार हैं। इस तरह देश की करीब 40 प्रतिशत आबादी को इसके तहत मेडिकल कवर मिल जाएगा। लाभार्थी परिवार पैनल में शामिल सरकारी या निजी अस्पताल में प्रति साल 5 लाख रुपये तक का कैसलेस इलाज करा सकेंगे।
आज जो जौनपुर के आस-पास में हो रहा है। वह काम दशकों से देश के सुदूर गरीब, पिछड़े आदिवासी क्षेत्रों में मिशनरियों द्वारा बड़ी चालाकी से शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवा के नाम पर किया जा रहा है। वह चाहे झारखंड, ओडिशा, बंगाल हों या फिर उत्तर-पूर्व के आदिवासी क्षेत्र प्रदेश। चर्च के प्रतिनिधि सेवा के नाम पर भोले-भाले आदिवासियों को उसकी मजबूरी का फायदा उठाकर उनका धर्म परिवर्तित करते रहे हैं। उनकी हिम्मत इतनी बढ़ गई कि अब वे उत्तर प्रदेश जैसे मैदानी क्षे़त्र में, जहाँ सबकी नजर रहती है, वहाँ भी ये समाज के हाशिए पर जीने वाले लोगों की गरीबी और बीमारियों का फायदा उठाकर धर्म-परिवर्तित करने लगे। शासन हाथ पर हाथ धरे बैठा रहता है। पुलिस के मुँह को चर्च के बेसुमार पैसों से बंद कर दिया जाता है। सबकुछ धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर चलता रहा है। अनेक राजनीतिक दल एवं तथाकथित प्रबुद्ध समाज उनकी चिकनी-चुपड़ी बातों में आकर उनकी सेवा की तारीफ करते नहीं अघाते हैं। अब जबकि सर से पानी बहने लगा है और हर गाँव व समाज से अलगाव, हिंसा और सामाजिक विघटन की वारदातें सामने आने लगीं तो हाय-तौबा मची है।
हम किसी चर्च या संगठन के उपर शासन एवं सरकार की सुशासन की कमजोरियों का ठीकरा फोड़कर निश्चिंत नहीं हो सकते। आज भी समाज का बहुत बड़ा तबका स्वास्थ्य सेवाओं के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहा है। उनके पिछड़े इलाके में अस्पताल एवं डॉक्टर उन्हें सेवा देते नहीं। जिसके कारण वे बीमार होकर झोलाछाप डॉक्टरों, ओझाएवं तांत्रिक बाबाओं की शरण में जाते हैं तथा अंधविश्वासों की चपेट में आकर मानसिक बीमारी का शिकार बन जाते हैं। ऐसे में अगर कोई उन्हें उनके कष्टों से निजात दिलाने की बात करता है तो वे उन्हें अपना देवदूत मान बैठते हैं। भूलनडीह में धर्म परिवर्तन करने वाले लोगों से जब पूछा गया तो हर व्यक्ति का एक ही जवाब था कि चर्च उसके शारीरिक और मानसिक परेशानियों को दूर कर रहा है।
ऐसी परिस्थिति में प्रधानमंत्री जन आरोग्य जैसी योजनाएँ इन पिछड़े लोगों के लिए तो रामबाण साबित हो सकता हैं, बशर्ते कि इस योजनानुसार पूरी सरकारी मशीनरी इसे सफल बनाने का गंभीर प्रयास करे। जन आरोग्य योजना में निजी अस्पतालों को भी बहुत बड़ी जिम्मेदारी दी गई है। सिर्फ पैसे के लिए उनके द्वारा आजमाए जा रहे अनेक तरह के धतकर्मों को देखकर इनसे बहुत आशा तो नहीं जगती। सरकार द्वारा मुहैया कराए जा रहे पाँच लाख को आसानी से हड़पने के लिए वे कितने तरीके निकाल लेंगे, इसका अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है।
सरकार जब तक सरकारी क्षेत्र के अस्पतालों का विस्तार एवं उनकी सेवा गुणवत्ता पर विशेष ध्यान नहीं देगी, तबतक लोगों को इन परेशानियों से निजात नहीं मिलेगी। लोगों को अपने कष्टों से निजात चाहिए, और सरकारों को इनकी मूलभूत आवश्यकताओं की पूरी जिम्मेदारी लेनी होगी। इसको पैसों एवं आँकड़ों से नहीं मापा जा सकता कि कितने पैसों का बीमा दिया गया है। पैसे देखकर तो निजी स्कूल एवं अस्पताल व्यापार करते हैं। सरकार से तो लोग सेवा एवं सुशासन की ही आशा करते हैं, जो उनका अधिकार भी है। केन्द्र सरकार की इस योजना को स्वास्थ्य क्षेत्र में सुधार के लिए उठाया गया एक मजबूत कदम कह सकते हैं, परंतु गाँव से लेकर शहरों तक सुविधायुक्त सरकारी अस्पतालों के विस्तार से ही यह योजना सफल हो सकेगी। हम यही आशा करते हैं कि सभी को आयुष्मान बनाने का केन्द्र सरकार का सपना साकार हो, ताकि किसी व्यक्ति एवं समाज को अंधविश्वासों के अंधकूप में गिरकर तिल-तिलकर मरना न पड़े।

Friday, September 7, 2018


साक्षर को शिक्षित करने की चुनौती
सामान्य अर्थ में साक्षर वह कहलाता है जो सहज तरीके से पढ़ने, लिखने एवं सरल गणितीय समस्याओं को हल करने की क्षमता हासिल कर ले। एक साक्षर व्यक्ति से यह उम्मीद की जाती है कि वह हस्ताक्षर करने से पहले किसी दस्तावेज को पढ़ सके, सड़क के संकेतों को समझ सके, तथा रोजमर्रा के हिसाब-किताब को रख सके ताकि सहज ढंग से दैनिक गतिविधियों को संचालित किया जा सके। आंकडों के संदर्भ में देंखे तो भारत में साक्षरता के आंकड़े सालोसाल बढ़ रहे हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार 74.04 प्रतिशत साक्षरता थी जबकि इस समय 2018 में साक्षरता लगभग 80 प्रतिशत है, जो कि विश्व की औसत साक्षरता दर 84 प्रतिशत से कम है। अगर हम अनेक किंतु-परंतुओं को परे रखकर आंकड़ों में मूल्यांकन करें तो ठीक-ठाक प्रगति मानी जा सकती है।
शिक्षा एक व्यापक अवधारणा है। शिक्षित होने के लिए साक्षरता सहायक तो हो सकती है, अनिवार्य नहीं। भारतीय संदर्भ में अनेक संत-महात्मा, लोककवि, अनेक शासक एवं सामान्य जन, प्रकांड विद्वान एवं ज्ञानी हुए, इस ज्ञान परंपरा में निरक्षरता कभी बाधा नहीं बनी। शिक्षा सिर्फ डिग्री प्राप्त करने और परीक्षा पास करने की मोहताज नहीं है। शिक्षा लोगों को ज्ञान के माध्यम से एक संपूर्ण मानव बनाती है। यह दिमाग के नित नए दरवाजे-खिड़कियां खोलकर चीजों को नए तरीके से समझने में मदद करती है। यह इंसान को अनेक पूर्वग्रहों, अंधविश्वासों आदि से छुटकारा पाने तथा तार्किक, जनतांत्रिक बनाकर समभाव एवं सहयोग के माध्यम से मानव मूल्यों के लिए संघर्ष करने में सक्षम बनाती है।
हिन्द स्वराजमें गांधीजी ने लिखा है कि ‘‘तालीम (शिक्षा) का अर्थ अगर सिर्फ अक्षर ज्ञान ही हो, तो वह तो एक साधन जैसा ही हुआ। उसका अच्छा उपयोग भी हो सकता है और बुरा भी। एक शस्त्र से चीर-फाड़ करके बीमार को अच्छा किया जा सकता है और वही शस्त्र किसी की जान लेने के काम में लाया जा सकता है।’’ गांधी की शिक्षा की मंशा बच्चों को सुधार-सँवार कर आदर्श नागरिक बनाना है। उनका मानना था कि बुनियादी शिक्षा हिंदुस्तान के तमाम बच्चों को हिंदुस्तान की सभ्यता और संस्कृति के अनुरूप बनाती है। यह तालीम बालक के मन और शरीर दोनों का विकास करती है। संक्षेप में गांधीजी के शिक्षा का उद्देश्य जीविकोपार्जन, चारित्रिक विकास, सांस्कृतिक विकास, व्यक्ति और समाज का विकास, सामाजिक पुनर्निर्माण, सदाचार और नैतिकता, राष्ट्रीय एकता, आत्मानुभूति, ईश्वर प्राप्ति तथा व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास है।
आधुनिक जीवन में साक्षरता की भूमिका बहुत बढ़ गई है। आज जीवन के किसी भी क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए साक्षरता ही तो प्राथमिक सीढ़ी है। भारत के बच्चों को दो तरह से साक्षर किया जा रहा है एक तो वह जिसे सरकारी स्कूल कहा जाता है, जिसमें दोपहर के भोजन के लालच में बच्चे स्कूल जा रहे हैं और जैसे-तैसे साक्षर होकर देश की साक्षरता के आंकड़े दुरुस्त करने में सरकार का सहयोग कर रहे हैं और अकुशल बेरोजगारों की फौज में शामिल हो रहे हैं। दूसरे विशेष साक्षरता वाले अंग्रेजी माध्यम के वे पब्लिक स्कूल हैं, जो मोटी फीस लेकर कामयाब होने वाले विशेषज्ञ साक्षर पैदा कर रहे हैं। इस वर्ग में शिशु के पैदा होने के दो साल के अंदर ही प्ले स्कूलों के माध्यम से ही साक्षरता प्रारंभ हो जाती है जो तब कहीं जाकर रुकती है जब वह कोई प्रशासनिक अधिकारी, डॉक्टर, इंजीनियर, प्रबंधक, पत्रकार प्रोफेसर, वकील आदि बनकर अपने-अपने क्षेत्रों में सफलता का परचम फहराता है। इसके लिए हर बच्चे के माँ-बाप सबकुछ करने को तैयार हैं, जिसमें कोई समझौता, कोई कीमत मायने नहीं रखती, बस उसे किसी तरह सफलता मिल जाए!
