Thursday, December 31, 2015

विरुद्धों से सामंजस्य
हाल के दिनों में, ठीक बिहार विधानसभा के चुनाव के दौरान मीडिया और बुद्धिजीवियों का एक खास तबका यह साबित करने पर तुला हुआ है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की केन्द्र सरकार और उनकी पार्टी की नीतियों सेे देश में अचानक असहिष्णु एवं हिंसक माहौल बन गया है। इसमें विचारों की स्वतंत्रता, स्वतंत्र साहित्य, कला, तर्क और ज्ञान-विज्ञान की जगह सिकुड़ती जा रही है। हालात बड़ी तेजी से बेकाबू हो रहे हैं कि लेखकों, कलाकारों के लिए सकारात्मक-रचनात्मक कुछ कर पाना संभव नहीं रह गया है। इसके विरोध के लिए उन्होंने जिस मार्ग को चुना वह एकतरफा राष्ट्रीय सम्मानों की वापसी की है। 
ऐसी स्थिति में प्रधानमंत्री के सामने दो ही रास्ते थे एक तो यह कि वे बिहार विधानसभा के चुनावी भाषणों में ही चीख-चीखकर इस आरोप पर भी सफाई देते रहते। दूसरा, चुप रहते हुए इसे चुनावी विवादों से परे मानते हुए परिपक्वता से एक ऐसा संदेश देते कि देश और दुनिया में बनाये जा रहे इस कृत्रिम प्रदूषित धुंधलके को छंटने में सहायक हो।
उन्होंने दूसरा रास्ता चुना और जगह भी संसदीय जनतंत्र की जननी माने जाने वाले स्थान लंदन को। उन्होंने दो व्यक्तित्व भी ऐसे चुने जो भारत के आलोचनात्मक विवेक और जनतंत्र के पुरोधा माने जाते हैं। ऐसे दो महान व्यक्ति हैं भारतीय संविधान के निर्माता डॉ. भीमराम अंबेडकर तथा 12वीं शताब्दी में ही संसदीय जनतंत्र के विचारों के अलख जगाने वाले संत बसवेश्वर। इन दोनों की प्रतिमा तथा स्मारक का अनावरण एवं लोकार्पण करते हुए उन्होंने शंकाग्रस्त बुद्धिजीवियों तथा बयानवीर पुरातनपंथियों दोनों को सीधा संदेश दिया कि भारत आज भी इन्हीं महान लोगों के विचारों के साथ खड़ा है जो अंधविश्वास, अंधश्रद्धा, धार्मिक पाखंड, जात-पात, छुआछूत का विरोध करते हुए अपने समय में बागी बन गए थे।
संत बसवेश्वर (वर्ष 1134-1168) का काल सभी तरह के संकीर्णताओं से आक्रांत था। बसवेश्वर बीच-बाजार और चौराहे के संत थे। वे आम जनता से अपनी बात पूरे आवेग और प्रखरता के साथ करते थे। जाति रहित समाज की स्थापना करने और भेदभाव तथा छुआछूत मिटाने के लिए उन्होंने ऊंची जाति ब्राम्हण कन्या रत्नाका विवाह नीची दलित, अस्पृश्य शीलवंतनामक युवक से करवाया। जिसका मूल्य उन्हें अपने सबसे प्रिय शिष्य के बलिदान से चुकाना पड़ा था। उन्होंने उसी काल में आदर्श संसद (अनुभव मंटप) का निर्माण किया था जिसमें पुरुष और महिलाएं तथा समाज के सभी वर्ग एवं जाति के लोगों की समान संख्या में भागीदारी थी और वे खुले वातावरण में बहस को प्रोत्साहित करते थे। जिसका रूप आज हमें संसदीय लोकतंत्र के रूप में हमें देखने को मिला है।
लंदन में प्रधानमंत्री ने संविधान निर्माता और दलितों के मसीहा डॉ. अंबेडकर को समर्पित स्मारक का उद्घाटन किया। ब्रिटेन प्रवास के दौरान एक छात्र के रूप में 1920 के दशक में डॉ. अंबेडकर इसी इमारत में रहा करते थे और भारत ने अभी दो महीने पहले ही इस बंगले को अधिग्रहित किया है। आज भारतीय जनतंत्र इस बात पर इतराता है कि उसके संविधान के निर्माण के लिए एक ऐसा व्यक्ति मिला जिसने पूरी दुनिया की तमाम संविधानों की अच्छाइयों को लेकर भारत का संविधान बनाया। समानता, न्याय तथा विविधता जैसी जनतंत्र की तमाम खूबियों को सामंजस्य के संविधान के प्रावधानों में डाला। इसी का परिणाम है कि भारतीय लोकतंत्र पर आपातकाल लादने जैसी अनेक बाधाओं के बाद भी दिनों-दिन भारत में जनतंत्र की जडें़ मजबूत होती रही हैं। समाज की सभी जातियों, समुदायों एवं वर्गों का प्रतिनिधित्व राजनीति एवं समाज के हर क्षेत्र में लगातार बढ़ रही है।
आज का भारत बनने का इतिहास राजनीतिक, धार्मिक एवं सामाजिक रूप से अनेक प्रकार के उथल-पुथल, आपदाओं, विपदाओं, अनेक संकटों एवं संघर्षों के बीच से गुजरते हुए लोकतांत्रिक भारत बनने की कहानी रही है। इसमें बुद्ध, महावीर के उपदेशों, भक्तिकाल के अनेक संतो एवं कवियों के अनमोल विचारों, ज्योतिबा फुले, राजाराम मोहन राय स्वामी दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद, ईश्वरचंद विद्यासागर जैसे समाज सुधारकों तथा गांधी, तिलक एवं अंबेडकर जैसे अनेक स्वतंत्रता सेनानियों, क्रांतिकारियों एवं संविधानविदों के अनथक प्रयासों के फलस्वरूप ही हमें स्वतंत्र लोकतांत्रिक भारत मिला है।
इसका यह कदापि अर्थ नहीं है कि हमारे देश एवं समाज में सबकुछ ठीक ठाक है या हम एक आदर्श लोकतंत्र को प्राप्त कर चुके हैं। आज भी हम जातिवाद, धार्मिक उन्माद, लैंगिक भेदभाव, अंधविश्वास, भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद जैसे अनेक लोकतांत्रिक मर्यादाओं के विरुद्ध जाने वाले इन समस्याओं के निकृष्टतम एवं घृणित रूप से न केवल दो-चार होते रहें हैं, बल्कि कभी-कभी तो हमारे समाज में ऐसी घटनाएं घटित होती रहती हैं कि शक होने लगता है कि हम एक लोकतांत्रिक देश और समाज हैं भी की नहीं? ऐसे ही समय में तमाम लोकतांत्रिक संस्थाओं को कसौटी पर खरे उतरने एवं लोकतंत्र एवं संविधान के अनुरूप फैसले करने का समय होता है। हमारे बौद्धिक वर्ग को भी परखने का यही समय होता है कि वे अपने आलोचनात्मक विवेक से बिना किसी जाति, जाति, धर्म, सत्ता एवं दल के दवाब में आए देश के सुप्त पड़ी जनता की आवाज को रचनात्मक रूप से मुखरीत करे।             
इन दो महान विभूतियों अंबेडकर और बसवेश्वर के विचारों को मुखर अभिव्यक्ति देकर प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने देश के अंदर और बाहर के तमाम लोगों को साफ संदेश दिया है कि वे खुद और उनकी सरकार देश में आलोचनात्मक विवेक को सम्मान देती है। हमेशा विरुद्धों से सामंजस्य, समन्वय और संवाद के रास्ते खुले रखते हैं। बशर्तें कि सामने वाला भी लोकतांत्रिक मानदंडों के अनुरूप तर्क, आलोचना, विवेचना और संवाद के माध्यम से समाधान की ओर बढ़ने की माद्दा रखता हो।
लोकतंत्र के चौथे स्तंभ मीडिया एवं बौद्धिक वर्ग को सरकार की नीतियों एवं कार्यों पर हमेशा आलोचना, समालोचना एवं प्रश्नाकिंत करते रहना आवश्यक है, परंतु अपने निजी खुन्नस या किसी दल के समर्थन में भेड़िया आया, भेड़िया आया का शोर मचाकर पूरे समाज को भेड़ियाधसान हो जाने के लिए उत्प्रेरित करना हमारे जड़ जमाते जनतंत्र के लिए घातक प्रवृत्ति की परंपरा डाल सकती है। जिसकी परिणति निरपेक्ष एवं लोकतंत्र के प्रहरी माने जाने वाले मीडिया और बौद्धिक वर्ग को सत्ताधारी राजनीतिक दल, विपक्षी दलों या किसी खास वैचारिक गुट के प्रति प्रतिबद्ध या पिछलग्गू हो जाने के लिए मजबूर किया जा सकता है। ऐसी प्रवृति हमारे देश, समाज और लोकतंत्र के लिए मंगलकारी नहीं हो सकता।   


