Thursday, March 7, 2019


वन्दे भारत के पत्थरबाज!
चौथी बार भी पत्थरबाजी का शिकार बनने के बाद अपने जख्मों को सहलाते हुए वन्दे भारत एक्सप्रेसअपनी गति की तरंग-लय में कुछ सोचती-विचारती गतिमान है कि जब मेरे पहियों के ट्रैक पर चहलकदमी यानी ट्रायल प्रारंभ हुआ और अब जब यात्रियों को लेकर तेज रफ्तार पकड़ रही हूँ, मुझपर यह तीसरी बार पत्थरबाजी हुई है। मूर्ख शैतान पत्थरबाजों को मेरी चमक-दमक के साथ तेज चौकड़ी भरना रास नहीं आ रहा। इन्हें पता होना चाहिए कि मेरी गुणों और गति में आधुनिक भारत के अधिकांश लोगों के सपनों की धड़कन बसी है। लोग आज समय के साथ चलना चाहते हैं, जब पूरी दुनिया नवगति, नवलय से आगे बढ़ रही है तो भारत के लोग कबतक लस्टम-पस्टम करते हुए घंटों के सफर को दिनों में पूरा करते हुए पीछे घिसटते रहें। हाँ, यह सही है कि हर देश और समाज में ऐसे लोग होते ही हैं, जो तर्क-विज्ञान और आधुनिकता को धता बताते हुए अतीत और कठमुल्लेपन के शिकार होते हैं क्योंकि विवेक और आधुनिकता को समर्थन देने से उनका धंधा-पानी बंद होने का डर होता है। जरा सोचिए, जब पहली बार हाईस्पीड रेल की बात हुई थी तो अच्छे-खासे गुणीजनों ने कैसा उपहास उड़ाया था।
यह सिर्फ मेरे साथ ही थोड़ा ही हुआ है, यहाँ की बेटियों के साथ भी यही सब होता रहा, जब उसने नए जमाने के अनुरूप पुरुषों के संग कदम-ताल मिलाकर चलना प्रारंभ किया। उसे रोकने के लिए क्या-क्या नहीं होता रहा है। पहले तो उसके जन्म से पहले भ्रूण में ही मार देने की कोशिश, किसी तरह अगर जन्म हो गया तो पालन-पोषण और समान शिक्षा में हजार तरह के शारीरिक, मानसिक रोड़े, उससे किसी तरह आगे बढ़ी तो कैरियर, शादी, घर-गृहस्थी में हर जगह कहीं दहेज, कहीं तेजाब, तो कहीं तलाक, तलाक और तलाक के नाम पर वज्रपात! देश और दुनिया में न जाने कितनी बेटियों को अपने मूलभूत अधिकार पाने और स्वतंत्र होकर सर उठाकर जीने की चाहत में संगसार कर दिया गया। परंतु फिर भी बेटियाँ हारने वाली नहीं हैं, वे आगे बढ़ रहीं हैं, सरपट भाग रही हैं, हर मोर्चे पर झंडे गाड़ रही हैं।
भारत के मस्तक कश्मीर में तो आए दिन पत्थरबाजी होती है। ये पत्थरबाज उन जवानों पर पत्थरबाजी करते हैं, जो इनकी सुरक्षा और देश की रक्षा के लिए अपना घर-बार छोड़कर इनकी सेवा में अपनी जान को जोखिम में डालकर दिन-रात डटे हुए हैं। ये भाड़े के पत्थरबाज नहीं जानते हैं कि वे जिनके इशारे पर पत्थरबाजी कर रहे हैं, वे उनकी आजादी, जीने का अधिकार, उनके सपने, आशाओं, आकांक्षाओं और उनके कश्मीर, जिसे वे जन्नत कहते हैं, सबको मिटाकर सांप्रदायिक कट्टरता की अंधी सुरंग में ले जा रहे हैं। ये युवा भारत में लोकतंत्र की हवा में श्वास लेते हुए पले-बढ़े हैं, इन्हें यह नहीं पता कि उन्हें कट्टरपंथी आजादी के नाम पर जो सुनहरे सपने दिखा रहे हैं, वह इनको कितना घोर रक्तरंजित मध्यकालीन अंधकार में डूबी असभ्य दुनिया में ले जाने वाला है।