इतने समझौते और संघर्ष के बाद जब वह बच्चा सार्वजनिक जीवन में प्रवेश करता है तो उन्हें वास्तविक अर्थ में शिक्षित माना जा सकता है? अगर ऐसा हो गया होता तो क्या आज भी पद के अनुरूप दहेज की कीमत तय होती? हर विभाग के अंदर भ्रष्टाचार से सामान्य लोगों का जीना दूभर रहता? डॉक्टरों के रहते गरीब मरीज लाइलाज मरते? इसी का एक तबका आतंकवाद और नक्सलवाद में शामिल होता? इसी तरह इंजीनियर, सी.ए, शिक्षक, प्रोफेसर आदि अनेक क्षेत्रों के कितने लोग दावे के साथ कह सकते हैं कि वे राष्ट्रनिर्माण व व्यापक सामाजिक हित के लिए कर्तव्यों का ईमानदारी पूर्वक निर्वहन कर रहे हैं? अगर अपनी सफलता का दोहन सिर्फ निजी स्वार्थ पूर्ति के लिए ही करना है तो फिर ये किस मायने में शिक्षित हुए? इन्हें ज्यादा से ज्यादा सिर्फ विशेष डिग्रीधारी साक्षर माना जा सकता है, जो अपनी विशेष साक्षरता का उपयोग एवं दुरुपयोग सिर्फ अपने निजी भौतिक स्वार्थ के लिए करते हैं।
आज के दौर में देश और समाज को अनपढ़ों से ज्यादा खतरा दोनों तरह से तैयार किए जा रहे साक्षर कुपढ़ों से है। हर दिन गाँव, कस्बों एवं शहरों में हिंसा, बलात्कार एवं सार्वजनिक संपत्तियों का विनाश का एक नया वीभत्स रूप सामने आ रहा है। जिसे सोशल मीडिया के माध्यम से त्वरित गति से फैलाया जा रहा है। वह इन्हीं साक्षर कुपढ़ों की कारस्तानी है। दूसरी तरफ डिग्रीधारी विशेष बौद्धिक साक्षर वर्ग, जिसमें साहित्यकार, लेखकों एवं पत्रकारों का भी एक तबका नित घटने वाली अनेक तरह की हिंसा, उपद्रव और बलात्कार जैसी शर्मनाक घटनाओं के तथ्यों एवं आंकड़ों को तोड़-मोड़कर पद और प्रतिष्ठानों में जगह पाने के लिए दलीय राजनीति में फंसकर बड़ी बेशर्मी से वैमनस्य फैलाने में सूत्रधार की भूमिका निभा रहे हैं। 
यह नहीं कहा जा सकता है कि इन दोनों माध्यमों से निकले साक्षरों में शिक्षित कोई है ही नहीं, अगर नहीं होता तो पूरी व्यवस्था ध्वस्त हो जाती। इन्हीं माध्यमों से निकला एक समूह अपने परिवार, समाज और अच्छे शिक्षकों एवं स्वयं के प्रयास से शिक्षित होकर राष्ट्रनिर्माण और समाजसेवा में जी-जान से लगा है। परंतु कुपढ़ साक्षर आज हर जगह हावी होते जा रहे हैं। आज निरक्षरों को साक्षर करने से भी बड़ी चुनौती इन साक्षरों को सही मायने में शिक्षित करने की है। इन्हें मानवता और भारतीय जीवन मूल्यों के अनुरूप शिक्षित नहीं किया गया तो आनेवाले समय में परिवार, समाज, राजनीति, पर्यावरण जैसे अनेक क्षेत्रों में अनेक तरह की हिंसा, विघटन एवं विध्वंस अभी से कई गुणा बढ़ने वाले हैं। 



निर्मल हृदय की निर्ममता
रांची स्थित निर्मल हृदयमें मासुम बच्चों को बेचने की खबरों से सालों पहले घटी एक दुखद घटना बरबस याद आ गई। मैं इंटर पास करके दिल्ली आगे की पढ़ाई करने आया था। मेरे बड़े भाई मदनगीर के पास दक्षिणपुरी में झुग्गी बासिंदो के लिए 20 गज की जमीन पर बने कमरे में किराये पर रहते थे। दिन में वे ऑफिस चले जाते थे और मैं ज्यादातर कमरे पर ही रहता था। बगल में ही रहने वाला एक लड़का दीपक जो मुझसे कुछ छोटा यानी 15-16 साल का, सुंदर, लंबा और छरहरा किशोर था। हमेशा मेरी सहायता करने के लिए तत्पर रहता, अक्सर शाम को पास के किसी पार्क मंदिर या मार्केट घुमाने ले चलता। एक दिन दोपहर में कुछ पढ़ते हुए आंखे लग गई थीं। नीचे गली में एकाएक बड़ा शोर सुनाई पड़ा देखा तो लोमहर्षक दृश्य देखकर आवाक् रह गया। पता चला कि दीपक विराट सिनेमा के पास मैदान में दोस्तों के साथ खेल रहा था, किसी बात पर लड़ाई हुई और किसी लड़के ने उसके सीने में बड़ा सा चाकू जोरों से घुसेड़ दिया। वह लहू से लथपथ तीव्र गति से माँ...माँऽऽऽ...चिल्लाते हुए करीब एक किलोमिटर की दूरी चंद मिनटों में ही तय करके अपनी गली में खाट पर बैठी अपनी माँ की छाती में समाता चला गया और कुछ ही पलों में दम तोड़ दिया। उसकी आखें जड़ हो गईं, मां पत्थर बन गई! पूरी गली स्तब्ध जहाँ का तहाँ जम गयी थी।
बीमार, असहाय, गरीबों को सहारा देनेवाली, संवेदना और ममता की प्रतिमूर्ति मानी जानेवाली मदर टेरेसा, जिन्हें भारत रत्न, नोबेल पुरस्कार, तथा मृत्यु के बाद संत का दर्जा दिया गया। उनकी संस्था मिशनरीज ऑफ चौरिटीकी ओर से संचालित संस्था निर्मल हृदयपर बड़ी मात्रा में बच्चे को बेचने एवं मानव तस्करी में संलग्न पाया गया है। झारखंड की राजधानी रांची स्थित निर्मल हृदयकी संचालिका सिस्टर कोंसिलिया बाखला, सिस्टर मेरिडियन और कर्मचारी अनिमा को 4 जुलाई को गिरफ्तार कर लिया गया है। पुलिस को दिए बयान के मुताबिक सिस्टर कोंसिलिया ने स्वीकारा है कि उसने अब तक छह बच्चों को अवैध तरीके से बेचा है। यह मामला तब खुला जब यूपी के सोनभद्र जिले के ओबरा निवासी सौरभ अग्रवाल बाल कल्याण समिति के पास शिकायत लेकर पहुंचे कि उन्हें उनका बच्चा वापस नहीं दिया जा रहा है। इस बच्चे को उन्होंने पाँच मई को 1.20 लाख रु. में खरीदा था।
एफआईआर में दर्ज जानकारी के मुताबिक गुमला की एक रेप पीड़िता अविवाहित लड़की ने बीते एक मई को रांची सदर अस्पताल में बच्चा को जन्म दिया। इस नवजात को कर्मचारी अनिमा इंदवार तथा सिस्टर कोंसिलिया ने अग्रवाल दंपती को बेच दिया। इधर 30 जून को सीडबल्यूसी के सदस्यों ने संस्था का दौरा किया था। इससे डरकर अनिमा ने उसी दिन अग्रवाल दंपति को फोन कर कहा कि बच्चे को अदालत में पेश करना है, उसे लेकर रांची आ जाइए। उन्होंने बच्चे को दो जुलाई अनिमा को दे दिया। तीन जुलाई को बच्चे की जानकारी लेने वह संस्था पहुंचे, जहाँ उन्हें बच्चे से नहीं मिलने दिया गया। इसके बाद उसी दिन उन्होंने इसकी शिकायत सीडबल्यूसी से की। सूचना मिलते ही चेयरमैन रूपा कुमारी निर्मल हृदयपहुंची।
बाल कल्याण समिति, जिला समाज कल्याण अधिकारी, पुलिस तथा अन्य अधिकारियों की प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि निर्मल हृदय में रहीं पीड़िताओं जिनमें बिन ब्याही मां, रेप की शिकार बेसहारा लड़कियां-महिलाएं जो बच्चा जनने वाली होती हैं, उन्हें निर्मल हृदयमें रखा जाता है। इन्हीं से जन्मे और शिशु भवन में रखे गए 280 बच्चों का कोई अता-पता नहीं है। अब तक की जांच के दौरान जब्त किए गए कागजात के अनुसार 2015 से 2018 तक उक्त दोनों जगहों (निर्मल हृदय, शिशु भवन) में 450 गर्भवती पीड़िताओं को भर्ती कराया गया। इनसे जन्मे 170 बच्चों को बाल कल्याण समिति के समक्ष प्रस्तुत किया गया या जानकारी दी गई। शेष 280 बच्चों का कोई अता-पता नहीं है।
इस काले धंधे से जुड़े लोगों की पहुँच इतनी है कि बच्चों की खरीद-बिक्री के खेल पर हाथ डालने वाले सीडब्ल्यूसी के तत्कालीन अध्यक्ष ओमप्रकाश सिंह और सदस्य मु.अफजल जब 2015 में डोरंडा स्थित शिशु भवन का निरीक्षण करने गए थे। इस दौरान उन्हें वहां घुसने से रोका गया, जबरन जांच के लिए घुसे तो छेड़छाड़ का आरोप लगाकर साजिश के तहत बर्खास्त करा दिया गया। इसके बाद लंबे समय तक अध्यक्ष का पद खाली रहने के बाद अपने अनुकूल जहांआरा को प्रभारी अध्यक्ष बनवाया गया ताकि वे मिलजुलकर इस कुकृत्य को चलाते रहें।