Tuesday, December 8, 2015

दिल्ली की सड़कों पर मुर्गियां और साइकिल चालक

गाजियाबाद से दिल्ली (आनंद विहार) में प्रवेश करते ही जाम से बुरा हाल हो जाता है। जाम में फंसे हुए बहुत कुछ दिखता है। दो चीजें जो खास ध्यान खींचती है वे है ठेले या टेम्पो में पिंजड़ों में बंद भीगे-भीगे से, लदे-फदे दाने ढूंढती या अपने आप में खोए, उदासीन ऊंघती, ऊबती, डूबती सी मुर्गियां और बड़े-बड़े कारों वाले, बसों वाले तथा सबसे ज्यादा पुलिस वालों की घृणा का पात्र बनते तथा जान को खतरे में डालते हुए अपने धुन में रोजी-रोजगार के लिए चलते साइकिल चालक। दोनों को देखकर मन में समान भाव से निरीहता का भाव जगता है। दोंनो कितने मजबूर, समाज के लिए कितने सदुपयोगी पर सड़कों पर दोनों घृणा के पात्र।
इन मुर्गियों को इसलिए पैदा किया जाता है कि ये जल्दी से जल्दी बढ़ें ताकि इसके लजीज मांस को स्वाद ले लेकर खाया जा सके। यह लोगों के लिए कोई जीव नहीं महज एक स्वाद है। भोज्य पदार्थ है। साग सब्जियों की तरह बल्कि उससे बदतर हालत में इन मुर्गियों को रखा जाता है। अब जैसे हर मौसम में रासायनिक खादों तथा बायोटेक बीजों के माध्यम से मंडियों के लिए ज्यादा से ज्यादा खेती की जाती है। इनको भी मांस के लिए ऐसे खाद्य पदार्थ खिलाए जाते है ताकि जल्दी इनका वजन बढ़ें, ये मुर्गियां भी दिन-दुनिया से बेपरवाह हमेशा दाना ही चुगती रहती हैं मानो इन्होंने प्रण कर लिया हो कि हम तब तक खाते रहेंगे जब तक कि कोई दूसरा प्राणी हमें खा न ले। इन्हें गंदे दड़बों से निकालकर छोटे से छोटे पिंजरों में ठूस दिया जाता है और लाद कर हलाल के लिए ले जाया जाता है। 
अब दिल्ली की सड़को पर साइकिल की सवारी समाज के हाशिए पर रहने वाले लोग ही करते हैं। इसमें भी दो तरह के लोग हैं एक तो वह जो कि इतना कम कमाते हैं कि यहां की बसों की सवारी भी नहीं कर सकते और दूसरे वे जिसकी साइकिल से ही रोजी रोजगार चलता है। साइकिल से ही सब्जी, सस्ते दामों पर रेडीमेड कपड़े, दरी आदि गली-गली बेचना, पान, बीड़ी-सिगरेट दुकान-दुकान पहुंचाना, कुकर, सिलाई मषीन आदि ठीक करना। अनेकों प्रकार की सेवाएं घर बैठे ही सस्ते दामों पर प्रदान करते है। अगर ये सेवाएं देना बंद कर दंे तो अच्छे-अच्छों का जीना दूभर हो जाए। परंतु जब यह अपनी जान हथेली पर रखकर दिल्ली की दानवी सड़कों पर चलता है और दुर्घटनाओं का शिकार बनता है तो हर तरफ से हिकारत और अपमान का ही भाव झेलना पड़ता है वह कुछ इन शब्दों में फुटता है- अबे आत्महत्या ही करनी थी तो घर कौन सा बुरा था... या....मेरी ही गाड़ी के आगे मरना था... इत्यादि। पुलिस की भी इनके दुर्घटनाओं पर कुछ ऐसा ही भाव होता है- साला दिल्ली कि सड़को पर साइकिल की सवारी करेगा तो मरेगा ही इसमें कोई क्या कर सकता है ....।
यहां मेट्रो से लेकर ए.सी. बसें तक चलाई जा रही हैं। परंतु दिल्ली तथा इसके आस-पास की एक चौथाई जनसंख्या क्या इस हालत में है कि इसमें सफर कर सके? या साइकिल पर आधारित अपनी रोजगार चला सके? परंतु  सरकार को इस तबके की चिंता है ही कितनी? वह तो चाहती है कि जितना जल्दी हो यह वर्ग यहां से उजड़कर कहीं और चली जाए ताकि वह इसे सुखी-समृद्ध लोगों का साफ सुथरी दिल्ली बना सके। सरकार कभी न्यूयार्क की ट्रैफिक व्यवस्था तो कभी लंदन की व्यवस्था लागू करना चाहती है। इनसे यही निवेदन किया जा सकता है कि दिल्ली को भारत की राजधानी ही रहने दिया जाए जिसमें हर वर्ग के लोगों के लिए रहने, रोजगार करने और सुरक्षित आने-जाने की आजादी हो।
एक सीधी-सरल बात दिल्ली के प्रबुद्ध नीति नियंताओं की समझ में क्यों नहीं आती है कि लगातार चौड़ी होती दिल्ली की सडकों में अगर एक साइकिल लेन बना दीया जाए और थोडी कड़ाई से इस पर अमल किया जाए ताकि इस पर सिर्फ साइकिल वाले ही चलें तो सिर्फ यह गरीब तबका ही लाभान्वित नहीं होगा बल्कि सभी वर्गों के लोग साइकिल की सवारी करना चाहेंगे, जिसमें बढ़ते किराये से परेशान निम्न मध्यम वर्गों के लोग, स्कूलों और कॉलेज के विद्यार्थी से लेकर वह वर्ग भी जो किलो के भाव से वजन घटाने के चक्कर में तथाकथित हैल्थ क्लबों या जीम की शरण में जाता है। प्रदूषण से मुक्ति तो मिलेगी ही मिलेगी।