एक दिन मेरे साथ सफर करते हुए दो यात्री मुझ पर हुई पत्थरबाजी पर बहस करते हुए कह रहे थे कि अनेक बार, खासकर बिहार, उत्तरप्रदेश, दिल्ली आदि से गुजरनेवाली रेल में लाइन के बगल में खेलते-खड़े बच्चे बिना किसी कारण के ही पत्थरबाजी कर देते हैं, इससे लोगों की जान-माल और सरकारी संपत्ति का भारी नुकसान होता है, परंतु जब आप देश के दूसरे क्षेत्रों, खासकर दक्षिण भारत से गुजरने वाली रेल के सफर में अकसर देखने को मिलता है कि बच्चे बाय-बाय करते और शुभकामनाएँ देते हुए मिलेंगे। दूसरे ने उनसे काफी हद तक सहमति जताते हुए जोड़ा कि ऐसा नहीं है, यहाँ भी अनेक बार स्वागत करते मिल जाएंगे। कोई भी बच्चा माँ के पेट से तो ढेला फेंकना सीखकर आता नहीं, इसके लिए उसका परिवार तथा माता-पिता द्वारा दिए जा रहे संस्कार, समाज जिसमें वह पल रहा है, उसके नैतिक मूल्य तथा उसकी शिक्षा जिम्मेदार है।
आगे बढ़ती वन्दे भारत सोचती है, कुछ साल पहले ही तो भारतीय रेल का क्या बुरा हाल था, हर तरफ रेल से लेकर हर स्टेशन पर कैसी गंदगी का अंबार था, लेट-लतीफी से यात्रियों का हाल बुरा था। दुर्घटनाओं और लूट-खसोट की कोई सुनवाई नहीं, किसी की जिम्मेदारी तय नहीं। रेल मंत्रालय को एक दुधारू गाय समझकर इस मंत्रालय पर हर नेता की नजर रहती, रेलमंत्री इसके बजट में सिर्फ नई रेल की घोषणा करते, अपने चहेतों को ठेके और नौकरी बाँटते, जिसमें जमकर भ्रष्टाचार होता। परिणाम यह हुआ कि रेल दौड़ना तो दूर, रेंगती हुई विलंब से गंतव्य तक पहुंचती। ऐसे माहौल में बुलेट रेल, और हाईस्पीड रेल की बात ही क्या, सेमी हाईस्पीड रेल भी उनके लिए सपना ही था। केन्द्र सरकार की संकल्प शक्ति, कार्यक्षमता के कारण अपने ही देश में मेक इन इंडियाके तहत बनी मैं सेमी हाईस्पीड वंदे भारत रेलवे ट्रैक पर फर्राटे भर रही हूँ, कुछ महीनों में मेरी अनेक सखियाँ भी देश के कोने-कोने में द्रुत लय-ताल मिलएँगी और मुझे पूरा विश्वास है कि 2022 तक बुलेट रेल हवा से बातें करने लगेगी।
शरमाती-इठलाती आगे सरपट भागती वह सपनों में खो जाती है, मैं तो वन्दे भारत रेलपूरे भारत को वन्दे भारतकरने के सपने को साकार करने का एक छोटा सा साधन मात्र हूँ, मेरे जैसे हजारों साधन, चाहे वह शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा, कृषि, उद्योग, पर्यावरण जैसे अनेक संसाधनों की कड़ियाँ जब जुगलबंदी करते हुए तीव्र गति से अपनी सेवा देंगी। भारत का हर बच्चा स्कूल जाएगा। किसान और मजदूरों को मेहनत की पूरी कीमत मिलेगी। बेटियाँ बिंदास होकर अपने सपने को साकार करेंगी। हर युवा को उसकी योग्यता और क्षमता के अनुरूप रोजगार मिलेगा। कोई बुजुर्ग, विधवा या बेवा किसी की मोहताज नहीं होंगी। हर वर्ग निर्भय होकर सम्मान से जीएगा और समय पर सबको इंसाफ मिलेगा। पहाड़ हरे-भरे होंगे, नदियाँ स्वच्छ और स्वतः प्रवहमान होंगी, हर आँगन व हर डाल पर चिड़िया गुंजायमान होंगी और अनगिनत फूल खिलखिलाएँगे। नासमझ पत्थरबाजों को समझाने का प्रयास हो, नकारात्मक प्रगति के रोड़ेबाजों को समय से समुचित सजा मिले। तभी होगा असली वंदे भारत!



