विरुद्धों से सामंजस्य
हाल के दिनों में, ठीक बिहार विधानसभा के चुनाव के दौरान मीडिया और बुद्धिजीवियों का एक
खास तबका यह साबित करने पर तुला हुआ है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की केन्द्र
सरकार और उनकी पार्टी की नीतियों सेे देश में अचानक असहिष्णु एवं हिंसक माहौल बन
गया है। इसमें विचारों की स्वतंत्रता, स्वतंत्र साहित्य, कला, तर्क और ज्ञान-विज्ञान की जगह सिकुड़ती जा रही है। हालात बड़ी तेजी से
बेकाबू हो रहे हैं कि लेखकों, कलाकारों के लिए सकारात्मक-रचनात्मक कुछ
कर पाना संभव नहीं रह गया है। इसके विरोध के लिए उन्होंने जिस मार्ग को चुना वह
एकतरफा राष्ट्रीय सम्मानों की वापसी की है।
ऐसी स्थिति में
प्रधानमंत्री के सामने दो ही रास्ते थे एक तो यह कि वे बिहार विधानसभा के चुनावी
भाषणों में ही चीख-चीखकर इस आरोप पर भी सफाई देते रहते। दूसरा, चुप रहते हुए इसे चुनावी विवादों से परे मानते हुए परिपक्वता से एक
ऐसा संदेश देते कि देश और दुनिया में बनाये जा रहे इस कृत्रिम प्रदूषित धुंधलके को
छंटने में सहायक हो।
उन्होंने दूसरा
रास्ता चुना और जगह भी संसदीय जनतंत्र की जननी माने जाने वाले स्थान लंदन को।
उन्होंने दो व्यक्तित्व भी ऐसे चुने जो भारत के आलोचनात्मक विवेक और जनतंत्र के
पुरोधा माने जाते हैं। ऐसे दो महान व्यक्ति हैं भारतीय संविधान के निर्माता डॉ.
भीमराम अंबेडकर तथा 12वीं शताब्दी में ही संसदीय जनतंत्र के विचारों के अलख जगाने
वाले संत बसवेश्वर। इन दोनों की प्रतिमा तथा स्मारक का अनावरण एवं लोकार्पण करते
हुए उन्होंने शंकाग्रस्त बुद्धिजीवियों तथा बयानवीर पुरातनपंथियों दोनों को सीधा
संदेश दिया कि भारत आज भी इन्हीं महान लोगों के विचारों के साथ खड़ा है जो
अंधविश्वास, अंधश्रद्धा, धार्मिक पाखंड, जात-पात, छुआछूत का विरोध करते हुए अपने समय में बागी बन गए थे।
संत बसवेश्वर (वर्ष
1134-1168) का काल सभी तरह के संकीर्णताओं से आक्रांत था। बसवेश्वर बीच-बाजार और
चौराहे के संत थे। वे आम जनता से अपनी बात पूरे आवेग और प्रखरता के साथ करते थे।
जाति रहित समाज की स्थापना करने और भेदभाव तथा छुआछूत मिटाने के लिए उन्होंने ऊंची
जाति ब्राम्हण कन्या ‘रत्ना’ का विवाह नीची दलित, अस्पृश्य ‘शीलवंत’ नामक युवक से करवाया। जिसका मूल्य उन्हें
अपने सबसे प्रिय शिष्य के बलिदान से चुकाना पड़ा था। उन्होंने उसी काल में आदर्श
संसद (अनुभव मंटप) का निर्माण किया था जिसमें पुरुष और महिलाएं तथा समाज के सभी
वर्ग एवं जाति के लोगों की समान संख्या में भागीदारी थी और वे खुले वातावरण में
बहस को प्रोत्साहित करते थे। जिसका रूप आज हमें संसदीय लोकतंत्र के रूप में हमें
देखने को मिला है।
लंदन में
प्रधानमंत्री ने संविधान निर्माता और दलितों के मसीहा डॉ. अंबेडकर को समर्पित
स्मारक का उद्घाटन किया। ब्रिटेन प्रवास के दौरान एक छात्र के रूप में 1920 के दशक
में डॉ. अंबेडकर इसी इमारत में रहा करते थे और भारत ने अभी दो महीने पहले ही इस
बंगले को अधिग्रहित किया है। आज भारतीय जनतंत्र इस बात पर इतराता है कि उसके
संविधान के निर्माण के लिए एक ऐसा व्यक्ति मिला जिसने पूरी दुनिया की तमाम
संविधानों की अच्छाइयों को लेकर भारत का संविधान बनाया। समानता, न्याय तथा विविधता जैसी जनतंत्र की तमाम खूबियों को सामंजस्य के