पिछले सप्ताह गाजीपुर मोड़, जहां से आनन्द विहार के लिए सड़क मुड़ती है एक साइकिल चालक सड़क के किनारे किसी वाहन से टकराकर हाथ-पांव फेंक रहा था। मानो कसाई ने किसी मुर्गी को अभी-अभी जिबह कर टीन के डिब्बे में स्थिर होने के लिए बंद कर दिया हो और लहुलुहान मुर्गी अपने प्राणांतक पीड़ा से पूरे डिब्बे में उथल-पुथल मचा रही हो, परंतु कसाई इससे बेपरवाह ग्राहकों को निपटाने में मशगूल हो। पास ही उसका मुड़ी-तुड़ी साइकिल और कुकर, गैस चूल्हा, सिलाई मशीन इत्यादि ठीक करने वाला सामान बिखरा पड़ा था। हर कोई अपनी गति से अपने घर को लौट रहा था। हमारी बस भी आगे बढ़ गई ......!

Thursday, November 12, 2015

खुल रहे हैं दरवाजे!
पिछली दीवाली के समय हमारे ऑफिस के सामने वाले बच्चों के पार्क में बड़ी तेजी से साफ-सफाई, रंग-रोगन एवं नये-नये झूले, सी-सॉ, स्लाइडर, कुरसियां वगैरह लग रहे थे। ये सब पहले से भी थे, लेकिन बेकार... सारे जस-के-तस धूल खाते। दिनभर पूरा पार्क सुनसान। पिछले आठ सालों में कालकाजी के डी.डी. एवं पी.टी ब्लॉक नई दिल्ली के इस संभ्रांत एवं शक्तिशाली लोगों की कॉलोनी में, यहाँ के बच्चों को इन पार्को में शायद ही कभी खेलते एवं धमाचौकड़ी मचाते देखा होगा। उन्हें जब भी देखा, बड़ी-बड़ी गाड़ियों से स्कूल या कहीं से नौकरों या ड्राइवरों के संग आते-जाते। उस दिन भी अमीरों के इस शगल कि- हर दो-तीन साल में घर के सभी सामान को नये फैशन के हिसाब से बदल दोको मानकर आगे बढ़ जाता, परंतु सामने ही संगीता सिन्हा जी (पाँचवाँ स्तंभ की संपादक) एवं रेजिडेंस वेलफेयर एसोसिएशन की जॉली जी मिल गर्इं। मैंने पूछ ही लिया, यहाँ बच्चे तो खेलते नहीं, फिर इतना कुछ क्यों करवा रही हैं? दोनों ने एक साथ मुस्कराते हुए कहा, कल से देख लीजिएगा! मैंने कहा, चलिए देखते हैं। दूसरे दिन आया तो देखा, पूरा नजारा ही बदला हुआ था। पूरी तरह से सजा-धजा यह एस.बी.आई. चिल्ड्रेन पार्क बच्चों से गुलजार था। सभी के हाथों में मिठाई के पैकेट थे और सभी मस्ती में मशगूल थे। परंतु ये बच्चे इस कॉलोनी की चहारदीवारी के नहीं थे। ब्लॉक का पिछला दरवाजा, जिसके सामने झुग्गियों का लंबा विस्तार है। जहाँ बेचारे बच्चों को खेलने के लिए खतरनाक मुख्य सड़क के सिवा कुछ नहीं, जो कभी-कभी बड़ी दीवारों से या चोरी-छुपे इधर घुसकर आम-जामुन तोड़कर जल्दी से जल्दी भागने की फिराक में रहते थे, के लिए खोल दिया गया था।
अमेरिका मैसाच्यूसेट्स के जूलिया वाइज और जेफ कॉफमैन ऐसे दंपत्ती हैं, जो अपनी कमाई के सिर्फ छह फीसद पर गुजारा कर लेते हैं और बाकी सारी कमाई जरूरतमंदों की सहायता में दान कर देते हैं। जूलिया एक समाजसेविका हैं जबकि जेफ गूगल में सॉफ्टवेयर इंजीनियर। इस दंपत्ती का मानना है कि अपनी जरूरी आवश्यकताओं की पूर्ति के बाद इस दुनिया को ज्यादा बेहतर बनाने के लिए सारी कमाई जरूरतमंदों को दान करके हमें बहुत सकून मिलता है। भारतीय आईटी क्षेत्र के दिग्गज अजीम प्रेमजी ने सॉफ्टवेयर कंपनी विप्रो में अपनी लगभग आधी हिस्सेदारी परोपकारी कार्यों के नाम कर दी है। अजीम प्रेमजी फाउंडेशन वर्षों से विभिन्न राज्य सरकारों के साथ घनिष्ठ साझेदारी में समाज के हासिए पर जीनेवाले घरों के बच्चों की शिक्षा में गुणात्मक सुधार के लिए अभिनव कार्य कर रहा है। पटना सुपर थर्टी के कुमार आनंद ने अपने प्रयास से समाज के ऐसे दबे-वंचित घरों के विद्यार्थियों के लिए आई.आई.टी. जैसे संस्थानों के दरवाजे खोल दिए, जिसकी किसी ने कल्पना तक नहीं की होगी। पटना महावीर मंदिर ट्रस्ट और इसके प्रमुख किशोर कुणाल के अभिनव प्रयास से आज पटना में पाँच अस्पताल, जिसमें महावीर कैंसर अस्पताल भी शामिल है और छठा हृदय रोगों के लिए विशेष अस्पताल जल्द ही प्रारंभ होने वाला है, आम लोगों के लिए चलाया जा रहा है।  इसके अलावा समाज में ऐसी छोटी एवं बड़ी अनेकों पहल समाज के अनेक क्षेत्रों के लोग कर रहे हैं।