सम्मानों का सम्मान
किसी भी पुरस्कार या सम्मान का गौरव तभी तक कायम रहता है, जबतक उसके लिए पारदर्शी व समुचित तरीके से उसके लिए योग्य, साहसी व प्रतिभावान कर्मयोगी व्यक्तियों को सम्मानित करने के लिए चयन किया जाता है। अगर योग्य व्यक्तियों को सम्मानित किया जाता है तो उसका तो मनोबल बढ़ता ही है, देश और समाज भी उससे लाभान्वित और प्रभावित होता है। इसके साथ खुद उस सम्मान का भी सम्मान बढ़ जाता है। हम लंबे समय तक किसी बड़े सम्मान का आदर सिर्फ इसलिए नहीं करते कि वह किसी महान व्यक्ति या बड़ी संस्था से जुड़ा हुआ है। महान व्यक्ति या संस्था का अपना प्रभामंडल होता अवश्य है, परंतु उस सम्मान या पुरस्कार का सम्मान तो लंबे समय तक तभी कायम रहेगा, जबतक उस सम्मान के उद्देश्यों एवं मानदंडो के अनुरूप जनतांत्रिक व पारदर्शी तरीके से व्यक्तियों व संस्थाओं को सम्मानित किया जाएगा। इसलिए सम्मानित करने वालों को कभी यह नहीं भूलना चाहिए कि किसी को सम्मानित कर वे सिर्फ उसे सम्मान दे रहे हैं, बल्कि योग्य एवं उचित व्यक्ति को सम्मानित कर खुद वह सम्मान भी सम्मानित होता है और अपनी प्रतिष्ठा व प्रभाव में चार चाँद लगाता है।
इस मायने में हर वर्ष 26 जनवरी की पूर्व संध्या पर घोषित किए जाने वाले पद्म पुरस्कारों को परखने का यह सही समय है। देश में यह पुरस्कार 1954 से दिए जा रहे हैं। बीते 65 सालों में देश के 4 हजार 417 नामी व्यक्तियों को सम्मानित किया जा चुका है। इन पुरस्कारों के लिए नामों के चयन की एक लंबी प्रक्रिया है। पात्र व्यक्तियों से उनके आवेदन अनुशंसाओं के साथ कलेक्टर के माध्यम से केंद्र सरकार को भेजे जाते हैं। अनुशंसित नामांकन पद्म पुरस्कार समिति के समक्ष रखे जाते हैं। समिति अपनी सिफारिशें प्रधानमंत्री को भेजती है। वहाँ से अंतिम मुहर के लिए सूची राष्ट्रपति के पास भेजी जाती है।
पद्म पुरस्कारों के शुरुआती दौर में सम्मानित ज्यादातर हस्तियाँ वे थीं, जिन्होंने अपना जीवन किसी विशिष्ट क्षेत्र में बिना किसी लोभ या लाभ के राष्ट्र सेवा में खपा दिया था। पहली सूची में जो 23 नाम थे, उनमें प्रख्यात वैज्ञानिक होमी जहाँगीर भाभा, शांति स्वरूप भटनागर, मूर्धन्य कवि मैथिलीशरण गुप्त, नामी शायर जोश मलीहाबादी, जनरल केएस थिमैया, सुप्रसिद्ध गायिका एमएस सुब्बालक्ष्मी आदि शामिल थे। लेकिन धीरे-धीरे पद्म पुरस्कार प्रतिभाओं के सम्मान के साथ निजी पसंद और राजनीतिक प्रतिबद्धता ही मुख्य आधार बनते गए। इसीलिए पद्म पुरस्कारों पर विवादों की घटा छाने लगी। कई ऐसे लोग भी राजनीतिक जोड-तोड़ के बल पर पद्म पुरस्कार पाने लगे, जो किसी साधारण पुरस्कार के भीे काबिल न थे। नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए सरकार आने के बाद यह बात भी उठी कि लगातार अनेक ऐसे लोगों को यह सम्मान मिलता रहा है, जो कि इसके योग्य नहीं हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि हमें देश में विविध क्षेत्रों में निष्काम भाव से काम कर रहे उन अलक्षित (अनसंग हीरो) नामों को ढूँढ़कर पुरस्कृत करना चाहिए। इस सरकार ने पद्म पुरस्कारों के