मदर टेरेसा पर उनके जीते जी और मरने के बाद भी देश-विदेश के अनेक लोगों ने समाजसेवा के नाम पर धर्म परिवर्तन करवाने तथा तथा दुनिया भर से चंदे के रूप में मिलने वाले अरबों रुपयों का गलत इस्तेमाल का आरोप लगता रहा है। जिसपर अधिकांश लोगों ने ध्यान नहीं दिया तथा उन्हें असहायों की माँ मानते रहे और उनकी संस्थाओं को सम्मान देते रहे। परंतु अब जब निर्मल हृदय की अनेक शाखाओं द्वारा बच्चों को बेचने और मानव तस्करी के नित नए प्रमाण मिल रहे हैं तो यह बड़ा विश्वासघात है।
बीसेक साल पहले दिल्ली के दक्षिणपुरी के दीपक को किसी ने चाकू मारा वह जनून में आखिरी दम तक मौत से संघर्ष करते हुए माँ के आंचल में समा जाना चाहता था उसे यह एहसास था कि यहाँ सारे कष्टों से मुक्ति मिल जाएगी। असहाय, अत्यंत दुखी और बलात्कार की शिकार अनेक लड़कियां और औरतें भी इसी आशा से निर्मल हृदय की शरण लेती हैं कि वहां उन्हें एक नया जीवन मिलेगा, परंतु निर्मल हृदयमें तो उनके मजबूरियों को ही व्यापार में बदलकर मानव तस्करी की जा रही है। यह तो ठीक यही बात हुई कि दीपक मरणांतक पीड़ा से चीत्कार करते हुए आ रहा हो, उधर उसकी माँ मानव अंग के तस्करों से पहले से ही सौदा कर तैयार रखा हो कि जैसे ही दीपक आए मरने से पहले ही उसके सारे अंगों को निकाल-निकालकर बेच दे। निर्मल हृदयकी निर्मम हृदयहीनता मानव समाज एवं सभ्यता की बहुत बड़ी त्रासदी है!


Friday, June 22, 2018


योग हमें प्रकृतिस्थ बनाता है
प्रकृति दो शब्दों से बना है प्र+कृति प्र का अर्थ है प्रकृष्ट, सर्वोत्तम। कृति का अर्थ है रचना। अर्थात ऐसी रचना, जो सर्वोत्तम है। उपभोगवादी अप्राकृतिक जीवन शैली अपनाकर हम सर्वोत्तम रचना प्रकृति का विनाश करते चले जा रहे हैं। योगहमें प्रकृतिस्थ बनाता है। योग का अर्थ है जुड़ना। योग की विभिन्न क्रियाओं के माध्यम से हम प्रकृति से जुड़ते हैं। प्रकृति ही हर जीव-जाति के लिए जीने के साधन जुटाती रही है। पृथ्वी पर साफ पानी, साफ हवा और वनस्पति तथा खनिज उपलब्ध कराती है। आज हमारी प्रकृति और पर्यावरण खतरे में है। ऐसे में योग ही ऐसा माध्यम है, जो जीवन की होड़ और दौड़ को सही रास्ते पर लाने में मार्गदर्शन कर सकता है।
आदियोगी शिव प्रकृतिपुरुष हैं। शिव ही महायोगी हैं। शिव प्रथम गृहस्थ हैं। यह सुनने में भले ही अटपटा लगे परंतु वास्तविकता यही है कि प्रकृतिपुरुष शिव स्वयं परस्पर विरोधी शक्तियों के बीच सामंजस्य बनाए रखने के सुंदरतम प्रतीक हैं। शिव का जो प्रचलित रूप है, वह है शीश पर चंद्रमा और गले में अत्यंत विषैला नाग। चंद्रमा आदिकाल से ही शीतलता प्रदान करने वाला, लेकिन नाग? अपने विष की एक बूँद से किसी भी प्राणी के जीवन को कालकवलित कर देने वाला। अनियंत्रित उर्जाप्रवाह यानी गंगा को अपनी जटाओं में बाँधकर नियंत्रित करने वाले और समुद्रमंथन से निकले हलाहल को कंठ में धारण करनेवाले नीलकंठ। कैसा अद्भुत संतुलन है। शिव अर्धनारीश्वर हैं। पुरुष और प्रकृति (स्त्री) का सम्मिलित रूप। वे अर्ध नारीश्वर होते हुए भी कामजित हैं। प्रकृति यानी पार्वती उनकी पत्नी हैं, लेकिन हैं वीतरागी। शिव गृहस्थ होते हुए भी श्मशान में रहते हैं। मतलब काम और संयम का सम्यक संतुलन। भोग भी, विराग भी; शक्ति भी, विनयशीलता भी। आसक्ति इतनी कि पत्नी उमा के यज्ञवेदी में कूदकर प्राण दे देने पर उनके शव को लेकर शोक में तांडव करने लगते हैं। विरक्ति इतनी कि पार्वती से शिव के विवाह की प्रेरणा पैदा करने के लिए प्रयत्नशील कामदेव को भस्म करने के बाद वे पुनः ध्यानरत हो जाते हैं।
योगिक संस्कृति में शिव को ईश्वर नहीं, आदि योगी माना जाता है। यह शिव ही थे, जिन्होंने मानव-मन में योग का बीज बोया।योग विद्या के मुताबिक 15 हजार साल से भी पहले शिव ने योग सिद्धि प्राप्त की और हिमालय पर एक प्रचंड और भाव विभोर कर देने वाला नृत्य किया। कुछ देर वे परमानंद में पागलों की तरह नृत्य करते, फिर शांत होकर पूरी तरह से निश्चल हो जाते। इस अनोखे अनुभव के बारे में लोग अनजान थे, आखिरकार लोगों की दिलचस्पी बढ़ी और वे इसे जानने को उत्सुक होकर धीरे-धीरे उनके पास पहुँचे। लेकिन उनके हाथ कुछ नहीं लगा, थक-हारकर वापस लौट आए। परंतु उनमें से सात लोग थोड़े हठी किस्म के थे। उन्होंने ठान लिया कि वे शिव से इस राज को जानकर ही रहेंगे।
शिव ने उन्हें डराया, कहा इस रहस्य को जानने के लिए बहुत कठिन साधना की आवश्यकता है। तुम लोग कभी इसे हासिल नहीं कर पाओगे। उन्होंने शिव की बात को चुनौती की तरह लिया, वर्षों-वर्ष साधना करते रहे, लेकिन शिव थे कि उन्हें नजरअंदाज करते जा रहे थे। उनकी 84 साल की लंबी साधना के बाद शिव ने इन तपस्वियों को देखा तो पाया कि हाँ, अब ये इतने पक चुके हैं कि योग का ज्ञान हासिल कर सकते हैं। अब उन्हें और नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इनका गुरु बनने का निर्णय लिया। इस तरह शिव स्वयं आदिगुरु बने। तभी से इस दिन को गुरु पूर्णिमाकहा जाने लगा। केदारनाथ से थोड़ा ऊपर जाने पर एक झील है, जिसे कांति सरोवर कहते हैं। इस झील के किनारे शिव दक्षिण दिशा की ओर मुड़कर बैठ गए और अपनी कृपा लोगों पर बरसाने लगे। इस तरह आम जन में योग विज्ञान का संचार हुआ।
शिव के दो रूप हैं, सौम्य और रौद्र। जब शिव अपने सौम्य रूप में होते हैं, तो प्रकृति में लय बनी रहती है। पुराणों में शिव को पुरुष और प्रकृति का पर्याय माना गया है। यानी पुरुष और प्रकृति का सम्यक संतुलन ही आकाश, पदार्थ, ब्रह्मांड और ऊर्जा को नियंत्रित रखते हुए गतिमान बनाए रखता है। प्रकृति में जो कुछ भी है, आकाश, पाताल, पृथ्वी, अग्नि, वायु, सबमें संतुलन बनाए रखने का नाम ही शिवत्व है। वेदों में शिव को रुद्र कहा गया है। काफी बाद में रचे गए पुराणों और उपनिषदों में रुद्र का ही नाम शिवहो गया और रौद्र स्वरूप में रुद्रको जाना गया। वस्तुतः प्रकृति और पुरुष के बीच असंतुलन होने के परिणामस्वरूप रौद्र रूप प्रकट होता है। प्रकृति में जहाँ कहीं मानव असंतुलन की ओर अग्रसर हुआ है, तब शिव ने रौद्र रूप धारण किया है। लय और प्रलय में संतुलन बनाए रखने वाले शिव की भूमि रुद्रप्रयाग, चमोली, उत्तरकाशी तथा अन्यत्र अनेक प्राकृतिक आपदा इसके उदाहरण हैं।
हमें योगी शिव के समन्वयी स्वरूप का ध्यान करना चाहिए। अपने भीतर के संतुलन के साथ-साथ प्रकृति के संतुलन को भी बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए। तभी जीवन में लय को कायम रख सकेंगे। योगिक क्रियाओं के माध्यम से योग इंसान को अपने अंदर अनेक तरह के बीमारियों एवं दूषित विचारों को दूर करने का अवसर देता है। योग हर इंसान को स्वयं को नियंत्रित कर प्रकृतिस्थ यानी सरल-सहज बनाता है। यह स्वस्थ मन, स्वस्थ तन, स्वस्थ पर्यावरण एवं स्वस्थ समाज की ओर लौटने का अवसर देता है। मानव द्वारा अपने निजी स्वार्थ, लोभ और लालसा के लिए पर्यावरण का इतना विनाश करने के बावजूद, अभी भी हमारे पास रामबाण इलाज योगहै, जिसके माध्यम से हम इस ब्रह्मांड और मानव सभ्यता को बचा सकते हैं। यदि हम अभी भी नहीं चेते और अनियंत्रित अप्राकृतिक उपभोगवाद की ओर भागते रहे तो सर्वस्व विनाश से कोई नहीं बचा सकता। शिव जब शक्ति यानी प्रकृति युक्त होता है, तभी समर्थ और रचनात्मक होता है। शक्ति के वियोग में शिव भयंकर विनाशकारी नृत्य करते हैं!