इसी महीने सूचना के अधिकार कानून के दस वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में उत्सव समारोह मनाया गया। इस कानून के लागू होने पर आम जनता की लिए सरकार की आलमारियों में फाइलों में बंद अनेक ऐसे दस्तावेजों तक उनकी पहुँच हो गई, जिससे सरकार तथा नौकरशाही के मनमानियों पर बहुत हद तक पाबंदी लगी और शासन में पारदर्शिता आई। इसके अलावा लोगों को सेवा का अधिकार भी मिला है। इधर न्यायपालिका ने भी लोकहित में अनेक फैसले किए हैं। सामाजिक न्याय पीठ की स्थापना एक ऐसा ही अनुठा प्रयास है इसके अंतर्गत महिलाओं, बच्चों एवं उपेक्षित वर्ग से संबंधित समस्याओं को सही समय पर दक्षतापूर्ण निणर्य दिया जा सके, ताकि ये भी समाज में सर उठाकर सम्मान से जी सकें।
उपरोक्त सभी विविध क्षेत्रों में आ रहे सकारात्मक बदलाव की एक झलक मात्र है। यह खुशी की बात है कि सरकार और समाज को यह बात अब तीव्र गति से महसूस हो रही है और अनेक गंभीर प्रयास भी हो रहे हैं। हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि दरवाजे अभी खुलने प्रारंभ हुए हैं, समाज का जो वर्ग इन चहारदीवारियों से सदियों से दूर रहा है, वह एक कौतूहल, डर और उत्सुकता से अंदर प्रवेश करने का प्रयास कर रहा है। दूसरी तरफ इन चहारदीवारियों या सत्ता प्रतिष्ठानों के कर्ता-धर्ता भी आशंका और भय से सहमे हुए हैं। यही कारण है कि सरकार के अधिकारी लोगों को सूचनाएँ मुहैया कराने में अडंगेबाजी लगाते हैं यहाँ तक कि अनेक सूचनाकर्मियों की हत्याएँ भी की गई हैं। पटना महावीर मंदिर जैसे देश में हजारों की संख्या में मंदिर एवं धर्मस्थल हैं, जिनके पास अरबों-खरबों की सम्पत्ति है। विप्रो जैसी सैकडों कंपनियाँ हैं जिनके पास अपार बेकार पड़ा धन है। अगर वे भी स्वास्थ्य एवं शिक्षा जैसे क्षेत्रों में सेवा देकर देश एवं सामान्य मानवी के भविष्य को सँवारने में लग जाएं तो हमारा देश और समाज अभी से ज्यादा सुंदर हो जाएगा।

कालका जी डी.डी ब्लॉक जैसे दिल्ली एवं देश के अनेक शहरों में अनगिनत ऊँची दीवारों एवं सलाखों से बंद ब्लॉक बना दिए गए हैं और करीब-करीब सबके पिछवाड़े में र्झुिग्गयों का विस्तार भी होता है। इन ब्लॉकों के जीवन में गति इन्हीं झुग्गियों के लोगों की सेवाओं पर टिकी है। फिर भी इसमें पलनेवाले बच्चे अपनी नैसर्गिक अधिकार, दौड़ने-खेलने के लिए जगह तक के लिए तरसते हैं। पहले भले कुछ लोगों को इनके प्रवेश देने पर अनेक तरह की आशंकाएँ हो पर साल भर के अपने अनुभव से यही कह सकता हूँ कि झुग्गियों एवं गरीबों के बच्चे भी कम समझदार नहीं हैं। आज तक इन बच्चों ने किसी का कुछ भी नुकसान नहीं किया है न ही कुछ तोड़ा-फोड़ा है। ये खूब मस्ती में खेलते-भागते हैं। हमारे ऑफिस के बाहरी गेट खुला रहने के बावजूद उसके नलके से पानी पीने के लिए भी पूछकर आते हैं। यहाँ के रेजिडेंस ऐसोसिएशन जैसे विश्वास एवं उदारता की जरूरत है। 21वीं सदी जनतंत्र की सदी है इसमें इसमें सिर्फ बाजारों को खोलने से प्रगति नहीं वाला बल्कि दिल, दिमाग और हर बंद ब्लॉकों के दरवाजे खोलने पड़ेगें।              