लिए व्यक्ति चयन और आवेदन में एक महत्त्वपूर्ण बदलाव किया। दो साल पहले ऑनलाइन आवेदन शुरू हुए और कुछ ऐसे चेहरों को पद्म पुरस्कार मिले, जिसके बारे में उन्होंने खुद भी नहीं सोचा होगा। ऑनलाइन आवेदनों का रास्ता खुलने का नतीजा है कि वर्ष 2019 के पद्म पुरस्कारों के लिए अंतिम तिथि 15 सितम्बर, 2018 तक कुल 49,992 आवेदन मिले हैं, जो वर्ष 2010 में प्राप्त नामांकनों की अपेक्षा 32 गुना ज्यादा हैं। उस वर्ष 1313, तो वर्ष 2016 में 18768 और वर्ष 2017 में 35595 नामांकन प्राप्त हुए थे।
इस वर्ष पूर्व राष्ट्रपति व राजनेता प्रणब मुखर्जी, उनके साथ ही सामाजिक कार्यकर्ता और संघ विचारक नानाजी देशमुख तथा प्रख्यात संगीतकार भूपेन हजारिका को मरणोपरांत भारतरत्न से सम्मानित किया गया है। इन महान विभूतियों को सम्मानित कर सरकार ने पूरे देश को सकारात्मक शुभ संदेश दिया है। इसके अलावा पद्म पुरस्कारों में अधिकांश अचर्चित कर्म योद्धा हैं जिन्होंने समाज सेवा को ही अपनी जीवनचर्या बना लिया है, इनमें 96 वर्षीय वल्लभभाई वसराम हैं, जिन्होंने बिना किसी आधुनिक प्रयोगशाला के ही मधुवन गाजरका विकास किया। वह 65 वर्षों से जैविक कृषि प्रचार में संलग्न हैं। उन्हें पद्मश्री मिला है। ओडिशा की 69 वर्षीय कमला पुजारी ने बीज प्रजाति संरक्षण का बड़ा काम किया है। सुधांशु बिस्वास, 99 वर्षीय स्वतंत्रता सेनानी, जिन्होंने अपना जीवन गरीबों की सेवा के लिए समर्पित कर दिया। बिस्वास पश्चिम बंगाल में स्कूल, अनाथालय और डिस्पेंसरी चलाते हैं।
पद्म सम्मान के लिए इस बार कई ऐसे नायकों को चुना गया है, जो अब तक राष्ट्रीय मीडिया की चकाचौंध से दूर ही थे। इनमें मुजफ्फरपुर की राजकुमारी देवी के घर में बनाए अचार-मुरब्बा के अनेक दिग्गज भी मुरीद हैं। ओडिशा के चाय वाले गुरुजीके नाम से मशहूर डी प्रकाश राव भी इस सम्नान के लिए चुने गए। चाय बेचकर अनाथ और गरीबों को शिक्षा दे रहे हैं। झारखंड में जंगलों की रक्षा में जुटीं जमना टुडू उर्फ लेडी टार्जन भी ऐसा ही एक नाम हैं, जो अनेक विरोधों और खतरों के बावजूद वन संरक्षण में जुटी हुई हैं।
डॉ. स्मिता एवं डॉ. रवींद्र महाराष्ट्र के मेलघाट जिले के उपेक्षित क्षेत्र में 30 साल से कोरकू जनजातियों के बीच सक्रिय हैं। वे गरीबों के बीच प्राथमिक चिकित्सा केंद्र चला रहे हैं। चिकित्सा सेवा की राशि सिर्फ दो रुपये है। एम आर राजगोपाल को भारत में पैलिएटिव केयरका जनक माना जाता है। पैलिएटिव केयरका इस्तेमाल गंभीर रूप से बीमार मरीजों में दर्द कम करने के लिए किया जाता है। इसी तरह 66 वर्षीय एम चिन्ना पिल्लई भी पद्मश्री सूची में हैं। उन्होंने अपने दम पर हजारों महिलाओं के स्वयं सहायता समूह बनाए। बचत और साख की संस्थाएँ बनीं। इसके अलावा भी जमीन से जुड़े और विपरीत परिस्थितियों में समाजसेवा करने वाले अनेक अचर्चित नाम सूची में हैं।
इस वर्ष पद्म सम्मानों से सम्मानित लोगों की सूची और उनके कार्यों को देखकर यही कहा जा सकता है कि इस सम्मान से सम्मानित होकर विविध क्षेत्रों में सेवा कार्य करने वालों का ही मनोबल नहीं बढ़ा है बल्कि पद्म पुरस्कारों का भी पूरे देश और समाज में सम्मान बढ़ा है। 