Wednesday, May 2, 2018


विभाजन नहीं, विविधता चाहिए
जनतंत्र में चुनाव ही वह मौका होता है, जब मतदाता सत्ताधारी दल और विपक्षी दलों का हिसाब-किताब लेते हैं। वादों एवं विकास के मुद्दों पर उन्हें घेरते हैं और अपनी जरूरतों, उनकी घोषणाओं एवं संकल्पों पर संवाद करते हैं। कर्नाटक में विधानसभा चुनाव होने वाला है। पिछले पाँच सालों से मुख्यमंत्री सिद्धारमैया की कांग्रेस सरकार विकासात्मक कार्यों की डींगें हाँकती रही, मगर चुनाव के ठीक पहले ऐसी विभाजनकारी नीतियों को हवा दे दी है जो समाज, राज्य और देश के लिए घातक सिद्ध होने वाली हैं। उन्होंने सबसे पहले कर्नाटक राज्य के अलग झंडे की वकालत करते हुए केन्द्र सरकार को इसे मान्यता देने की माँग की, दूसरा लिंगायत समाज को हिन्दू धर्म से अलग धर्म की मान्यता देकर उसके लिए अल्पसंख्यक दर्जे की सिफारीश की।
लिंगायत शिव के उपासक हैं। इसकी स्थापना 12वीं सदी के समाज सुधारक और दर्शनशास्त्री संत बसवेश्वर के द्वारा हुई थी। संत बसवेश्वर का काल सभी तरह की संकीर्णताओं से आक्रांत था। बसवेश्वर बीच-बाजार और चौराहे के संत थे। वे आम जनता से अपनी बात पूरे आवेग और प्रखरता के साथ करते थे। जाति रहित समाज की स्थापना करने और भेदभाव तथा छुआछूत मिटाने के लिए उन्होंने ऊँची जाति ब्राम्हण कन्या रत्नाका विवाह नीची जाति के दलित, अस्पृश्य शीलवंतनामक युवक से करवाया। जिसका मूल्य उन्हें अपने सबसे प्रिय शिष्य के बलिदान से चुकाना पड़ा था। उन्होंने उसी काल में आदर्श संसद (अनुभव मंडप) का निर्माण किया था, जिसमें पुरुष और महिलाएँ तथा समाज के सभी वर्ग एवं जाति के लोगों की समान संख्या में भागीदारी थी। वे खुले वातावरण में बहस को प्रोत्साहित करते थे, जिसका रूप आज हमें संसदीय लोकतंत्र के रूप में देखने को मिलता है।
8वीं शताब्दी में दक्षिण भारत में जो अनेक भक्ति आंदोलन हुए, वहीं से लिंगायत समाज का उद्भव माना जाता है। लिंगायत यदा-कदा खुद को हिन्दू धर्म से अलग धर्म की मान्यता देने की माँग करते आये हैं। उनकी अपनी अलग पहचान को मुश्किल बनाता है उनमें और वीरशैव में समानता। हिन्दू धर्म में वीरशैव एक शैव समाज है। इसके अनुयायियों का मानना है कि संत बसवेश्वर लिंगायत समाज के संथापक नहीं, बल्कि एक समाज सुधारक थे, जो वीरशैव का हिस्सा है। वीरशैव जहाँ वेद और जाति व्यवस्था मानते थे, वहीं लिंगायतों ने शुरू से ही वेदों और जाति व्यवस्था को चुनौती दी।
हिन्दू धर्म को अनेक विद्वान अंग्रेजी के रिलीजन के अर्थ में धर्म न मानकर इसे हिन्दू संस्कृति की मान्यता देते हैं। सदियों से इसके अंदर से अनेक संप्रदाय बनते रहे, संग-संग पलते रहे, यहाँ तक कि एक दूसरे के विरुद्ध संघर्ष भी करते रहे, फिर भी एकमेव रहे। इस धर्म की खासियत ही सुधार के लिए संघर्ष, संवाद और सहअस्तित्व है। इस धर्म के लचीले स्वरूप में जब भी जड़ता की स्थिति निर्मित हुई, तब कोई न कोई महापुरुष ने आकर इसे गतिशीलता प्रदान कर इसकी सहिष्णुता को एक नई आभा से मंडित कर दिया। इस दृष्टि से प्राचीनकाल में बुद्ध और महावीर के द्वारा, मध्यकाल में शंकराचार्य, संत बसवेश्वर, गुरुनानक और चैतन्य महाप्रभु के माध्यम से तथा आधुनिक काल में राजा राम मोहन राय, स्वामी दयानन्द, स्वामी विवेकानन्द, महात्मा ज्योतिबा फुले, महात्मा गांधी तथा बाबा भीमराव अंबेडकर आदि अनेक सुधारकों के द्वारा किए गए प्रयास इस धर्म की धरोहर बन गए।
हिन्दू धर्मदर्शन में अनेक मत, संप्रदाय, धारा एवं वाद बनते रहे और इसकी उदारता से खुले आगोश में पुनः समाते चले गए। इसके अंदर वैष्णव, शैव तथा स्मृति हैं। वैष्णवों के अंदर अनेक उपसंप्रदाय हैं, जैसे वल्लभ, रामानंद आदि। उसी तरह शैव के अंदर दसनामी, नाथ, शाक्त आदि। सभी संप्रदाय एवं उपसंप्रदाय एक दूसरे से टकराते रहे हैं, फिर भी हिन्दू धर्म का हिस्सा बने रहे हैं। इसके अलावा चार्वाक का लोकायत दर्शन भी इसी धर्म का हिस्सा रहा है, जो न तो ईश्वर को मानता है और न ही किसी पूजा विधि को। दैहिक या भौतिक सुख ही इस दर्शन की सबसे बड़ी विशेषता है।
ऐसे में क्या चुनाव से ठीक पहले वोट की राजनीति के लिए कोई मुख्यमंत्री या सरकार हिन्दुओं को विभाजित कर नया धर्म बनाएगी? चुनावी फायदे के लिए कुछ सरकारी सुविधाओं का चारा डालकर उसे अल्पसंख्यक या पिछड़ा घोषित करेगी? क्या उनकी सरकार इसी तरह बौद्ध धर्म के संप्रदाय हीनयान, महायान, वज्रयान तथा नवयान को; जैन धर्म के दिगंबर और श्वेतांबर को; इस्लाम धर्म के शिया और सुन्नी को; ईसाइ धर्म के प्रोटेस्टैंट और रोमन कैथोलिक को पिछड़े का दर्जा देने के लिए अलग धर्म के तौर पर मान्यता देगी? उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश एन. संतोष हेगड़े ने सिद्धरमैया सरकार की आलोचना करते हुए कहा कि ‘‘किसी समुदाय को धर्म का दर्जा देने का काम सरकार का नहीं है। भारत के संविधान के तहत धर्मनिरपेक्ष सरकार है, वह किसी समुदाय के आंतरिक मामले में हस्तक्षेप करने का काम नहीं कर सकती।’’
इससे पहले सिद्धरमैया सरकार ने कन्नड़ लोगों की अस्मिता के नाम पर राज्य मंत्रिमंडल ने अलग झंडे को मंजूरी देकर गेंद केंद्र के पाले में डाल दी थी। लेकिन गृह मंत्रालय ने इसे खारिज करते हुए कहा कि झंडा कोड के तहत सिर्फ एक झंडे को मंजूरी दी गई है। इसलिए एक देश का एक झंडा ही होगा। जम्मू-कश्मीर का मामला अपवाद है, क्योंकि उसके लिए संविधान में अलग व्यवस्था है।
सवाल है कि चुनाव करीब आते ही उन्हें अलग लिंगायत समुदाय और कन्नड अस्मिता की चिंता क्यों सताने लगी? इसके पहले भी अनेक दल अनेक जाति एवं धर्म के लोगों को जो आरक्षण के दायरे में नहीं आते हैं, उनके सामने भी आरक्षण का चुग्गा डालकर वोट की फसल काटते रहे हैं। परंतु चुनाव के बाद यही वादे उनके गले की फाँस बनकर पूरे देश में जातिवादी हिंसा व नफरत का माहौल तैयार करते रहे हैं। हमारा समाज इतने सारे धर्मों, संप्रदायों, उपसंप्रदायों, जातियों, उपजातियों गोत्रों, कुलों और मूलों की अनन्त शृंखलाओं से बँधा है कि इसे जबरन छेड़ना हिंसा और अराजकता को ही न्योतना होगा। हर किसी को देश की विविधता में एकताका सम्मान करना चाहिए, न कि विभाजनकारी नीतियों को हवा देकर इसमें दरार पैदा करने का काम करना। बेहतर हो कि विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और नागरिक सुरक्षा जैसे सवाल हमारे चुनावों के मुख्य मुद्दे बनें। हमें विविधताओं से भरा भारत चाहिए, विभाजित भारत नहीं।



संसद में संवाद नहीं!