Saturday, October 3, 2015

सबको सहज सुलभ हो स्वास्थ्य सेवा 
सात साल का अविनाश, छह साल का अमन और 38 वर्षीय हरीश, इन तीनों में समानता सिर्फ यही है कि इन तीनों की जान डेंगू के चपेट में आकर सही समय पर समुचित इलाज नहीं मिलने। एक अस्पताल के इलाज से इनकार करने और दूसरेश्‍ तीसरे, चौथे, पाँचवे, छठे और उससे भी आगे इलाज के लिए भागने तथा अस्पतालों के डॉक्टरों के अमानवीय उपेक्षा के बीच हुई। अविनाश की मौत से उसके माता-पिता को ऐसा सदमा लगा कि दोनों नें एकसाथ एक ऊँची इमारत से छलांग लगाकर जान दे दी। यह तो सिर्फ गिनती के उदाहरण हैं। दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में चक्कर लगाने पर अनेकों दर्द भरी दास्तान और दारुण कोहराम इन दिनों सुनने को मिल रहा है।
डेंगू के कारण राजधानी दिल्ली में अफरातफरी इसलिए ज्यादा मची है कि यह राजधानी है, यह मीडिया तथा प्रबुद्ध लोगों के केन्द्र में है। नहीं तो, हर वर्ष पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और बंगाल में इंसेफ्लाइटिस या जापानी बुखार से हजारों गरीब और दलित के बच्चे मौत के मुँह में समा जाते है। बड़े-बड़े डॉक्टर, विशेषज्ञ और नेता इसे रहस्यमयी बीमारी बताकर, व्याख्यान देकर जिम्मेदारी से मुक्त हो जाते हैं। भारत में अभी भी टीबी से मरने वाले लोग सबसे ज्यादा हैं। हमारे यहाँ प्रसव के दौरान जच्चा-बच्चा की मौतों के आँकड़े बेहद डरावने हैं। दुनिया में बाल-मृत्यु की कुल घटनाओं में एक चौथाई सिर्फ भारत में होती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 55 प्रतिशत शिशुओं की मृत्यु का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष कारण कुपोषण ही है। 
1946 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने हर नागरिक के लिए स्वास्थ्य के अधिकार को स्थापित किया। इसके बाद 1948 में मानवाधिकार घोषणा-पत्र के अनुच्छेद 25 के रूप में इसे शामिल किया गया। सन् 2000 में संयुक्त राष्ट्र ने स्वास्थ्य अधिकार को लेकर कुछ मानक तय किए। ये मानक हैं- उपलब्धता यानी सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाएँ आम लोगों को उपलब्ध हों। इनमें पीने का साफ पानी, साफ-सफाई युक्त अस्पताल, प्रशिक्षित चिकित्साकर्मी और आवश्यक जरूरी दवाएँ। स्वास्थ्य सेवाएँ लोगों की शारीरिक और आर्थिक स्थिति के अनुसार उनकी पहुँच में हों। सभी स्वास्थ्य सुविधाएँ चिकित्सा के नैतिक मापदंडों के अनुरूप हों और अच्छी गुणवत्ता पर आधारित हों।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 47 के अनुसार राज्य अपने लोगों के पोषाहार स्तर और जीवन स्तर को ऊँचा करने तथा लोक स्वास्थ्य के सुधार को लेकर अपने प्राथमिक कर्त्तव्यों को मानेगा... पर यह व्यवस्था राज्य के नीति निर्देशक तत्वों के अर्न्तगत है। जो सिर्फ दिखाने का दांत भर है। देश की न्यायालयों ने अनुच्छेद 21 के तहत दैहिक स्वतंत्रता के संरक्षण के अधिकार को जीवन और स्वास्थ्य के अधिकार के साथ जोड़कर मानव की गरिमा और सम्मान के साथ जीने का अधिकार माना है। इस कानूनी व्याख्या के बावजूद गरीब का जीवन हर समय मौत के आगोश में है।
केन्द्र सरकार ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति- 2015 के जिस मसौदे पर जनता की राय माँगी है उसके अनुसार आने वाले दिनों में चिकित्सा देश के नागरिकों का मौलिक अधिकार बन जाएगी। सिद्धांततः यह क्रांतिकारी बात है। पिछली यूपीए सरकार के दस साल के शासन के दौरान पहले पाँच साल में स्वास्थ्य मंत्री आर. रामदास एम्स के डॉक्टरों और वहाँ के विधार्थियों से सिर्फ इस बात पर उलझे रहे कि एम्स के विद्यार्थियों को अपने शिक्षा के दौरान गाँवों में सेवा देना अनिवार्य हो या नहीं, जबकि दूसरे पाँच साल के दौरान स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद गाँव के एमबीबीएस के लिए तीन वर्षीय कोर्स बनाने और वह लागू कैसे हो, इसी जद्दोजहद में लगे रहे। यूपीए सरकार और योजना आयोग इस ऊहापोह से उबर नहीं पाया कि स्वास्थ्य क्षेत्र में सरकारी बजट बढ़े या निजी अस्पतालों को बढ़ावा दिया जाए। इस बीच आम लोग अनेक तरह की बीमारियों की चपेट में आ-आकर मरते रहे। पूर्वी उत्तर प्रदेश में जापानी बुखार से मरते पीड़ित परिवार के लोग यूपीए अध्यक्षा सोनिया गांधी को रक्त से लिखे अनेकों पत्र भेजते रहे। पूरे देश में निजी अस्पतालों के स्वास्थ्य सेवा की लाभ की फसल लहलहाती रही। 
दुनिया के अनेक देशों में स्वास्थ्य के अधिकार को बकायदा मौलिक अधिकार का दर्जा दिया गया है लेकिन भारत सरकार अपने नागरिकों को समुचित प्राथमिक इलाज की भी व्यवस्था नहीं कर पाई। अनेक योजनाएँ अवश्य प्रारंभ हुई पर भ्रष्टाचार और प्रशासनिक ढिलाई की भेंट चढ़ गई। इसका सबसे बड़ा खामियाजा हमारे गाँव और गरीब को भुगतना पड़ा। मोदी सरकार की स्वास्थ्य नीति में सबसे महत्त्वपूर्ण बात स्वास्थ्य को मौलिक अधिकार का दर्जा देना है। यदि ऐसा होता है तो सरकार की विभिन्न महत्त्वपूर्ण योजनाएँ स्वास्थ्य सेवा के केन्द्र में रखकर बनाई जाने लगेंगी। दूसरी मुख्य बात इस मसौदे में यह है कि स्वास्थ्य पर सार्वजनिक व्यय को बढ़ाकर जीडीपी के 2.5 प्रतिशत तक लाना, जो अभी उसका 1.2 प्रतिशत है। इसके अलावा प्रसव के दौरान जच्चा-बच्चा की मृत्यु की घटनाओं में कमी लाने के प्रयासों पर जोर, संक्रामक रोगों पर नियंत्रण पर प्रमुखता से ध्यान, असंक्रामक रोगों की बढ़ती संख्या से निपटने का प्रयास, सरकारी अस्पतालों में सभी को मुफ्त दवाएँ और रोग जाँच सुविधाएँ उपलब्ध कराने का प्रस्ताव तथा सार्वजनिक क्षेत्र के साथ निजी क्षेत्र की भूमिका पर भी जोर है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने बीमारियों का जो अंतरराष्ट्रीय वर्गीकरण किया है, उसके अंत में जेड-59.5 कोड नाम जिस बीमारी को दिया गया, वह है नितांत गरीबी। हमारी सरकार को यह मूल बात समझना पड़ेगा कि दुनिया का सबसे बड़ा रोग नितांत गरीबी से हमारा देश अभी नहीं उबरा है और अगर उबर भी जाए तो भी बुनियादी प्राथमिक शिक्षा एवं स्वास्थ्य की जिम्मेदारी सरकार की ही है और रहेगी भी। कोई निजी अस्पताल नुकसान उठाकर यह सेवा नहीं देनेवाला। उसकी स्थापना तो देशी अमीरों तथा डॉलर के लिए विदेशियों के इलाज हेतु हेल्थ टुरिज्म या हॉस्पिटल हॉस्पिटेलिटी के लिए किया जाता है। उसे बीमार, गरीब और गाँव से क्या मतलब?  
केन्द्र सरकार की नई स्वास्थ्य नीति आशा जगाती है। सरकार सभी वर्गों को घर के करीब प्राथमिक चिकित्सा की समुचित व्यवस्था करे। समय पर समुचित प्राथमिक उपचार मिल जाने से नब्बे प्रतिशत बीमारियों का इलाज वहीं हो जाता है। समाज के सभी वर्गों को समान रूप से स्वस्थ परिवेश में जीने की यह मौलिक आवश्यकता है। अगर यह मिल जाए तो कोई अमन अनेक बड़े अस्पतालों के दरवाजे से दुरदुराए जाते हुए समुचित इलाज के अभाव में दम नहीं तोड़ेगा। किसी अविनाश के माता-पिता व्यवस्था से व्यथित होकर एकसाथ छत से छलाँग लगाकार खुद अपना विनाश नहीं करेगा।