पुल बनाएँ और बनें भी
पुल सबको जोड़ता है। एक इनसान को दूसरे इनसान से, एक समाज को दूसरे समाज से, गाँव को दूसरे गाँवों और शहर से, प्रदेश को दूसरे प्रदेश से, दूसरे देश से भी। मानव सभ्यता के विकास में पुलों का अहम योगदान है। आधुनिक भौतिक एवं सामाजिक-सामुदायिक विकास का अगर गंभीर अध्ययन किया जाए तो आग के बाद पुलों का ही योगदान ठहरेगा। इसके लिए एकतरफ जहाँ मानव ने दूरदराज के लोगों को पुल बनाकर भौगोलिक दूरियों को मिटाया, वहीं दूसरी तरफ मानव खुद भी पुल बनकर संबंधों यानी रिश्ते-नातों के अंतर्जाल बुनकर जंगली, अराजकतावादी समाज से आधुनिक सामाजिक व्यवस्था तक पहुँचा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार 25 दिसंबर को असम के डिब्रुगढ़ में भारत के सबसे लंबे रेल-सड़क बोगीबील पुल का उद्घाटन किया। इस दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने खुली जीप में सवार होकर एवं पैदल चलकर भी पुल का अवलोकन किया। ब्रह्मपुत्र की तेज और अथाह लहरों के बीच पुल बनाना कोई आसान काम नहीं था। उसका महत्त्व इससे भी समझा जा सकता है कि यह देश का सबसे लंबा पुल है, लगभग पाँच किलोमीटर लंबा। यह तकरीबन वैसा ही पुल है, जैसा एक पुल यूरोप में स्वीडन और डेनमार्क के बीच बना है, नीचे रेल की दोतरफा पटरियाँ और ऊपर तीन लेन की सड़क। इसे इतना मजबूत बनाया गया है कि बिना किसी बाधा के यह 120 वर्षों तक साथ निभाता रहेगा।
यह पुल जितना लंबा है, उससे कहीं लंबी इसकी कहानी है। सर्वप्रथम बोगीबील पर पुल बनाने की माँग दरअसल 1962 में चीनी आक्रमणके बाद ही उठी थी। बोगीबील पुल परियोजना साल 1985 में हुए असम समझौते की शर्तों का एक हिस्सा था। इसका शिलान्यास 1997 में उस समय के प्रधानमंत्री एच डी देवेगौड़ा ने किया था। वैसे इसे बनाने का काम ठीक ढंग से 2002 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने शुरू करवाया। 2004 से 2014 तक प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए के कार्यकाल में इस काम में गतिरोध बना रहा, जबकि केन्द्र और असम दोनों जगह कांग्रेस की सरकार थी। 2014 के चुनाव में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का यह पुल बनाने का एक मुख्य वादा था, जो अब साकार हुआ है।
बोगीबील पुल असम और अरुणाचल प्रदेश के लोगों की जिंदगी को तो आसान बनाएगा ही, साथ ही भारतीय सेना के लिए भी आधारभूत सुविधाएं अब सहज उपलब्ध होंगी। सेना की जरूरतों को देखते हुए ही इसको इतना मजबूत बनाया गया है कि इस पर न सिर्फ भारी-भरकम टैंकों की आवाजाही हो सकती है, बल्कि जरूरत पड़ने पर वायुसेना के जेट विमान भी उतारे जा सकते हैं। बोगीबील पुल से कुछ ही आगे भारत और चीन की सीमा है, यानी वह जगह, जहाँ चीन का लपलपाता विस्तारवाद हमेशा से भारत के लिए सिरदर्द बना हुआ है। इस मायने में यह पुल इस क्षेत्र में सेना को मिली एक नई सुविधा ही नहीं, बल्कि उसे एक नया आत्मविश्वास भी देगा।