लोकतंत्र की संसदीय प्रणाली में संसद को देश की राजनीतिक, सामाजिक  आर्थिक व बहुविध आंतरिक व बाह्य स्थितियों का दर्पण माना जाता है, यानी संसद में पूरे देश के मुद्दों एवं हलचलों का प्रतिबिंब दिख जाता है कि देश किन परिस्थितियों से गुजर रहा है। परंतु लगातार कुछ वर्षों से संसद के बनावटी हुड़दंग और हंगामे को देखकर यही लगता है कि हमारे चुने गए प्रतिनिधियों को या तो जनता की अपेक्षाओं या आकांक्षाओं की समझ नहीं है या वे जानबूझकर किसी स्वार्थी हित के हाथों जनतंत्र व संसद की मर्यादा को मटियामेट कर रहे हैं। इसकी झाँकी इस महत्त्वपूर्ण बजट सेशन में देखने को मिल रही है, जिसमें विरोधी दलों द्वारा इस कदर हंगामा किया जा रहा है कि अनेक जरूरी विधेयकों एवं कार्यों की बात अगर छोड़ भी दें, यहाँ तक कि देश के भविष्य को तय करने वाला बजट तक लोकसभा में बिना कोई चर्चा-बहस के पारित हो गया। हद तो तब हो गई, जब इराक के मोसुल में आईएसआईएस के हाथों चार साल पहले बेरहमी से मारे गए 39 भारतीयों की पूरी जानकारी विदेश मंत्री सुषमा स्वराज लोकसभा में देना चाह रही थीं तो उन्हें बोलने तक नहीं दिया गया।
लोकसभा ने बिना चर्चा के ही वित्त विधेयक और विनियोग विधेयक 2018 को मंजूरी दे दी। इससे पहले विभिन्न मंत्रालयों और विभागों की 99 माँगों को गिलोटिन के जरिये मंजूरी दी गई। हाल के वर्षों में शायद यह पहला मौका है, जब पूरा बजट बिना चर्चा के लोकसभा में पारित हुआ हो। बजट को बिना बहस के पारित होना देश और लोकतंत्र के लिए उचित नहीं है। बजट सिर्फ आमदनी और खर्च का ब्योरा भर नहीं होता बल्कि पिछले वर्षों की शासकीय वित्तीय कार्यनीतियों और उसकी खामियों की समीक्षा, सुधार एवं सुझावों का दस्तावेज एवं देश के भविष्य का दिशा-निर्देश भी होता है। संसद सदस्यों, खासकर विपक्षी सदस्यों से यह अपेक्षा रहती है कि इसके हर पहलू का गहराई से अध्ययन एवं विश्लेषण कर इसके अंदर छुपे अनेक अव्यक्त प्रावधानों एवं तथ्यों को जोरदार बहस के माध्यम से उजागर करें, सरकार को घेरें एवं सुधार व जवाबदेही के लिए मजबूर कर दें। सरकार कई बार अपने दलीय हित या अनेक दवाब समूहों के फायदे के लिए बजट में दबे-छुपे कुछ ऐसा प्रावधान कर जाती है, जो देश के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है। परंतु यह कितना दुःखद है कि वित्तीय वर्ष की समयसीमा तथा विपक्षी सदस्यों की अनावश्यक अलोकतांत्रिक हुल्लड़बाजी में वित्त एवं विनियोग विधेयक यों ही बिना बहस के पारित हो गया।
एक दूसरा अत्यंत दुःखदायी विषय, विदेश मंत्री सुषमा स्वराज इराक के मोसुल से अगवा हुए 39 भारतीय नागरिकों की मौत की जानकारी लोकसभा में दे रही थीं, किंतु कांग्रेस के सांसदों द्वारा किए जा रहे अनावश्यक हंगामे के कारण वे पूरी जानकारी नहीं दे पायीं। असफल रहने पर उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा कि, ‘‘कांग्रेस ने मौत पर ओछी राजनीति की सारी हदें पार कर दीं, कांग्रेस पार्टी ने लोकसभा काररवाई को उस समय बाधित क्यों किया गया, जब मुझे इराक में मारे गए 39 भारतीयों की जानकारी देनी थी?’’ बयान के दौरान लोकसभा में कांग्रेस द्वारा हंगामे का नेतृत्व कांग्रेस के ज्योतिरादित्य सिंधिया ने राहुल गांधी के इशारे पर किया और लोकसभा अध्यक्ष द्वारा बार-बार आग्रह करने के बावजूद सिंधिया के नेतृत्व में कांग्रेस सदस्यों का शोर-शराबा जारी रहा। प्रेस कॉन्फ्रेंस में विदेश मंत्री ने बताया कि मृतकों में पंजाब के 27 लोग, हिमाचल के 4, बिहार के 6 और बंगाल के 2 लोग शामिल हैं।
इराक के मोसुल में 39 भारतीय कामगारों के जीवित होने की जिस झीनी-सी संभावना पर सैकड़ों विवश परिजनों की उम्मीद टिकी थी, वह एक झटके में टूट गई। यह त्रासदी चार साल पहले घटित हुई, पर उसकी पुष्टि अब हुई। काम की तलाश में दूसरे देश जाकर समूह में आतंकियों के हाथों मारे जाने से दुःखद कुछ नहीं हो सकता, लेकिन मौत के करीब चार साल तक उनके बारे में पता न चल पाना तो और भी दुर्भाग्यपूर्ण था। इस मामले में भारत सरकार चाहकर भी बहुत कुछ नहीं कर सकती थी। आईएस के कब्जे के दौरान मोसुल में जब इराक सरकार की ही पहुँच नहीं थी, तो बाहरी देशों की बात ही क्या? मोसुल के आईएस के कब्जे से मुक्त होते ही हमारी सरकार उनकी तलाश में सक्रिय हुई। रडार की मदद से एक गाँव के टीले पर सामूहिक कब्र का पता चला और निकाले गए शवों के डीएनए टेस्ट से मिलान कराने के बाद उनके भारतीय होने की पुष्टि हुई।
सबसे बड़े लोकतंत्र के प्रतिनिधि हे महानुभावो! अगर बजट और वित्त विधेयक जैसे महत्त्वपूर्ण दस्तावेज भी बिना आपकी बहसों के ही पारित हो जाते हैं। चार वर्षों से आशा और निराशा के भँवर में गोते खाते उन सैंकड़ों परिवारों तक 39 लोगों की निर्मम हत्या की पुष्ट खबर पहुँची, तब भी आपकी अंतरात्मा नहीं जगी। आपसे तो आशा थी कि सारी दलीय कटुता को परे रखकर तत्काल इस हत्या के पीछे के कारणों की चर्चा करते, सरकार की नीतियों में कोई खामी है तो उसे उजागर कर ऐसी घटनाओं के निवारण के लिए मजबूर करते। परंतु चर्चा-संवाद की तो बात ही दूर, आपने तो मंत्री महोदया को पूरी बात ही कहने नहीं दी। जिनके अवशेष के रूप में सिर्फ हड्डिया, उनके कड़े, केश, कंघे, जूते, कपड़े उनकी सुरक्षा के लिए माताओं, बहनों और पत्नी द्वारा बाँधे गऐ गंडे-ताबीज ही अवशेष बचे हैं, उनकी आत्मा की शांति के लिए तथा उनके आश्रित-पीड़ित परिवारों के गहरे घावों पर मरहम लगाने के लिए आपलोगों ने दो मिनट की मौन श्रद्धांजलि देना भी उचित नहीं समझा। वे बेचारे 25 से 30 हजार रुपये महीना कमाने के चक्कर में उस बियाबान में दरिंदों के हाथों निर्ममता से मारे गए और आपलोग जनता की गाढ़ी कमाई के करोड़ों रुपये हंगामे की भेंट प्रतिदिन चढ़ा रहे हैं। आप पर अगर इन दुखियारों की पीड़ा का भी असर नहीं हो रहा तो जनतंत्र के इस संप्रभू मंदिर में चुनकर आए महानुभावो, एक बार सोचिए, आप किसका प्रतिनिधित्व कर रहे हैं? हो सकता है, आप जिन मुद्दों पर बाधा उत्पन्न कर रहे हैं, वह भी महत्त्वपूर्ण हो, परंतु उसका भी समाधान तो वाद-प्रतिवाद-संवाद और नीति-निर्माण से ही निकलेगा न। फिर संसद में संवाद और संवेदनशीलता की जगह हंगामा क्यों?