Wednesday, September 2, 2015

समान शिक्षा तो प्राथमिक सोपान है

इलाहाबाद उच्च न्यायालय का शिक्षा में बुनियादी सुधार से संबंधी अहम् फैसला आए चौबीस घंटे भी नही बीते थे। समान स्कूलिंग व्यवस्था का सपना देखने वाले शिक्षाविद्, समान शिक्षा के लिए संघर्षरत अनेक स्वैच्छिक संगठन तथा मीडिया इसका स्वागत व विवेचन की तैयारी में ही लगे थे कि उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा शिव कुमार पाठक को नौकरी से बर्खास्त कर देने का समाचार आ गया। जिससे साफ पता चल गया कि सरकार को अदालत का यह फैसला कितना नागवार गुजरा है। प्रदेश में शिक्षा की बदहाल स्थिति के खिलाफ इलाहाबाद उच्च न्यायालय में लम्भुआ सुल्तानपुर के शिक्षक शिव कुमार पाठक ने ही इलाहाबाद उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी। इस जनहित याचिका पर न्यायाधीश सुधीर अग्रवाल की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने दो टूक फैसला सुनाते हुए कहा कि सभी नौकरशाहों, कर्मचारियों, न्यायाधीशों और जनप्रतिनिधियों के बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ें। अदालत का कहना है कि अगर सरकार से वेतन लेने वालों के बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ने लगेंगे तो सरकारी स्कूलों की स्थिति सुधर जाएगी। अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार के मुख्य सचिव को छह माह के भीतर उक्त व्यवस्था करने का आदेश दिया है।
जब  सर्वोच्च न्यायालय के अनेकों हस्तक्षेप के बाद शिक्षा का अधिकारकानून बना था तो लग रहा था कि वे दिन अब करीब हैं जब अमीर और गरीब सबको अनिवार्य और समान शिक्षा एक साथ मिल पायेगी। सरकार या राज्य यह व्यवस्था करेगी कि प्रधानमंत्री से लेकर एक अदने से चपरासी और टाटा, बिड़ला, अंबानी तथा झुग्गी-झोपड़ी में रहनेवाले के बच्चे, सभी एक साथ अपने घर के करीब समान सुविधाओं वाली शिक्षा प्राप्त करेंगे। परंतु इस कानून में ऐसे-ऐसे नियम व शर्तें जोड़ दी गई कि कानून अमल में आते ही सारे सपने टूट-बिखरकर भ्रष्टतंत्र और शिक्षा के दलालों के प्राइवेट स्कूलों की दहलीज पर घुटने टेक बैठा। देश के अभागे गरीब, दलित बच्चे निरंतर अव्यवस्था के शिकार सरकारी स्कूलों में प्रदुषित मिड डे मील खाने और सिर्फ देश की साक्षरता के आँकड़े बढ़ाने के लिए बच गए।  
स्वतंत्रता संग्राम में अपना सब कुछ बलिदान करने वाले स्वतंत्रता सेनानियों एवं संविधान निर्माताओं का सपना था कि देश के सभी नागरिकों को राजनीतिक, आर्थिक एवं सामाजिक जनतंत्र मिले और इसकी बुनियाद समान शिक्षा का अधिकार है। संविधान के अनुच्छेद 21ए से मिली शिक्षा को मौलिक अधिकार व अनुच्छेद 45 में दर्ज नीति-निर्देशक सिद्धांत सभी के लिए शैक्षिक अवसरों की समानता तय करने का प्रावधान करते हैं। 1966 में कोठारी आयोग, 1985-86 की नई शिक्षा नीति से लेकर अनेक समितियों और रिर्पोटों ने समान शिक्षा प्रणाली को मान्यता दी गई। इसके अलावा समान पड़ोस में समान स्कूलिंग व्यवस्था के लिए अनेक शिक्षाविद् व स्वैच्छिक संगठन मांग करते रहे तथा आंदोलनरत रहे। परंतु सरकारी तंत्र निरंतर प्राथमिक शिक्षा की बदहाली को देखकर देखकर भी अनदेखा किए रहा। शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे अपने मूलभूत कर्त्तव्यों से निरंतर मुँह मोड़े रहने का ही परिणाम है कि अदालतों को बार-बार हस्तक्षेप कर आदेश व चेतावनी देनी पड़ रही है।
दशकों शिक्षा की उपेक्षा के कारण ही प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्चतम शिक्षा तक में निजीकरण का बोलबाला हो गया। आज गाँवों से लेकर महानगरों तक, सभी जगह निजी स्कूलों का ही बोलबाला है। गरीब से गरीब भी जो अपने बच्चों को पढ़ाना चाहता है, वह सरकारी स्कूलों की तरफ देखना नहीं चाहता और निजी स्कूलों के जालफाँस में फँसने को मजबूर है। सरकारी स्कूलों की स्थिति निरंतर जर्जर होती चली गई। शिक्षकों की भर्ती वर्षों से नहीं हो रही है, उसकी जगह पर मामूली वेतन पर ठेके या संविदा पर शिक्षक रखे जा रहे हैं, जिनके पास न तो समुचित डिग्री है न ही वे प्रशिक्षित होते हैं। संविदा शिक्षकों की नियुक्तियाँ शिक्षा को बेहतर बनाने के नजरिये से नहीं, बल्कि पंचायत स्तर पर ही वोट बैंक, भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद को ध्यान में रखकर की जाती हैं। शिक्षकों को भी यह एहसास है कि नौकरी उन्हें उपकृत करने के लिए दी गई है, पढ़ाने के लिए नहीं। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस फैसले में उत्तर प्रदेश में भी शिक्षकों की भर्ती की प्रक्रिया को गलत बताया है। सरकारी स्कूलों का स्तर इतना गिर चुका है कि शिक्षक खुद अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में पढ़ने नहीं भेजते।
राजनेता, मंत्री, अफसर व सरकारी कर्मचारी जिनके पास नीतियों को लागू करने का अधिकार और पैसा दोनों है, वे जब अपने बच्चों को निजी स्कूलों में पढ़ाते हैं तो सरकारी स्कूलों की सुध लेने वाला कौन बचता है? संविधान के दर्शन, अच्छे से अच्छे कानून एवं नीतियां सिर्फ हाथी के दाँत बनकर रह जाती हैं। देश के सभी जाने-माने शिक्षाविदों से लेकर आमजन और इलाहाबाद उच्च न्यायालय का भी यही मानना है कि जब देश के नीति निर्माताओं, उसके अनुपालन करवाने वाले तथा अन्य सक्षम लोगों के बच्चे भी इन स्कूलों में पढ़ने लगेंगे तभी वे इन स्कूलों की मूलभूत सुविधाओं और शैक्षिक गुणवत्ता सुधारने की ओर ध्यान देंगे।
न्यायालय का फैसला वर्तमान शिक्षा व्यवस्था की वजह से समाज में गरीब और अमीर, शक्तिशाली और सामान्य के बीच लगातार बढ़ती दरार को भी पाटने का प्रयास है। आज समाज में जितनी भी हिंसा और उथल-पुथल मची है, वह समाज में अनेक वर्गों के बीच बढ़ती इस शैक्षिक विषमता का परिणाम है। प्राथमिक शिक्षा ही वह बुनियाद है जिसके बल पर कोई देश और समाज रूपी महल तैयार होता है। अगर बुनियाद की तामीर ही सामाजिक भेदभाव एवं अनेक वर्गों में अलगाव के विषाक्त गारे पर पड़ेगी तो महल को बनने से पहले भरभराकर विध्वंस होने से कौन बचा पाएगा!