संविधान के प्रावधानों में डाला। इसी का परिणाम है कि भारतीय लोकतंत्र पर आपातकाल
लादने जैसी अनेक बाधाओं के बाद भी दिनों-दिन भारत में जनतंत्र की जडें़ मजबूत होती
रही हैं। समाज की सभी जातियों, समुदायों एवं वर्गों का प्रतिनिधित्व
राजनीति एवं समाज के हर क्षेत्र में लगातार बढ़ रही है।
आज का भारत बनने का
इतिहास राजनीतिक, धार्मिक एवं सामाजिक रूप से अनेक प्रकार
के उथल-पुथल, आपदाओं, विपदाओं, अनेक संकटों एवं संघर्षों के बीच से
गुजरते हुए लोकतांत्रिक भारत बनने की कहानी रही है। इसमें बुद्ध, महावीर के उपदेशों, भक्तिकाल के अनेक संतो एवं कवियों के
अनमोल विचारों, ज्योतिबा फुले, राजाराम मोहन राय स्वामी दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद, ईश्वरचंद विद्यासागर जैसे समाज सुधारकों
तथा गांधी, तिलक एवं अंबेडकर जैसे अनेक स्वतंत्रता
सेनानियों, क्रांतिकारियों एवं संविधानविदों के
अनथक प्रयासों के फलस्वरूप ही हमें स्वतंत्र लोकतांत्रिक भारत मिला है।
इसका यह कदापि अर्थ
नहीं है कि हमारे देश एवं समाज में सबकुछ ठीक ठाक है या हम एक आदर्श लोकतंत्र को
प्राप्त कर चुके हैं। आज भी हम जातिवाद, धार्मिक उन्माद, लैंगिक भेदभाव, अंधविश्वास, भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद जैसे अनेक लोकतांत्रिक मर्यादाओं के विरुद्ध जाने वाले
इन समस्याओं के निकृष्टतम एवं घृणित रूप से न केवल दो-चार होते रहें हैं, बल्कि कभी-कभी तो हमारे समाज में ऐसी घटनाएं घटित होती रहती हैं कि
शक होने लगता है कि हम एक लोकतांत्रिक देश और समाज हैं भी की नहीं? ऐसे ही समय में तमाम लोकतांत्रिक संस्थाओं को कसौटी पर खरे उतरने एवं
लोकतंत्र एवं संविधान के अनुरूप फैसले करने का समय होता है। हमारे बौद्धिक वर्ग को
भी परखने का यही समय होता है कि वे अपने आलोचनात्मक विवेक से बिना किसी जाति, जाति, धर्म, सत्ता एवं दल के दवाब में आए देश के सुप्त पड़ी जनता की आवाज को
रचनात्मक रूप से मुखरीत करे।
इन दो महान विभूतियों
अंबेडकर और बसवेश्वर के विचारों को मुखर अभिव्यक्ति देकर प्रधानमंत्री श्री
नरेन्द्र मोदी ने देश के अंदर और बाहर के तमाम लोगों को साफ संदेश दिया है कि वे
खुद और उनकी सरकार देश में आलोचनात्मक विवेक को सम्मान देती है। हमेशा विरुद्धों
से सामंजस्य, समन्वय और संवाद के रास्ते खुले रखते
हैं। बशर्तें कि सामने वाला भी लोकतांत्रिक मानदंडों के अनुरूप तर्क, आलोचना, विवेचना और संवाद के माध्यम से समाधान
की ओर बढ़ने की माद्दा रखता हो।
लोकतंत्र के चौथे
स्तंभ मीडिया एवं बौद्धिक वर्ग को सरकार की नीतियों एवं कार्यों पर हमेशा आलोचना, समालोचना एवं प्रश्नाकिंत करते रहना आवश्यक है, परंतु अपने निजी खुन्नस या किसी दल के समर्थन में भेड़िया आया, भेड़िया आया का शोर मचाकर पूरे समाज को भेड़ियाधसान हो जाने के लिए
उत्प्रेरित करना हमारे जड़ जमाते जनतंत्र के लिए घातक प्रवृत्ति की परंपरा डाल सकती
है। जिसकी परिणति निरपेक्ष एवं लोकतंत्र के प्रहरी माने जाने वाले मीडिया और
बौद्धिक वर्ग को सत्ताधारी राजनीतिक दल, विपक्षी दलों या किसी खास वैचारिक गुट के प्रति प्रतिबद्ध या
पिछलग्गू हो जाने के लिए मजबूर किया जा सकता है। ऐसी प्रवृति हमारे देश, समाज और लोकतंत्र के लिए मंगलकारी नहीं हो सकता।