Friday, March 9, 2018


रोबोट का गौरैया प्रेम
फिर आ गया 20 मार्च, यानी विश्व गौरैया दिवस। सूचना एवं संचार माध्यमों में फिर से गौरैया के संरक्षण और उसके संवर्द्धन के बारे में खुब चर्चा-परिचर्चा होगी; अखबार, पत्र-पत्रिकाओं में लेख छपेंगे। फेसबुक एवं व्हाट्सएप पर गौरैयों की सुंदर-मनमोहक तस्वीरों एवं चीं-चीं करती, करतब दिखाती उसके विडियो के संग लाखों-करोड़ों की संख्या में संदेश भेजे जाएंगे। परंतु इन सबसे अनभिज्ञ गौरैया महानगरों एवं शहरों से लगातार पलायन करते हुए कहीं सुदूर क्रमशः घटते प्राकृतिक वन-प्रांतर में मिटती, सिमटती, विलुप्ति के कागार पर पहुँचती जाएगी।
सिर्फ गौरैया की बात क्या करें, मार्च महीना है, फगुआया मन है, बसंत अपने शबाब पर है। परंतु अभी तक कानों में कोयल की एक भी कूक सुनाई नहीं पड़ी। जबकि मैं मोबाइल का इयर फोन भी नहीं लगाता और पेड़-पौधों एवं पार्कों से होकर ऑफिस आते-जाते ज्यादा से ज्यादा पैदल चलता हूँ। मेरा ऑफिस भी चारों तरफ से घने वृक्षों से भरे पार्कों के बीच है। इतनी चेतावस्था रहने के बावजूद कोयल की कूक सुनाई नहीं पड़ी है। इसका मतलब यह है कि इस बसंत में भी बहुत कुछ मिलावट हो गई है। उस बसंत का क्या मतलब, जिसमें कोयल की कूक न हो, चहुँदिशी पीले-पीले फूलों से लदे पेड़-पौधे न हांे, आमों में मंजरी न दिखाई पड़े, नवसृजन के लिए विसर्जन यानी पतझड़ और फिर फूटते कोंपल अगर दिखे नहीं तो फिर काहे का वसंत?
गौरैया, कोयल ही नहीं, देखते-देखते गिद्ध का अस्तित्व भी समाप्तप्राय है, जबकि यह पक्षी अत्यंत विपरीत परिस्थितियों में भी जीवित रह सकता है। गिद्ध एक मृतोपजीवी पक्षी है, जो भोजन के लिए केवल मृत पशुओं पर निर्भर रहता है। इस तरह वह वातावरण के लिए कुशल एवं प्राकृतिक सफाईकर्मी है। इसका पाचनतंत्र इतना मजबूत होता है कि यह रोगाणुओं से परिपूर्ण सड़ा-गला मांस भी पचा सकता है। वह हमारे पर्यावरण एवं मानव जीवन को अनेक प्रकार के संक्रामक रोगों को फैलने से रोककर हमें बचाता है। 90 के दशक से पहले लगभग 40 लाख गिद्ध भारत में थे, जो लगभग 12 लाख टन सड़े-गले मांस को वार्षिक दर से समाप्त किया करते थे। परंतु पिछले दशकों में 99 प्रतिशत गिद्धों की आबादी समाप्त हो गई। जाँच के दौरान पाया गया कि मवेशियों के दर्द निवारण के लिए दी जाने वाली दवा में प्रयोग होने वाली रसायन डाइक्लोफेनेकइसके लिए जिम्मेदार है। इस दवा की रसायन पशुओं के मरने के बाद भी उसके शव में उपस्थित रहती है। इस तरह उसे खाते ही गिद्ध डाइक्लोफेनेक की विषाक्तता से समाप्तप्राय होता गया।
मनुष्य की बढ़ती असीम लालसा, उसकी शिकारी प्रवृत्ति और गिद्धदृष्टि ने एक ऐसी डिजीटल रोबोट सभ्यता को जन्म दिया है, जिसको किसी पारिस्थितिक संतुलन, जैव विविधता या वासंती बहुरंगी उत्सवलीला की आवश्यकता नहीं है। वह सिर्फ हिज मास्टर वॉयसबनकर चलायमान है। यह कृत्रिम बुद्धि वाला जानवर बहुत चुपके से हमारे जीवन में प्रवेश कर चुका है। कहा जा रहा है कि जल्द ही कार्यालयों में अनुवादकों, सचिव और क्लर्कों की जगह रोबोट ले लेगा। रोबोट कई मामलों में हमारे डॉक्टरों, इंजीनियरों और वैज्ञानिकों से भी बेहतर साबित हो सकते हैं। क्या पता, कल वह एक अच्छा डायरेक्टर, प्रशासक, विचारक, समाजशास्त्री, दार्शनिक और लेखक-संपादक भी हो। लेकिन यह कृत्रिम दिमाग जब जीवन के हर क्षेत्र में तैनात हो जाएगा तब क्या होगा? हम यह अनुमान नहीं लगा सकते कि यह कृत्रिम बुद्धि (रोबोट) कहाँ तक पहुँचेगी। महान वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग को लगता है कि यह आगे चलकर मानव सभ्यता के लिए खतरा साबित होगी। दार्शनिक बासट्राम को भी कहा है कि इस कृत्रिम दिमाग में इतनी क्षमता होगी कि यह मानव सभ्यता का ही सफाया कर सकती है।
आज हर तरफ दिख रहा है कि हम एक पोस्ट ह्यूमन यानी उत्तर मानव युग की ओर जा रहे है। एक ऐसा युग जहाँ मानव तो होगा परंतु हम रोबोट के गुलाम भर होंगे, वह जैसे नचाएगा हम वैसा नाचेंगे। हम जिस तरह से अपने सारे कार्य कंप्यूटरों एवे डिजीटल माध्यमों के हवाले करते जा रहे हैं वह दिन दूर नहीं है जब यह भस्मासुर अपने निर्माता के ही सर पर हाथ रखकर उसे भस्मीभूत करेगा। उसकी बानगी आज हर तरफ दिख तो रही है। नहीं दिख रही तो जरा कानों से इयर फोन हटाकर और मॉनिटर एवं मोबाइल से नजरें परे कर देख लीजिए, क्या आपको गौरैया की चीं-चीं आस-पास सुनाई पड़ रही है? क्या कोयल इस बसंत में कूक रहा है? क्या हमारे आयातित वृक्षों के बनावटी पार्को एवं जंगल में बसंती हवा झकोंरे मार रही है?  
भारत जैव विविधता से परिपूर्ण देश है। जहाँ पूरे विश्व का 8 प्रतिशत जैव विविधता वाला भाग मौजूद है। सभी प्राणी एक दूसरे से खाद्य शृंखला द्वारा जुड़े हैं। आज विश्व में कई पशु-पक्षी, जंगली प्रजातियाँ एवं विविध पेड़-पौधे या तो विलुप्त हो गए या उनका अस्तित्व संकट में है। पहले मानव नें अपनी असीम पिपाशाओं की पूर्ति के लिए पूरी पारिस्थितिकी का संतुलन बिगाड़ा। खुद अपने गाँव, घर-आँगन छोड़कर महानगरों में कबूतर के दड़बेनुमा अनेक मंजिली अट्टालिकाओं में कैद हुआ। उसी में बनावटी बोनसाई पौधे लगाए। वहीं पिंजरों में चिड़िया-तौते को पाला। वह यह भूल गया कि ऐसा करते हुए वह खुद भी स्वतंत्र व्यक्तित्व से गिरकर एक बोनसाई विचार का यानी बौना व्यक्तित्व बनता गया है। वह यहीं नहीं रुका और ज्यादा से ज्यादा सुख-सुविधा के लिए तिलस्मी डिजीटल दुनिया का गुलाम बनता गया। इसका ताजा उदाहरण सऊदी अरब है, जिसके हुक्मरानों ने महिलाओं को स्वतंत्र व्यक्तित्व नहीं माना और उन्हें अधिकांश स्वतंत्र नागरिक के मौलिक अधिकारों से मरहुम रखा, परंतु एक रोबोट रोबोट सोफियाको अपने देश की नागरिकता प्रदान कर यह सुनिश्चत किया है कि उसे वह सब अधिकार मिले जिसके लिए वहाँ की महिलाएं सदियों से तरसती रहीं।
मानव सिर्फ नन्हीं जीव गौैरैया ही नहीं खो रहा है बल्कि पूरी जैव विविधता, मानवीय प्रवृत्तियों- आचार-व्यवहार, नैतिकता एवं संवेदनाओं को खोते हुए खुद एक मशीनी पुतले यानी रोबोट में तब्दील होता जा रहा है। इस रोबोट मानव को असली गौरेया, कोयल, गिद्ध और बसंत से कोई मतलब नहीं है। यह विश्व गौरैया दिवस पर ट्वीटर, व्हाट्सएप, फेसबुक आदि के माध्यम से लाखों-करोड़ों गौरैया के फोटो, विडीयो युक्त बनावटी संवेदना-संदेश भेज देगा और बस...!   