यह पुल असम और अरुणाचल प्रदेश के पूर्वी क्षेत्र में ब्रह्मपुत्र नदी के उत्तर और दक्षिण तट के बीच संपर्क की सुविधा प्रदान करेगा। इससे अरुणाचल प्रदेश के अंजाव, चंगलांग, लोहित, निचली दिबांग घाटी, दिबांग घाटी और तिरप के दूरस्थ जिलों को ही लाभ नहीं होगा बल्कि उत्तर-पूर्व क्षेत्र के लिए एक जीवनरेखा के रूप में कार्य करेगा। यह न केवल डिब्रुगढ़ और अरुणाचल प्रदेश की राजधानी ईटानगर के बीच 150 किलोमीटर सड़क का फासला कम करेगा। पहले धेमाजी से डिब्रुगढ़ की 500 किलोमीटर की दूरी तय करने में 34 घंटे लगते थे, अब यह सफर महज 100 किलोमीटर का रह जाएगा और 3 घंटे लगेंगे। डिब्रुगढ़ से दिल्ली के बीच रेलयात्रा में कम से कम तीन घंटे का समय कम कर देगा यानी दिल्ली भी इसके दिल के ज्यादा करीब होगी।
सरकार यातायात, व्यापार, संचार के लिए पुल का निर्माण कर सकती है, यानी साधन मुहैया तो करा सकती है परंतु लोगों के दिलों को जोड़ने का पुल तो व्यक्ति और समाज को ही बनना और बनाना पड़ेगा। आधुनिक समय की सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि संचार के विविध पुल विकसित हो गए हैं और लगातार हो रहे हैं, परंतु समाज या रिश्तों को जोड़ने वाले सारे पुलों को हम खुद नेस्तनाबूद करते जा रहे हैं। कहीं जाति-संप्रदाय के नाम पर, तो कहीं क्षेत्र, भाषा एवं संस्कृति के नाम पर लोगों के बीच दूरियाँ बढ़ रही हैं। आज देश, प्रदेश, शहर, कस्बा, गाँव ही नहीं, हर घर में सारे रिश्तों के बीच भी दरारें बढ़ती जा रही हैं। कहने के लिए तो हर आदमी के पास ऐसा साधन है, जो बटन दबाते ही अपनों के सारे गिले-सिकवे दूर कर गले लग सकता है, मिनटों या कुछ ही देर में दूसरे के करीब पहुँच सकता है। परंतु अपनी झूठे अहं के कारण इतनी दूरियाँ बढ़ चुकी हैं कि वह सबकुछ होते हुए भी घुट-घुटकर मरने को अभिशप्त है। आज वह सोशल मीडिया के माध्यम से हजारों-लाखों लोगों से जुड़ा है, परंतु फिर भी नितांत अकेला है। हमने सामाजिक-मानवीय रिश्तों के हर व्यक्ति, हर संस्था को ध्वस्त कर दिया है और करते जा रहे हैं, जो मानवीय संबंधों के पुल का काम करते थे। जिसके कारण विविध भौतिक संसाधन होने के बावजूद अधिकांश व्यक्ति, परिवार, समाज अनेक सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक समस्याओं एवं संघर्षों में फँसकर हिंसा और विघटन से त्रस्त हैं।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बोगीबील पुल को राष्ट्र को सोंपकर क्षेत्रीय दूरियों को पाटने के लिए एक बहुत बड़ा कदम उठाया है। इस क्षेत्रीय दूरी के कारण ही उत्तर भारत एवं देश के अन्य भागों से पूर्वोत्तर भारत की दूरी बहुत ज्यादा लगती थी। ढोला-सादिया पुल के बाद बोगीबील पुल बन जाने से यह भौगोलिक दूरी काफी कम हो गई है। हमें इसी के साथ मानवीय संबंधों के पुल को भी इतना मजबूत करना पड़ेगा कि वो सांप्रदायिकता, जातीयता, क्षेत्रीयता और भाषाओं के नाम पर पैदा किए जाने वाली दरारों को पाटकर पूरे समाज और देश को एकता की डोर से जोड़ दे। सभ्यता की प्रगति के लिए पुल बनाना बहुत जरूरी है, साथ में पुल बनना भी, ताकि हम पूरे समाज और संसार को एक-दूसरे से जोड़ते रहें और जुड़े रहें।



माँ से मिला दो!