आज पूरा देश, खासकर हिन्दी प्रदेशों एवं उत्तर प्रदेश सरकार को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले को आने वाले समय के गंभीर परिणामों से बचने के लिए एक अवसर एवं चुनौती दोनों रूप में स्वीकार करना चाहिए। फैसले को सकारात्मक भाव से लेकर समाज में समन्वय का बीज वपन कर सभी नवांकुरों को समान रूप से बढ़ने, फलने-फूलने का माहौल पैदा करना चाहिए। न कि याचिकाकर्ता शिव कुमार पाठक को दंडित-उत्पीड़ित कर और इस फैसले को सर्वोच्च न्यायलय में चुनौती देकर मुद्दे को टालने का प्रयास करना चाहिए। सरकार को समझना चाहिए कि अब समय काफी बदल चुका है। अब लैपटॉप, बेरोजगारी भत्ते और मिड डे मील के लालीपॉप से गुणवत्तापूर्ण समान शिक्षा की यह भूख शांत नहीं होने वाली है। समान स्कूलिंग या समान शिक्षा की माँग तो प्राथमिक सोपान है। अगर इस सोपान पर देश के सभी बच्चों के कदम एकसाथ मजबूती से जम जाये तो वह राजनीतिक जनतंत्र के साथ-साथ सामाजिक एवं आर्थिक जनतंत्र का मार्ग प्रशस्त करेगा! 