Thursday, February 8, 2018


सिरफिरेपन से कैसे मिले निजात?
सत्य और तथ्य यही है कि सिरफिरापन एक घातक मानसिक बीमारी है। यह जब महज एक आदमी तक ही सीमित होता है, तब भी बड़ा विनाशकारी होता है और मुश्किल से काबू में आता है। वही जब संस्थागत, जातिगत, धर्मगत या समाजगत हो जाए तो पूरे समाज, देश और उससे भी आगे पूरी प्रकृति एवं मानवता के लिए घोर विध्वंसकारी होता है। सिरफिरेपन की यह बीमारी सदियों से चली आ रही है परंतु दुःख की बात यह है कि हम ज्यों-ज्यों अपने आप को ज्यादा सभ्य और आधुनिक बनने और बनाने का दंभ भरते हुए आगे बढ़ते रहे, तब से स्थिति ज्यादा खतरनाक और जटिल होती गई।
नये साल के प्रारंभ में हरियाणा के पलवल में आधी रात को लोहे का पाइप लेकर निकले पूर्व सैनिक नरेश धनकड़ ने छह मासूम लोगों की पीट-पीट कर हत्या कर दी। पुलिस टीम उसे पकड़ने पहुंची तो उसने पुलिस पर भी हमला कर दिया। दिल्ली के बुराड़ी इलाके में खुदकुशी का एक अजीबोगरीब मामला सामने आया। यहाँ मकान के दूसरे माले से छलांग लगाकर एक शख्स नवदीप ने अपनी जान दे दी। वह स्वीडन से पढ़कर दिल्ली आया हुआ था। जान देने से पहले नवदीप लाइफ आफ्टर डेथविषय से संबंधित सामग्री पढ़ रहा था। वह इंटरनेट पर यह खंगाल रहा था कि सेकेंड फ्लोर से कूदने से क्या वाकई जान जा सकती है? राजकोट (गुजरात) के एक युवक संदीप ने अपनी माँ जयश्रीबेन की छत से फेंककर हत्या कर दी। उसने ऐसा इसलिए किया, क्योंकि उसके मुताबिक उसकी माँ बूढ़ी हो गई थी और बीमार रहने लगी थी। दिल्ली में ही रहकर आई.ए.एस. की तैयारी कर रही एक पीसीएस अधिकारी लड़की ने 31 दिसंबर की रात को पंखे से लटककर इसलिए आत्महत्या कर ली कि उसे अपने कील- मुहांसों से जल्दी निजात नहीं मिल पा रही थी। पिछले दिनों केरल का एक युवक अब्दुल मनफ सीरिया में मारा गया, वह उस आइएसआइएस में शामिल था। जो पूरी दुनिया को एक कट्टर इस्लाम में तब्दील करने के लिए मौत और विध्वंस का तांडव कर रहा है। अब्दुल मनफ ने भी इसी में भर्ती होकर मृत्यु (आत्महत्या) को चुना। ऐसे आत्महंता प्रवृत्ति के उदाहरण इन दिनों बहुतेरे हैं।
संस्थागत सिरेफिरेपन की बात करें तो हाल के दिनों के ही ढेरों उदाहरण हैं, जिसमें अनेक बाबा, जिसमें संत गुरमीत राम-रहीम, बाबा वीरेंद्र देव दीक्षित, केरल के तिरुवनंतपुरम के एक चर्च के पादरी फादर देवराज, लखनऊ के खदीजतुल कुबरा लिलबनातमदरसे के संचालक कारी तय्यब जियाजैसा व्यक्ति धर्म, अध्यात्म, शिक्षा, समाजसेवा की आड़ लेकर भोले-भाले लोगों को वर्षों से ठगता रहा। स्त्रियों एवं मासूम बच्चियों को अपना हवस का शिकार बनाता रहा। विरोध करनेवालों की वह निर्ममता से हत्या करवाता रहा। सरकार और कानून को ठेंगा दिखाता रहा और न्यायालय के आदेश पर घिर जाने के बाद पूरे राज्य को दंगा और हिंसा में झोंकने का भरपूर प्रयास किया।
पूरी दुनिया को झुलसा रहा यह आतंकवाद किसी सिरफिरे के दिमाग की ही तो उपज है, जो यह मानता है कि मेरी कौम या संप्रदाय ही दुनिया का असली धर्म है और बाकी सभी का विश्वास बकवास है, उसे इस धरती पर रहने का कोई अधिकार नहीं है। इसी तरह नस्ल, रंग, लिंग और जातिवाद  अपनी तथाकथित काल्पनिक महानता के आगे किसी को भी जगह देने को तैयार नहीं है। पिछले एक साल के दौरान हमारे देश में ही जाति के नाम पर जिस तरह खुलेआम सड़कों पर हिंसा का तांडव किया गया और जानमाल एवं सार्वजनिक संपत्तियों का नुकसान किया गया, वह सिरफिरेपन की अति है।
मनुष्य अपनी प्रकृति से एक मेहनती एवं सरल स्वभाव का प्राणी है। आदिकाल में जब इसे आग मिल गई तो इसने बेकार की हिंसा से मुक्ति पा ली और सामूहिक जीवन की ओर बढ़ा। जब अनाज  और फल मिल गए तो शिकारी जीवन को त्यागकर कृषक और गृहस्थ जीवन को अपना लिया। घर- परिवार, नाते-रिस्तेदारी और सामाजिक-सामुदायिक जीवन की ओर अग्रसर हुआ, जिससे उसे अपनी प्रकृति के अनुरूप सुकून और सहज जीवन मिला। हमारी सभ्यता की प्रगति का आख्यान सहयोग और सामाजिकता का है। परंतु निजी दंभ, लोभ और लोलुपता ने स्थिति को जटिल से जटिलतर बना दिया। विश्वास और सहयोग की जगह सौदा, समझौता और धोखेबाजी ने ले ली।
यह सिरफिरापन नहीं है तो क्या है जिसके कारण हमने विकास के लिए एक ऐसा मार्ग चुना, जिसमें सिर्फ अपना निजी सुख और उपभोग ही सर्वोपरि है। आज दुनिया की अधिकांश जनसंख्या शुद्ध हवा और पानी के लिए तरस रही है। हमारी सदानीरा नदियां नालों में, हर-भरे जंगल, पहाड़ वीरान और इसमें पलने वाले पक्षी एवं जीव-जंतु विलुप्ति के कागार पर पहुंच गए। इस उपभोगवादी जीवनपद्धति के शिकार धर्म, विज्ञान, अध्यात्म और नैतिक मूल्य हो गए और इसके प्रतिनिधि के रूप में ऐसे ठग और ठेकेदार पैदा कर दिए, जो बाजारवादी उपभोगवादी जीवन को बढ़ावा देने के लिए सबका दुरुपयोग करने लगे। इसी का परिणाम है कि मानव को मुक्ति का मार्ग दिखाने वाला धर्म आतंकवाद का, अध्यात्म पाखंड का और विज्ञान विनाश का पर्याय होता गया। आज एक सामान्य आदमी भय, आतंक और अविश्वास के साये में जी रहा है। सहारे और सहयोग की डोर में हर जगह गांठंे ही गांठंे पड़ गई हैं।
सिरफिरापन एक गंभीर मानसिक बीमारी है, जिसके लिए अनेक तत्व जिम्मेदार हैं, जिसमें आनुवंशिकी, पालन-पोषण, उसके घर-परिवार, रिस्तेदारी, समाज, धर्म, शासन-व्यवस्था, आर्थिक स्थिति, शिक्षा एवं देश-काल की परिस्थितियां एवं पर्यावरण मुख्य रूप से जिम्मेदार होते हैं। निजी सिराफन अब सामूहिक पागलपन में तब्दील हो चुका है। स्थिति इतनी भयावह हो गई है कि विधा के मंदिर में किशोर और मासूम बच्चे मामूली डांट पर अपनी प्रधानाध्यापिका तक कि हत्या, सिर्फ स्कूल में छूट्टी भर कराने के लिए सातवर्षीय नौनिहाल की बेरहमी से गला रेतकर हत्या, ककहरा सीखने के उम्र में कहीं यौन हिंसा के आरोप का दंश झेल रहा है तो कहीं उसका शिकार हो रहा है।
जब सारी परिस्थितियाँ अनुकूल हों तो कोई मनोचिकित्सक किसी सिरफिरे का इलाज आसानी से कर सकता है। परंतु सामूहिक पागलपन का इलाज भी सामूहिक करना पड़ेगा, ऐसी परिस्थितियाँ पैदा करनी पडेगी, जिसमें व्यक्ति सहज रूप से अपने घर-परिवार, रिस्तेदारी, समाज और पर्यावरण के संग विश्वास, सहयोग और सहअस्तित्व के साथ रह सके। परंतु वैश्विक बाजारवादी तंत्र के मोहजाल में फंसी दुनिया में क्या यह संभव होगा?