दस साल का मासूम जुबैल उ.प्र. के एटा से साइकिल लेकर दिल्ली के लिए निकल पड़ा। साढ़े तीन घंटे में 35 किलोमीटर सिकंदराराऊ रेलवे क्रॉसिंग तक आते-आते थककर चूर हो गया। उसके बाद उसकी हालत साइकिल चलाने लायक नहीं रही। उसे अब आगे जाने की कोई तरकीब नहीं सूझ रही थी। भूख-प्यास से व्याकुल मासूम रुआंसा होकर एक ई-रिक्शा चालक के पास गया और अपने पास के जमा पूंजी पाँच रुपये देकर बोला, ‘अंकल, आप मुझे मेरी माँ के पास दिल्ली तक छोड़ दोगे। मैं अपनी माँ से दो साल से नहीं मिला हूँ।
ई-रिक्शा चालक उसकी बातें सुनकर परेशान हो गया। वह बच्चे को लेकर कोतवाली पहुँचा और प्रभारी निरीक्षक मनोज कुमार शर्मा को सौंप दिया। शर्मा ने बच्चे को उसके पिता मोहम्मद महफूज को सुपुर्द कर दिया। मोहम्मद महफूज निवासी कांशीराम टाउनशिप, एटा का पहली पत्नी से पाँच वर्ष पूर्व तलाक हो चुका है। वह दिल्ली में रहती है। मोहम्मद महफूज एवं उसकी पहली पत्नी ने दूसरी जगह शादी करके अपनी अलग दुनिया बसा ली है। पहली पत्नी से हुए तीन बच्चे अपने पिता के पास ही रहते हैं। महफूज की दूसरी पत्नी से भी एक पुत्र है। पहली पत्नी अपने बच्चों से मिलने करीब दो वर्ष पूर्व आई थी। जुबैल एटा के रानी अवंतीबाई पब्लिक स्कूल में दूसरी कक्षा का छात्र है। उस दिन वह सुबह सात बजे घर से अपनी साइकिल पर स्कूल के लिए निकला था, लेकिन उसके मन में अपनी माँ से मिलने की धुन सवार थी। यह सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि जुबैल ने अपने माँ-बाप के तलाक के बाद अपने आप को कितना अकेला महसूस किया होगा, बेचैनी में कितनी रातों तक वह सोया नहीं होगा, वह अकसर अपने पिता से माँ से मिलाने को कहता रहा।
एक बच्चा जैविक, भौतिक एवं मानसिक अपनी हर आवश्यकताओं के लिए माँ की ओर ही देखता है और माँ उसकी भाषा एवं मनोभावों को समझकर उसकी सारी आवश्कताओं को पूरा करती है। कभी उसे भूख भी लगती है तो वह हमेशा बोलकर नहीं माँगता बल्कि दूसरे बहाने कर-करके रोता है, माँ उसकी मानसिकता को पढ़कर कभी लाड़ से तो कभी डाँटकर खिलाती है। इस उम्र में दुनिया-जहान के बेशुमार प्रश्न उसके जेहन में पैदा होते रहते हैं, वह अपने माता-पिता से ही सहज समाधान पाता है। अनेक आवश्यकताओं के अलावा उसे नींद भी माँ की ही थपकी से आती है और माँ-बाप के सुरक्षा कवच के अंदर सपनों की दुनिया में खो जाता है। एक बच्चे का पूरा व्यक्तित्व उसके माता-पिता के सामूहिक पालन-पोषण पर ही फलित होता है।
जब से हम इस तथाकथित आधुनिकता के भ्रमजाल में फँसे हैं, अपने परिवार और समाज से कटते चले जा रहे हैं। एक समय वह भी था, जब बच्चा अपने माता-पिता से ज्यादा दादा-दादी, नाना-नानी, चाचा-चाची, मामा-मामी एवं बुआ-मौसियों से भरे घर में पलता और बढ़ता था, परंतु धीरे-धीरे, खासकर शहरी समाज में सबसे कटता-सिकुड़ता बच्चा सिर्फ अपने माँ-पिता के बीच का होकर रह गया; अब तो स्थिति यह हो गई कि बच्चे को अपने माँ या बाप से भी बिछुड़कर घुट-घुटकर जीना पड़ रहा है। जुबैल जैसे मुस्लिम बच्चों की त्रासदी का तो क्या कहना, जिसने तलाक के बाद माँ को भी खोया और बाप की नई शादी के बाद पिता को भी। नई शादी के बाद बाप भी वैसा कहाँ रह पाता है, जिस लाड़-प्यार का वह आदी रहता आया है।
