Tuesday, December 8, 2015

दिल्ली की सड़कों पर मुर्गियां और साइकिल चालक

गाजियाबाद से दिल्ली (आनंद विहार) में प्रवेश करते ही जाम से बुरा हाल हो जाता है। जाम में फंसे हुए बहुत कुछ दिखता है। दो चीजें जो खास ध्यान खींचती है वे है ठेले या टेम्पो में पिंजड़ों में बंद भीगे-भीगे से, लदे-फदे दाने ढूंढती या अपने आप में खोए, उदासीन ऊंघती, ऊबती, डूबती सी मुर्गियां और बड़े-बड़े कारों वाले, बसों वाले तथा सबसे ज्यादा पुलिस वालों की घृणा का पात्र बनते तथा जान को खतरे में डालते हुए अपने धुन में रोजी-रोजगार के लिए चलते साइकिल चालक। दोनों को देखकर मन में समान भाव से निरीहता का भाव जगता है। दोंनो कितने मजबूर, समाज के लिए कितने सदुपयोगी पर सड़कों पर दोनों घृणा के पात्र।
इन मुर्गियों को इसलिए पैदा किया जाता है कि ये जल्दी से जल्दी बढ़ें ताकि इसके लजीज मांस को स्वाद ले लेकर खाया जा सके। यह लोगों के लिए कोई जीव नहीं महज एक स्वाद है। भोज्य पदार्थ है। साग सब्जियों की तरह बल्कि उससे बदतर हालत में इन मुर्गियों को रखा जाता है। अब जैसे हर मौसम में रासायनिक खादों तथा बायोटेक बीजों के माध्यम से मंडियों के लिए ज्यादा से ज्यादा खेती की जाती है। इनको भी मांस के लिए ऐसे खाद्य पदार्थ खिलाए जाते है ताकि जल्दी इनका वजन बढ़ें, ये मुर्गियां भी दिन-दुनिया से बेपरवाह हमेशा दाना ही चुगती रहती हैं मानो इन्होंने प्रण कर लिया हो कि हम तब तक खाते रहेंगे जब तक कि कोई दूसरा प्राणी हमें खा न ले। इन्हें गंदे दड़बों से निकालकर छोटे से छोटे पिंजरों में ठूस दिया जाता है और लाद कर हलाल के लिए ले जाया जाता है। 
अब दिल्ली की सड़को पर साइकिल की सवारी समाज के हाशिए पर रहने वाले लोग ही करते हैं। इसमें भी दो तरह के लोग हैं एक तो वह जो कि इतना कम कमाते हैं कि यहां की बसों की सवारी भी नहीं कर सकते और दूसरे वे जिसकी साइकिल से ही रोजी रोजगार चलता है। साइकिल से ही सब्जी, सस्ते दामों पर रेडीमेड कपड़े, दरी आदि गली-गली बेचना, पान, बीड़ी-सिगरेट दुकान-दुकान पहुंचाना, कुकर, सिलाई मषीन आदि ठीक करना। अनेकों प्रकार की सेवाएं घर बैठे ही सस्ते दामों पर प्रदान करते है। अगर ये सेवाएं देना बंद कर दंे तो अच्छे-अच्छों का जीना दूभर हो जाए। परंतु जब यह अपनी जान हथेली पर रखकर दिल्ली की दानवी सड़कों पर चलता है और दुर्घटनाओं का शिकार बनता है तो हर तरफ से हिकारत और अपमान का ही भाव झेलना पड़ता है वह कुछ इन शब्दों में फुटता है- अबे आत्महत्या ही करनी थी तो घर कौन सा बुरा था... या....मेरी ही गाड़ी के आगे मरना था... इत्यादि। पुलिस की भी इनके दुर्घटनाओं पर कुछ ऐसा ही भाव होता है- साला दिल्ली कि सड़को पर साइकिल की सवारी करेगा तो मरेगा ही इसमें कोई क्या कर सकता है ....।
यहां मेट्रो से लेकर ए.सी. बसें तक चलाई जा रही हैं। परंतु दिल्ली तथा इसके आस-पास की एक चौथाई जनसंख्या क्या इस हालत में है कि इसमें सफर कर सके? या साइकिल पर आधारित अपनी रोजगार चला सके? परंतु  सरकार को इस तबके की चिंता है ही कितनी? वह तो चाहती है कि जितना जल्दी हो यह वर्ग यहां से उजड़कर कहीं और चली जाए ताकि वह इसे सुखी-समृद्ध लोगों का साफ सुथरी दिल्ली बना सके। सरकार कभी न्यूयार्क की ट्रैफिक व्यवस्था तो कभी लंदन की व्यवस्था लागू करना चाहती है। इनसे यही निवेदन किया जा सकता है कि दिल्ली को भारत की राजधानी ही रहने दिया जाए जिसमें हर वर्ग के लोगों के लिए रहने, रोजगार करने और सुरक्षित आने-जाने की आजादी हो।
एक सीधी-सरल बात दिल्ली के प्रबुद्ध नीति नियंताओं की समझ में क्यों नहीं आती है कि लगातार चौड़ी होती दिल्ली की सडकों में अगर एक साइकिल लेन बना दीया जाए और थोडी कड़ाई से इस पर अमल किया जाए ताकि इस पर सिर्फ साइकिल वाले ही चलें तो सिर्फ यह गरीब तबका ही लाभान्वित नहीं होगा बल्कि सभी वर्गों के लोग साइकिल की सवारी करना चाहेंगे, जिसमें बढ़ते किराये से परेशान निम्न मध्यम वर्गों के लोग, स्कूलों और कॉलेज के विद्यार्थी से लेकर वह वर्ग भी जो किलो के भाव से वजन घटाने के चक्कर में तथाकथित हैल्थ क्लबों या जीम की शरण में जाता है। प्रदूषण से मुक्ति तो मिलेगी ही मिलेगी।

पिछले सप्ताह गाजीपुर मोड़, जहां से आनन्द विहार के लिए सड़क मुड़ती है एक साइकिल चालक सड़क के किनारे किसी वाहन से टकराकर हाथ-पांव फेंक रहा था। मानो कसाई ने किसी मुर्गी को अभी-अभी जिबह कर टीन के डिब्बे में स्थिर होने के लिए बंद कर दिया हो और लहुलुहान मुर्गी अपने प्राणांतक पीड़ा से पूरे डिब्बे में उथल-पुथल मचा रही हो, परंतु कसाई इससे बेपरवाह ग्राहकों को निपटाने में मशगूल हो। पास ही उसका मुड़ी-तुड़ी साइकिल और कुकर, गैस चूल्हा, सिलाई मशीन इत्यादि ठीक करने वाला सामान बिखरा पड़ा था। हर कोई अपनी गति से अपने घर को लौट रहा था। हमारी बस भी आगे बढ़ गई ......!

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