Wednesday, January 3, 2018

लोभ और लाभ की लाइलाज बीमारी
दुनिया में ऐसी कोई बीमारी नहीं, जिसका इलाज अगर हमारी मेडिकल साइंस, सरकार और समाज चाह ले तो नहीं हो सके, सिवाय लोभ और लाभ नामक बीमारी के। यह एक ऐसा वायरस है, जो बड़ी तीव्र गति से हमारी व्यवस्था को ग्रस रहा है। यह दबे पांव पहुँचकर जिम्मेदार व्यक्ति, संस्था, और सरकार की बीमारियों से मुकाबला करने वाली आंतरिक रोग प्रतिरोधक क्षमता को ही नष्ट-भ्रष्ट कर देता है। इसका शिकार निरीह सामान्य जन जब समाज और सरकारी संस्थाओं की तरफ आशा से टकटकी लगाकर देखता है, पता चलता है कि वह खुद भी इसी वायरस से ग्रसित हो, इस लोभ और लाभ का सहभागी बन सिर्फ घड़ियाली आसूँ बहा रहा है। इस तरह लोभ और लाभ का व्यापार निर्विघ्न चलता जा रहा है।
विगत दिनों गुड़गाँव के फोर्टिस अस्पताल ने डेंगू के असफल इलाज के बाद मृतक बच्ची के परिजनों से शव देने के पूर्व अनाप-शनाप सोलह लाख रुपये का बिल अदा करने की माँग की। दिल्ली के शालीमार बाग स्थित मैक्स अस्पताल ने पहले तो जुडवां नवजातों को, जिसमें एक उस समय जीवित था, मृत घोषित कर उनके शव को पैककर उनके परिजनों को सौंप दिया। पहले डॉक्टरों ने आइसीयू में रखने के लिए भारी-भरकम खर्च बताया, परिजनों द्वारा इतना खर्च उठाने पर असमर्थता जताने पर कुछ देर बाद ही जिंदा बच्चे को भी मृत घोषित कर उन्हें सौंप दिया। एक अन्य मामले में नोएडा मैक्स अस्पताल खोड़ा कॉलोनी में रहकर नोएडा में एक प्राइवेट नौकरी कर रहे मनोज की मृत्यु के उपरांत पाँच दिनों तक वेंटिलेटर पर रखकर बिल बढ़ाता रहा और बिल पाँच लाख तक पहुँचा दिया, पूरा पैसा परिजनों द्वारा नहीं चुका पाने के कारण उन्हें लाश तक नहीं सौंपी गयी। नोएडा के ही निओअस्पताल के बारे में इंडियन मेडिकल एसोसिएसन के डॉक्टरों की टीम ने जाँच में यह पाया कि अस्पताल ने मरीज पर अपने ही मेडिकल स्टोर से ब्रांडेड दवा खरीदने के लिए गैरकानूनी तरीके से दबाव डालकर लाखों रुपये का बिल बनाया और एडवांस पैसे कि लिए भर्ती मरीज के घर बाउंसर भेजता है।
ऐसे मामले उन अनेकों मामलों में से एक हैं, जो पूरे देश में रोज घटित हो रहे हैं। यह तो दिल्ली और उसके आस-पास का मामला है, जो मीडिया में कुछ देर के लिए ही सही जगह पा जाता है, नहीं तो यह गोरखधंधा तो राजधानियों से लेकर जिलों, कस्बों, गाँवों तक दिन दूनी रात चौगुनी गति से खूब फल-फूल रहा है। ये निजी अस्पताल न केवल अनेक तरह के अनावश्यक ऑपरेशन करने, अनावश्यक दवाइयों के दस गुने-बीस गुने दाम वसूलने, मरे हुए मरीजों को भी कई दिनों तक वेंटिलेटर पर रखकर बिल बढ़ाते जाने, यहाँ तक कि किडनी रैकेट और मानव अंगों की तस्करी तक में भी शामिल हैं।    
आंकड़े बताते हैं कि आज भी देश में इलाज पर लोग अपनी क्षमता से बाहर 70 फीसदी खर्च करने को मजबूर हैं। केन्द्र सरकार ने अब स्वास्थ्य पर 2.5 फीसदी खर्च का लक्ष्य रखा है, लेकिन 2002 में भी नीति बनाते वक्त 2010 तक इसे 2 फीसदी करने का लक्ष्य रखा था, लेकिन आज भी यह खर्च 1.2 फीसदी तक ही है। विश्व स्वास्थ्य सूचकांक में भारत का स्थान 188 देशों में 143वाँ है। भारत, स्वास्थ्य पर अपनी जीडीपी का सिर्फ 1.2 प्रतिशत व्यय करता है। जबकि अमेरिका का 8.3 प्रतिशत, चीन 3.1 प्रतिशत और दक्षिण अफ्रीका 4.2 प्रतिशत। दशकों से लगातार स्वास्थ्य सेवा को किनारा कर दिए जाने के कारण हमारी सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था इतनी भ्रष्ट और जर्जर होती गई कि इस क्षेत्र में निजी डॉक्टरों, व्यवसायियों, बिल्डरों, झोलाछाप नीम-हकीम डॉक्टरों और तथाकथित तांत्रिक बाबाओं तक को लोगों का खून पीने के लिए खुला मैदान मिल गया।   
भारतीय जनता पार्टी नें 2014 के आमचुनाव में अपने घोषणापत्र में यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज (यूएचसी) का वादा किया था। देश के हर नागरिक को प्राथमिक से हर स्तर की सभी जरूरी स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराना ही यूएचसी है, जिसमें सबको समय पर सहज, सुलभ और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सुविधा मिल सके। इसके लिए केन्द्र सरकार ने दर्जनों एम्स खोलने से लेकर दवाइयों एवं इलाज में काम आने वाले जरूरी सामानों का उचित मूल्य निर्धारण के लिए कई कदम उठाने की घोषणा कर उसके अनुपालन का प्रयास कर रही है। परंतु यह यूएचसी के लिए नाकाफी है। यूएचसी का लक्ष्य कब तक पूरा होगा, कोई समय सीमा तय नहीं है। तो सवाल है कि कब तक लोग निजी अस्पतालों के हाथों लूटते और मरते रहेंगे? लांसेट के एक अध्ययन के मुताबिक, स्वास्थ्य पर निवेश करने से 10 गुणा रिटर्न मिलता है। स्वास्थ्य सुविधा बेहतर होने से व्यक्ति की उम्र में एक साल का इजाफा होता है तो उत्पादकता बढ़ने से जीडीपी में 4 फीसदी की सालाना बढ़ोतरी होती है।
अनेक किंतु परंतु के बाद भी देश की जनता ने प्रधानमंत्री के नोटबंदी एवं जीएसटी जैसे कड़े फैसलों में अनेक तकलीफों को सहकर भी भारी जनसमर्थन दिया। गुजरात और हिमाचल में विजय इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। देश की आर्थिक स्थिति पर विरोधी दलों, मीडिया संस्थानों द्वारा लगातार प्रश्नचिह्न लगाने के बावजूद देश की अर्थव्यवस्था रफ्तार पकड़ रही है। आर्थिक रेटिंग एजेंसियां भी सकारात्मक संदेश दे रही हैं। सेंटर फॉर इकोनॉमिक्स एंड बिजनेस रिसर्च वर्ल्ड इकोनॉमिक लीगने यह अनुमान लगाया है कि भारत 2018 में फ्रांस और ब्रिटेन को पछाड़कर दुनिया की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगी। एक तरफ यह उजला पक्ष और दूसरी तरफ दुनिया के स्वास्थ्य सूचकांक में भारत का 188 देशों में 143 वाँ स्थान, क्या यह शर्मसार करने वाली बात नहीं होगी?
क्या कोई सरकार देश की आंतरिक और बाहरी सुरक्षा को प्राइवेट एजेंसी के हवाले कर सकती है? ऐसा करने के नतीजे कितने भयंकर हो सकते हैं, यह कल्पना के परे है। उसी तरह लोगों के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए भी किसी लाभ के उद्देश्य से चलने वाली निजी एजेंसियों के हवाले कैसे कर सकती है, जिसका प्राथमिक ध्येय ही येन-केन-प्रकारेण लाभ कमाना है? सरकार अगर देश का सुरक्षा बजट कुल बजट का 12-13 प्रतिशत कर सकती है जो जरूरी भी है, तो स्वास्थ्य जैसी बुनियादी जरूरत पर ईमानदारी से 5-6 प्रतिशत खर्च होना ही चाहिए। भारत सही मायने में विकसित देश तभी होगा, जब यहाँ के सामान्य जन पूरी तरह से स्वस्थ और सुरक्षित होंगे।