Thursday, June 4, 2015

कल्पवृक्ष बना वंशवृक्ष

भारतीय जनमानस में बहुत गहरे तक यह व्याप्त है कि कल्पवृक्ष से जिस वस्तु की भी याचना की जाए, वह उसे यह दे देता है। इसका नाश कल्पांत तक नहीं होता। कल्पवृक्ष देवलोक का एक वृक्ष है। पुराणों के अनुसार समुद्रमंथन से प्राप्त 14 रत्नों में कल्पवृक्ष भी था। यह इंद्र को दे दिया गया था और इंद्र ने इसकी स्थापना सुरकानन में कर दी थी। यही कारण है कि हम भारतीय अनेक वृक्षों को कल्पवृक्ष मानकर पूजा करते हैं और कामना करते हैं कि उसकी कृपा से हमारी सारी मनोकामनाएँ पूरी हो जाएँगी। यह कल्पना या विश्वास कुछ इसी तरह का है जैसा कि महात्मा गांधी का रामराज्य की अवधारणा। स्वतंत्रता के समय देश की अधिकांश जनता ने गांधी जी एवं अनेक जननेताओं के नेतृत्व में स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लिया और अनेकों कुर्बानियाँ इस सोच के साथ दीं कि कांग्रेस नामक कल्पवृक्ष के छाया तले सबके प्रयासों से गुलामी से मुक्ति मिलगी और राम राज्यकायम होगा।
सदियों की गुलामी से मुक्ति मिली। अपने लोगों के हाथ में शासन की बागडोर भी आ गई। गांधी का कांग्रेस जो कभी विविध वृक्षों का बागीचा था वह शासन में आते ही राष्ट्रीय वृक्षबरगद की भूमिका में आ गई बरगद के वृक्ष की शाखाएँ दूर-दूर तक फैली हुई तथा जड़ें गहरी होती हैं। जड़ों और तने से और शाखाएँ बनती हैं। इसके इस विशेषता के कारण इसे अक्षय वटभी कहा जाता है, क्योंकि यह पेड कभी नष्ट नहीं होता है। इसकी छाया तले पशु-पक्षी एवं अनेक जीव-जंतु सुकून, भोजन एवं आवास पाते हैं और कल्पवृक्ष का एहसास करते हैं। आज भी गाँव के लोग इसी पेड़ की छाया में पंचायत करते हैं, यह मानकर कि यहाँ नीर-क्षीर-विवेक होगा और इंसाफ मिलेगा।
परंतु आजादी के छः दसकों बाद लोगों का यह भ्रम अब पूरी तरह से टूट गया है कि जिस कांग्रेेस रूपी कल्पवृक्षने उन्हें रामराज्यका सपना दिखाया था वह स्वप्न ही बनकर रह गया। कांग्रेस जिस बरगद को कल्पवृक्ष मानकर जनता को यह विश्वास दिलाती रही कि बरगद के समान ज्यों-ज्यों वह पुरानी होगी त्यों-त्यों उसके नये बरोह धरती की ओर फैलता जाएगा व नयी जड़ बनकर उसकी शाखा पूरे देश में फैल जाएगी। उसके तले सारे देश का रामराज्यका सपना साकार होगा। परंतु हुआ इसका उल्टा क्योंकि जिस बरगद को जनता ने कल्पवृक्ष समझा था वह कुछ सालों बाद ही वंशवृक्ष में तब्दील हो गया और एक ही परिवार का राज कायम हो गया। लोगों को यह बात बहुत बाद में समझ आया कि कांग्रेस जो कि कभी विविध वृक्षों की एक बाग थी बाद में क्रमशः जो भी उसके जड़ एवं तने का हिस्सा बनने से इंकार किया, उन वृक्षों को इस बाग से असमय उखाड़ दिया गया या पलायन को मजबूर कर दिया गया। उसी के नकल में अनेक प्रदेशों में भी कुछ ही वंशवृक्ष का शासन कायम होता गया। जो अब बड़ी ही निर्लज्जता से अपने परिवार एवं कुनबे के विकास तक ही सीमित होकर रह गया है। 
इस सच्चाई से कोई मुँह नहीं मोड़ सकता है कि वट वृक्ष के तले अनेक जीवों का पालन-पोषण होता है। परंतु यह भी सच्चाई है कि इसके आस-पास किसी भी स्वतंत्र पेड़-पौधों का पनपना और विकसित होना मुश्किल है। इसमें कुछ घास-झाड़ी वगैरह उगते भी हैं तो वे जड़विहीन होते हैं। सिर्फ देखने भर की उनमें हरियाली होती है। इतने बड़े भौगोलिक, सामाजिक, धार्मिक, अनेक विविधताओं से भरे इस देश में जिसमें अगर हम सिर्फ भौगोलिक एवं वनस्पति की विविधता पर ही नजर डालें तो भारत को अनेक वनस्पति प्रदेशों में वर्गीकृत किया जाता है- हिमालय प्रदेशीय या पर्वतीय वृक्ष, उष्णार्द्र सदाबहार वृक्ष, आर्द्र मानसूनी वृक्ष, उष्णार्द्र पतझड़ वृक्ष, मरुस्थलीय वृक्ष तथा दलदली अथवा ज्वार भाटा क्षेत्रों के वृक्ष। इन वृक्षों व वनों में हजारों तरह के विविध पेड़-पौधे हैं जो वहाँ की भौगोलिक परिस्थितियों के अनुरूप यहां के बाशिन्दों एवं पर्यावरण को जीवंत बनाते हैं।
गांधी जी जब रामराज्यकी बातें करते थे तो साथ में यह जोड़ना नहीं भूलते थे कि हर व्यक्ति, हर गाँव, हर प्रदेश स्वावलंबी होगा तभी स्वराज और रामराज्य आएगा। यही कारण है कि जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी यह कहते हैं कि देश का सिर्फ दिल्ली या अकेला प्रधानमंत्री नहीं, बल्कि इंडिया टीमयानी प्रधानमंत्री के साथ सभी राज्यों के विभिन्न दलों के मुख्यमंत्री मिलकर काम करें, तभी देश का एक समान विकास होगा। तो इस पर जनता का भारी समर्थन मिलता है। प्रधानमंत्री को इससे एक कदम आगे बढ़कर सभी जिला पंचायतों और ग्राम पंचायतों को भी अपनी इस टीम में शामिल कर सबकी भागीदारी सुनिश्चित करनी चाहिए ताकि हर गाँव, हर शहर, हर प्रदेश के लोग अपनी परिस्थितियों एवं विविधताओं के अनुरूप एक दूसरे के सहयोग से खुद स्वावलंबी बनंे तभी देश सही मायने में प्रगति करेगा।
भारतीय मानस में पैठा कल्पवृक्ष या रामराज्य की अवधारणा कोई कल्पना या यूटोपिया भले लगती हो, परंतु इसे ठीक से समझने की आवश्यकता है। अगर हम सही अर्थों में सबका साथ सबका विकासके नीतिवाक्य पर चलते हुए विविध पेड़-पौधों को विकसित होने दें तो, हमें अनेकों फल मिलेंगे, हजारों फूल खिलेंगे, हजारों तरह की रंग-बिरंगी चिड़िया चहचहाएँगी। सभी जीव-जंतु भारत के इस उपवन को गुलजार करेंगे। समय से सभी मौसम आएँगे। नदियाँ निर्बाध बहेंगी। बर्फ में ढके पर्वत नर्म धूप से नहा कर आभा बिखेरेंगे। सभी खेत हरे-भरे रहेंगे। किसान शाम को चौपालों पर कहकहे लगाएँगे। बच्चे खिलखिलाएँगें। सभी को समान रूप से शिक्षा, स्वास्थ्य एवं सुरक्षा जैसी मूल सुविधाएं मिलेगा।

 उसके लिए हमें अपने कल्पना-लोक से उतरकर जमीनी वास्तविकताओं को समझना पड़ेगा कि कल्पवृक्ष कोई एक पेड़ नहीं बल्कि विविध विशेषताओं वाली वनस्पतियाँ एवं पेड़-पौधे मिलकर कल्पवृक्ष बनते हैं। सभी के अनेक गुणों से ही पूरा पारिस्थितिकीय संतुलन कायम रहता है। इसी के मधुर फल से हमारी सारी मनोकामनाएँ पूरी हो सकती है। देश के सभी लोगों के इमानदारी पूर्वक समवेत प्रयास से ही रामराज्यभी संभव है।