माँ-बाप सिर्फ अपने-अपने निजी स्वार्थ, जरूरतों या एक-दूसरे से बदले की भावना के वसीभूत होकर तलाक ले लेते हैं और अपने मासूम बच्चों को उनके मूलभूत अधिकारों से वंचित कर उसे अकेलेपन से जूझने के लिए छोड़ देते हैं। बच्चा अकेलेपन में अंदर-अंदर टूटता-बिखरता रहता है और एक भग्न हृदय और भग्न मस्तिष्क वाला व्यक्तित्व तैयार होकर समाज के बीच आता है, जिसके कारण हिंसा के अनेक रूप नित नए रूप में सामने आते हैं।
कुछ वर्ष पहले ऑस्ट्रेलिया में वहाँ के लोगों के ज्यादा हिंसक होने पर एक शोध कराया गया था, उसका निष्कर्ष था कि ऑस्ट्रेलिया के द्वीपों पर जब ब्रिटेन ने 17वीं और 18वीं शताब्दी में वहाँ के मूल निवासियों को खदेड़कर कब्जा किया तो वहाँ ब्रिटेन के लोगों को बसाना प्रारंभ किया, जिसमें बहुत बड़ी संख्या में अपने माँ-पिता से अलग कर बच्चों को भी जबरन बसने भेज दिया गया था। अपने माता-पिता एवं सगे-संबंधियों से बिछुड़कर वे हिंसक होते चले गए, वहाँ के मूल आदिवासियों के ऊपर अनेक अत्याचार किए। उनका हिंसक मनोभाव सदियों बाद अनेक पीढ़ियों के बाद उनके अभी के वंशज भी इसी प्रवृत्ति से मुक्त नहीं हो पाए हैं।
हम एक ऐसे हत्यारे समय में जीने को अभिशप्त हैं, जहाँ हर घड़ी मीडिया में वीभत्स तरीके से नृशंस हत्याएँ परोसी जा रही हैं। कहीं कोई किशोर अपने माता-पिता की हत्या कर रहा है, तो कहीं बाप ही मासूम बच्चों समेत पूरे परिवार का खात्मा कर रहा है, कोई पति अपनी पत्नी की हत्या कर रहा है तो कहीं पत्नी ही अपने पति को सुपारी देकर मरवा रही है। व्यापार, राजनीति, आपसी रंजीश, रोडरेज, और पार्किंग के लिए आए दिन होने वाली हत्याएँ तो आम हैं। हमारी संवेदनाएँ इतनी कुंद होती जा रही हैं। हम मुश्किल से ठहरकर इन सब के पीछे के कारणों पर गहराई से सोच पाते हैं कि हिंसा के अनेक कारणों में से एक बहुत बड़ा कारण परिवार के हिंसक माहौल में बच्चों का पालन-पोषण है।
सदियों पहले ब्रिटेन ने अपने देश के बच्चों को उनके माता-पिता और घर-समाज से अलग कर ऑस्ट्रेलिया के द्वीपों में वहाँ के आदिवासियों को उजाड़ते हुए हिंसा का जो बीज-वपन उनमें किया, कई पीढ़ियों के बाद हिंसा की वह विषबेल आज भी फल-फूल रही है। हमारे बच्चे पहले संयुक्त परिवार और अब माता-पिता से भी विलगित होकर जिस उदास-उजाड़ टापू में पलने को अभिशप्त हो रहे हैं, वह हमारे समाज रूपी समुद्र में नित नए हिंसक ज्वार ला रहा है और परिवार का पूरा ताना-बाना बिखर रहा है। मासूम जुबैल दिल्ली तक दस्तक देने का प्रयास करते हुए मिन्नतें कर रहा है कि मुझे मेरी माँ से मिला दो, मेरा हँसता-खेलता बचपन बचा लो!